फिल्म समीक्षा
दिलचस्प मगर अवास्तविक ‘एक मैं और एक तू‘
धीरेन्द्र अस्थाना
बेहतर पटकथा, भव्य विदेशी सैर सपाटा, कर्णप्रिय और ताजगी भरा गीत-संगीत, चुस्त निर्देशन और शानदार-जानदार अभिनय। फिर क्या हुआ कि दर्शक बड़ी संख्या में फिल्म देखने नहीं पहुंचे। वही जिसके लिए फिल्म समीक्षक बरसों से सिर पीट रहे हैं। एक अच्छी सी दिल को छूने वाली विश्वसनीय कहानी। धर्मा प्रोडक्शन से निकली नयी फिल्म ‘एक मैं और एक तू’ की सबसे बड़ी कमी यही है कि निर्देशक ने टार्गेट दर्शक यानी युवाओं पर तो फोकस किया मगर कहानी ऐसी चुनी जिसे भारतीय युवक अपनी कहानी नहीं मान सकते। युवा फ्रस्ट्रेशन और प्रॉब्लम को यह फिल्म जितनी ताकत और रोचकता से लगभग अंत में रेखांकित करती है वह काबिले तारीफ है, मगर इमरान एक पार्टी में अपने मां-बाप के सामने अपनी दबी-कुचली इच्छाओं को लेकर जो गुस्सैल विस्फोट करता है उसकी प्रक्रिया अथवा यात्रा अनुपस्थित है। करीना कपूर और इमरान खान जैसे जन्मजात कलाकार इस फिल्म को बहुत ऊंचाई पर ले जा सकते थे, अगर निर्देशक-लेखक शकुन बत्तरा ने कहानी को थोड़ा रियल स्पर्श देने का प्रयत्न किया होता। माना कि दो रईस मां-बाप की संतानें करीना कपूर और इमरान खान विदेश में बेरोजगार होने के बावजूद बढ़िया शराब पी रहे हैं, अच्छा खाना खा रहे हैं, होटलों में नाच-गा रहे हैं, मेले-तमाशों का मजा लूट रहे हैं और कार से चलकर संघर्ष कर रहे हैं, क्योंकि वे रईसों की संतानें हैं। माना कि लॉस वेगास के मैरिज चैपल में किसी भी वक्त, किसी भी हालत में शादी हो जाती है। इसलिए नशे में टल्ली होकर करीना-इमरान भी आधी रात को मैरिज कर लेते हैं। सुबह होश में आने पर दोनों इस लीगल शादी से बंधन मुक्त होने के लिए कोर्ट में अर्जी भी देते हैं जिस पर दर्शक ‘एप्रूव्ड’ की स्टैम्प भी लगता देखते हैं। लेकिन बाद में इमरान को लगता है कि उसे करीना से प्यार हो गया है जबकि करीना उसे समझाती है कि वह दोस्ती को प्यार समझ रहा है। दोनों बोर लाइफ से ‘ब्रेक’ लेने के लिए इंडिया जाते हैं, जहां जिंदगी भर अपने मां-बाप के निर्देशों तले जीने वाला इमरान अपनी खुद की चाहतों का विस्फोट करता है और मां-बाप को हतप्रभ छोड़ वापस लॉस वेगास लौट जाता है। इस बार उसके पास नौकरी भी है। फिल्म इस ‘नोट’ पर खत्म होती है कि इमरान करीना को फिर से शादी करने के लिए राजी करने का प्रयास करता रहेगा। यह इंडियन रियलिटी नहीं है भाई। मुंबई दिल्ली में भी युवाओं की रिलेशनशिप ऐसी नहीं है। हां लॉजिक से कोई लेना-देना नहीं है तो फिल्म देख लें।
निर्देशक: शकुन बत्तरा
कलाकार: इमरान खान, करीना कपूर, राम कपूर, बोमन ईरानी, रत्ना पाठक, सोनिया मेहरा
संगीत: अमित त्रिवेदी
Thursday, February 16, 2012
Saturday, January 28, 2012
अग्निपथ
फिल्म समीक्षा
यह नये समय का ‘अग्निपथ‘
धीरेन्द्र अस्थाना
अमिताभ बच्चन वाली कामयाब फिल्म ‘अग्निपथ‘ का रीमेक बनाया है तो पुरानी फिल्म से तुलना का अभिशाप झेलना ही होगा। यह निर्देशक करन मल्होत्रा का नये समय में खड़ा ‘अग्निपथ‘ जरूर है लेकिन थोड़े हेर-फेर के बाद फिल्म की मूल कहानी वही है। पुरानी ‘अग्निपथ‘ में सब कुछ संतुलित और विश्वसनीय था। हालांकि वह फिल्म भी लार्जर देन लाइफ वाले फॉर्मूले के हिसाब से ही बनायी गयी थी। लेकिन नयी ‘अग्निपथ‘ में कुछ चरित्र और घटनाएं अविश्वसनीय हो गयी हैं। करन मल्होत्रा की पटकथा भी थोड़ी असंतुलित और लंबी हो गयी है। जब चरित्र नये हैं और नये समय की ‘अग्निपथ‘ है तो बेहतर होता कि नये ढंग से नयी कहानी के साथ फिल्म बनायी जाती। इस बार विजय दीनानाथ चौहान के रूप में रितिक रोशन हैं तो कांचा के रूप में संजय दत्त। रितिक की प्रेमिका बनी हैं प्रियंका चोपड़ा तो पुलिस अधिकारी का किरदार निभाया है ओम पुरी ने। मुंबई के माफिया डॉन रऊफ लाला का चरित्र ऋषि कपूर ने निभाया है। यह नयी ‘अग्निपथ‘ का नया चरित्र है। सब के सब महारथी हैं और सब ने लाजवाब अभिनय किया है। लेकिन कोई यह तो बताए कि मुंबई में कम उम्र लड़कियों की सार्वजनिक नीलामी वाला वैसा बाजार कब और कहां लगता था जैसा ‘अग्निपथ‘ में ऋषि कपूर लगाते हैं। कहानी को अतिरिक्त रोचकता देने के लिए जोड़ा गया यह दृश्य फिल्म में कृत्रिमता पैदा करता है। इसकी कोई जरूरत नहीं थी। जिस कांचा के साम्राज्य मांडवा में पुलिस दल जाने से घबराता है वहां रितिक रोशन अकेला पहुंच जाता है और कांचा की सुरक्षा व्यवस्था को धता बताते हुए बहुत सारे बमों से उसके तमाम ऊंचे-ऊंचे टावर उड़ा देता है। जिस रितिक रोशन के हाथों संजय दत्त को मरना है वह संजय दत्त न सिर्फ रितिक को मार-मार के अधमरा कर देता है बल्कि चार बार एक लंबा खंजर रितिक के पेट के आर-पार कर देता है। जिस बरगद के पेड़ पर रितिक के पिता को कांचा ने लटका कर मारा था वहां पहुंच कर मरणासन्न रितिक में फिर एक नकली जोश पैदा होता है और वह भारी पत्थर से संजय दत्त को घायल कर उसे उसी पेड़ पर लटका कर मार डालता है। फिर वह खुद भी मर जाता है। इससे पहले शादी के पहले दिन उसकी प्रेमिका प्रियंका चोपड़ा भी मारी जाती है। बहुत दिनों बाद कोई ऐसी फिल्म देखी जिसके सारे प्रमुख चरित्र अंत में मर जाते हैं। पता नहीं दर्शक इस फिल्म को आने वाले समय में कितना पचाएंगे? मगर पहले दिन तो सिनेमाई भाषा में टिकट विंडो टूट गईं। फिल्म की सबसे खतरनाक धड़कन कैटरीना कैफ का आइटम सॉन्ग है जिसने ‘जुलुम‘ ढा दिया।
निर्देशक: करन मल्होत्रा
