फिल्म समीक्षा
जटिल प्रेम की ‘काइट्स‘
धीरेन्द्र अस्थाना
बहुत लंबे समय से इंतजार हो रहा था ‘काइट्स‘ के उड़ने और आसमान पर छा जाने का। पहले दिन इस फिल्म को देखने के लिए दर्शकों की भीड़ भी उमड़ पड़ी। लेकिन हाॅल से निकलते समय दर्शकों के चेहरे कुछ-कुछ मायूस थे। किसी ने शायद सोचा भी नहीं था कि ऋतिक रोशन-बारबरा मूरी की एक जटिल सी, दुखांत प्रेम कहानी से सामना होने वाला है। बहुत महंगी फिल्म है ‘काइट्स‘ और फिल्म के आरंभ में ऋतिक रोशन तथा कंगना रानावत का जो डांस है, उसमें ऋतिक ने करिश्मा और जादू सब कर दिया है। कंगना ने भी उसमें अपनी जान लगा दी है। लेकिन इतनी भव्य और खर्चीली फिल्म की कहानी बस इतनी सी है कि कंगना रानावत ऋतिक रोशन से प्यार प्यार करती है जबकि ऋतिक को बारबरा मूरी से प्यार है। बारबरा कंगना के भाई निक ब्राउन की मंगेतर है। निक और कंगना लाॅस वेगास के सबसे बड़े कैसीनो मालिक कबीर बेदी की संताने हैं। निक और कबीर गुंडों की लंबी चैड़ी फौज के साथ लगभग माफिया सरदारों जैसा जीवन जीते हैं। फिल्म के अंत में ऋतिक रोशन और बारबरा मूरी अलग-अलग ढंग से आत्महत्या कर लेते हैं। ऋतिक और बारबरा को एक दूसरे की भाषा समझ नहीं आती। दोनों कबीर बेदी की संतानों से केवल धन के लिए जुड़े थे। फिर पता नहीं क्यों वैभव तथा ताकत का दामन छोड़ कर दोनों एक दूसरे से मोहब्बत करने लगे और माफिया राज से टकरा बैठे। दोनों का प्रेम बेहद जटिल और अबूझ है। फिल्म में कंगना का ‘स्पेस‘ कम है तो भी उसने जानदार अभिनय किया है। भारी प्रचार के बावजूद बारबरा मूरी न तो अभिनय से और न ही सेक्स अपील से प्रभावित कर पायीं। पूरी फिल्म केवल और केवल ऋतिक रोशन के भरोसे खड़ी की गयी है और फिल्म देखी भी ऋतिक के कारण ही जाएगी। ऋतिक का डांस, भागने-लड़ने के दृश्य, बाॅडी लैंग्वेज, आंखों की भाषा सब कुछ बेहद अद्वितीय और विस्मयकारी है। उनके अपोजिट हिंदी और अंग्रेजी न जानने वाली मैक्सिकन हीरोईन रखने की आवश्यकता नहीं थी। अपने भारत की टाॅप टेन अभिनेत्रियों में से कोई भी होती तो फिल्म का मुकद्दर ही बदल जाता। प्यार भले ही भाषा की दीवार को नहीं मानता लेकिन फिल्म को अच्छी तरह समझने के लिए भाषा ही प्राथमिक है। फिल्म बनाने में निर्माता राकेश रोशन ने दिल खोल कर पैसा खर्च किया है। उनकी निर्देशकीय क्षमता को देखते हुए यह विचार आना स्वाभाविक है कि अगर इस फिल्म का निर्देशन उन्होंने किया होता तो शायद नतीजे ज्यादा बेहतर होते। फिर भी, एक बार तो फिल्म देखनी ही चाहिए - लोकेशंस, तकनीक और ऋतिक के लिए।
निर्माता: राकेश रोशन
निर्देशक: अनुराग बसु
कलाकार: ऋतिक रोशन, बारबरा मूरी, कंगना रानावत, कबीर बेदी, निक ब्राउन, यूरी सूरी
संगीत: राजेश रोशन
Saturday, May 22, 2010
Saturday, May 15, 2010
बम बम बोले
फिल्म समीक्षा
गरीबी का ग्लोबल आख्यान ‘बम बम बोले‘
धीरेन्द्र अस्थाना
जब भारत के महान फिल्मकार सत्यजित रे विश्व के स्तर पर सराहे जाते थे तो बाॅलीवुड का एक वर्ग चिल्लाता था, ‘रे साहब भारत की गरीबी बेच रहे हैं।‘ लेकिन ये अपने प्रियदर्शन बाबू तो शुद्ध रूप से ‘मेनस्ट्रीम सिनेमा‘ के सरताजों में से हैं। ये तो मनोरंजक, कमर्शियल और मुख्य धारा का सिनेमा बनाते हैं। तो इनकी बनायी ‘बम बम बोले‘ को क्या कहें? एक तथाकथित अमीर देश के सचमुच के गरीब हिस्से का मार्मिक बाइस्कोप है यह। कह सकते हैं कि गरीबी का ग्लोबल आख्यान है क्योंकि ‘टैरर‘, ‘आतंकवादी‘ आदि शब्दों-गतिविधियों के जुड़ते ही मामला लोकल से सीधे अंतरराष्ट्रीय हो जाता है।
दिल-दिमाग को (झकझोर देने वाली नहीं), अवसादग्रस्त कर देने वाली इस फिल्म को क्या परिभाषा दें? बच्चों के संदर्भ में फिल्में दो तरह की होती हैं। पहली तरह की फिल्में होती हैं ‘बच्चों के लिए‘ जैसे ‘हनुमान रिटन्र्स‘, ‘मकड़ी‘, ‘जजंतरम ममंतरम‘, ‘ब्लू अंब्रैला‘ और ‘घटोत्कच‘ आदि। दूसरी तरह की फिल्में होती हैं ‘बच्चों के बारे में‘ जैसे ‘तारे जमीन पर‘ जो दर्शील सफारी के बाल मन और समस्याओं पर बनी बेजोड़ फिल्म है। लेकिन दर्शील सफारी के ही बेहतर अभिनय से सजी ‘बम बम बोले‘ न तो बच्चों के लिए है, न ही बच्चों के बारे में है। ईरानी निर्देशक माजिद मजीदी की चर्चित फिल्म से प्रेरित ‘बम बम बोले‘ एक गंभीर फिल्म है जो एक गरीब मेहनतकश अतुल कुलकर्णी तथा उसकी कर्मठ व संतोषी पत्नी ऋतुपर्णा सेन गुप्ता की फटेहाली और वंचित-अपमानित जीवन का मर्मस्पर्शी विमर्श पेश करती है। इस बदहाल जीवन में दर्शील सफारी और जिया वस्तनी के मासूम बचपन को उपस्थित कर के प्रियदर्शन ने एक खतरनाक सवाल पूछा है -‘खुशहाली, उन्नति, बदमाशी, बेईमानी, चोरी-डकैती, अन्याय, पांच सितारा जीवन संस्कृति, माफिया राज आदि-आदि के मौजूदा समय में ‘मेहनत, ईमानदारी, सच्चाई और मासूमियत‘ का ‘स्पेस‘ कितना है और कहां है?‘ स्कूल जाने के लिए, दो भाई बहनों का एक ही फटा-पुराना जूता अदल बदल कर पहनना और फिर जूतों को लेकर फंतासी दृश्य ही रच देना प्रियदर्शन की कल्पनाशीलता का अदभुत उदाहरण है। फिल्म में दर्शक नहीं थे। जाहिर है कि आज के अतार्किक, नाच गानों और सेक्स से भरपूर ‘काॅमिक सिनेमाई समय‘ में असुविधाजनक सवालों से कौन टकराना चाहेगा?
