Wednesday, November 21, 2012

जब तक है जान


फिल्म समीक्षा

यश चोपड़ा का आखिरी रोमांस: जब तक है जान 

धीरेन्द्र अस्थाना

शाहरुख खान को लेकर यश चोपड़ा सन् 2004 में बेहद संवेदनशील और मर्मस्पर्शी फिल्म ‘वीर जारा‘ लेकर आए थे। फिर लंबे समय तक वह मौन रहे। आठ वर्ष बाद 2012 में वह शाहरुख खान को ही लेकर फिल्म ‘जब तक है जान‘ लेकर आए। अपने अस्सीवें जन्मदिन 27 सितंबर 2012 को हुए एक समारोह में यश जी ने घोषणा की थी कि यह उनके निर्देशन की अंतिम फिल्म है। तब किसे पता था कि इस घोषणा के कुछ ही दिनों बाद यानी 21 अक्टूबर 2012 को यश जी इस दुनिया से विदा ले लेंगे। दुखद बात यह है कि अपनी अंतिम फिल्म को यश जी रिलीज होते हुए नहीं देख पाए। बहरहाल ‘जब तक है जान‘ यश जी का अपने अंदाज में रचा गया आखिरी रोमांस है जो दर्शकों को शाहरुख खान की इमोशनल और अनुष्का शर्मा की खिलंदड़ी अभिव्यक्ति के लिए याद रहेगा। यश जी रोमांस के बादशाह कहे जाते थे। वह अपनी हर फिल्म में प्रेम में का कोई नया ही अंदाज लेकर आते थे। लेकिन इस फिल्म में वह कोई नयी कहानी नहीं कह पाए। हालांकि फिल्म टुकड़ों में बहुत अच्छी है और दिल को छू लेने में कामयाब है। लेकिन कुल मिलाकर फिल्म बोझिल और लंबी हो गयी है। उस पर शाहरुख खान का दो-दो बार हुआ एक्सीडेंट तथा याददाश्त का आना-जाना पुराने फार्मूलों की याद दिलाता है। कैटरीना कैफ ने शाहरुख खान के साथ जो डांस किया है वह लाजवाब है और उसी के लिए कैटरीना को याद भी रखा जाएगा। अभिनय के मामले में इस बार वह पिछड़ गई हैं। अनुष्का का दिलकश और खिलंदड़ा अभिनय फिल्म की यू एस पी है। वह फिल्म के प्रेम त्रिकोण का तीसरा कोण बनकर उभरती हैं और दर्शकों की सहानुभूति बटोर ले जाती हैं। फिल्म के एक दृश्य में वह हंसी और भावुकता के मिले-जुले अंदाज में शाहरुख खान से कहती हैं, ‘मेरी जेनरेशन में तो मुझे तुम्हारे जैसा लवर कोई मिलेगा नहीं और मैं पड़ गई हूं तुम्हारे प्यार में। तुम हो कि मुझसे प्यार करोगे नहीं। क्योंकि तुम तो मीरा (कैटरीना) के इंतजार में रुके हुए हो। तो अपनी तो लग गई बॉस।‘ यह छोटा सा दृश्य और इसकी भावाभिव्यक्ति इतनी भावप्रवण थी कि दर्शक अपनी आंख पोछ रहे थे। इंडियन आर्मी के बम निरोधक दस्ते के मुखिया के रफ-टफ किरदार में शाहरुख ने ज्यादा प्रभावित किया बजाय कैटरीना के प्रेमी के किरदार के। कैटरीना एक एनआरआई लड़की हैं। शाहरुख फिल्म के पहले हाफ में लंदन में कायदे का रोजगार ढूंढ़ रहे युवक और अंतिम हाफ में आर्मी ऑफिसर। अनुष्का हैं डिस्कवरी चैनल के लिए रोमांचक फिल्में बनाने वाली जांबाज और बिंदास निर्देशिका। जो शाहरुख पर फिल्म बनाने के दौरान उनसे टकराती है और उनके प्यार में पड़ जाती है। यश जी की इस आखिरी प्रेम कहानी को देख लेना चाहिए। 

निर्देशक: यश चोपड़ा
कलाकार: शाहरुख खान, कैटरीना कैफ, अनुष्का शर्मा, ऋषि कपूर, नीतू सिंह, अनुपम खेर।
गीत: गुलजार
संगीत: ए आर रहमान

लव शव ते चिकन खुराना


फिल्म समीक्षा

तड़केदार लव शव ते चिकन खुराना

धीरेन्द्र अस्थाना

जिस फिल्म में बतौर प्रोडय़ूसर या डायरेक्टर अनुराग कश्यप का नाम जुड़ा हो इसका अच्छा होना लाजिमी है। इसलिये बहुत उम्मीद के साथ यह फिल्म देखनी शुरू की थी। उम्मीद टूटी भी नहीं। कथा पटकथा, संवाद संपादन-संगीत- अभिनय-बैक ड्राप हर मोर्चे पर ‘लव शव ते चिकन खुराना‘ एक बेहतरीन अनुभव से गुजरती है। एक ताजा अनुभव दिलचस्प भी अर्थपूर्ण भी है। बिना स्टाकर कास्ट और बड़े वजट की हुए बिना एक मनोरंजक फिल्म जो अपने पंजाबी तड़के की वजह से चटपटी भी लगती है। कहानी बहुत साधारण सी लेकिन उत्सुकता से भरी हुई है। और माहौल एकदम घरेलू। पंजाब के किसी गली मोहल्ले में घटती कोई साझा परिवार की उथल पुथल भरी वास्तविकता जिंदगी जैसी। यहां सिनेमा का जादुई यथार्थवाद नहीं यथार्थवाद पर खड़ा जादुई सिनेमा है। जो सिर चढ़कर बोलता है। इस पर कुणाल कपूर और हुमा कुरैशी का महज और जीवंत अभिनय। कहानी अनुराग कश्यप वाले अंदाज में घटती हुई- फ्लैशबैक में आवाजाही। निदेॅशक भले ही समीर शर्मा हैं लेकिन कहानी कहने का अंदाज अनुराग वाला ही है। कुछ बनने का सपना लेकर कुणाल घर से पैसे चुराकर लंदन भाग जाता है। लंदन में असफल हो कर पूरे दस साल बाद पंजाब के अपने गांव आता है। लंदन के एक गैंगस्टर का चालीस हजार पाउंड का कर्जदार होकर। गांव आकर यह पता चलता है किदादा जी की याददाश्त जा चुकी है। और उनका खाने का ढाबा बंद पड़ गया है। दादा जी जो मशहूर चिकन खुराना बनाते थे और जिसके दम पर ढाबा सोना उगलता था इस चिकन खुराना का नुस्खा किसी को पता ही नहीं था। फिर दादा जी मर जाते हैं और विरासत में बंद ढाबा कुणाल के नाम कर गये हैं। कुणाल अपनी बचपन की दोस्त हुमा कीमदद से चिकन बनाने की कोशिश करता है लेकिन सफल नहीं हो पाता। एक दिन उसे दादा जी के दवाई के डिब्बे में से वह मसाला मिल जाता है जिससे चिकन खुराना बनता था। क्या था वह मसाला और कैसे पूरी फिल्म एकखुशनुमा मोड़ पर आकर विराम लेती है, यह जानने के लिये फिल्म देख आइये, मजा आयेगा। किरदारों से भरी हुई है फिल्म लेकिन हर चरित्र अपनी छाप छोड़ता है। अमित त्रिवेदी का संगीत सुंदर है। 

