Monday, December 19, 2011

पप्पू कांट डांस साला

फिल्म समीक्षा

सपनों की फिसलन पर ‘पप्पू कांट डांस साला‘

धीरेन्द्र अस्थाना

बनारस, गोरखपुर, सतना, सीवान, भागलपुर, बेगूसराय या फिर गुड़गांव अथवा रोहतक जैसे छोटे शहरों से मुंबई आकर अपने सपनों को साकार करने का संघर्ष करने वाले युवक-युवतियों के जीवन पर पहले भी कई अच्छी-बुरी फिल्में बनी हैं। ‘पप्पू कांट डांस साला‘ इसी कड़ी की एक और फिल्म है। सौरभ शुक्ला एक काबिल डायरेक्टर एक्टर हैं इसलिए उम्मीद थी कि विषय पुराना होने के बावजूद वह फिल्म में कुछ नया करने की कोशिश करेंगे। यह कोशिश उन्होंने की भी है। बनारस से विनय पाठक मुंबई आता है और मेडिकल रिप्रजेंटेटिव की नौकरी पकड़ लेता है। कोल्हापुर से नेहा धूपिया आती है और एक कोरियाग्राफर रजत कपूर के डांस ग्रुप में शामिल हो जाती है। नेहा को एक बड़ी डांसर बनना है और बॉलीवुड में अपना निजी स्पेस बनाना है। विनय पाठक जहां एक छोटे शहर का सीधा-साधा, संस्कारवान और ईमानदार युवक है वहीं नेहा धूपिया बददिमाग, बिंदास और बोल्ड लड़की के किरदार में है जो अपनी चाहतों को पूरा करने के लिए शहर में जिद की तरह बनी हुई है। सपनों के शहर मुंबई में इन दोनों को सेल्स टैक्स वालों की सरकारी कॉलोनी में एक दूसरे के सामने किराए पर फ्लैट मिलता है। एक रात सरकारी छापा पड़ने के बाद नेहा का फ्लैट सील हो जाता है और वह जबरन विनय पाठक के फ्लैट में कब्जा जमा लेती है लेकिन किराए का आधा पैसा जबरन देकर। इसके बाद शुरू होता है दो विपरीत मूल्यों, सपनों और इच्छाओं का अनंत टकराव। यह टकराव ही इस फिल्म को दिलचस्प भी बनाता है और बाकी फिल्मों से थोड़ा अलग भी करता है। नेहा बात-बात में विनय को पप्पू कह कर उसका मजाक उड़ाती है वहीं विनय भी मौका पड़ने पर नेहा को नैतिकता का पाठ पढ़ाने से बाज नहीं आता। एक दिन नेहा तमक कर कहती है कि नैतिकता की इतनी बात करते हो तो मुंबई में क्या कर रहे हो? जाते क्यों नहीं अपने बनारस? बात विनय को लग जाती है और वह बनारस लौट जाता है। यहां से कहानी में एक नया मोड़ सौरभ ने यह दिया है कि मुंबई और नेहा को छोड़कर आने के बाद विनय पाठक इन दोनों में और ज्यादा रहने लगता है। इस बिंदु पर खड़े विनय को नसीरुद्दीन शाह बताता है कि विनय को नेहा से मोहब्बत हो गई है और उसकी मुक्ति नेहा की दुनिया में ही है। विनय नेहा के पास लौट आता है और एक-दूसरे को जमकर नापसंद करने वाले ये दो लोग एक साथ हो जाते हैं। फिल्म का गीत-संगीत और संवाद पक्ष प्रभावित करता है। फिल्म थोड़ी लंबी और बोझिल हो गई है जिससे बचा जा सकता था। जिन फिल्मों के लिए नेहा धूपिया को याद किया जाएगा उनमें एक फिल्म बिना शक ‘पप्पू कांट डांस साला‘ भी होगी। अगर इस फिल्म का कायदे से प्रचार किया गया होता तो बॉक्स ऑफिस पर यह फिल्म सफल हो सकती थी।

निर्देशक: सौरभ शुक्ला
कलाकार: विनय पाठक, नेहा धूपिया, रजत कपूर, संजय मिश्रा, नसीरुद्दीन शाह, सौरभ शुक्ला
संगीत: मल्हार पाटेकर

2 comments:

  1. फिल्म सफल होने से क्या होता? मोटी बात यह है की धीरेन्द्र अस्थाना ने फिल्म पसंद की है. अब हमें भी देखनी ही होगी.

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  2. jitendra ji ki baat se sahmat hoo vese bhi Asthana ji ka likha mujhe hamesh bhata he

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