निर्देशक: प्रियदर्शन
कलाकार: दर्शील सफारी, जिया वस्तनी (होनहार बिरवान के होत चीकने पात / बधाई हो, बहुत आगे जाना है), अतुल कुलकर्णी, ऋतुपर्णा सेन गुप्ता
संगीत: अजान सामी, तापस रेलिया, एम जी श्रीकुमार
गरीबी का ग्लोबल आख्यान ‘बम बम बोले‘
धीरेन्द्र अस्थाना
जब भारत के महान फिल्मकार सत्यजित रे विश्व के स्तर पर सराहे जाते थे तो बाॅलीवुड का एक वर्ग चिल्लाता था, ‘रे साहब भारत की गरीबी बेच रहे हैं।‘ लेकिन ये अपने प्रियदर्शन बाबू तो शुद्ध रूप से ‘मेनस्ट्रीम सिनेमा‘ के सरताजों में से हैं। ये तो मनोरंजक, कमर्शियल और मुख्य धारा का सिनेमा बनाते हैं। तो इनकी बनायी ‘बम बम बोले‘ को क्या कहें? एक तथाकथित अमीर देश के सचमुच के गरीब हिस्से का मार्मिक बाइस्कोप है यह। कह सकते हैं कि गरीबी का ग्लोबल आख्यान है क्योंकि ‘टैरर‘, ‘आतंकवादी‘ आदि शब्दों-गतिविधियों के जुड़ते ही मामला लोकल से सीधे अंतरराष्ट्रीय हो जाता है।
दिल-दिमाग को (झकझोर देने वाली नहीं), अवसादग्रस्त कर देने वाली इस फिल्म को क्या परिभाषा दें? बच्चों के संदर्भ में फिल्में दो तरह की होती हैं। पहली तरह की फिल्में होती हैं ‘बच्चों के लिए‘ जैसे ‘हनुमान रिटन्र्स‘, ‘मकड़ी‘, ‘जजंतरम ममंतरम‘, ‘ब्लू अंब्रैला‘ और ‘घटोत्कच‘ आदि। दूसरी तरह की फिल्में होती हैं ‘बच्चों के बारे में‘ जैसे ‘तारे जमीन पर‘ जो दर्शील सफारी के बाल मन और समस्याओं पर बनी बेजोड़ फिल्म है। लेकिन दर्शील सफारी के ही बेहतर अभिनय से सजी ‘बम बम बोले‘ न तो बच्चों के लिए है, न ही बच्चों के बारे में है। ईरानी निर्देशक माजिद मजीदी की चर्चित फिल्म से प्रेरित ‘बम बम बोले‘ एक गंभीर फिल्म है जो एक गरीब मेहनतकश अतुल कुलकर्णी तथा उसकी कर्मठ व संतोषी पत्नी ऋतुपर्णा सेन गुप्ता की फटेहाली और वंचित-अपमानित जीवन का मर्मस्पर्शी विमर्श पेश करती है। इस बदहाल जीवन में दर्शील सफारी और जिया वस्तनी के मासूम बचपन को उपस्थित कर के प्रियदर्शन ने एक खतरनाक सवाल पूछा है -‘खुशहाली, उन्नति, बदमाशी, बेईमानी, चोरी-डकैती, अन्याय, पांच सितारा जीवन संस्कृति, माफिया राज आदि-आदि के मौजूदा समय में ‘मेहनत, ईमानदारी, सच्चाई और मासूमियत‘ का ‘स्पेस‘ कितना है और कहां है?‘ स्कूल जाने के लिए, दो भाई बहनों का एक ही फटा-पुराना जूता अदल बदल कर पहनना और फिर जूतों को लेकर फंतासी दृश्य ही रच देना प्रियदर्शन की कल्पनाशीलता का अदभुत उदाहरण है। फिल्म में दर्शक नहीं थे। जाहिर है कि आज के अतार्किक, नाच गानों और सेक्स से भरपूर ‘काॅमिक सिनेमाई समय‘ में असुविधाजनक सवालों से कौन टकराना चाहेगा?