निर्देशक: समीर शर्मा
कलाकार: कुणाल कपूर, हुमा कुरेशी, राजेश शर्मा, विनोद नागपाल, डॉली अहलूवालिया, राहुल बग्गा, अनंगशा विस्वास।
संगीत: अमित त्रिवेदी।

चक्रव्यूह


फिल्म समीक्षा

सत्ता और क्रांति का:चक्रव्यूह‘

धीरेन्द्र अस्थाना

एक ऐसे समय में जब नक्सलवाद का नाम लेना भी एलानिया तौर पर रिस्की हो गया है, प्रकाश झा नक्सलवाद पर पूरा विमर्श और एक्शन लेकर ही आ गये हैं। दर्शकों और आलोचकों को कम से कम इस मायने में प्रकाश झा को सलाम करना चाहिए कि उन्होंने सत्ता के दमन के विरुद्ध जनता के लामबंद संघर्ष को व्याख्यायित और रेखांकित करने का साहस दिखाया। माना कि आम तौर पर अर्थपूर्ण सिनेमा बनाने वाले प्रकाश झा बाजार की मांग भी पूरी कर देते हैं तो भी यह क्या कम है कि वह मनोरंजन की आंधी में विचार का दीपक जलाये रखते हैं। ‘चक्रव्यूह‘ उन्होंने बहुत संभल कर बनायी है। नक्सलवाद जैसी समस्या पर फिल्म बनाने के दो खतरे हैं। आप किसी एक तरफ गिर सकते हैं। एक तरफ सत्ता, दूसरी तरफ सत्ता के विरुद्ध चलने वाला हथियार बंद आंदोलन। फिसलने का जोखिम साठ प्रतिशत। मगर प्रकाश झा दोनों अतिरेकों से खुद को बचा लेते हैं और समस्या को विमर्श में बदल देते हैं। वह सब कुछ देखने वाले पर छोड़ देते हैं। अब चक्रव्यूह में केवल दर्शक है, वह भी निहत्था और अकेले। लगभग सभी कलाकारों से प्रकाश झा ने बेहद बढ़िया ढंग से काम लिया है लेकिन नयी अभिनेत्री अंजलि पाटिल से तो उसका सर्वश्रेष्ठ निकलवा लिया है। एक आक्रामक लेकिन संवेदनशील नक्सली लीडर के अपने किरदार को अंजलि ने ऊंचाई पर पहुंचा दिया है। मनोज बाजपेयी को पहचान भले ही रामगोपाल वर्मा ने दिलायी हो लेकिन उन्हें अब केवल प्रकाश झा की फिल्में ही करनी चाहिए। प्रकाश झा उन्हें वह हैसियत दे रहे हैं, जिसकी उन्हें जरूरत भी है और दरकार भी। अपने पुलिसिया काम को समर्पित लेकिन बार-बार सत्ता के दखल से बेचैन अर्जुन राम पाल भी अपने किरदार में जमते हैं मगर फिल्म का सबसे सशक्त चरित्र है अभय देओल का। अपने दोस्त अर्जुन की मदद करने के लिए वह नक्सलियों के दल में सेंध लगाता है लेकिन उनकी विचारधारा और संघर्ष को देख उन्हीं के बीच का हो कर रह जाता है। फिल्म सत्ता और पूंजी की दुरभिसंधि को भी बेनकाब करती है। अंत में प्रकाश झा कोई निष्कर्ष नहीं देते हैं। वह विचार को खुला छोड़ देते हैं। यह आपको तय करना है कि आप चक्रव्यूह को सघन करना चाहते हैं या उसे तोड़ना चाहते हैं। अनिवार्य रूप से देखी जाने वाली फिल्म।

निर्देशक: प्रकाश झा
कलाकार: अभय देओल, अर्जुन राम पाल, ओम पुरी, ईशा गुप्ता, अंजलि पाटिल, मनोज बाजपेयी, समीरा रेड्डी (आइटम डांस)
संगीत: सलीम-सुलेमान

स्टूडेंट ऑफ द ईयर


फिल्म समीक्षा

हिट है ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर‘

धीरेन्द्र अस्थाना

फिल्म देखने के दौरान लगातार यह सोच जारी थी कि करण जौहर की फिल्म है और कोई मैसेज नहीं है, ऐसा कैसे हो सकता है। लेकिन जब लगभग अंत में मैसेज उद्घाटित हुआ तो दिल को राहत भी मिली और खुशी भी कि इतनी खूबसूरती के साथ इतना बड़ा मैसेज दिया गया। लगभग गेम शो के फॉम्रेट में बनायी गयी यह फिल्म मैसेज देती है कि तमाम कम्पटीशन पर आधारित गेम शोज दरअसल रिश्तों को बिगाड़ने का काम करते हैं। अपनी इस नयी फिल्म से करण जिन तीन नये युवाओं को लेकर आये हैं, उन्होंने अपने अपने हुनर से खुद को साबित कर दिया है। वरुण धवन और आलिया भट्ट तो फिल्मी बैकग्राउंड से हैं, इसलिए अभिनय उनके रक्त में है लेकिन सिद्धार्थ मल्होत्रा ने तो अपनी प्रतिभा के दम पर बॉलीवुड में पांव रखा है। तीनों ही युवा अभिनेताओं (एक अभिनेत्री) को भविष्य की उम्मीद कहा जा सकता है। वरुण और सिद्धार्थ में इमरान खान और रणबीर कपूर जैसा चुंबकीय आकर्षण तो नहीं है लेकिन दोनों ने बेहद सधा हुआ अभिनय किया है। आलिया भट्ट के रूप में इंडस्ट्री को नयी ग्लैमर गर्ल मिली है। आने वाला समय उसकी अभिनय क्षमता का परिचय भी देगा, ऐसा लगता तो है। पूरी फिल्म कॉलेज कैंपस, छात्र, छात्रों के सपने, उनके संघर्ष, उनके रोमांस, उनके टकराव, उनके भटकाव और उनके निजी पारिवारिक अंतर्विरोधों पर फोकस करती है। जबर्दस्त एंटरटेनर होने के साथ-साथ फिल्म संवेदनशील और अर्थपूर्ण भी है। कहानी कसी हुई, संवाद चुटीले और गीत मनभावन हैं। पुराने हिट गानों में नये बोल डालकर एक बेहतरीन फ्यूजन रचा गया है। सभी गाने लोकप्रिय हो चुके हैं लेकिन ‘डिस्को दिवाने‘ गीत में काजोल की दमदार मौजूदगी सुखद लगती है। कॉलेज डीन के किरदार में ऋषी कपूर प्रभावित करते हैं। अपने डीन की गंभीर बीमारी की खबर सुनकर कॉलेज के कुछ छात्र पूरे दस साल बाद इकट्ठे होते हैं। कहानी वर्तमान से फ्लैश बैक के बीच आवाजाही करती रहती है। इस प्रक्रिया के दौरान ही घटती हैं कुछ खट्टी मीठी चटपटी और कड़वी कहानियां। इमोशंस को रचने की कला में माहिर है करण। इस फिल्म में भी वह संवेदना का मायालोक खड़ा कर पाये हैं। जमाना हर तरफ कम्पटीशन का है लेकिन यह कम्पटीशन बहुत जानलेवा है दोस्तों। इस कम्पटीशन के खतरनाक रास्तों से बचकर निकलने में ही समझदारी है। बहुत ही प्यारी फिल्म। 

