Saturday, February 13, 2010

माई नेम इज खान

फिल्म समीक्षा

अद्भुत और अनूठी माई नेम इज खान

धीरेन्द्र अस्थाना

जैसे अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘पा‘ का महत्व उसे देख कर ही समझा जा सकता है ठीक उसी तरह ‘माई नेम इज खान‘ का महत्व समझने के लिए उसे देखना जरूरी है। आम मुंबईकरों ने इस फिल्म को पुलिस के पहरे में टूट कर देखा। खबर है कि मुंबई के जिस भी सिनेमाघर में फिल्म चली वहां पहले दिन का प्रत्येक शो हाउसफुल था। आम जनता के ऐसे लाड़-दुलार की उम्मीद तो शायद फिल्म के निर्देशक करण जौहर और फिल्म के कलाकारों - शाहरुख खान, काजोल, जरीना वहाब को भी नहीं रही होगी। 12 फरवरी को मुंबई में जनता जीत गयी और राजनीति हार गयी।
कुछ भटकावों, विचलन और अतियों को नजरअंदाज कर दें तो ‘माई नेम इज खान‘ एक अनूठे अनुभव की यात्रा पर ले जाती है। फिल्म के केंद्र में रिजवान खान नामक एक युवक है जो एसपर्जर सिंड्रोम नामक बीमारी से पीड़ित है। इस बीमारी के बावजूद यह युवक (शाहरुख खान) अमेरिका जाता है, जहां उसका छोटा भाई जिमी शेरगिल एक कामयाब बिजनेसमैन है। छोटे भाई के ब्यूटी प्रोडक्ट बेच कर शाहरुख अपना जीवन आरंभ करता है और एक तलाकशुदा तथा एक बच्चे की मां काजोल से प्यार करने लगता है। शाहरुख की मासूमियत, सच्चाई और अपने बेटे के प्रति उसके प्यार को देख काजोल भी शाहरुख को चाहने लगती है और दोनों विवाह कर लेते हैं। इसके बाद घटता है वह हादसा जिसने अमेरिका ही नहीं पूरी दुनिया के भाईचारे और अमन चैन की बुनियाद ही तहस नहस कर दी। अमेरिका के वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर हुए आतंकवादी हमले ने रिश्तों के समीकरण ही गड़बड़ा दिए। एक मजहबी हमले में शाहरुख-काजोल का बेटा मारा गया। काजोल शाहरुख से विमुख हो गयी और शाहरुख के जीवन का एक ही मकसद रह गया - अमेरिकी राष्ट्रपति से मिलना और उनसे कहना ‘मिस्टर प्रेसीडेंट, माई नेम इज खान ऐंड आई एम नॉट ए टेरेरिस्ट।‘
शाहरुख खान, काजोल और जरीना वहाब ने अपने किरदारों को ‘विस्मय‘ में बदल दिया है। तीनों का अभिनय ‘परकाया प्रवेश‘ का जीवंत उदाहरण है। करण जौहर ने कहीं भी अपनी पकड़ कमजोर नहीं पड़ने दी है। शाहरुख खान के रिजवान खान वाले किरदार को महिमा मंडित करने के लिए उन्होंने कुछ ज्यादा ही कसरत कर दी है इसके बावजूद फिल्म बोझिल और अविश्वसनीय नहीं है। यह मनोरंजक नहीं, मकसद वाली फिल्म है और जिस मकसद से यह बनायी गयी, वह कामयाब हो गया है। फिल्म का एकमात्र संदेश है - दुनिया में दो ही तरह के लोग होते हैं। अच्छे लोग और बुरे लोग। फिल्म को अवश्य देखें।

निर्देशक: करण जौहर
कलाकार: शाहरुख खान, काजोल, जरीना वहाब, जिमी शेरगिल, सोनिया जहान, विनय पाठक
संगीत: शंकर-अहसान-लॉय

3 comments:

  1. तो क्या फिल्म देख ली जाए।

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  2. देख कर लिखी है या बिना देखे लिखी है...
    एकदम घटिया फिल्म है, फिल्म देखने से पहले अपने आस पास वाले से पूछना नहीं तो मेरी तरह पछताओगे...
    आपका कहना कि ये फिल्म मनोरंजक नहीं, एकदम सही है

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