निर्देशक: प्रियदर्शन
कलाकार: दर्शील सफारी, जिया वस्तनी (होनहार बिरवान के होत चीकने पात / बधाई हो, बहुत आगे जाना है), अतुल कुलकर्णी, ऋतुपर्णा सेन गुप्ता
संगीत: अजान सामी, तापस रेलिया, एम जी श्रीकुमार
Saturday, May 8, 2010
बदमाश कंपनी
फिल्म समीक्षा
देखी जा सकती है ‘बदमाश कंपनी‘
धीरेन्द्र अस्थाना
कहानी, संवाद, पटकथा, निर्देशन सब कुछ एक अच्छे एक्टर परमीत सेठी का है। निर्माता हैं यशराज बैनर यानी यश चोपड़ा-आदित्य चोपड़ा। फिल्म है ‘बदमाश कंपनी‘ जिसे सन् 1994 के समय में फिल्माया गया है। चार दोस्तों के संघर्ष, स्वप्न, महत्वाकांक्षा, अमीर बनने की धुन में हेरा-फेरी, झूठ-फरेब, कस्टम की चोरी, जुआ, शराबखोरी, औरतबाजी, ऐयाशी, मस्ती आदि आदि को ‘लार्जर दैन लाइफ‘ के फार्मूले में रख कर एक रोचक फिल्म बनाने की कोशिश की गयी है। ‘टाइमपास‘ के लिए फिल्म को एक बार देखा जा सकता है। हमारे ज्ञान और संवेदना में कुछ जोड़ती नहीं है तो बहुत अधिक निराश भी नहीं करती ‘बदमाश कंपनी‘। शीर्षक से भ्रम होता है कि फिल्म ‘अंडरवल्र्ड‘ पर आधारित होगी पर ऐसा नहीं है। काॅलेज का इम्तहान पास करके निकले तीन मध्यवर्गीय लड़कों का गैंग ही बदमाश कंपनी है जिसमें अनुष्का शर्मा भी आ मिलती है।
सुबह से रात तक एक ही दफ्तर में, एक ही सीट पर लगातार काम करने वाले अनुपम खेर का बेटा है शाहिद कपूर जो घिस-घिस करके जीवन घिसने में यकीन नहीं करता। वह कोई अनूठा सा व्यापार करके रातों रात अमीर बनना चाहता है। वह जीवन की पहली कमाई डाॅलर छुपा कर बैंकाक ले जाने और वहां खरीददारी करके, कस्टम ड्यूटी बचा कर भारत ले आने से करता है। इस पहले काम में चारों का गैंग बनता है। एक बैग की खरीदारी पर भारत का लोकल स्मगलर उन्हें दस हजार रुपये देता है। शाहिद को व्यापारिक हेराफेरी के नये-नये विचार आते रहते हैं और इन्हें आजमा कर यही कंपनी अमीर भी होने लगती है। शाहिद की अपने नैतिकतावादी पिता से नहीं पटती और वह घर छोड़ देता है। और बड़ा बनने के लिए यह कंपनी अमेरिका जा बसती है लेकिन अनैतिक मूल्यों और व्यावसायिक धोखा धड़ी को तो महिमामंडित किया नहीं जा सकता। इसलिए शाहिद कपूर का पतन शुरू होता है। तीनों दोस्त एक एक करके उसका साथ छोड़ देते हैं। बैंक के साथ धोखाधड़ी के केस में शाहिद को पुलिस पकड़ती है। तब जाकर उसकी आंख खुलती है और नाटकीय ढंग से सब कुछ सामान्य होता जाता है। ‘रब ने बना दी जोड़ी‘ की सीधी सादी अनुष्का शर्मा ने बिंदास और बोल्ड अभिनय अभिनय किया है। शाहिद कपूर किरदार के मुताबिक अभिनय करने में पारंगत होते जा रहे हैं। फिल्म के गीत कहानी को गति देते हैं और संगीत अच्छा है।
निर्माता: यशराज फिल्म्स
निर्देशक: परमीत सेठी
कलाकार: शाहिद कपूर, अनुष्का शर्मा, म्यांग चेंग, वीर दास, अनुपम खेर
संगीत: प्रीतम चक्रवर्ती
देखी जा सकती है ‘बदमाश कंपनी‘
धीरेन्द्र अस्थाना
कहानी, संवाद, पटकथा, निर्देशन सब कुछ एक अच्छे एक्टर परमीत सेठी का है। निर्माता हैं यशराज बैनर यानी यश चोपड़ा-आदित्य चोपड़ा। फिल्म है ‘बदमाश कंपनी‘ जिसे सन् 1994 के समय में फिल्माया गया है। चार दोस्तों के संघर्ष, स्वप्न, महत्वाकांक्षा, अमीर बनने की धुन में हेरा-फेरी, झूठ-फरेब, कस्टम की चोरी, जुआ, शराबखोरी, औरतबाजी, ऐयाशी, मस्ती आदि आदि को ‘लार्जर दैन लाइफ‘ के फार्मूले में रख कर एक रोचक फिल्म बनाने की कोशिश की गयी है। ‘टाइमपास‘ के लिए फिल्म को एक बार देखा जा सकता है। हमारे ज्ञान और संवेदना में कुछ जोड़ती नहीं है तो बहुत अधिक निराश भी नहीं करती ‘बदमाश कंपनी‘। शीर्षक से भ्रम होता है कि फिल्म ‘अंडरवल्र्ड‘ पर आधारित होगी पर ऐसा नहीं है। काॅलेज का इम्तहान पास करके निकले तीन मध्यवर्गीय लड़कों का गैंग ही बदमाश कंपनी है जिसमें अनुष्का शर्मा भी आ मिलती है।
सुबह से रात तक एक ही दफ्तर में, एक ही सीट पर लगातार काम करने वाले अनुपम खेर का बेटा है शाहिद कपूर जो घिस-घिस करके जीवन घिसने में यकीन नहीं करता। वह कोई अनूठा सा व्यापार करके रातों रात अमीर बनना चाहता है। वह जीवन की पहली कमाई डाॅलर छुपा कर बैंकाक ले जाने और वहां खरीददारी करके, कस्टम ड्यूटी बचा कर भारत ले आने से करता है। इस पहले काम में चारों का गैंग बनता है। एक बैग की खरीदारी पर भारत का लोकल स्मगलर उन्हें दस हजार रुपये देता है। शाहिद को व्यापारिक हेराफेरी के नये-नये विचार आते रहते हैं और इन्हें आजमा कर यही कंपनी अमीर भी होने लगती है। शाहिद की अपने नैतिकतावादी पिता से नहीं पटती और वह घर छोड़ देता है। और बड़ा बनने के लिए यह कंपनी अमेरिका जा बसती है लेकिन अनैतिक मूल्यों और व्यावसायिक धोखा धड़ी को तो महिमामंडित किया नहीं जा सकता। इसलिए शाहिद कपूर का पतन शुरू होता है। तीनों दोस्त एक एक करके उसका साथ छोड़ देते हैं। बैंक के साथ धोखाधड़ी के केस में शाहिद को पुलिस पकड़ती है। तब जाकर उसकी आंख खुलती है और नाटकीय ढंग से सब कुछ सामान्य होता जाता है। ‘रब ने बना दी जोड़ी‘ की सीधी सादी अनुष्का शर्मा ने बिंदास और बोल्ड अभिनय अभिनय किया है। शाहिद कपूर किरदार के मुताबिक अभिनय करने में पारंगत होते जा रहे हैं। फिल्म के गीत कहानी को गति देते हैं और संगीत अच्छा है।