निर्देशक: करण जौहर
कलाकार: सिद्धार्थ मल्होत्रा, वरुण धवन, आलिया भट्ट, ऋषी कपूर, राम कपूर, काजोल
संगीत: विशाल-शेखर

अइया


फिल्म समीक्षा

सपने के भीतर का सपना ‘अइया‘

धीरेन्द्र अस्थाना

अगर सिनेमा एक सपना है तो रानी मुखर्जी की नयी फिल्म ‘अइया‘ सपने के भीतर चलता सपना है। ‘नो वन किल्ड जेसिका‘ के पूरे बीस महीने के बाद रानी की कोई फिल्म आयी है और उसके साथ बतौर प्रोड्यूसर अनुराग कश्यप का नाम जुड़ा है तो यह यकीन तो था कि फिल्म खराब तो नहीं ही होगी। लीक से हटकर बनी हुई फिल्म है और देखे जाने के दौरान थोड़ी सी संवेदनशीलता और थोड़े से दिमाग की मांग करती है। आमतौर पर होता यह है कि हीरो ही हीरोईन के प्यार में दीवाना दिखाया जाता है। ‘अइया‘ में मामला उलट गया है। फिल्म के हीरो पृथ्वीराज को पता ही नहीं है कि रानी मुखर्जी उसके प्यार में मरी जा रही है। एक निम्न मध्य वर्गीय मराठी परिवार की इकलौती कमाऊ लड़की रानी मुखर्जी हमेशा सपनों की दुनिया में विचरण करती रहती है। सपनों में सड़क जैसी गंदगी, ऊबड़ खाबड़पन और कचरा नहीं है। सपनों में यथार्थ से पिटता वर्तमान नहीं है। इसलिए जीवन के यथार्थ से घबरा कर रानी जब तक फैंटेसी की दुनिया में उछलती कूदती, गाती नाचती और रोमांस करती रहती है, खुश रहती है। फैंटेसी से बाहर निकली नहीं कि घर का दारुण यथार्थ, जमाने की किचकिच और उदास एकांत सिर पर नाचने लगता है। जीवन से बार बार का यह पलायन रानी को अपने कॉलेज के एक पेंटर छात्र पृथ्वी राज की तरफ आकर्षित कर देता है। अंत से पहले तक पृथ्वीराज को एक रफ-टफ, रूखा और कुछ कुछ बदतमीज किस्म के किरदार में पेंट किया गया है। इसके इर्द-गिर्द दारू पीने और ड्रग्स लेने की कहानियां फैली हुई हैं। उसे पता ही नहीं है कि उसके कॉलेज की लाइब्रेरियन रानी मुखर्जी उससे दीवानों की तरह प्यार करती है। इधर रानी मुखर्जी की सगाई का दिन आ गया है और उधर रानी मंडप से गायब हो कर पृथ्वी का पीछा करते करते उस अगरबत्ती के कारखाने में पहुंच जाती है, जिसका मालिक पृथ्वी है। हालांकि पृथ्वी की महक से रह-रह कर आनंदित हो जाने वाले रानी के दृश्य कुछ अतिरेकपूर्ण हो गये हैं। जैसे ‘द डर्टी पिक्चर‘ में विद्या ने खतरनाक डांस किया है वैसी ही रानी ने भी ‘अइया‘ में धमाल मचा दिया है। पारंपरिक सौंदर्य बोध पर तमाचा मारने वाली यह फिल्म अंत में परंपरा के रास्ते पर ‘यू टर्न‘ लेकर सुखद अंत के नोट पर समाप्त हो जाती है। रानी के शानदार-जानदार अभिनय और मौलिक किस्म की उम्दा कॉमेडी के लिए फिल्म देखी जा सकती है। 

निर्देशक: सचिन कुंदालकर
कलाकार: रानी मुखर्जी, पृथ्वीराज
संगीत: अमित त्रिवेदी

इंग्लिश विंग्लिश


फिल्म समीक्षा

श्रीदेवी की अद्भुत इंग्लिश विंग्लिश

धीरेन्द्र अस्थाना

निर्देशक के रूप में बॉलीवुड को एक बेहतरीन सिनेकर्मी मिली हैं-गौरी शिंदे। आज की यंग जेनरेशन की रुचियों के आईने में देखें तो गौरी की फिल्म बोरिंग और अस्वीकृत हो सकती थी लेकिन उन्होंने इतनी कसी हुई पटकथा तैयार की है कि कब इंटरवल हो जाता है, पता ही नहीं चलता। फिल्म का निर्देशन भी अत्यंत सहज और घरेलू जैसा है, लगता ही नहीं कि हम फिल्म देख रहे हैं। ऐसा अनुभव होता है कि अपने आसपास के किसी परिवार की कहानी से गुजर रहे हैं। उस पर श्रीदेवी जैसी अनुभवी और भावप्रवण कलाकार का उम्दा और जीवंत अभिनय। सब मिलाकर ‘इंग्लिश विंग्लिश‘ एक बेहतरीन सिनेमा की कतार में दर्ज हो गयी है। अगर यह कहा जाए कि इस फिल्म में शशि वाला जो संवेदनशील किरदार है, उसे शायद उनकी समकालीन कोई दूसरी अभिनेत्री नहीं निभा सकती थी तो गलत नहीं होगा। उम्र और अनुभव श्री के चेहरे से टपकने लगे हैं, इसके बावजूद वह अपनी वापसी शानदार ढंग से कर पाने में सफल हुई हैं। जिन लोगों के विवाह को कई वर्ष बीत गये हैं और जिनके रिश्तों के बीच की गर्माहट मंद पड़ गयी है, उन्हें यह फिल्म निश्चित रूप से देखनी चाहिए। उन युवाओं के लिए भी इस फिल्म में एक मैसेज है, जो अपनी लापरवाही के चलते छोटी-छोटी बातों से मां-बाप का दिल दुखा देते हैं और उफ भी नहीं करते। फिल्म प्यार के संबंधों में इज्जत की मांग करती है, जो एक नया आयाम है संबंधों की बारीकी को टटोलने का। पूरी तरह श्रीदेवी की फिल्म है लेकिन दो लोगों का जिक्र करना जरूरी है। एक श्रीदेवी के बेटे का रोल निभाने वाले शिवांस कोरिया का, जिसने अपने अभिनय से दंग कर दिया। दूसरी श्रीदेवी की भांजी का रोल करने वाली प्रिया आनंद का, जो बड़ी कुशलता से परदेस में अपनी मौसी को मित्र बनकर सहेजती है। अमिताभ बच्चन का केमो रोल दिलचस्प है। पूरी दुनिया में अंग्रेजी जिस तरह बोलचाल की आम भाषा बन गयी है, उसके कुछ अनर्थ भी हुए हैं। यह फिल्म उसी अनर्थ को अर्थ देती है। अपने ही घर में अंग्रेजी न जानने के कारण पल-पल उपेक्षा झेलती श्रीदेवी जब अपनी बड़ी भांजी की शादी के लिए बहन के घर अमेरिका जाती है और सर्वाइवल के लिए उसे एक कोचिंग क्लास में अंग्रेजी सीखनी पड़ती है-इस उपकथा ने फिल्म को काफी दिलचस्प और दर्शनीय बना दिया है। चोरी-चोरी अंग्रेजी सीख चुकी श्रीदेवी जब शादी वाले दिन अपनी भांजी और उसके पति को धाराप्रवाह अंग्रेजी में शुभकामनाएं देती है और उन्हें विवाह, रिश्तों और प्यार का मर्म समझाती है तो पूरा कुनबा अवाक रह जाता है। फिल्म एक सुखद शुरुआत पर समाप्त होती है। 