कलाकार: रितिक रोशन, संजय दत्त, प्रियंका चोपड़ा, ऋषि कपूर, ओम पुरी, कैटरीना कैफ।
संगीत: अजय अतुल गोगावले
गीत: अमिताभ भट्टाचार्य
यह नये समय का ‘अग्निपथ‘
धीरेन्द्र अस्थाना
अमिताभ बच्चन वाली कामयाब फिल्म ‘अग्निपथ‘ का रीमेक बनाया है तो पुरानी फिल्म से तुलना का अभिशाप झेलना ही होगा। यह निर्देशक करन मल्होत्रा का नये समय में खड़ा ‘अग्निपथ‘ जरूर है लेकिन थोड़े हेर-फेर के बाद फिल्म की मूल कहानी वही है। पुरानी ‘अग्निपथ‘ में सब कुछ संतुलित और विश्वसनीय था। हालांकि वह फिल्म भी लार्जर देन लाइफ वाले फॉर्मूले के हिसाब से ही बनायी गयी थी। लेकिन नयी ‘अग्निपथ‘ में कुछ चरित्र और घटनाएं अविश्वसनीय हो गयी हैं। करन मल्होत्रा की पटकथा भी थोड़ी असंतुलित और लंबी हो गयी है। जब चरित्र नये हैं और नये समय की ‘अग्निपथ‘ है तो बेहतर होता कि नये ढंग से नयी कहानी के साथ फिल्म बनायी जाती। इस बार विजय दीनानाथ चौहान के रूप में रितिक रोशन हैं तो कांचा के रूप में संजय दत्त। रितिक की प्रेमिका बनी हैं प्रियंका चोपड़ा तो पुलिस अधिकारी का किरदार निभाया है ओम पुरी ने। मुंबई के माफिया डॉन रऊफ लाला का चरित्र ऋषि कपूर ने निभाया है। यह नयी ‘अग्निपथ‘ का नया चरित्र है। सब के सब महारथी हैं और सब ने लाजवाब अभिनय किया है। लेकिन कोई यह तो बताए कि मुंबई में कम उम्र लड़कियों की सार्वजनिक नीलामी वाला वैसा बाजार कब और कहां लगता था जैसा ‘अग्निपथ‘ में ऋषि कपूर लगाते हैं। कहानी को अतिरिक्त रोचकता देने के लिए जोड़ा गया यह दृश्य फिल्म में कृत्रिमता पैदा करता है। इसकी कोई जरूरत नहीं थी। जिस कांचा के साम्राज्य मांडवा में पुलिस दल जाने से घबराता है वहां रितिक रोशन अकेला पहुंच जाता है और कांचा की सुरक्षा व्यवस्था को धता बताते हुए बहुत सारे बमों से उसके तमाम ऊंचे-ऊंचे टावर उड़ा देता है। जिस रितिक रोशन के हाथों संजय दत्त को मरना है वह संजय दत्त न सिर्फ रितिक को मार-मार के अधमरा कर देता है बल्कि चार बार एक लंबा खंजर रितिक के पेट के आर-पार कर देता है। जिस बरगद के पेड़ पर रितिक के पिता को कांचा ने लटका कर मारा था वहां पहुंच कर मरणासन्न रितिक में फिर एक नकली जोश पैदा होता है और वह भारी पत्थर से संजय दत्त को घायल कर उसे उसी पेड़ पर लटका कर मार डालता है। फिर वह खुद भी मर जाता है। इससे पहले शादी के पहले दिन उसकी प्रेमिका प्रियंका चोपड़ा भी मारी जाती है। बहुत दिनों बाद कोई ऐसी फिल्म देखी जिसके सारे प्रमुख चरित्र अंत में मर जाते हैं। पता नहीं दर्शक इस फिल्म को आने वाले समय में कितना पचाएंगे? मगर पहले दिन तो सिनेमाई भाषा में टिकट विंडो टूट गईं। फिल्म की सबसे खतरनाक धड़कन कैटरीना कैफ का आइटम सॉन्ग है जिसने ‘जुलुम‘ ढा दिया।
निर्देशक: करन मल्होत्रा
कलाकार: रितिक रोशन, संजय दत्त, प्रियंका चोपड़ा, ऋषि कपूर, ओम पुरी, कैटरीना कैफ।
संगीत: अजय अतुल गोगावले
गीत: अमिताभ भट्टाचार्य
Monday, January 16, 2012
4084
फिल्म समीक्षा
कहां से चली कहां पहुंची 4084
धीरेन्द्र अस्थाना
फिल्म ‘4084’ के लिए स्वयं नसीरुद्दीन शाह भले ही यह कहें कि ‘इसकी कहानी एकदम अलग थी, इसलिए नेरेशन के पहले मिनट में ही मैंने इसे करने की सहमति दे दी।’ लेकिन हकीकत यह है कि दिलचस्प ढंग से फिल्माने के बावजूद यह एक साधारण मसाला फिल्म है। मूलरूप से ‘4084’ एक कॉमेडी थ्रिलर है लेकिन इसमें बॉलीवुड के सभी मसालों का तड़का लगाया गया है। इमोशन का, सेक्स का, आइटम नंबर का, हास्य का और एक्शन का। एक बहुत पुरानी फिल्म का गाना था- ‘जाते थे जापान पहुंच गये चीन, समझ गये न।’ बिल्कुल इसी तर्ज पर ‘4084’ की कहानी बुनी गयी है। चार टपोरी टाइप के चरित्र पुलिस भेष में पुलिस वैन 4084 चुराकर एक वीरान घर से 20 करोड़ के असली नोट हड़पने का प्लान बनाते हैं। इस घर में असली नोटों के बदले डबल करके नकली नोट दिए जा रहे हैं। चौथे दिन वहां बचेंगे सिर्फ असली नोट, जिसके रखवाले हैं केवल दो गुंडे। यह कहानी बताकर नसीर साहब अपने साथ के के मेनन, अतुल कुलकर्णी और रवि किशन को लेते हैं। चारों की चार कहानियां, चार अतीत और चार वर्तमान हैं। अगर बीस करोड़ मिल जाएं तो चारों अपने अतीत और वर्तमान से छुटकारा पाकर अपने-अपने सपनों के भविष्य में छलांग लगा सकते हैं। कहानी में यू टर्न तब आता है, जब इन चारों की वैन को एक सचमुच का पुलिस आफिसर रोक लेता है। इसे एक गैंगस्टर जाकिर हुसैन की तलाश है, जो द्वारका लॉज के किसी कमरे में छिपा है। वह इन चारों को अपनी मदद के लिए साथ में ले लेता है। अब ये चारों पुलिस वाले तो हैं नहीं, इसलिए पुलिस का काम करते समय कैसे इनके छक्के छूटते हैं, इस स्थिति से कॉमेडी पैदा की गयी है। फिल्म की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि फिल्म के चारों किरदार एकदम सड़क के स्वाभाविक टपोरी लगते हैं। अपने अब तक के करियर में अतुल कुलकर्णी ने पहली बार डांस किया है और झकास ठुमके लगाए हैं। के के तो स्वाभाविक अभिनय के मास्टर हैं। उनके और अतुल के बीच हुए कुछ संवाद चुटीले और मजेदार हैं। फिल्म की एक अलग अदा यह जरूर है कि कई घटनाक्रमों को पार करने के बाद अंत में इन चारों को बीस करोड़ के नोट हाथ लग ही जाते हैं। फिल्मों में चूंकि हीरोईन होती ही है, इसलिए इसमें भी है। नहीं भी होती तो कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि हीरोईन श्वेता भारद्वाज से सिर्फ डांस करवाया गया है। फिल्म के दोनों आइटम नंबर ‘सेटिंग झाला’ और ‘बदमस्त’ छोटे शहरों में लोकप्रिय हो सकते हैं।