निर्माता: यशराज फिल्म्स
निर्देशक: परमीत सेठी
कलाकार: शाहिद कपूर, अनुष्का शर्मा, म्यांग चेंग, वीर दास, अनुपम खेर
संगीत: प्रीतम चक्रवर्ती
Monday, May 3, 2010
हाउसफुल
फिल्म समीक्षा
हाउसफुल कॉमेडी से फुल
धीरेन्द्र अस्थाना
निर्देशक साजिद खान ने कुछ दिन पहले कहा था - ‘मैं इस बात को नहीं मानता कि सिनेमा समाज को बदल सकता है। हां मैं यह जरूर मानता हूं कि सिनेमा समाज को खुश रखने का काम कर सकता है।‘ सार्थक, या अर्थपूर्ण या संदेशपरक सिनेमा के समर्थक इस वक्तव्य से असहमत हो सकते हैं लेकिन हकीकत यही है कि बहुत लंबे समय के बाद सिनेमाघरों में भीड़ उमड़ी थी। लंबी कतारों में लग कर लोग हंसी-खुशी अपना पर्स ढीला कर रहे थे। इस भीड़ में बड़ा प्रतिशत ‘युवाओं‘ का था जो फिल्म देखने के दौरान लगातार खिलखिला रहा था, तालियां बजा रहा था और सीट पर उछला पड़ रहा था। एकदम किसी मेले-ठेले का खुशनुमा माहौल था सिनेमा हॉल के भीतर। दर्शक पर्दे पर टकटकी लगाये अक्षय कुमार, लारा दत्ता, रीतेश देशमुख, दीपिका पादुकोन, बोमन ईरानी, रणधीर कपूर, जिया खान, चंकी पांडे और अर्जुन रामपाल का शानदार-जानदार जलवा देख रहे थे। मौज-मजा-रोमांस, हंसी, इमोशन, नाच-गाना अर्थात सौ प्रतिशत मनोरंजन से लबरेज फिल्म है ‘हाउसफुल।‘ सबका पैसा वसूल। दर्शक का, निर्माता का, निर्देशक का और कलाकारों का भी। ‘माइंडलेस काॅमेडी‘ का अदभुत उदाहरण। कहानी का आइडिया भी अनूठा है। महाराष्ट्र में अनलकी व्यक्ति या बैड लक के लिए एक शब्द प्रचलित है ‘पनौती।‘ तो अक्षय कुमार का रोल एक ‘पनौती‘ जैसा है। वह जहां जाता है चीजें बिगड़ जाती हैं। उसके आगे आगे चलता है उसका दुर्भाग्य। इसी केंद्रीय विचार के चारों तरफ विभिन्न हास्य प्रसंग, उप कथाएं और ‘काॅमिक सिचुएशन्स‘ गूंथ कर हंसी-ठट्ठे का गुलदस्ता तैयार किया गया है। और जैसा कि हिंदी के कमर्शियल सिनेमा में होता है तमाम तरह की बाधाएं आसानी से पार करते हुए नायक-नायिका मिल जाते हैं और फिल्म का ‘हैप्पी एंड‘ हो जाता है। अगर आप सिनेमा से कोई उम्मीद नहीं रखते और उसे हंसने-हंसाने का तमाशा भर मानते हैं तो यह फिल्म तुरंत देख लीजिए। इटली और लंदन के सुंदर दृश्यों तथा बेहद कम कपड़ों में युवतियों के मादक नृत्य फिल्म की अतिरिक्त विशेषता हैं। शंकर-अहसान-लॉय का संगीत कानों को अच्छा लगता है। फिल्म की बॉक्स ऑफिस सफलता तय है। लगता है आम दर्शकों की अदालत में कॉमेडी ही सरताज है।
निर्माता: साजिद नाडियाडवाला
निर्देशक: साजिद खान
कलाकार: अक्षय कुमार, दीपिका पादुकोन, रितेश देशमुख, लारा दत्ता, बोमन ईरानी, रणधीर कपूर, जिया खान, अर्जुन रामपाल
संगीत: शंकर-एहसान-लॉय
हाउसफुल कॉमेडी से फुल
धीरेन्द्र अस्थाना
निर्देशक साजिद खान ने कुछ दिन पहले कहा था - ‘मैं इस बात को नहीं मानता कि सिनेमा समाज को बदल सकता है। हां मैं यह जरूर मानता हूं कि सिनेमा समाज को खुश रखने का काम कर सकता है।‘ सार्थक, या अर्थपूर्ण या संदेशपरक सिनेमा के समर्थक इस वक्तव्य से असहमत हो सकते हैं लेकिन हकीकत यही है कि बहुत लंबे समय के बाद सिनेमाघरों में भीड़ उमड़ी थी। लंबी कतारों में लग कर लोग हंसी-खुशी अपना पर्स ढीला कर रहे थे। इस भीड़ में बड़ा प्रतिशत ‘युवाओं‘ का था जो फिल्म देखने के दौरान लगातार खिलखिला रहा था, तालियां बजा रहा था और सीट पर उछला पड़ रहा था। एकदम किसी मेले-ठेले का खुशनुमा माहौल था सिनेमा हॉल के भीतर। दर्शक पर्दे पर टकटकी लगाये अक्षय कुमार, लारा दत्ता, रीतेश देशमुख, दीपिका पादुकोन, बोमन ईरानी, रणधीर कपूर, जिया खान, चंकी पांडे और अर्जुन रामपाल का शानदार-जानदार जलवा देख रहे थे। मौज-मजा-रोमांस, हंसी, इमोशन, नाच-गाना अर्थात सौ प्रतिशत मनोरंजन से लबरेज फिल्म है ‘हाउसफुल।‘ सबका पैसा वसूल। दर्शक का, निर्माता का, निर्देशक का और कलाकारों का भी। ‘माइंडलेस काॅमेडी‘ का अदभुत उदाहरण। कहानी का आइडिया भी अनूठा है। महाराष्ट्र में अनलकी व्यक्ति या बैड लक के लिए एक शब्द प्रचलित है ‘पनौती।‘ तो अक्षय कुमार का रोल एक ‘पनौती‘ जैसा है। वह जहां जाता है चीजें बिगड़ जाती हैं। उसके आगे आगे चलता है उसका दुर्भाग्य। इसी केंद्रीय विचार के चारों तरफ विभिन्न हास्य प्रसंग, उप कथाएं और ‘काॅमिक सिचुएशन्स‘ गूंथ कर हंसी-ठट्ठे का गुलदस्ता तैयार किया गया है। और जैसा कि हिंदी के कमर्शियल सिनेमा में होता है तमाम तरह की बाधाएं आसानी से पार करते हुए नायक-नायिका मिल जाते हैं और फिल्म का ‘हैप्पी एंड‘ हो जाता है। अगर आप सिनेमा से कोई उम्मीद नहीं रखते और उसे हंसने-हंसाने का तमाशा भर मानते हैं तो यह फिल्म तुरंत देख लीजिए। इटली और लंदन के सुंदर दृश्यों तथा बेहद कम कपड़ों में युवतियों के मादक नृत्य फिल्म की अतिरिक्त विशेषता हैं। शंकर-अहसान-लॉय का संगीत कानों को अच्छा लगता है। फिल्म की बॉक्स ऑफिस सफलता तय है। लगता है आम दर्शकों की अदालत में कॉमेडी ही सरताज है।
निर्माता: साजिद नाडियाडवाला
निर्देशक: साजिद खान
कलाकार: अक्षय कुमार, दीपिका पादुकोन, रितेश देशमुख, लारा दत्ता, बोमन ईरानी, रणधीर कपूर, जिया खान, अर्जुन रामपाल
संगीत: शंकर-एहसान-लॉय
Saturday, April 24, 2010
अपार्टमेंट
फिल्म समीक्षा
इस ‘अपार्टमेंट‘ में क्यों रहना?