निर्देशक: गौरी शिंदे।
कलाकार: श्रीदेवी, शिवांस कोरिया, नाविका कोरिया, प्रिया आनंद, सुजाता कुमार, आदिल हुसैन।
संगीत: अमित त्रिवेदी।

ओह माई गॉड


फिल्म समीक्षा

ओह माई गॉड पाखंड पर प्रहार

धीरेन्द्र अस्थाना


इस फिल्म को देखते समय चौंक कर ओह माई गॉड बोलने के कई अवसर आते हैं। धर्म को धंधा बनाने वालों और पाखंड की दुकान चलाने वालों पर फिल्म जमकर प्रहार करती है। एक धर्मभीरू देश में ऐसी फिल्म बना ले जाना कोई हंसी खेल नहीं है। एक प्रोड्यूसर के नाते अक्षय कुमार ने यह साहस दिखाया, इसके लिए उन्हें देश का सलाम मिलना चाहिए। हैरत की बात यह है कि यह फिल्म अक्षय कुमार की नहीं बल्कि परेश रावल की फिल्म है। दूसरा अचरज यह कि फिल्म में हीरोईन ही नहीं है। कमाल की बात यह कि सोनाक्षी सिन्हा ने प्रभु देवा के साथ मिलकर जो डांस किया है, वह बरसों तक एक आक्रामक नृत्य की मिसाल बना रहेगा। इस डांस में सोनाक्षी ने अपनी सर्वश्रेष्ठ नृत्य प्रतिभा उतार दी है। उल्लेखनीय बात यह है कि इस फिल्म के पटरी से उतर जाने के कई चांस थे लेकिन निर्देशक ने उन खतरों को खूबसूरती से संभाल लिया। खतरा था कि फिल्म ईश्वर के ही विरुद्ध चली जाती लेकिन लेखक-निर्देशक ने ईश्वर की सत्ता को स्थापित रखते हुए ईश्वर के नाम पर चल रहे पाखंड पर ही फोकस किया। तो भी यह खतरा तो है कि आस्था का कारोबार करने वाले तिलमिला जाएं। परदे पर इस कारोबार को मिथुन चक्रवर्ती और गोविंद नामदेव ने अंजाम दिया है और क्या खूब अंजाम दिया है। बतौर एक्टर यह गोविंद नामदेव की कुछ चुनिंदा फिल्मों में गिनी जाएगी। मुंबई के चोर बाजार में कानजी लालजी मेहता (परेश रावल) मूर्तियां बेचने का धंधा करता है। वह साधारण मूर्तियों को एंटीक बताकर ऊं चे दामों पर बेचता है। यह गुजराती शख्स स्वयं नास्तिक है और धर्म का मजाक उड़ाता रहता है। एक दिन मुंबई में भूकंप आता है और केवल परेश रावल की दुकान ध्वस्त होती है। प्रचारित हो जाता है कि यह ईश्वर का प्रकोप है। परेश रावल इसे चुनौती की तरह लेता है और हाई कोर्ट में भगवान के खिलाफ मुकदमा दर्ज करता है। इस अनोखे मुकदमे के दौरान परेश पूरी ताकत से धर्म के पाखंड पर प्रहार करता है। इटंरवल से कुछ पहले इस लड़ाई में परेश रावल का साथ देने के लिए आधुनिक कृष्ण भगवान के रूप में अक्षय कुमार प्रकट होते हैं। अक्षय परेश को ज्ञान देते हैं कि ईश्वर तो है और वह कण कण में है, कि उसे चढ़ावे और मंदिरों की जरूरत नहीं है, वह तो दिल में रहता है। कि मनुष्य को पांखड से परे हो जाना चाहिए। यही इस फिल्म का संदेश है और यही गर्व भी। ऐसा होगा नहीं पर होना चाहिए था कि यह फिल्म देशभर के गली-कूचों- मोहल्लों-हाउसिंग सोसायटियों में निःशुल्क दिखाई जाती। अवश्य देखने लायक फिल्म।

निर्देशक: उमेश शुक्ला
कलाकार: पेरश रावल, मिथुन चक्रवर्ती, अक्षय कुमार, ओम पुरी, महेश मांजरेकर, गोविंद नामदेव, लुबना सलीम, मुरली शर्मा
संगीत: हिमेश रेशमियां

हीरोइन


फिल्म समीक्षा 

असफलता के डर में जीती ‘हीरोइन‘

धीरेन्द्र अस्थाना


मधुर भंडारकर की नयी फिल्म ‘हीरोईन‘ केवल और केवल करीना कपूर के अभिनय के लिए याद की जायेगी। एक स्टार हीरोईन के डर, आशंका, सनक, क्रोध, कुंठा, हर्ष, शतरंजी चाल, तनाव, अवसाद और अकेलेपन के दर्जनों आयाम करीना कपूर ने इतने बेहतर और प्रभावशाली ढंग से अदा किये हैं कि मन खुश हो जाता है। सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि ऐसा बिल्कुल नहीं लगता कि हम पर्दे पर करीना कपूर को देख रहे हैं। फिल्म इंडस्ट्री की टॉप कमर्शियल हीरोईन के किरदार को करीना ने जीवंत अभिव्यक्ति दी है। बार बालाओं, फुटपाथ पर भीख मांगने वालों, कॉरपोरेट वर्ल्ड और फैशन इंडस्ट्री के बाद मधुर भंडारकर ने खुद को अपने ही संसार यानी सिने जगत पर फोकस किया है। ऐसा नहीं है कि इस दुनिया के छल छद्म, उजाले अंधेरे, सक्सेस पार्टियां, ग्लैमर, डिप्रेशन, जलन, कुढ़न और चालबाजियों को मधुर ने ही पहली बार उजागर किया है। मधुर से पहले भी कई फिल्मकारों ने पूरी तरह या आंशिक तौर पर इस दुनिया के विरोधाभासों को अपना विषय बनाया है। हां, इतना जरूर है कि मधुर ने फिल्म की मेकिंग, सहजता और गति का ध्यान रखा है। कहानी के स्तर पर वह नया कुछ नहीं दे पाये हैं लेकिन फिल्म को एक फ्रेश लुक और समकालीन स्पर्श देने में जरूर कामयाब हुए हैं। कई बार ऐसा भी लगता है कि हम उनकी फिल्म ‘फैशन‘ के ही कुछ हिस्से फिर से देख रहे हैं और फिल्म थोड़ी बहुत बोझिल भी हो गयी है लेकिन तो भी मधुर एक सफल फिल्म बनाने में कामयाब हुए हैं। फिल्म का ‘हलकट जवानी‘ वाला करीना पर फिल्माया आइटम नंबर पहले ही बहुत ज्यादा प्रचारित हो चुका है। बाकी गीत भी अच्छे और फिल्म को व्याख्याचित करने वाले हैं। हालांकि पूरी फिल्म एक हीरोईन के उतार-चढ़ाव भरे जीवन पर केंद्रित है तो भी करीना के साथ अपनी अपनी रिलेशनशिप को अर्जुन रामपाल और रणदीप हुडा ने सशक्त ढंग से अदा किया है। रणवीर शौरी का किरदार बहुत छोटा है लेकिन एक सार्थक फिल्मों के कट्टर और जुनूनी निर्देशक के चरित्र को उन्होंने दमदार अभिव्यक्ति दी है। गोविंद नामदेव जैसे सशक्त अभिनेता इस फिल्म में नष्ट हुए हैं। गोविंद को ऐसे फालतू चरित्र नहीं करने चाहिए। सिने जगत की भीतरी सच्चाइयों से रू-ब-रू होने के लिए फिल्म को देखना चाहिए।