निर्देशक: हृदय शेट्टी
कलाकार: नसीरुद्दीन शाह, के के मेनन, रवि किशन, अतुल कुलकर्णी, जाकिर हुसैन, श्वेता भारद्वाज
संगीत: ललित पंडित/विशाल राजन
कहां से चली कहां पहुंची 4084
धीरेन्द्र अस्थाना
फिल्म ‘4084’ के लिए स्वयं नसीरुद्दीन शाह भले ही यह कहें कि ‘इसकी कहानी एकदम अलग थी, इसलिए नेरेशन के पहले मिनट में ही मैंने इसे करने की सहमति दे दी।’ लेकिन हकीकत यह है कि दिलचस्प ढंग से फिल्माने के बावजूद यह एक साधारण मसाला फिल्म है। मूलरूप से ‘4084’ एक कॉमेडी थ्रिलर है लेकिन इसमें बॉलीवुड के सभी मसालों का तड़का लगाया गया है। इमोशन का, सेक्स का, आइटम नंबर का, हास्य का और एक्शन का। एक बहुत पुरानी फिल्म का गाना था- ‘जाते थे जापान पहुंच गये चीन, समझ गये न।’ बिल्कुल इसी तर्ज पर ‘4084’ की कहानी बुनी गयी है। चार टपोरी टाइप के चरित्र पुलिस भेष में पुलिस वैन 4084 चुराकर एक वीरान घर से 20 करोड़ के असली नोट हड़पने का प्लान बनाते हैं। इस घर में असली नोटों के बदले डबल करके नकली नोट दिए जा रहे हैं। चौथे दिन वहां बचेंगे सिर्फ असली नोट, जिसके रखवाले हैं केवल दो गुंडे। यह कहानी बताकर नसीर साहब अपने साथ के के मेनन, अतुल कुलकर्णी और रवि किशन को लेते हैं। चारों की चार कहानियां, चार अतीत और चार वर्तमान हैं। अगर बीस करोड़ मिल जाएं तो चारों अपने अतीत और वर्तमान से छुटकारा पाकर अपने-अपने सपनों के भविष्य में छलांग लगा सकते हैं। कहानी में यू टर्न तब आता है, जब इन चारों की वैन को एक सचमुच का पुलिस आफिसर रोक लेता है। इसे एक गैंगस्टर जाकिर हुसैन की तलाश है, जो द्वारका लॉज के किसी कमरे में छिपा है। वह इन चारों को अपनी मदद के लिए साथ में ले लेता है। अब ये चारों पुलिस वाले तो हैं नहीं, इसलिए पुलिस का काम करते समय कैसे इनके छक्के छूटते हैं, इस स्थिति से कॉमेडी पैदा की गयी है। फिल्म की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि फिल्म के चारों किरदार एकदम सड़क के स्वाभाविक टपोरी लगते हैं। अपने अब तक के करियर में अतुल कुलकर्णी ने पहली बार डांस किया है और झकास ठुमके लगाए हैं। के के तो स्वाभाविक अभिनय के मास्टर हैं। उनके और अतुल के बीच हुए कुछ संवाद चुटीले और मजेदार हैं। फिल्म की एक अलग अदा यह जरूर है कि कई घटनाक्रमों को पार करने के बाद अंत में इन चारों को बीस करोड़ के नोट हाथ लग ही जाते हैं। फिल्मों में चूंकि हीरोईन होती ही है, इसलिए इसमें भी है। नहीं भी होती तो कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि हीरोईन श्वेता भारद्वाज से सिर्फ डांस करवाया गया है। फिल्म के दोनों आइटम नंबर ‘सेटिंग झाला’ और ‘बदमस्त’ छोटे शहरों में लोकप्रिय हो सकते हैं।
निर्देशक: हृदय शेट्टी
कलाकार: नसीरुद्दीन शाह, के के मेनन, रवि किशन, अतुल कुलकर्णी, जाकिर हुसैन, श्वेता भारद्वाज
संगीत: ललित पंडित/विशाल राजन
Monday, January 2, 2012
2011 के मानचित्र पर सार्थक सिनेमा के दस्तखत
2011 के मानचित्र पर सार्थक सिनेमा के दस्तखत
धीरेन्द्र अस्थाना
सार्थक और बेहतरीन सिनेमा के संदर्भ में सन् 2011 का आरंभ ‘नो वन किल्ड जेसिका‘ से हुआ और अंत ‘द डर्टी पिक्चर‘ से। उल्लेखनीय है कि दोनों ही फिल्मों की हीरोइन विद्या बालन हैं। पिछले कुछ वर्षों से ऐसा देखने में आ रहा है कि प्रयोगधर्मी और मनोरंजनधर्मी दोनों तरह के फिल्मकार हर साल कुछ ऐसी फिल्में बना लेते हैं जो यह भरोसा दिलाती हैं कि सिनेमा की दुनिया में सब कुछ ही बाजार के हवाले नहीं हो गया है। व्यापार के स्तर पर अपनी प्रत्येक फिल्म को हिट कर देने वाले आमिर खान भी अपनी फिल्मों में कुछ न कुछ सार्थक कर ही जाते हैं जबकि वह खुद को शुद्ध रूप से एंटरटेनर मानते हैं।
सन् 2011 में सफल असफल लगभग 112 फिल्में रिलीज हुईं। इनमें से बाजार के स्तर पर ‘तनु वेड्स मनु‘, ‘रागिनी एमएमएस‘, ‘रेडी‘, ‘डबल धमाल‘, ‘मर्डर-2‘, ‘दिल्ली बेली‘, ‘नो वन किल्ड जेसिका‘, ‘जिंदगी ना मिलेगी दोबारा‘, ‘सिंघम‘, ‘आरक्षण‘, ‘बॉडीगार्ड‘, ‘मेरे ब्रदर की दुल्हन‘, ‘फोर्स‘, ‘रा डॉट वन‘, ‘रॉक स्टार‘, ‘देसी ब्वॉयज‘ और ‘द डर्टी पिक्चर‘ ने अच्छी कमाई की। शाहरुख अभिनीत ‘डॉन-2‘ भी वर्षांत की सबसे ज्यादा कारोबार करने वाली फिल्म साबित हो सकती है। लेकिन सिनेमा जैसे भारी पैसे की व्यापारिक दुनिया में रहने के बावजूद कुछ लोग हैं जिन्हें मनुष्य का दुख-दर्द भी महसूस होता है और उसके संघर्ष की आंच से उनका संवेदनशील मन उद्वेलित होता रहता है। यही लोग सिनेमा का एक मानवीय और अर्थपूर्ण अस्तित्व गढ़ते रहते हैं और इन्हीं लोगों के कारण सिनेमा के मानचित्र पर प्रत्येक वर्ष कुछ बेहतरीन दस्तखत चमक जाते हैं। सन् 2011 में ज्यादा तो नहीं लेकिन आठ से दस फिल्में जरूर ऐसी बनी हैं जो सार्थक सिनेमा के चाहने वालों को यह आश्वासन देती हैं कि मनोरंजन के नाम पर सब कुछ फूहड़ कॉमेडी और तर्क रहित एक्शन में विलीन नहीं हो गया है।