धीरेन्द्र अस्थाना
निर्देशक जगमोहन मूंदड़ा की फिल्म थी इसलिए बड़े चाव से देखने पहुंचे थे। लेकिन ‘अपार्टमेंट‘ तो पूरी तरह खाली निकला। कोई इस ‘अपार्टमेंट‘ में क्यों रहना चाहेगा? एक अदद सशक्त कहानी तक नहीं बुनी जा सकी। एक नीतू चंद्रा को छोड़ कर कोई नया आर्टिस्ट कायदे से अभिनय भी नहीं कर सका। एक अदद आइटम सांग बेवजह ठूंसा गया। असल में तो पूरी फिल्म में गानों की जरूरत ही नहीं थी। हीरो रोहित राॅय और हीरोईन तनुश्री दत्ता की जोड़ी जरा भी रोमांटिक नहीं लगती। अनुपम खेर मंजे हुए अभिनेता हैं। अपनी उपस्थिति से दिलासा देते रहे।
मुंबई के एक महंगे अपार्टमेंट में अकेले रहना ‘एफोर्ड‘ नहीं कर सकती तनुश्री इसलिए अपने ब्वायफ्रेंड रोहित राॅय को अपना रूम मेट बना कर उससे भाड़ा लेती है। शक्की स्वभाव की तनुश्री जरा सी बात पर रोहित को निकाल देती है। अब महंगी ईएमआई कहां से आये? एक कमरा भाड़े पर देने का विज्ञापन देती है। दर्जनों लड़कियां घर देखने आती हैं जिनमें से नीतू चंद्रा अपनी सादगी और संवेदनशीलता के कारण तनुश्री को पसंद आ जाती है और इस प्रकार दोनों साथ रहने लगते हैं। नीतू चंद्रा क्रमशः तनुश्री की निजी जिंदगी पर हक जमाने लगती है जिससे तनुश्री ‘अपसेट‘ हो जाती है। इस बीच अनुपम खेर के समझाने पर तनुश्री की रोहित से सुलह हो जाती है। यह सुलह अनुपम खेर ने करवायी है इसलिए नीतू पहले अनुपम की लाडली बिल्ली को और फिर अनुपम खेर को भी मार देती है। मरने से पहले अनुपम ईगतपुरी जाकर नीतू का अतीत जान आए थे कि वह एक मनोरोगी है तथा एक हत्या के जुर्म में सजा भी काट आयी है। नीतू यह बात जान चुकी है इसलिए पहले वह अनुपम खेर को मारती है फिर तनुश्री को बंधक बना लेती है। इसी क्रम में वह घर आये पुलिस इंस्पेक्टर का मर्डर करती है फिर रोहित को घायल करती है फिर बिल्डिंग के टैरेस पर तनुश्री को साथ लेकर पहुंच जाती है। अंततः तनुश्री का हाथ छोड़ वह नीचे गिर कर मर जाती है। मानसिक विचलन का शिकार एक असुरक्षित, अनाथ लड़की के नीम-पागल रोल में नीतू चंद्रा का अभिनय इस फिल्म की इकलौती उपलब्धि है।
निर्देशक: जगमोहन मूंदड़ा
कलाकार: रोहित राॅय, तनुश्री दत्ता, नीतू चंद्रा, अनुपम खेर, मुश्ताक खान
संगीत: बप्पी लाहिरी
इस ‘अपार्टमेंट‘ में क्यों रहना?
धीरेन्द्र अस्थाना
निर्देशक जगमोहन मूंदड़ा की फिल्म थी इसलिए बड़े चाव से देखने पहुंचे थे। लेकिन ‘अपार्टमेंट‘ तो पूरी तरह खाली निकला। कोई इस ‘अपार्टमेंट‘ में क्यों रहना चाहेगा? एक अदद सशक्त कहानी तक नहीं बुनी जा सकी। एक नीतू चंद्रा को छोड़ कर कोई नया आर्टिस्ट कायदे से अभिनय भी नहीं कर सका। एक अदद आइटम सांग बेवजह ठूंसा गया। असल में तो पूरी फिल्म में गानों की जरूरत ही नहीं थी। हीरो रोहित राॅय और हीरोईन तनुश्री दत्ता की जोड़ी जरा भी रोमांटिक नहीं लगती। अनुपम खेर मंजे हुए अभिनेता हैं। अपनी उपस्थिति से दिलासा देते रहे।
मुंबई के एक महंगे अपार्टमेंट में अकेले रहना ‘एफोर्ड‘ नहीं कर सकती तनुश्री इसलिए अपने ब्वायफ्रेंड रोहित राॅय को अपना रूम मेट बना कर उससे भाड़ा लेती है। शक्की स्वभाव की तनुश्री जरा सी बात पर रोहित को निकाल देती है। अब महंगी ईएमआई कहां से आये? एक कमरा भाड़े पर देने का विज्ञापन देती है। दर्जनों लड़कियां घर देखने आती हैं जिनमें से नीतू चंद्रा अपनी सादगी और संवेदनशीलता के कारण तनुश्री को पसंद आ जाती है और इस प्रकार दोनों साथ रहने लगते हैं। नीतू चंद्रा क्रमशः तनुश्री की निजी जिंदगी पर हक जमाने लगती है जिससे तनुश्री ‘अपसेट‘ हो जाती है। इस बीच अनुपम खेर के समझाने पर तनुश्री की रोहित से सुलह हो जाती है। यह सुलह अनुपम खेर ने करवायी है इसलिए नीतू पहले अनुपम की लाडली बिल्ली को और फिर अनुपम खेर को भी मार देती है। मरने से पहले अनुपम ईगतपुरी जाकर नीतू का अतीत जान आए थे कि वह एक मनोरोगी है तथा एक हत्या के जुर्म में सजा भी काट आयी है। नीतू यह बात जान चुकी है इसलिए पहले वह अनुपम खेर को मारती है फिर तनुश्री को बंधक बना लेती है। इसी क्रम में वह घर आये पुलिस इंस्पेक्टर का मर्डर करती है फिर रोहित को घायल करती है फिर बिल्डिंग के टैरेस पर तनुश्री को साथ लेकर पहुंच जाती है। अंततः तनुश्री का हाथ छोड़ वह नीचे गिर कर मर जाती है। मानसिक विचलन का शिकार एक असुरक्षित, अनाथ लड़की के नीम-पागल रोल में नीतू चंद्रा का अभिनय इस फिल्म की इकलौती उपलब्धि है।
निर्देशक: जगमोहन मूंदड़ा
कलाकार: रोहित राॅय, तनुश्री दत्ता, नीतू चंद्रा, अनुपम खेर, मुश्ताक खान
संगीत: बप्पी लाहिरी
Monday, April 19, 2010
दूसरा विवाह