निर्देशक: मधुर भंडारकर
कलाकार: करीना कपूर, अर्जुन रामपाल, रणदीप हुडा, रणवीर शौरी, हेलन, गोविंद नामदेव
संगीत: सलीम/सुलेमान
   

बरफी


फिल्म समीक्षा

‘बरफी‘ में प्रतिभाओं का विस्फोट

धीरेन्द्र अस्थाना

सीधी सादी सरल कहानी को पसंद करने वाले आम दर्शकों को फिल्म निराश कर सकती है। क्योंकि गूंगे प्यार की इस विशेष कहानी को निर्देशक ने थोड़े जटिल ढंग से रच दिया है। हां, अर्थपूर्ण और गंभीर किस्म की फिल्में पसंद करने वालों के लिए तो ‘बरफी‘ लॉटरी लगने जैसी फिल्म। अच्छी फिल्मों को बनाने और बचाने वाले जिद्दी फिल्मकारों की सूची में अनुराग बसु का नाम भी दर्ज हो गया है। इस फिल्म की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें रणबीर कपूर और प्रियंका चोपड़ा की अभिनय प्रतिभा का विस्फोट हुआ है। जैसे अमिताभ बच्चन और रानी मुखर्जी के लिए ‘ब्लैक‘ उनके सिनेमाई कॅरियर की यादगार फिल्म है, ठीक वैसे ही रणबीर और प्रियंका के लिए ‘बरफी‘ भी मील का पत्थर साबित होने वाली है। कोई आर्श्चय नहीं कि सन् 2012 के कई बड़े फिल्मी एवॉर्ड इस फिल्म के नाम दर्ज हो जाएं। अच्छे सिनेमा को प्रोत्साहन देने के लिए ही नहीं, अपनी सिनेमाई समझ को परिष्कृत करने के लिए भी दर्शकों को यह फिल्म देखनी चाहिए। रणबीर कपूर ने फिल्म में एक गूंगे-बहरे लेकिन जिंदादिल और संवेदनशील युवक का रोल अदा किया है। वह पहले ईलीना डिक्रूज से प्यार करना चाहता है पर बात बनती नहीं क्योंकि ईलीना की सगाई हो चुकी है। बाद में अपनी बचपन की पहचान वाली अल्प विकसित दिमाग वाली लड़की प्रियंका चोपड़ा को ही वह चाहने लगता है। कैसे दोनों कुछ दिन साथ बिताते हैं, कैसे प्रियंका का अपहरण होता है, कैसे उसकी हत्या की कहानी प्रचारित की जाती है और अंत में कैसे रणबीर अपनी नादान प्रेमिका को ढूंढ़ लेता है, यह सब निर्देशक ने थोड़ा पेचीदा ढंग से बयान किया है। बहुत बाद में ईलीना को अहसास होता है कि वह रणबीर से ही प्यार करती है लेकिन तब तक देर हो चुकी होती है। प्रियंका और रणबीर शादी करते हैं और बूढ़े होकर एक साथ मर जाते हैं। फिल्म के कुछ गाने पहले ही लोकप्रिय हो चुके हैं। फिल्म को ‘कॉमेडी‘ कहा गया है लेकिन असल में ‘बरफी‘ एक जटिल प्रेम की संवेदनशील रचना है। ईलीना डिक्रूज ने भी संवेदनशील अभिनय किया है। 

निर्देशक: अनुराग बसु
कलाकार: रणबीर कपूर, प्रियंका चोपड़ा, इलीना डिक्रूज, आशीष विद्यार्थी, सौरभ शुक्ला
संगीत: प्रीतम चक्रवर्ती

राज-3


फिल्म समीक्षा

‘राज-3‘ में चलीं नफरत की आंधियां

धीरेन्द्र अस्थाना

निर्देशक विक्रम भट्ट अपनी नयी फिल्म ‘राज-3‘ में दर्शकों को कहीं-कहीं डराने में कामयाब हुए हैं। अच्छे ढंग से संपादित एक बेहतर हॉरर फिल्म है, जिसे फिल्म समझ कर ही देखा जाना चाहिए। आंखों के ऊपर से विज्ञान का चश्मा उतारकर थ्री डी चश्मा लगाएं और तब फिल्म देखें, ज्यादा मजा आएगा। पूरी फिल्म शुरू से अंत तक बांध कर रखती है। फिल्म में ब्लैक मैजिक और बुरी शक्तियों को स्थापित किया गया है और उनका तोड़ ईश्रीय शक्ति को बताया गया है, जो हिंदुस्तान की आदिकालीन मान्यता है। डॉक्टर भी ब्लैक मैजिक और भूत-प्रेत को मानने वाला है लेकिन जब फिल्म का आधार ही यह दुनिया है तो फिल्म को इस तरह देखें कि इस दुनिया को कितने दिलचस्प ढंग से फिल्माया गया है। फिल्म में नफरत की आंधियां चलती हैं, जिनका शिकार बनती है ईशा गुप्ता और माध्यम है इमरान हाशमी, जिसे बिपाशा बसु ने फिल्म इंडस्ट्री में नाम, शोहरत और पैसा दिया है। बिपाशा बसु अपने समय की सुपरस्टार है लेकिन एक नयी हीरोईन अपने टेलेंट और ग्लैमर से उसके साम्रज्य में सेंध लगा रही है। यह नयी हीरोईन ईशा गुप्ता है, जो रियल लाइफ में उसकी सौतेली बहन है। दोनों की मांएं अलग थीं लेकिन पिता एक था। ईशा के बढ़ते रथ को ध्वस्त करने के लिए बिपाशा बसु ब्लैक मैजिक का सहारा लेती है। तंत्र-मंत्र से सिद्ध किया पानी पिला-पिलाकर वह ईशा को पागल बनाती है, डराती है और बीमार कर देती है। यह काम करता है इमरान हाशमी, जो बिपाशा का प्रेमी है लेकिन बाद में ईशा से प्यार करने लगता है और बिपाशा के कुकर्म में साझीदार बनने से मना कर देता है। उसी के कारण ईशा बीमार हुई है, वही ईशा की आत्मा को मुक्त कराने के लिए परलोक जाता है। फिल्म का सबसे बेहतरीन पक्ष उसके संवाद और सिनेमेटोग्राफी है। बिपाशा बसु, ईशा गुप्ता और इमरान हाशमी, तीनों का काम उत्तम है। सन् 2002 में ‘राज‘ से शुरू हुआ इमरान हाशमी का फिल्मी सफर ‘राज-3‘ में दस वर्ष पूरे कर रहा है। ‘राज‘ में वह सहायक निर्देशक थे। ‘राज-3‘ में लीड एक्टर हैं। ईशा पर कॉक्रोचों को हमले वाला दृश्य यादगार है। भट्ट कैंप की सफल फिल्म है।