7 जनवरी 2011 को रिलीज हुई राजकुमार गुप्ता की फिल्म ‘नो वन किल्ड जेसिका‘ एक साफ-सुथरी, मर्मस्पर्शी और वैचारिक फिल्म थी। सत्ता के केंद्र दिल्ली में कैसे तंत्र और धन की सांठ-गांठ के सामने आम जीवन असहाय और निहत्था है, इसका ज्वलंत विमर्श इस फिल्म ने पर्दे पर साकार कर दिया था। दिल्ली के एक बहुचर्चित मर्डर केस पर आधारित इस फिल्म को बेहद सधे हाथों और संवेदनशील मन से बुना गया था। 21 जनवरी को किरण राव द्वारा निर्देशित पहली फिल्म रिलीज हुई ‘धोबी घाट‘। एक फोटो ग्राफर की आंख से देखी गयी इस फिल्म में आमिर खान और प्रतीक बब्बर ने कमाल का काम किया है। फिल्म के प्रदर्शन से पहले ही निर्देशिका किरण राव ने स्वीकार कर लिया था कि यह अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों की फिल्म है। अपनी पहली ही फिल्म को मुंबई का विमर्श बना कर किरण राव ने साहस का परिचय दिया। इसमें उन्होंने चार समानांतर कहानियों के जरिए मुंबई के जटिल यथार्थ को खोलने की कोशिश की। 4 फरवरी को सार्थक फिल्मों के निर्देशक सुधीर मिश्रा ‘ये साली जिंदगी‘ के साथ सामने आए। जिन फिल्मों को कंटेंट इज किंग कह कर परिभाषित किया जाता है वैसी फिल्म तो ये थी ही अभिनय के स्तर पर भी बेमिसाल रही। इसमें जीवंतता, सहजता और सशक्तता की एक नई ऊंचाई पर खड़े मिले इरफान खान। एक पंक्ति में कहना हो तो ये स्टाइल, कंटेंट और एक्टिंग की फिल्म रही जो जिंदगी के खट्टे-मीठे खुरदुरे अनुभवों का कोलाज बन गयी। 29 अप्रैल को रिलीज हुई एकता कपूर की फिल्म ‘शोर‘ में भी निर्देशक राज नीदिमोरू और कृष्णा डीके ने सपनों के शहर मुंबई में अपने-अपने दम पर अपने अपने तरीके से संघर्ष कर रहे कुछ युवाओं की जद्दोजहद को प्रस्तुत किया। इस फिल्म में भी तीन कहानियां समानांतर चलती हैं। बेरोजगारी, चोरी चकारी, क्रिकेट, लोकल की भीड़, मारामारी, प्यार, तीज त्योहार, झोपड़पट्टी, पांच सितारा पार्टियां, बीयर बार, पुलिस इन सबको साथ लेकर चलने वाली यह छोटी सी फिल्म बड़े पर्दे पर एक सशक्त कविता की तरह उभरती है। बतौर निर्देशक तो नहीं लेकिन बतौर निर्माता अनुराग कश्यप की फिल्म ‘शैतान‘ ने भी वर्ष 2011 में अपनी जोरदार उपस्थिति दर्ज करायी। समय, समाज, कहानी, चरित्र एकदम यथार्थवादी लेकिन कहने का अंदाज फंतासी में लिपटा हुआ, बिल्कुल जादुई यथार्थवाद जैसा। मौजूदा उत्तर आधुनिक समय की जमीन पर खड़ी फिल्म ‘शैतान‘ उन युवाओं की नीच ट्रेजेडी का बखान करती है जिनकी दिशाएं खो गई हैं। ‘शैतान‘ सिनेमा में रचनात्मकता को संभव करती है। 15 जुलाई को रिलीज हुई जोया अख्तर की फिल्म ‘जिंदगी ना मिलेगी दोबारा‘ बेहद खूबसूरती और संवेदनशीलता के साथ यह सार्थक संदेश देने में कामयाब हुई कि जिंदगी अगर जंग है तो जंग कर, कि जिजीविषा ही जीवन का अंतिम सच होना चाहिए। फिल्म के तीनों नायकों रितिक रोशन, फरहान अख्तर और अभय देओल ने जिंदगी की आखिरी सांस तक संघर्ष करने वाले युवकों का सफल प्रतिनिधित्व किया। 12 अगस्त को रिलीज हुई प्रकाश झा की फिल्म ‘आरक्षण‘ जहां बॉक्स ऑफिस के मोर्चे पर कामयाब हुई वहीं उसने एक महत्वपूर्ण संदेश देने का काम भी किया। समय, समाज, राजनीति और आरक्षण जैसे मुद्दों पर गंभीर चर्चा करने वाली इस फिल्म ने मनोरंजन को भी साधे रखा। एक्टिंग के स्कूल कहे जाने वाले अमिताभ बच्चन ने पूरी फिल्म को अपने जीवंत अभिनय से बांधे रखा। वहीं सैफ अली खान और दीपिका पादुकोन भी संवेदनशील और मर्मस्पर्शी अभिनय करने में कामयाब हुए। अभिनय की दुनिया के एक बड़े नाम पंकज कपूर के निर्देशन की पहली फिल्म ‘मौसम‘ 23 सितंबर को रिलीज हुई। दंगों के बैकड्रॉप पर पहले भी संवेदनशील प्रेम कहानियां रची गयी हैं। ‘मौसम‘ भी उसी कड़ी की एक नाजुक सी फिल्म थी जो इसलिए असफल हो गयी क्योंकि पंकज कपूर एक ही फिल्म में देश दुनिया में हुए कई सारे दंगों और आतंकवादी गतिविधियों को दिखाने का मोह नहीं समेट पाए। लेकिन अच्छी फिल्मों की सूची में ‘मौसम‘ का नाम शामिल रहना चाहिए जिसे शाहिद और सोनम कपूर के सुंदर अभिनय के लिए याद किया जाएगा। 11 नवंबर को निर्देशक इम्तियाज अली एक गायक के जीवन और संघर्ष पर बनी खुरदुरी तथा बेचैन कर देने वाली फिल्म ‘रॉकस्टार‘ लेकर आए। इस फिल्म में रणबीर कपूर ने साबित किया कि वह कपूर खानदान के एकदम काबिल वारिस हैं। फिल्म में रणबीर का बहुआयामी अभिनय दर्शकों को अचंभित कर गया। वहीं ए.आर. रहमान ने इसमें यादगार संगीत दिया। 2 दिसंबर को एकता कपूर ‘द डर्टी पिक्चर‘ लेकर आयीं जिसमें प्रतिभाशाली विद्या बालन ने साउथ की सनसनी सिल्क स्मिता का रंगारंग लेकिन पेचीदा किरदार बोल्ड और ब्यूटीफुल ढंग से निभा कर न सिर्फ हिंदी सिनेमा को समृद्ध किया बल्कि बॉक्स ऑफिस पर सिक्कों की बारिश भी करवायी। सिल्क स्मिता के बहाने यह फिल्म जगमग उजालों के पीछे थरथराते उदास और गर्दिश में डूबे चेहरों की मार्मिक दास्तान बन गयी। चमकदार सिनेमा के दारुण यथार्थ को इस फिल्म ने एक मर्मांतक चीख की तरह पेश किया। देखना है कि अगले वर्ष सार्थक फिल्मों की यह लकीर और कितनी बड़ी होगी।
धीरेन्द्र अस्थाना
सार्थक और बेहतरीन सिनेमा के संदर्भ में सन् 2011 का आरंभ ‘नो वन किल्ड जेसिका‘ से हुआ और अंत ‘द डर्टी पिक्चर‘ से। उल्लेखनीय है कि दोनों ही फिल्मों की हीरोइन विद्या बालन हैं। पिछले कुछ वर्षों से ऐसा देखने में आ रहा है कि प्रयोगधर्मी और मनोरंजनधर्मी दोनों तरह के फिल्मकार हर साल कुछ ऐसी फिल्में बना लेते हैं जो यह भरोसा दिलाती हैं कि सिनेमा की दुनिया में सब कुछ ही बाजार के हवाले नहीं हो गया है। व्यापार के स्तर पर अपनी प्रत्येक फिल्म को हिट कर देने वाले आमिर खान भी अपनी फिल्मों में कुछ न कुछ सार्थक कर ही जाते हैं जबकि वह खुद को शुद्ध रूप से एंटरटेनर मानते हैं।