कम दगाबाज नहीं साहित्यकार भी
धीरेन्द्र अस्थाना
‘यह क्या/मैंने घर बसाया/और बेघर हो गया/घर में क्यों नहीं रह पाता प्रेम?‘ इन पंक्तियों के भीतर घर बसाने, घर बिखर जाने और फिर से घर बसाने की मुख्य चाहत छिपी है। जिंदगी बिताने के लिए एक मनपसंद जीवन साथी खोजना एक बुनियादी तथा नैसर्गिक इच्छा है जो अनेक कारणों से टूटती-बिखरती भी आयी है। बेमेल विवाह, नकली दंभ, इच्छाओं का टकराव, विपरीत रुचियां और अपने सपनों में जीवन साथी को कतई अजनबी अनुभव करना बिखराव के प्रमुख कारण हैं। यह कितनी बड़ी विसंगति है इस रिश्ते की, कि दूसरे विवाह के मुद्दे पर, शान से दूसरा विवाह करने वाले अनेक नये-पुराने साहित्यकार प्रतिक्रिया देने से न सिर्फ किनारा कर गये बल्कि उन्होंने आग्रह किया कि इस संदर्भ में उनका नामोल्लेख भी न किया जाए। दिवंगत लेखकों में अज्ञेय, धर्मवीर भारती, मोहन राकेश, राहुल सांकृत्यायन, रमेश बक्षी आदि के दूसरे विवाह चर्चित रहे हैं। बहरहाल, अपनी कहानियों से हिंदी में हलचल मचाये रखने वाले साहित्यकार उदय प्रकाश का इस बारे में कहना है -‘समाज के अपारंपरिक क्षेत्र, जिनमें खेल, साहित्य, कला नृत्य, थियेटर और सिनेमा आते हैं, इनमें समाज की पारंपरिक सत्ताओं का उतना नियंत्रण नहीं रहता जितना एक आम नागरिक समाज में रहता है। मीडिया और बाजार के इस नये समय में इन अपारंपरिक इलाकों में रहने वाले लोग सेलिब्रिटी हो जाते हैं। उनकी पहचान उनकी सामाजिक सांस्कृतिक अस्मिता के द्वारा नहीं बल्कि उनकी अपनी सफलता/असफलता पर निर्भर करती है। इन लोगों की दूसरी या तीसरी या चैथी शादी की जरूरत को उन तर्कों से नहीं समझा जा सकता जिन तर्कों से हम एक आम पारिवारिक व्यक्ति के विवाह को समझते हैं। व्यक्ति की स्वतंत्रता और उसके किसी चुनाव की निजता/एकांतिकता पर चैतरफा हमला व्यर्थ है/अर्थहीन है। वैसे, एक ताजा अमेरिकी अध्ययन के मुताबिक तलाक विचलन या दगाबाजी नहीं, अपने साथी के प्रति ईमानदारी का प्रतीक है। यानी जब तक साथ हैं, वफादार हैं। जब वफादार नहीं हैं तो अलग होते हैं।‘
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति, पूर्व पुलिस अधिकारी और उपन्यासकार विभूति नारायण राय ने दो टूक शब्दों में कहा -‘पुरुष बुनियादी रूप से दगाबाज स्वभाव का होता है। वह दूसरी शादी के लिए न सिर्फ तर्क तलाश लेता है बल्कि दूसरी शादी कर भी लेता है। आम तौर पर स्त्री दूसरा विवाह नहीं कर पाती।‘
संपादिका, लेखिका और स्त्री विमर्श की प्रमुख हस्ताक्षर क्षमा शर्मा भी यही मानती हैं कि ‘आम तौर पर, पहला विवाह टूटने पर, स्त्री दूसरा विवाह नहीं कर पाती। एक बड़ी वजह उसके पास छूट गये बच्चे होते हैं। दूसरी वजह, पहले विवाह की असफलता का बोध उसे दूसरे विवाह की (भी) व्यर्थता का पूर्वाभास करा देता है। मजेदार स्थिति यह है कि पहले विवाह में लोग बेहद छोटे कारणों से अलग हो जाते हैं जबकि दूसरी शादी में बेहद बड़े कारणों से भी समझौता कर लेते हैं। यह रवैया पहली शादी में अपनाएं तो शादी टूटे ही न। तलाक के बाद सामान्य जीवन की तरफ लौटने में डेढ़-दो साल लग जाता है। कभी-कभी पुराना सामान्य जीवन लौटता ही नहीं है। इसलिए पहली प्राथमिकता विवाह को बचाये रखने की होनी चाहिए। क्योंकि यह बिल्कुल जरूरी नहीं है कि दूसरा विवाह सफल ही होगा।‘
आठवें दशक की संवेदनशील लेखिका राजी सेठ का कहना है -‘वास्तविक अर्थों में देखें तो तमाम शादियां एक अरसे के बाद सिर्फ शादियां रह जाती हैं। यह बोध होना चाहिए कि शादी को प्रेम नहीं समझदारी जिंदा रखती है। समझ होती है तो प्रेम भी टिक जाता है वरना वह भी टूट जाता है। समझदारी पौधों को पानी देने की तरह होती है। लचीलापन हर चीज को जिंदा रखता है - प्रेम को भी, विवाह को भी, दोस्ती को भी।‘
‘हंस‘ के संपादक और वरिष्ठ लेखक राजेंद्र यादव ने कहा -‘पहले मां-बाप शादी कर देते थे। पढ़-लिख कर पता चलता था कि पत्नी मनमाफिक नहीं है। तब आदमी दूसरे विवाह की तरफ लपकता था। कभी कभी पहली पत्नी की मृत्यु के बाद जीवन का अकेलापन भरने के लिए भी दूसरा विवाह किया जाता है। लेकिन पहला हो या दूसरा, कोई भी विवाह सुख या संतुष्टि की गारंटी नहीं है।‘
दूसरे विवाह की सबसे बड़ी त्रासदी आम तौर पर यह पायी गयी कि वर्तमान में जो अतीत घुस कर बैठा रहता है, वह दूसरी शादी की यात्रा को निर्विघ्न नहीं चलने देता।
धीरेन्द्र अस्थाना