निर्देशक: विक्रम भट्ट
कलाकार: इमरान हाशमी, बिपाशा बसु, ईशा गुप्ता, मनीष चौधरी
गीत: संजय मासूम/कुमार राशिद खान
संगीत: जीत गांगुली /राशिद खान


जोकर


फिल्म समीक्षा

यह ‘जोकर‘ बेमजा है

धीरेन्द्र अस्थाना


निर्देशक शिरीष कुंदेर ने अपने हिसाब से एक ऐसी फिल्म बनाने का प्रयास किया है जो आम फिल्मों से थोड़ी अलग दिखे। एक गंभीर विषय को मजा किया अंदाज और विदूषराना चरित्रों के साथ पेश करके उन्होंने ‘जोकर‘ को न सिर्फ बेमजा कर दिया बल्कि कमजोर भी कर दिया। फिल्म में एक ऐसे मुतहा गांव को खड़ा किया गया है जिसका नाम हिंदुस्तान के नक्शे पर नहीं है। तीन राज्यों की सीमा पर बसे इस गांव पगलापुर में न बिजली है, न पानी। न बाजार, न स्कूल कॉलेज। इस गांव के मुखिया का बेटा है अक्षय कुमार जो अमेरिका में रहकर एलियन्स की दुनिया पर काम कर रहा है। सोनाक्षी सिन्हा के साथ उसकी ‘लिव इन रिलेशन शिप‘ है। मुखिया बुलाता है और उससे निवेदन करता है कि वह गांव को गरीबी और पिछड़ेपन के दलदल से निकालने के लिए कुछ करे। पागलों जैसे हाव भाव करके रहने वालों के इस पिछड़े गांव में जो जश्न मनाया जाता है उसमें चित्रांगदा सिंह हिंदी-अंग्रेजी का मिक्स आइटम नंबर पेश करती है। अपने प्रति गांव वालों का प्यार देख अक्षय कुमार गांव को मुक्ति देने का बीड़ा उठाता है। अपनी राजनैतिक सामाजिक कोशिशों में नाकाम होने के बाद अक्षय एक खेल रचता है। वह रंगों और सब्जियों के मेल से तीन गांव वालों को एलियंस की शक्ल देकर दुनिया में घोषणा करवाता है कि पगलापुर में एलियंस दिखे हैं। पूरी दुनिया पगलापुर पहुंचने में जुट जाती है। फिल्म के अंत में अक्षय का प्रतिद्वंदी रहा एक अमेरिकी वैज्ञानिक अक्षय का भांडाफोड़ देता है और पुलिस अक्षय को गिरफ्तार करने पहुंच जाती है। लेकिन तभी अक्षय के कम्प्यूटर के सिग्नल सचमुच के एलियंस से जुड़ जाते हैं। फिर एक उड़न तश्तरी में सचमुच का एलियंस वहां प्रकट होता है। उसके जाने के बाद तोहफे के तौर पर गांव में तेल के सोते फूट उठते हैं। जाहिर है अब गांव अमीर हो जाएगा और उसे तमाम सुविधाएं मिल जाएंगी। यह एक अच्छी फेंटेसी थी जिसे खराब ढंग से फिल्मा कर बिगाड़ दिया गया है। दबंग छोकरी सोनाक्षी सिन्हा की पहली ऐसी फिल्म जो खतरे की घंटी बजा रही है। पूरी फिल्म में सिर्फ श्रेयस तलपदे का किरदार मजा भी देता है और आकर्षित भी करता है। बाकी सब के सब बहुत ज्यादा ‘लाउड‘ हैं।

निर्देशक: शिरीष कुंदेर
कलाकार: अक्षय कुमार, सोनाक्षी सिन्हा, श्रेयस तलपदे, मिनीष लांबा, संजय मिश्रा
संगीत: जीवी प्रकाश कुमार/गौरव।

Friday, November 16, 2012

शीरी फरहाद की तो निकल पड़ी


फिल्म समीक्षा

अधेड़ समय में प्यार

‘शीरी फरहाद की तो निकल पड़ी‘

धीरेन्द्र अस्थाना


जैसा कि आम तौर पर होता है, लीक से हटकर बनी अच्छी फिल्में देखने में ज्यादा रुचि नहीं दिखाते दर्शक। ‘शीरी फरहाद की तो निकल पड़ी‘ के साथ भी यही ट्रेजडी घटित हुई। पहले दिन ज्यादा दर्शक नहीं आये। हालांकि निर्देशिका बेला सहगल ने विषय तो अच्छा चुना ही, उसे बुना भी बहुत बेहतर ढंग से। लेकिन फिल्म में न तो मारामारी थी, न ही कोई लार्जर दैन लाइफ फार्मूला था और न कोई आइटम डांस था। लुप्त होती पारसी कम्युनिटी के जीवन, संघर्ष और कल्चर वाले बैक ड्रॉप पर दो ऐसे साधारण लोगों की प्रेम कहानी रची गयी, जो एक अधेड़ समय में अकेले और उदास खड़े थे। क्या थकी उम्र में, जब कनपटियों पर के बालों को सफेद कर चुका होता है बुरा वक्त, सामने खड़े एक निश्छल प्रेम को गले नहीं लगा लेना चाहिए। यही इस फिल्म का संदेश भी है और सार्थकता भी। दरअसल इस फिल्म की असाधारणता इसकी साधरणता में ही छिपी है। फिल्मांकन, अहसास, गीत, संवाद, जीवन, रहन-सहन सब कुछ एकदम साधारण। एकदम हमारे आसपास के गली कूचों में टहलता हुआ। कलाकार भी हमारे आसपास के। बोमन ईरानी और फराह खान। एक मंझा हुआ अभिनेता। दूसरी मंझे हुए अभिनेताओं से उनका बेहतर अभिनय निकलवाने वाली निर्देशिका। बतौर एक्ट्रेस फराह की यह पहली फिल्म है। वह चाहें तो इस क्षेत्र में बनी रह सकती हैं। दोनों ने बहुत उम्दा काम किया है। अश्लील या फूहड़ हुए बिना एक खरा-खरा कॉमिक सिनेमा पेश करने की कोशिश की है दोनों ने, जो बहुत सहज और दिलचस्प लगता है। निर्देशिका ने ब्रा और पेंटी की दुकान में काम करने वाले एक 45 वर्षीय पारसी आदमी के अकेलेपन और व्यथा को भी आवाज दी है। फिल्म कई जगहों पर इमोशनल हो जाती है। पर फिल्माये एक खुशनुमा गाने में सहसा वह संताप भी चला आता है, जिससे फराह अपने अतीत में गुजरती रही हैं। मुख्यतः तो यह बोमन ईरानी और फराह खान की ही प्रेम कहानी है लेकिन सहायक चरित्रों ने भी फिल्म में समां बांधा है। खासकर बोमन की मां का किरदार निभाने वाली डेजी ईरानी तो पारसी समय और समाज की आत्मा बन गयी हैं। दर्शकों को अच्छी फिल्म बनाने वालों को उत्साहित करना चाहिए वरना सबके सब खराब सिनेमा बनाने वाले राजपथ पर मुड़ जायेंगे। कृपया देखें। 