सन् 2011 में सफल असफल लगभग 112 फिल्में रिलीज हुईं। इनमें से बाजार के स्तर पर ‘तनु वेड्स मनु‘, ‘रागिनी एमएमएस‘, ‘रेडी‘, ‘डबल धमाल‘, ‘मर्डर-2‘, ‘दिल्ली बेली‘, ‘नो वन किल्ड जेसिका‘, ‘जिंदगी ना मिलेगी दोबारा‘, ‘सिंघम‘, ‘आरक्षण‘, ‘बॉडीगार्ड‘, ‘मेरे ब्रदर की दुल्हन‘, ‘फोर्स‘, ‘रा डॉट वन‘, ‘रॉक स्टार‘, ‘देसी ब्वॉयज‘ और ‘द डर्टी पिक्चर‘ ने अच्छी कमाई की। शाहरुख अभिनीत ‘डॉन-2‘ भी वर्षांत की सबसे ज्यादा कारोबार करने वाली फिल्म साबित हो सकती है। लेकिन सिनेमा जैसे भारी पैसे की व्यापारिक दुनिया में रहने के बावजूद कुछ लोग हैं जिन्हें मनुष्य का दुख-दर्द भी महसूस होता है और उसके संघर्ष की आंच से उनका संवेदनशील मन उद्वेलित होता रहता है। यही लोग सिनेमा का एक मानवीय और अर्थपूर्ण अस्तित्व गढ़ते रहते हैं और इन्हीं लोगों के कारण सिनेमा के मानचित्र पर प्रत्येक वर्ष कुछ बेहतरीन दस्तखत चमक जाते हैं। सन् 2011 में ज्यादा तो नहीं लेकिन आठ से दस फिल्में जरूर ऐसी बनी हैं जो सार्थक सिनेमा के चाहने वालों को यह आश्वासन देती हैं कि मनोरंजन के नाम पर सब कुछ फूहड़ कॉमेडी और तर्क रहित एक्शन में विलीन नहीं हो गया है।
7 जनवरी 2011 को रिलीज हुई राजकुमार गुप्ता की फिल्म ‘नो वन किल्ड जेसिका‘ एक साफ-सुथरी, मर्मस्पर्शी और वैचारिक फिल्म थी। सत्ता के केंद्र दिल्ली में कैसे तंत्र और धन की सांठ-गांठ के सामने आम जीवन असहाय और निहत्था है, इसका ज्वलंत विमर्श इस फिल्म ने पर्दे पर साकार कर दिया था। दिल्ली के एक बहुचर्चित मर्डर केस पर आधारित इस फिल्म को बेहद सधे हाथों और संवेदनशील मन से बुना गया था। 21 जनवरी को किरण राव द्वारा निर्देशित पहली फिल्म रिलीज हुई ‘धोबी घाट‘। एक फोटो ग्राफर की आंख से देखी गयी इस फिल्म में आमिर खान और प्रतीक बब्बर ने कमाल का काम किया है। फिल्म के प्रदर्शन से पहले ही निर्देशिका किरण राव ने स्वीकार कर लिया था कि यह अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों की फिल्म है। अपनी पहली ही फिल्म को मुंबई का विमर्श बना कर किरण राव ने साहस का परिचय दिया। इसमें उन्होंने चार समानांतर कहानियों के जरिए मुंबई के जटिल यथार्थ को खोलने की कोशिश की। 4 फरवरी को सार्थक फिल्मों के निर्देशक सुधीर मिश्रा ‘ये साली जिंदगी‘ के साथ सामने आए। जिन फिल्मों को कंटेंट इज किंग कह कर परिभाषित किया जाता है वैसी फिल्म तो ये थी ही अभिनय के स्तर पर भी बेमिसाल रही। इसमें जीवंतता, सहजता और सशक्तता की एक नई ऊंचाई पर खड़े मिले इरफान खान। एक पंक्ति में कहना हो तो ये स्टाइल, कंटेंट और एक्टिंग की फिल्म रही जो जिंदगी के खट्टे-मीठे खुरदुरे अनुभवों का कोलाज बन गयी। 29 अप्रैल को रिलीज हुई एकता कपूर की फिल्म ‘शोर‘ में भी निर्देशक राज नीदिमोरू और कृष्णा डीके ने सपनों के शहर मुंबई में अपने-अपने दम पर अपने अपने तरीके से संघर्ष कर रहे कुछ युवाओं की जद्दोजहद को प्रस्तुत किया। इस फिल्म में भी तीन कहानियां समानांतर चलती हैं। बेरोजगारी, चोरी चकारी, क्रिकेट, लोकल की भीड़, मारामारी, प्यार, तीज त्योहार, झोपड़पट्टी, पांच सितारा पार्टियां, बीयर बार, पुलिस इन सबको साथ लेकर चलने वाली यह छोटी सी फिल्म बड़े पर्दे पर एक सशक्त कविता की तरह उभरती है। बतौर निर्देशक तो नहीं लेकिन बतौर निर्माता अनुराग कश्यप की फिल्म ‘शैतान‘ ने भी वर्ष 2011 में अपनी जोरदार उपस्थिति दर्ज करायी। समय, समाज, कहानी, चरित्र एकदम यथार्थवादी लेकिन कहने का अंदाज फंतासी में लिपटा हुआ, बिल्कुल जादुई यथार्थवाद जैसा। मौजूदा उत्तर आधुनिक समय की जमीन पर खड़ी फिल्म ‘शैतान‘ उन युवाओं की नीच ट्रेजेडी का बखान करती है जिनकी दिशाएं खो गई हैं। ‘शैतान‘ सिनेमा में रचनात्मकता को संभव करती है। 15 जुलाई को रिलीज हुई जोया अख्तर की फिल्म ‘जिंदगी ना मिलेगी दोबारा‘ बेहद खूबसूरती और संवेदनशीलता के साथ यह सार्थक संदेश देने में कामयाब हुई कि जिंदगी अगर जंग है तो जंग कर, कि जिजीविषा ही जीवन का अंतिम सच होना चाहिए। फिल्म के तीनों नायकों रितिक रोशन, फरहान अख्तर और अभय देओल ने जिंदगी की आखिरी सांस तक संघर्ष करने वाले युवकों का सफल प्रतिनिधित्व किया। 12 अगस्त को रिलीज हुई प्रकाश झा की फिल्म ‘आरक्षण‘ जहां बॉक्स ऑफिस के मोर्चे पर कामयाब हुई वहीं उसने एक महत्वपूर्ण संदेश देने का काम भी किया। समय, समाज, राजनीति और आरक्षण जैसे मुद्दों पर गंभीर चर्चा करने वाली इस फिल्म ने मनोरंजन को भी साधे रखा। एक्टिंग के स्कूल कहे जाने वाले अमिताभ बच्चन ने पूरी फिल्म को अपने जीवंत अभिनय से बांधे रखा। वहीं सैफ अली खान और दीपिका पादुकोन भी संवेदनशील और मर्मस्पर्शी अभिनय करने में कामयाब हुए। अभिनय की दुनिया के एक बड़े नाम पंकज कपूर के निर्देशन की पहली फिल्म ‘मौसम‘ 23 सितंबर को रिलीज हुई। दंगों के बैकड्रॉप पर पहले भी संवेदनशील प्रेम कहानियां रची गयी हैं। ‘मौसम‘ भी उसी कड़ी की एक नाजुक सी फिल्म थी जो इसलिए असफल हो गयी क्योंकि पंकज कपूर एक ही फिल्म में देश दुनिया में हुए कई सारे दंगों और आतंकवादी गतिविधियों को दिखाने का मोह नहीं समेट पाए। लेकिन अच्छी फिल्मों की सूची में ‘मौसम‘ का नाम शामिल रहना चाहिए जिसे शाहिद और सोनम कपूर के सुंदर अभिनय के लिए याद किया जाएगा। 11 नवंबर को निर्देशक इम्तियाज अली एक गायक के जीवन और संघर्ष पर बनी खुरदुरी तथा बेचैन कर देने वाली फिल्म ‘रॉकस्टार‘ लेकर आए। इस फिल्म में रणबीर कपूर ने साबित किया कि वह कपूर खानदान के एकदम काबिल वारिस हैं। फिल्म में रणबीर का बहुआयामी अभिनय दर्शकों को अचंभित कर गया। वहीं ए.आर. रहमान ने इसमें यादगार संगीत दिया। 2 दिसंबर को एकता कपूर ‘द डर्टी पिक्चर‘ लेकर आयीं जिसमें प्रतिभाशाली विद्या बालन ने साउथ की सनसनी सिल्क स्मिता का रंगारंग लेकिन पेचीदा किरदार बोल्ड और ब्यूटीफुल ढंग से निभा कर न सिर्फ हिंदी सिनेमा को समृद्ध किया बल्कि बॉक्स ऑफिस पर सिक्कों की बारिश भी करवायी। सिल्क स्मिता के बहाने यह फिल्म जगमग उजालों के पीछे थरथराते उदास और गर्दिश में डूबे चेहरों की मार्मिक दास्तान बन गयी। चमकदार सिनेमा के दारुण यथार्थ को इस फिल्म ने एक मर्मांतक चीख की तरह पेश किया। देखना है कि अगले वर्ष सार्थक फिल्मों की यह लकीर और कितनी बड़ी होगी।