‘यह क्या/मैंने घर बसाया/और बेघर हो गया/घर में क्यों नहीं रह पाता प्रेम?‘ इन पंक्तियों के भीतर घर बसाने, घर बिखर जाने और फिर से घर बसाने की मुख्य चाहत छिपी है। जिंदगी बिताने के लिए एक मनपसंद जीवन साथी खोजना एक बुनियादी तथा नैसर्गिक इच्छा है जो अनेक कारणों से टूटती-बिखरती भी आयी है। बेमेल विवाह, नकली दंभ, इच्छाओं का टकराव, विपरीत रुचियां और अपने सपनों में जीवन साथी को कतई अजनबी अनुभव करना बिखराव के प्रमुख कारण हैं। यह कितनी बड़ी विसंगति है इस रिश्ते की, कि दूसरे विवाह के मुद्दे पर, शान से दूसरा विवाह करने वाले अनेक नये-पुराने साहित्यकार प्रतिक्रिया देने से न सिर्फ किनारा कर गये बल्कि उन्होंने आग्रह किया कि इस संदर्भ में उनका नामोल्लेख भी न किया जाए। दिवंगत लेखकों में अज्ञेय, धर्मवीर भारती, मोहन राकेश, राहुल सांकृत्यायन, रमेश बक्षी आदि के दूसरे विवाह चर्चित रहे हैं। बहरहाल, अपनी कहानियों से हिंदी में हलचल मचाये रखने वाले साहित्यकार उदय प्रकाश का इस बारे में कहना है -‘समाज के अपारंपरिक क्षेत्र, जिनमें खेल, साहित्य, कला नृत्य, थियेटर और सिनेमा आते हैं, इनमें समाज की पारंपरिक सत्ताओं का उतना नियंत्रण नहीं रहता जितना एक आम नागरिक समाज में रहता है। मीडिया और बाजार के इस नये समय में इन अपारंपरिक इलाकों में रहने वाले लोग सेलिब्रिटी हो जाते हैं। उनकी पहचान उनकी सामाजिक सांस्कृतिक अस्मिता के द्वारा नहीं बल्कि उनकी अपनी सफलता/असफलता पर निर्भर करती है। इन लोगों की दूसरी या तीसरी या चैथी शादी की जरूरत को उन तर्कों से नहीं समझा जा सकता जिन तर्कों से हम एक आम पारिवारिक व्यक्ति के विवाह को समझते हैं। व्यक्ति की स्वतंत्रता और उसके किसी चुनाव की निजता/एकांतिकता पर चैतरफा हमला व्यर्थ है/अर्थहीन है। वैसे, एक ताजा अमेरिकी अध्ययन के मुताबिक तलाक विचलन या दगाबाजी नहीं, अपने साथी के प्रति ईमानदारी का प्रतीक है। यानी जब तक साथ हैं, वफादार हैं। जब वफादार नहीं हैं तो अलग होते हैं।‘
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति, पूर्व पुलिस अधिकारी और उपन्यासकार विभूति नारायण राय ने दो टूक शब्दों में कहा -‘पुरुष बुनियादी रूप से दगाबाज स्वभाव का होता है। वह दूसरी शादी के लिए न सिर्फ तर्क तलाश लेता है बल्कि दूसरी शादी कर भी लेता है। आम तौर पर स्त्री दूसरा विवाह नहीं कर पाती।‘
संपादिका, लेखिका और स्त्री विमर्श की प्रमुख हस्ताक्षर क्षमा शर्मा भी यही मानती हैं कि ‘आम तौर पर, पहला विवाह टूटने पर, स्त्री दूसरा विवाह नहीं कर पाती। एक बड़ी वजह उसके पास छूट गये बच्चे होते हैं। दूसरी वजह, पहले विवाह की असफलता का बोध उसे दूसरे विवाह की (भी) व्यर्थता का पूर्वाभास करा देता है। मजेदार स्थिति यह है कि पहले विवाह में लोग बेहद छोटे कारणों से अलग हो जाते हैं जबकि दूसरी शादी में बेहद बड़े कारणों से भी समझौता कर लेते हैं। यह रवैया पहली शादी में अपनाएं तो शादी टूटे ही न। तलाक के बाद सामान्य जीवन की तरफ लौटने में डेढ़-दो साल लग जाता है। कभी-कभी पुराना सामान्य जीवन लौटता ही नहीं है। इसलिए पहली प्राथमिकता विवाह को बचाये रखने की होनी चाहिए। क्योंकि यह बिल्कुल जरूरी नहीं है कि दूसरा विवाह सफल ही होगा।‘
आठवें दशक की संवेदनशील लेखिका राजी सेठ का कहना है -‘वास्तविक अर्थों में देखें तो तमाम शादियां एक अरसे के बाद सिर्फ शादियां रह जाती हैं। यह बोध होना चाहिए कि शादी को प्रेम नहीं समझदारी जिंदा रखती है। समझ होती है तो प्रेम भी टिक जाता है वरना वह भी टूट जाता है। समझदारी पौधों को पानी देने की तरह होती है। लचीलापन हर चीज को जिंदा रखता है - प्रेम को भी, विवाह को भी, दोस्ती को भी।‘
‘हंस‘ के संपादक और वरिष्ठ लेखक राजेंद्र यादव ने कहा -‘पहले मां-बाप शादी कर देते थे। पढ़-लिख कर पता चलता था कि पत्नी मनमाफिक नहीं है। तब आदमी दूसरे विवाह की तरफ लपकता था। कभी कभी पहली पत्नी की मृत्यु के बाद जीवन का अकेलापन भरने के लिए भी दूसरा विवाह किया जाता है। लेकिन पहला हो या दूसरा, कोई भी विवाह सुख या संतुष्टि की गारंटी नहीं है।‘
दूसरे विवाह की सबसे बड़ी त्रासदी आम तौर पर यह पायी गयी कि वर्तमान में जो अतीत घुस कर बैठा रहता है, वह दूसरी शादी की यात्रा को निर्विघ्न नहीं चलने देता।
Saturday, April 17, 2010
पाठशाला
फिल्म समीक्षा
पाठशाला के पाखंड का पाठ
धीरेन्द्र अस्थाना