निर्देशक: बेला सहगल
कलाकार: बोमन ईरानी, फराह खान, डेजी ईरानी
संगीत: जीत गांगुली
पटकथा एवं संवाद: संजय लीला भंसाली

एक था टाइगर


फिल्म समीक्षा

प्यार में एक था टाइगर

धीरेन्द्र अस्थाना

सौ करोड़ कमाई वाले क्लब की एक और फिल्म। यशराज कैंप में घुस कर एक सुपरहिट देने के बाद सलमान खान ने साबित कर दिया कि कमाई और दर्शकों के मामले में वह किसी भी स्टार के किले में सेंध लगा सकते हैं। आलोचकों की समस्या बढ़ाने वाली फिल्म है। क्योंकि तमाम घटनायें और प्रसंग अविसनीय हैं, लेकिन मनोरंज के स्तर पर इतनी जोरदार है कि दर्शक सांस रोककर देखते हैं। नयी नयी लुभावनी विदेशी लोकेशंस हैं। खतरनाक किस्म के और कुछ नयी तरह के एक्शन हैं। कैटरीना और सलमान की जोड़ी है। जासूसी के बैकटॉप पर प्यार में डूबी फिल्म है। वह भी दो दुश्मन देशों के जासूसों के बीच पनपे प्यार की। भले ही आप तारीफ न करें लेकिन निर्देशक कबीर खान ने अपनी तरफ से कुछ नया करने की कोशिश की है। यह दिखाकर कि प्यार की न कोई सीमा होती है, न मजहब, न मुल्क। यह थीम पहले भी दिखाई गयी है, मगर यहां प्यार इन दो जासूसों के बीच है। जो गुप्तचर एजेंसी रॉ (हिंदुस्तान) और आईएसआई (पाकिस्तान) के लिए काम करते हैं। फिल्म देखते समय एक पुरानी फिल्म का यह गाना बरबस याद आता है- दो जासूस करें, महसूस कि दुनिया बड़ी खराब है। तो होता यह है कि दोनों अपना-अपना फर्ज और वफादारी भूलकर भाग जाते हैं। सलमान के पास उसकी जासूसी वाली कमाई के 13 लाख रुपये हैं। सलमान और कैटरीना अपने अपने मुल्कों की जासूसी संस्थाओं को चकमा देकर पूरी दुनिया में छुपते फिर रहे हैं और लापता बने रहने की यह दौड़ अनंत है। केवल 23 लाख रुपये में यह कैसे संभव होगा। इस बात पर दिमाग न खपायें, क्योंकि सौ करोड़ कमाने वाले कई एक्टर घोषणा कर चुके हैं कि माइंडलेस फिल्में ही सौ करोड़ कमा सकती हैं। आज तो सलमान खान और कैटरीना के रोमांस और एक्शन की जुगलबंदी का मजा है। सलमान के पर्दे पर एंट्री लेते ही जिस तरह दर्शक झूमकर सीटियां बजाते हैं, उसे देखकर कोई भी एक्टर रश्क कर सकता है। बहुत समय के बाद रोशन सेठ को पर्दे पर देखना अच्छा लगता है। गाने पहले ही हिट हो चुके हैं, लेकिन इनमें वह बात नहीं है, जो सलमान पर फिल्माये बहुत सारे पुराने गानों में है। सलमान की फिल्म है, एक बार देखना तो बनता है भाई।

निर्देशक: कबीर खान 
कलाकर: सलमान खान, कैटरीन कैफ, गिरीश करनाड, रणवीर शौरी 
संगीत: साजिद- वाजिद, सोहेल सेन

गैंग्स ऑफ वासेपुर-2


फिल्म समीक्षा

तलछट का कोरस यानी गैंग्स ऑफ वासेपुर-2

धीरेन्द्र अस्थाना

बॉलीवुड के स्टार निर्देशक इम्तियाज अली का मानना है कि ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर‘ पर इंडस्ट्री को गर्व करना चाहिए। यह अनुराग कश्यप की अब तक की श्रेष्ठ फिल्म है। इम्तियाज की राय सौ फीसदी सही है। सचमुच यह फिल्म जीवन के भयावह यथार्थ को दसों उंगलियों से पकड़ने का कारनामा है। यहां गैंगवार लार्जर दैन लाइफ बनकर ग्लैमर का आलोक नहीं रचती बल्कि जमीन पर बने रहकर कत्लेआम को पूरे दुख और पूरे शोर के साथ पेश करती है। फिल्म के पहले पार्ट की तरह दूसरे पार्ट में भी चरित्रों का एक मेला जैसा मौजूद है लेकिन यह अनुराग की खासियत है कि वह हर चरित्र को परिभाषित भी करते हैं और उसकी यात्रा को पूर्णता भी देते हैं। पहले पार्ट के अंत में गैंगस्टर मनोज बाजपेयी मार दिए जाते हैं। पीछे रह जाती हैं उनकी दो पत्नियां और बच्चे। अब नये पार्ट में वासेपुर पर मनोज के गंजेड़ी बेटे नवाजुद्दीन का दबदबा है। मनोज की दूसरी बीवी दुर्गा (रीमा सेन) का बेटा शमशाद (राजकुमार यादव) डॉन बनना चाहता है। उसकी यह चाहत उसे बड़े भाई नवाजुद्दीन को लेफ्टिनेंट बना देती है। हुमा कुरैशी अब नवाजुद्दीन की पत्नी हैं। बाकी किरदार वही हैं - एमएलए रामाधीर सिंह (तिग्मांशू धूलिया), नगमा खातून (रिचा चड्ढा), फरहान (पीयूष मिश्रा), जेपी सिंह (सत्या आनंद) और सुल्तान कुरैशी (पंकज त्रिपाठी)। ये सब मिलकर जिंदगी की तलछट को कोरस में गाते हैं। रक्तपात और रंजिश में डूबा यह समाज प्यार भी करता है, नफरत भी। कत्ल भी करता है और शोक में भी डूबता है। इसका सब कुछ जमीनी है। इसके तमाम किरदार किसी भी शहर के गली-कूचों में भटकते मिल जाएंगे। सिनेमाई होने के बावजूद इस फिल्म के किरदार हिंदुस्तान के एक बड़े तबके का प्रतिनिधित्व करते नजर आते हैं। नवाजुद्दीन ही नहीं फिल्म के प्रत्येक एक्टर ने एक्टिंग नहीं की है, किरदार की काया में प्रवेश किया है। सतह से उठकर विराट में एकाकार होती यह फिल्म सिनेमा के मकसद और मर्म को एक नयी ऊंचाई देती है। अनुराग ने खुद को सिनेमा के विश्व नागरिकों के बीच खड़ा कर लिया है। काश, वह उस जगह पर टिके रहें। फिल्म में गाने भी हैं। अजीबो-गरीब लेकिन अद्भुत। इस फिल्म को सारे कार्य छोड़कर देखें। यह फिल्म अच्छे-अच्छे निर्देशकों को ‘नरभसा‘ देगी। 