Monday, December 26, 2011
डॉन टू
फिल्म समीक्षा
सिर्फ स्टाइलिश है:डॉन टू‘
धीरेन्द्र अस्थाना
निर्देशक फरहान अख्तर अपनी जिस संवेदनशीलता के लिए जाने जाते हैं, ’डॉन-टू‘ उससे एकदम अलग, तकनीक प्रधान फिल्म है। शाहरुख खान की फिल्म ‘रा डॉट वन‘ भी तकनीक प्रधान फिल्म थी, इसलिए उसने भी दर्शकों के दिल को नहीं छुआ था। ’डॉन टू‘ भी लगभग उसी कड़ी की फिल्म है, जो यह तो बता सकती है कि मारधाड़, विस्फोट, डकैती, जेल तोड़ना, सिक्योरिटी सिस्टम फेल कर देना, ऊंची बिल्डिंगों से कूदना आदि आदि के स्तर पर सिनेमा कितना आगे पहुंच गया है पर एक तार्किक, दमदार और भावप्रवण कहानी कहने से चूक जाती है। शाहरुख खान की जितनी भी यादगार और बेहतरीन फिल्में हैं, वे सब की सब अपनी मर्मस्पर्शी कहानियों के कारण उल्लेखनीय हैं। इसमें शक नहीं कि ’डॉन-टू‘ एक भव्य और महंगी फिल्म है, जिसकी विदेशी लोकेशन मन को बांधती हैं। इसमें भी शक नहीं कि इसमें शाहरुख खान का वह निराला अंदाज भी मौजूद है, जिसकी वजह से वह किंग खान हैं लेकिन एक उम्दा कथा-पटकथा के अभाव के चलते ’डॉन-टू‘ सिर्फ एक स्टाइलिश फिल्म बनकर रह गयी है। फिल्म के एक और खतरनाक डॉन बोमन ईरानी के आदेश के बावजूद जब प्रियंका चोपड़ा खुद गोली खा लेती है लेकिन शाहरुख खान पर गोली नहीं चला पाती, पूरी फिल्म में केवल यही एक दृश्य ऐसा है जो दर्शकों को भावना के स्तर पर स्पर्श करता है। प्रियंका चोपड़ा एक सीनियर पुलिस अधिकारी है, जो शाहरुख खान को जेल की सलाखों के पीछे देखने की तमन्ना में पूरी दुनिया में मारी-मारी घूम रही है। तो भी ऐन मौके पर वह कमजोर पड़ जाती है और खुद गोली खा लेती है। इससे जाहिर होता है कि शाहरुख खान को लेकर रागात्मकता का कोई बारीक सा तार प्रियंका के भीतर झनझना रहा है। बाकी तो पूरी फिल्म एक अंतरराष्ट्रीय बैंक की नोट छापने की मशीन हड़पने की कोशिशों पर केंद्रित है। नोटों की इन प्लेटों को अंत में शाहरुख खान हासिल करने में कामयाब भी हो जाता है और पुलिस के चंगुल से आजाद भी हो जाता है, इस मशहूर डायलॉग के साथ, ’डॉन को पकड़ना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।‘ अंतिम सीन में शाहरुख जिस बाइक से आता है, उसकी नंबर प्लेट पर लिखा है- ’डॉन-3‘ यानी पिक्चर अभी बाकी है दोस्त।
निर्देशक: फरहान अख्तर
कलाकार: शाहरुख खान, प्रियंका चोपड़ा, लारा दत्ता, ओम पुरी, कुणाल कपूर, बोमन ईरानी
संगीत: शंकर-अहसान-लॉय
सिर्फ स्टाइलिश है:डॉन टू‘
धीरेन्द्र अस्थाना
निर्देशक फरहान अख्तर अपनी जिस संवेदनशीलता के लिए जाने जाते हैं, ’डॉन-टू‘ उससे एकदम अलग, तकनीक प्रधान फिल्म है। शाहरुख खान की फिल्म ‘रा डॉट वन‘ भी तकनीक प्रधान फिल्म थी, इसलिए उसने भी दर्शकों के दिल को नहीं छुआ था। ’डॉन टू‘ भी लगभग उसी कड़ी की फिल्म है, जो यह तो बता सकती है कि मारधाड़, विस्फोट, डकैती, जेल तोड़ना, सिक्योरिटी सिस्टम फेल कर देना, ऊंची बिल्डिंगों से कूदना आदि आदि के स्तर पर सिनेमा कितना आगे पहुंच गया है पर एक तार्किक, दमदार और भावप्रवण कहानी कहने से चूक जाती है। शाहरुख खान की जितनी भी यादगार और बेहतरीन फिल्में हैं, वे सब की सब अपनी मर्मस्पर्शी कहानियों के कारण उल्लेखनीय हैं। इसमें शक नहीं कि ’डॉन-टू‘ एक भव्य और महंगी फिल्म है, जिसकी विदेशी लोकेशन मन को बांधती हैं। इसमें भी शक नहीं कि इसमें शाहरुख खान का वह निराला अंदाज भी मौजूद है, जिसकी वजह से वह किंग खान हैं लेकिन एक उम्दा कथा-पटकथा के अभाव के चलते ’डॉन-टू‘ सिर्फ एक स्टाइलिश फिल्म बनकर रह गयी है। फिल्म के एक और खतरनाक डॉन बोमन ईरानी के आदेश के बावजूद जब प्रियंका चोपड़ा खुद गोली खा लेती है लेकिन शाहरुख खान पर गोली नहीं चला पाती, पूरी फिल्म में केवल यही एक दृश्य ऐसा है जो दर्शकों को भावना के स्तर पर स्पर्श करता है। प्रियंका चोपड़ा एक सीनियर पुलिस अधिकारी है, जो शाहरुख खान को जेल की सलाखों के पीछे देखने की तमन्ना में पूरी दुनिया में मारी-मारी घूम रही है। तो भी ऐन मौके पर वह कमजोर पड़ जाती है और खुद गोली खा लेती है। इससे जाहिर होता है कि शाहरुख खान को लेकर रागात्मकता का कोई बारीक सा तार प्रियंका के भीतर झनझना रहा है। बाकी तो पूरी फिल्म एक अंतरराष्ट्रीय बैंक की नोट छापने की मशीन हड़पने की कोशिशों पर केंद्रित है। नोटों की इन प्लेटों को अंत में शाहरुख खान हासिल करने में कामयाब भी हो जाता है और पुलिस के चंगुल से आजाद भी हो जाता है, इस मशहूर डायलॉग के साथ, ’डॉन को पकड़ना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।‘ अंतिम सीन में शाहरुख जिस बाइक से आता है, उसकी नंबर प्लेट पर लिखा है- ’डॉन-3‘ यानी पिक्चर अभी बाकी है दोस्त।
निर्देशक: फरहान अख्तर