बच्चे देखें या न देखें मगर बच्चों के मां-बाप फिल्म ‘पाठशाला‘ जरूर देखे लें। उन्हें पता चलेगा कि शिक्षा के नाम पर कायम मुनाफाखोर प्राइवेट दुकानें उनके बच्चों के जीवन के साथ कैसा बर्बर खिलवाड़ कर रही हैं। मुंबइया हिंदी में कहें तो अंत में जाकर फिल्म थोड़ी ‘पकाऊ‘ (उपदेशात्मक) जरूर हो गयी है लेकिन फिल्म की मंशा बेहद सकारात्मक और सार्थक है। फिल्म के निर्देशक मिलिंद उके ने शिक्षा के बाजारवाद और पाखंड का बेहद उम्दा पाठ तैयार किया है। ‘एक्सट्रा केरिकुलर एक्टिविटीज‘ के नाम पर स्कूल प्रबंधन बच्चों के कोमल मनोलोक को कितना असहाय और जिस्म को किस कदर पस्त किए दे रहा है, इसका बेहद प्रभावशाली रेखांकन करने में निर्देशक को सफलता मिली है।
फिल्म ‘जब वी मेट‘ के बाद शाहिद कपूर ने अपने सहज लेकिन लाजवाब अभिनय की छटाएं बिखेरी हैं तो नाना पाटेकर का गुरू गंभीर व्यक्तित्व भी आकर्षित करता है। अंजन श्रीवास्तव ने संभवतः इस फिल्म में अपने जीवन का सबसे बेजोड़ अभिनय किया है। उनके द्वारा निभाये अनेक मार्मिक दृश्यों से मन भीग भीग उठता है। यूं तो पूरी फिल्म ही अपने गंभीर सरोकारों और हृदयस्पर्शी प्रसंगों के चलते याद की जाएगी लेकिन हाॅस्टल में भूखे-प्यासे, लस्त-पस्त सोये बच्चों वाला दृश्य मन में चिंता पैदा कर देता है कि इस उत्तर आधुनिक समय के बच्चे कितने गहरे दबावों के बीच पढ़ाई कर रहे हैं।
मोटे तौर पर ‘पाठशाला‘ को ‘थ्री ईडियट्स‘ और ‘तारे जमीन पर‘ के जोनर की फिल्म कह सकते हैं लेकिन ‘पाठशाला‘ का कथानक थोड़ा अलग है। यह पिछली दो फिल्मों की तरह शिक्षा के तंत्र या ढांचे पर प्रहार नहीं करती। यह शिक्षण संस्थाओं में फल-फूल रहे बाजारवाद पर चोट करती है। आम तौर पर हिंदी फिल्मों में हीरोईन ‘शो पीस‘ के तौर पर रहती है लेकिन ‘पाठशाला‘ में आयशा टकिया से निर्देशक ने बेहतर काम लिया है। वैसे इस फिल्म की एक खूबी यह भी है कि इसके सभी कलाकारों को उचित ‘स्पेस‘ मिला है। फिल्म का मुख्य गीत सुनने में तो अच्छा लगता ही है वह फिल्म को गति देने तथा उसके कुछ प्रसंगों को परिभाषित करने का काम भी करता है। फिल्म के अंत में मीडिया के हस्तक्षेप तथा नाना पाटेकर के भाषण वाला दृश्य थोड़ा लड़खड़ा गया है लेकिन कुल मिला कर फिल्म देखी जाने लायक है।
निर्देशक: मिलिंद उके
कलाकार: शाहिद कपूर, नाना पाटेकर, आयशा टकिया, सौरभ शुक्ला, अंजन श्रीवास्तव
संगीत: हनीफ शेख
पाठशाला के पाखंड का पाठ
धीरेन्द्र अस्थाना
बच्चे देखें या न देखें मगर बच्चों के मां-बाप फिल्म ‘पाठशाला‘ जरूर देखे लें। उन्हें पता चलेगा कि शिक्षा के नाम पर कायम मुनाफाखोर प्राइवेट दुकानें उनके बच्चों के जीवन के साथ कैसा बर्बर खिलवाड़ कर रही हैं। मुंबइया हिंदी में कहें तो अंत में जाकर फिल्म थोड़ी ‘पकाऊ‘ (उपदेशात्मक) जरूर हो गयी है लेकिन फिल्म की मंशा बेहद सकारात्मक और सार्थक है। फिल्म के निर्देशक मिलिंद उके ने शिक्षा के बाजारवाद और पाखंड का बेहद उम्दा पाठ तैयार किया है। ‘एक्सट्रा केरिकुलर एक्टिविटीज‘ के नाम पर स्कूल प्रबंधन बच्चों के कोमल मनोलोक को कितना असहाय और जिस्म को किस कदर पस्त किए दे रहा है, इसका बेहद प्रभावशाली रेखांकन करने में निर्देशक को सफलता मिली है।
फिल्म ‘जब वी मेट‘ के बाद शाहिद कपूर ने अपने सहज लेकिन लाजवाब अभिनय की छटाएं बिखेरी हैं तो नाना पाटेकर का गुरू गंभीर व्यक्तित्व भी आकर्षित करता है। अंजन श्रीवास्तव ने संभवतः इस फिल्म में अपने जीवन का सबसे बेजोड़ अभिनय किया है। उनके द्वारा निभाये अनेक मार्मिक दृश्यों से मन भीग भीग उठता है। यूं तो पूरी फिल्म ही अपने गंभीर सरोकारों और हृदयस्पर्शी प्रसंगों के चलते याद की जाएगी लेकिन हाॅस्टल में भूखे-प्यासे, लस्त-पस्त सोये बच्चों वाला दृश्य मन में चिंता पैदा कर देता है कि इस उत्तर आधुनिक समय के बच्चे कितने गहरे दबावों के बीच पढ़ाई कर रहे हैं।
मोटे तौर पर ‘पाठशाला‘ को ‘थ्री ईडियट्स‘ और ‘तारे जमीन पर‘ के जोनर की फिल्म कह सकते हैं लेकिन ‘पाठशाला‘ का कथानक थोड़ा अलग है। यह पिछली दो फिल्मों की तरह शिक्षा के तंत्र या ढांचे पर प्रहार नहीं करती। यह शिक्षण संस्थाओं में फल-फूल रहे बाजारवाद पर चोट करती है। आम तौर पर हिंदी फिल्मों में हीरोईन ‘शो पीस‘ के तौर पर रहती है लेकिन ‘पाठशाला‘ में आयशा टकिया से निर्देशक ने बेहतर काम लिया है। वैसे इस फिल्म की एक खूबी यह भी है कि इसके सभी कलाकारों को उचित ‘स्पेस‘ मिला है। फिल्म का मुख्य गीत सुनने में तो अच्छा लगता ही है वह फिल्म को गति देने तथा उसके कुछ प्रसंगों को परिभाषित करने का काम भी करता है। फिल्म के अंत में मीडिया के हस्तक्षेप तथा नाना पाटेकर के भाषण वाला दृश्य थोड़ा लड़खड़ा गया है लेकिन कुल मिला कर फिल्म देखी जाने लायक है।
निर्देशक: मिलिंद उके
कलाकार: शाहिद कपूर, नाना पाटेकर, आयशा टकिया, सौरभ शुक्ला, अंजन श्रीवास्तव
संगीत: हनीफ शेख
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