निर्देशक: अनुराग कश्यप 
कलाकार: नवाजुद्दीन सिद्दीकी, तिगमांशू धूलिया, रिचा चड्ढा, हुमा कुरैशी, रीमा सेन, राजकुमार यादव, पीयूष मिश्रा। 
संगीत:     स्नेहा खान बलचर।

जिस्म-2


फिल्म समीक्षा


प्यार और जंग की कशमकश: जिस्म-2

धीरेन्द्र अस्थाना

सुपरहिट फिल्म ‘जिस्म‘ से ‘जिस्म-2‘ का कोई लेना-देना नहीं है। इस फिल्म का कोई नया नाम भी हो सकता था लेकिन शायद भट्ट कैंप के मन में जिस्म की शोहरत भुनाने की बात रही होगी इसीलिए इस फिल्म को ‘जिस्म-2‘ नाम दिया गया। कथा-पटकथा स्वयं महेश भट्ट की है तो कहानी के स्तर पर तो फिल्म को उम्दा होना ही था। लेकिन इसमें भी कहानी शुरू होती है इंटरवल के बाद ही। इंटरवल से पहले तक सिर्फ तन की नुमाइश है या फिर चरित्रों को स्थापित और परिभाषित करने की कोशिश। कुल तीन चरित्रों की कहानी है। रणदीप हुडर को एक साइको किलर के तौर पर पेश किया गया है जो खुद को देशभक्त मानता है। मोटे तौर पर वह विलेन है। अरुणोदय सिंह को एक इंटेलिजेंस ऑफीसर बताया गया है। यानी हीरो है। सनी लियोन एक जिस्म बेचने वाली औरत है जो कभी रणदीप हुडा से प्यार करती थी, लेकिन जिसे एक रात रणदीप हमेशा के लिए छोड़ गया था। अरुणोदय सिंह रणदीप और उसके नेटवर्क को तबाह करने के मिशन में सनी लियोन को दस करोड़ रुपये देकर अपने साथ मिलाता है। सनी को फिर से रणदीप के जीवन में उतरना है और उसका डेटा चुराना है। इस मिशन के बीच में चुपके से उतरता है प्यार। इस प्यार का पीछा करती है नफरत। इस नफरत और प्यार की जंग के दौरान कहानी एक नया मोड़ ले लेती है। जो जासूस हैं वो निकलते हैं ‘बार इंडस्ट्री‘ के लिए काम करने वाले देशद्रोही और जो विलेन है वह बनता है सच्चा देशभक्त, लेकिन अपने खुद के जुनून और सनक में जकड़ा हुआ। अंत में फिल्म के तीनों किरदार एक दूसरे की गोलियों का शिकार होकर मारे जाते हैं। हाई वोल्टेज ड्रामा है जिसे रणदीप हुडा ने अपने अकेले के दम पर काफी ऊंचाई दी है। पता नहीं सनी लियोन को भट्ट साहब ने क्यों हीरोइन बनाया। उसे अभिनय करना नहीं आया। अरुणोदय सिंह को ज्यादा मौका नहीं मिला फिर भी उसने खुद को एक्शन और इमोशन से खुद को साबित करने की कोशिश की। फिल्म के संवाद अर्थपूर्ण और मर्मस्पर्शी हैं। मौला वाला गीत सुनने में अच्छा लगता है। इसके बोल भी बेहतरीन हैं और गायकी भी दिल को भाती है। पूजा भट्ट का निर्देशन भी चुस्त दुरुस्त है। एडल्ट मूवी है तो उस तरह के दृश्य भी हैं जिन्हें देखना युवा वर्ग पसंद करता है।

निर्देशक: पूजा भट्ट
पटकथा: महेश भट्ट
कलाकार: रणदीप हुडा, सनी लियोन, अरुणोदय सिंह
संगीत: एपी मुखर्जी, मिथुन, रक्षक, अब्दुल सईद

Thursday, November 8, 2012

क्या सुपर कूल हैं हम


क्या सुपर कूल हैं हम

जानदार दुकान का बेजान पकवान

धीरेन्द अस्थाना

सोचा था कि एकता कपूर की कंपनी से निकली है तो यकीनन फिल्म एकदम अनूठी और नायाब होगी। इस विश्वास का कारण था एकता की कंपनी से निकली पिछली तमाम सफल और शानदार फिल्में। लेकिन श्क्या सुपर कूल हैं हमश् ने यह भरोसा तोड़ दिया। इस फिल्म का नाम हो सकता था- श्कितने अश्लील हैं हम।श् कॉमेडी के नाम पर फूहड़ और अश्लील फिकरे, गंदी और नंगी गालियां, शर्मनाक हरकतें और बोर कर देने वाली एक्टिंग। एक जानदार दुकान से यह कैसा बेजान पकवान निकल कर आ गया। फिल्म की क्वालिटी से कोई समझौता न कर पाने का एकता का अपना मौलिक अंदाज कहां चला गया? लेखक निर्देशक सचिन याडरे ने कुछ ऊटपटांग स्थितियों को जोड़-जाड़कर एक ऐसी कमजोर फिल्म खड़ी की है, जिसमें न कोई कहानी है और न ही कोई ड्रामा। रितेश देशमुख और तुषार कपूर अच्छे एक्टर हैं, लेकिन एक बेजान पटकथा के भीतर रह कर वे भी कितना संभाल सकते थे। अश्लील संवादों के दोहरान से थोड़े ही फिल्म चला करती है। सेंसर के लोग सो रहे थे क्या? ऐसे संवाद और ऐसी हरकतें जिनके बारे में लिखा भी नहीं जा सकता। इंजीनियरिंग, एमबीए, एमबीबीएस या बीएमएम करने वाले आज के युवा क्या इसी तरह की सेक्स कॉमेडी देखना पसंद करते सो हैं? लगता तो नहीं है। तुषार और रितेश दो बेकार युवक हैं। दोनों बिना किसी कारण के दोस्त हैं। एक को एक्टर बनना है, दूसरे को डीजे। दोनों की जिंदगी में एक-एक लड़की है। ये दोनों लड़कियां बिना किसी कारण के दोनों लड़कों से दूर भागती हैं। अनुपम खेर एक अमीरजादे हैं जो थोड़े बहुत पागल जैसे हैं। वह एक कुतिया को अपनी मां समझते हैं और रितेश के कुत्ते को अपना बाप। फिल्म का असली हीरो तो रितेश का कुत्ता ही है। ज्यादा हंसाने का काम तो उसी ने किया है। उस कुत्ते में सेक्स की सुपर पावर है। उसी सुपर पावर के जरिये फिल्म को खींचने की कोशिश की गयी है। फिल्म के अंत में जैसा कि होता है, तुषार को अपनी और रितेश को अपनी प्रेमिका मिल जाती है।


प्रोड्यूसर:  एकता कपूर
डायरेक्टर: सचिन यार्डी
कलाकार: तुषार कपूर, रितेश देशमुख, अनुपम खेर, सारा जेन डायस, नेहा शर्मा
संगीत: अंजान मीत ब्रदर्स एवं अन्य