कलाकार: शाहरुख खान, प्रियंका चोपड़ा, लारा दत्ता, ओम पुरी, कुणाल कपूर, बोमन ईरानी
संगीत: शंकर-अहसान-लॉय
Monday, December 19, 2011
पप्पू कांट डांस साला
फिल्म समीक्षा
सपनों की फिसलन पर ‘पप्पू कांट डांस साला‘
धीरेन्द्र अस्थाना
बनारस, गोरखपुर, सतना, सीवान, भागलपुर, बेगूसराय या फिर गुड़गांव अथवा रोहतक जैसे छोटे शहरों से मुंबई आकर अपने सपनों को साकार करने का संघर्ष करने वाले युवक-युवतियों के जीवन पर पहले भी कई अच्छी-बुरी फिल्में बनी हैं। ‘पप्पू कांट डांस साला‘ इसी कड़ी की एक और फिल्म है। सौरभ शुक्ला एक काबिल डायरेक्टर एक्टर हैं इसलिए उम्मीद थी कि विषय पुराना होने के बावजूद वह फिल्म में कुछ नया करने की कोशिश करेंगे। यह कोशिश उन्होंने की भी है। बनारस से विनय पाठक मुंबई आता है और मेडिकल रिप्रजेंटेटिव की नौकरी पकड़ लेता है। कोल्हापुर से नेहा धूपिया आती है और एक कोरियाग्राफर रजत कपूर के डांस ग्रुप में शामिल हो जाती है। नेहा को एक बड़ी डांसर बनना है और बॉलीवुड में अपना निजी स्पेस बनाना है। विनय पाठक जहां एक छोटे शहर का सीधा-साधा, संस्कारवान और ईमानदार युवक है वहीं नेहा धूपिया बददिमाग, बिंदास और बोल्ड लड़की के किरदार में है जो अपनी चाहतों को पूरा करने के लिए शहर में जिद की तरह बनी हुई है। सपनों के शहर मुंबई में इन दोनों को सेल्स टैक्स वालों की सरकारी कॉलोनी में एक दूसरे के सामने किराए पर फ्लैट मिलता है। एक रात सरकारी छापा पड़ने के बाद नेहा का फ्लैट सील हो जाता है और वह जबरन विनय पाठक के फ्लैट में कब्जा जमा लेती है लेकिन किराए का आधा पैसा जबरन देकर। इसके बाद शुरू होता है दो विपरीत मूल्यों, सपनों और इच्छाओं का अनंत टकराव। यह टकराव ही इस फिल्म को दिलचस्प भी बनाता है और बाकी फिल्मों से थोड़ा अलग भी करता है। नेहा बात-बात में विनय को पप्पू कह कर उसका मजाक उड़ाती है वहीं विनय भी मौका पड़ने पर नेहा को नैतिकता का पाठ पढ़ाने से बाज नहीं आता। एक दिन नेहा तमक कर कहती है कि नैतिकता की इतनी बात करते हो तो मुंबई में क्या कर रहे हो? जाते क्यों नहीं अपने बनारस? बात विनय को लग जाती है और वह बनारस लौट जाता है। यहां से कहानी में एक नया मोड़ सौरभ ने यह दिया है कि मुंबई और नेहा को छोड़कर आने के बाद विनय पाठक इन दोनों में और ज्यादा रहने लगता है। इस बिंदु पर खड़े विनय को नसीरुद्दीन शाह बताता है कि विनय को नेहा से मोहब्बत हो गई है और उसकी मुक्ति नेहा की दुनिया में ही है। विनय नेहा के पास लौट आता है और एक-दूसरे को जमकर नापसंद करने वाले ये दो लोग एक साथ हो जाते हैं। फिल्म का गीत-संगीत और संवाद पक्ष प्रभावित करता है। फिल्म थोड़ी लंबी और बोझिल हो गई है जिससे बचा जा सकता था। जिन फिल्मों के लिए नेहा धूपिया को याद किया जाएगा उनमें एक फिल्म बिना शक ‘पप्पू कांट डांस साला‘ भी होगी। अगर इस फिल्म का कायदे से प्रचार किया गया होता तो बॉक्स ऑफिस पर यह फिल्म सफल हो सकती थी।
निर्देशक: सौरभ शुक्ला
कलाकार: विनय पाठक, नेहा धूपिया, रजत कपूर, संजय मिश्रा, नसीरुद्दीन शाह, सौरभ शुक्ला
संगीत: मल्हार पाटेकर
सपनों की फिसलन पर ‘पप्पू कांट डांस साला‘
धीरेन्द्र अस्थाना
बनारस, गोरखपुर, सतना, सीवान, भागलपुर, बेगूसराय या फिर गुड़गांव अथवा रोहतक जैसे छोटे शहरों से मुंबई आकर अपने सपनों को साकार करने का संघर्ष करने वाले युवक-युवतियों के जीवन पर पहले भी कई अच्छी-बुरी फिल्में बनी हैं। ‘पप्पू कांट डांस साला‘ इसी कड़ी की एक और फिल्म है। सौरभ शुक्ला एक काबिल डायरेक्टर एक्टर हैं इसलिए उम्मीद थी कि विषय पुराना होने के बावजूद वह फिल्म में कुछ नया करने की कोशिश करेंगे। यह कोशिश उन्होंने की भी है। बनारस से विनय पाठक मुंबई आता है और मेडिकल रिप्रजेंटेटिव की नौकरी पकड़ लेता है। कोल्हापुर से नेहा धूपिया आती है और एक कोरियाग्राफर रजत कपूर के डांस ग्रुप में शामिल हो जाती है। नेहा को एक बड़ी डांसर बनना है और बॉलीवुड में अपना निजी स्पेस बनाना है। विनय पाठक जहां एक छोटे शहर का सीधा-साधा, संस्कारवान और ईमानदार युवक है वहीं नेहा धूपिया बददिमाग, बिंदास और बोल्ड लड़की के किरदार में है जो अपनी चाहतों को पूरा करने के लिए शहर में जिद की तरह बनी हुई है। सपनों के शहर मुंबई में इन दोनों को सेल्स टैक्स वालों की सरकारी कॉलोनी में एक दूसरे के सामने किराए पर फ्लैट मिलता है। एक रात सरकारी छापा पड़ने के बाद नेहा का फ्लैट सील हो जाता है और वह जबरन विनय पाठक के फ्लैट में कब्जा जमा लेती है लेकिन किराए का आधा पैसा जबरन देकर। इसके बाद शुरू होता है दो विपरीत मूल्यों, सपनों और इच्छाओं का अनंत टकराव। यह टकराव ही इस फिल्म को दिलचस्प भी बनाता है और बाकी फिल्मों से थोड़ा अलग भी करता है। नेहा बात-बात में विनय को पप्पू कह कर उसका मजाक उड़ाती है वहीं विनय भी मौका पड़ने पर नेहा को नैतिकता का पाठ पढ़ाने से बाज नहीं आता। एक दिन नेहा तमक कर कहती है कि नैतिकता की इतनी बात करते हो तो मुंबई में क्या कर रहे हो? जाते क्यों नहीं अपने बनारस? बात विनय को लग जाती है और वह बनारस लौट जाता है। यहां से कहानी में एक नया मोड़ सौरभ ने यह दिया है कि मुंबई और नेहा को छोड़कर आने के बाद विनय पाठक इन दोनों में और ज्यादा रहने लगता है। इस बिंदु पर खड़े विनय को नसीरुद्दीन शाह बताता है कि विनय को नेहा से मोहब्बत हो गई है और उसकी मुक्ति नेहा की दुनिया में ही है। विनय नेहा के पास लौट आता है और एक-दूसरे को जमकर नापसंद करने वाले ये दो लोग एक साथ हो जाते हैं। फिल्म का गीत-संगीत और संवाद पक्ष प्रभावित करता है। फिल्म थोड़ी लंबी और बोझिल हो गई है जिससे बचा जा सकता था। जिन फिल्मों के लिए नेहा धूपिया को याद किया जाएगा उनमें एक फिल्म बिना शक ‘पप्पू कांट डांस साला‘ भी होगी। अगर इस फिल्म का कायदे से प्रचार किया गया होता तो बॉक्स ऑफिस पर यह फिल्म सफल हो सकती थी।
निर्देशक: सौरभ शुक्ला
कलाकार: विनय पाठक, नेहा धूपिया, रजत कपूर, संजय मिश्रा, नसीरुद्दीन शाह, सौरभ शुक्ला
संगीत: मल्हार पाटेकर
Tuesday, December 13, 2011
लेडीज वर्सेस रिकी बहल
फिल्म समीक्षा
साधारण है ‘लेडीज वर्सेस रिकी बहल’
धीरेन्द्र अस्थाना
निर्देशक वही, कलाकार वही और संगीतकार भी वही। फिर भी ‘लेडीज वर्सेस रिकी बहल’ वह करिश्मा नहीं कर सकी, जो यशराज बैनर की पिछले साल की हिट फिल्म ‘बैंड बाजा बारात’ ने किया था। केवल दिल्ली का परिवेश रखने और पंजाबी स्टाइल में डायलॉग बुलवा देने से कोई फिल्म दिलचस्प नहीं हो जाती। अच्छी फिल्म बनाने के लिए एक अच्छी कहानी का प्रभावशाली फिल्मांकन तो जरूरी है ही, चरित्रों का जीवंत और सहज होना भी अनिवार्य है। ‘लेडीज वर्सेस रिकी बहल’ की कहानी तो साधारण है ही, उसे फिल्माया भी किसी डॉक्यूमेंट्री की तरह गया है। अनुष्का शर्मा और रणवीर सिंह की जोड़ी ने ‘बैंड बाजा बारात’ में जो उम्मीद जगायी थी, उसे उन्होंने इस फिल्म में खुद ही तोड़ दिया। निर्देशक मनीष शर्मा इस बार इस जोड़ी से कुछ निकलवा नहीं पाये। निकलवाते भी कैसे? कहानी में कोई बात होती तब न, कोई करिश्मा किया जाता! रणवीर ंिसंह एक ठग हैं, जो लड़कियों को अपने जाल में फंसाकर उनके पैसे लूट लेता है। एक शहर की लड़की को बेवकूफ बनाकर वह दूसरे शहर की राह पकड़ लेता है। छोटे से जीवन में वह कुल 30 लड़कियों को ठग लेता है। प्रतिनिधि के रूप में कुल तीन लड़कियों को फिल्म में उसका शिकार दिखाया गया है। ये हैं मुंबई की दीपानिता शर्मा, लखनऊ की अदिति शर्मा ओैर दिल्ली की परिणति चोपड़ा। ठगे जाने के बाद तीनों एकजुट होती हैं और एक चतुर सेल्स गर्ल अनुष्का शर्मा को अपने साथ मिला गोवा पहुंचती हैं, जो रणवीर सिंह का नया ठिकाना है। नयी शिकार अनुष्का को ठगने की इस प्रक्रिया के दौरान रणवीर सिंह खुद शिकार बन जाता है। एक प्रसंग के दौरान वह जान जाता है कि उसे ठगा जा रहा है, लेकिन इस सच को जान लेने के बाद भी वह अपने पांव पीछे नहीं खींचता, क्योंकि तब तक उसे अनुष्का से सचमुच का प्यार हो जाता है। वह तीनों लड़कियों को उनका कुल एक करोड़ रुपया वापस लौटा देता है और अनुष्का से लाइफ का रियल पार्टनर बनने की गुजारिश करता है। हैप्पी एंड। ठगी का धंधा बड़ा हैरतअंगेज होता है। उसके लिए जबर्दस्त प्रतिभा चाहिए। रणवीर में इस प्रतिभा का अभाव दिखता है। अनुष्का इतनी जल्दी खुद को रिपीट करने लगेगी सोचा न था।
निर्देशक: मनीष शर्मा
कलाकार: रणवीर सिंह, अनुष्का शर्मा, परिणति, दीपानिता और अदिति।
संगीत: संगीतः सलीम सुलेमान
साधारण है ‘लेडीज वर्सेस रिकी बहल’
धीरेन्द्र अस्थाना
निर्देशक वही, कलाकार वही और संगीतकार भी वही। फिर भी ‘लेडीज वर्सेस रिकी बहल’ वह करिश्मा नहीं कर सकी, जो यशराज बैनर की पिछले साल की हिट फिल्म ‘बैंड बाजा बारात’ ने किया था। केवल दिल्ली का परिवेश रखने और पंजाबी स्टाइल में डायलॉग बुलवा देने से कोई फिल्म दिलचस्प नहीं हो जाती। अच्छी फिल्म बनाने के लिए एक अच्छी कहानी का प्रभावशाली फिल्मांकन तो जरूरी है ही, चरित्रों का जीवंत और सहज होना भी अनिवार्य है। ‘लेडीज वर्सेस रिकी बहल’ की कहानी तो साधारण है ही, उसे फिल्माया भी किसी डॉक्यूमेंट्री की तरह गया है। अनुष्का शर्मा और रणवीर सिंह की जोड़ी ने ‘बैंड बाजा बारात’ में जो उम्मीद जगायी थी, उसे उन्होंने इस फिल्म में खुद ही तोड़ दिया। निर्देशक मनीष शर्मा इस बार इस जोड़ी से कुछ निकलवा नहीं पाये। निकलवाते भी कैसे? कहानी में कोई बात होती तब न, कोई करिश्मा किया जाता! रणवीर ंिसंह एक ठग हैं, जो लड़कियों को अपने जाल में फंसाकर उनके पैसे लूट लेता है। एक शहर की लड़की को बेवकूफ बनाकर वह दूसरे शहर की राह पकड़ लेता है। छोटे से जीवन में वह कुल 30 लड़कियों को ठग लेता है। प्रतिनिधि के रूप में कुल तीन लड़कियों को फिल्म में उसका शिकार दिखाया गया है। ये हैं मुंबई की दीपानिता शर्मा, लखनऊ की अदिति शर्मा ओैर दिल्ली की परिणति चोपड़ा। ठगे जाने के बाद तीनों एकजुट होती हैं और एक चतुर सेल्स गर्ल अनुष्का शर्मा को अपने साथ मिला गोवा पहुंचती हैं, जो रणवीर सिंह का नया ठिकाना है। नयी शिकार अनुष्का को ठगने की इस प्रक्रिया के दौरान रणवीर सिंह खुद शिकार बन जाता है। एक प्रसंग के दौरान वह जान जाता है कि उसे ठगा जा रहा है, लेकिन इस सच को जान लेने के बाद भी वह अपने पांव पीछे नहीं खींचता, क्योंकि तब तक उसे अनुष्का से सचमुच का प्यार हो जाता है। वह तीनों लड़कियों को उनका कुल एक करोड़ रुपया वापस लौटा देता है और अनुष्का से लाइफ का रियल पार्टनर बनने की गुजारिश करता है। हैप्पी एंड। ठगी का धंधा बड़ा हैरतअंगेज होता है। उसके लिए जबर्दस्त प्रतिभा चाहिए। रणवीर में इस प्रतिभा का अभाव दिखता है। अनुष्का इतनी जल्दी खुद को रिपीट करने लगेगी सोचा न था।
निर्देशक: मनीष शर्मा
कलाकार: रणवीर सिंह, अनुष्का शर्मा, परिणति, दीपानिता और अदिति।
संगीत: संगीतः सलीम सुलेमान
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