Monday, January 19, 2015

तेवर

फिल्म समीक्षा
मसालों का फ्लेवर: तेवर
धीरेन्द्र अस्थाना
आखिर अर्जुन कपूर जैसा संभावनाशील और प्रतिभाशाली एक्टर भी कमर्शियल सिनेमा के दुश्चक्र में फंस ही गया। बिना मसालों वाली लीक से हट कर बनी बीसियों फिल्में हिट हो चुकी हैं, हिट हो रही हैं तो भी निर्माता निर्देशक बार बार महाशियां दी हट्टी, एमडीएच मसाले में घुस जाते हैं। मसालों के फ्लेवर के बावजूद बहुत चलने वाली फिल्म नहीं है तेवर। इसे सिर्फ कुछ लोगों के उम्दा काम की वजह से देखा जा सकता है या फिर इसके गानों की वजह से जो पहले से ही सुपर हिट की केटेगरी में शामिल हो चुके हैं। सोनाक्षी सिन्हा लगातार सिढ़ियां चढ़ रही हैं और हर तरह के किरदार में अपनी छाप छोड़ रही है। अर्जुुन इस फिल्म से पूरी तरह सलमान खान के नक्शे कदम पर चल पड़े हैं। उन्हें डायलॉग भी उसी तरह के दिये गये हैं जैसे डायलॉग बोल कर सिनेमा हॉल में सलमान खान तालियां बटोरा करते हैं। एक्टिंग और लोकेशन केे मोर्चे पर इस फिल्म की यूएसपी हैं अभिनेता मनोज बाजपेयी और आगरा मथुरा की गलियां। मनोज बाजपेयी के लेफ्ट हेंड बने अभिनेता सुब्रत दत्ता के रूप में बॉलीवुड को एक नये तेवर वाला खलनायक मिला है। उसने किसी स्थापित एक्टर की नकल करने के बजाय अपना खुद का अंदाज विकसित किया है। लेकिन आने वाली फिल्मों में उसे सोनू सूद और प्रकाश राज जैसे स्वतंत्र खलनायकों वाले किरदारों को प्राथमिकता देनी चाहिए ना कि खलनायक के सहायक की भूमिका। मथुरा के वहशी गुंडे के किरदार में मनोेज बाजपेयी ने पूरी फिल्म में समां बांध दिया है। सत्या के बाद उनकी तेवर को दर्ज किया जाएगा। सेंसर बोर्ड आजकल काफी उदार हो गया लगता है। एकदम अश्लील संवादों को धडल्ले से ओके कर रहा है। फिल्म कुल मिला कर गुंडागर्दी और मोहब्बत का कॉकटेल है। अर्जुन कपूर आगरा का बिंदास और तेवर वाला लड़का है जो कहीं भी कुछ गलत होते देख उससे भिड़ जाता है। फिर चाहे उसका नतीजा कुछ भी हो। हालांकि वह आगरा के एसपी राजबब्बर का बेटा है लेकिन उसके अंदाज टपोरियों जैसे ही हैं। सोनाक्षी मथुरा की मिडिल क्लास फैमिली से है। उसे डांस वगैरह बहुत पसंद है। ऐसे ही एक डांस के कार्यक्रम में मथुरा का बाहुबली मनोेेेेेेेेेेेेेेेेज बाजपेयी उस पर फिदा हो जाता है और उससे शादी का निवेदन तक कर आता है। सोनक्षी का भाई टीवी रिपोर्टर इस शादी में बाधा खड़ी करता है तो मनोज उसकी हत्या कर देता है। सोनक्षी मथुरा छोड़ दिल्ली भाग रही होती है और वहां से अमेरिका लेकिन तभी स्टेशन पर मनोज उसे पकड़ लेता है। दूसरों के पंगों में टांग अड़ाने वाला अर्जुन स्टेशन पर मनोज की जम कर धुनायी करता है और सोनाक्षी को भगा ले जाता है। इसके बाद की पूरी फिल्म सोनक्षी और अर्जुन के लगातार भागते रहने, गुंडों से लड़ने और गाने बजाने में बीतती जाती है। पर्दे पर दिखने के लिए राज बब्बर जैसे बड़े एक्टर ने मामूली पुलिस कर्मी का रोल निभा लिया यह देख कर दुख हुआ। सचमुच बहुत क्रूर है हिंदी सिनेमा। कमल हासन जैसे महान एक्टर की बेटी ने फिल्म में आइटम डांस किया है, यह भी एक खबर है। नये साल की पहली साधारण फिल्म।

निर्देशक: अमित रविन्द्रनाथ शर्मा
कलाकारः अर्जुप कपूर, सोनाक्षी सिन्हा, मनोज बाजपेयी, श्रुति हासन, राजेश शर्मा 
संगीत: साजिद वाजिद




Monday, December 29, 2014

अगली

फिल्म समीक्षा

काले तंत्र की क्रूर कथा : अगली

धीरेन्द्र अस्थाना

अनुराग कश्यप का एक और बेहतरीन प्रोजेक्ट : अगली। क्रूर तंत्र की काली कथा बयां करने का एक नया अंदाज और सिनेमा का एक नया पाठ। कितना कठिन संधर्ष किया है इस बंदे ने तब जा कर कहीं यह बॉलीवुड में अपनी खुद की लकीर खींच पाया है। अगली समाज के धुले पुछे लोगों के कुरूप चेहरों की पड़ताल करती है। इस फिल्म के हीरो हीरोइन इसकी कहानी है और उस कहानी को विमर्श में ढाल देने का अंदाज उसका क्राफ्ट है। इस फिल्म को इसलिए भी देखा जाना चाहिए ताकि पता चले कि अच्छा सिनेमा कैसे बुना और रचा जाता है। यह सौ करोड़ के क्लब में शामिल होने वाली फिल्म भले ही ना हो लेकिन सौ बरस के बेहतरीन सिनेमा की एक फिल्म अवश्य है। रोनित रॉय, राहुल भट्ट, तेजस्वनी कोल्हापुरे, सुरवीन चावला इन सभी कलाकारों ने अपने किरदार में जान लड़ा दी है। ये सब समय के हाथों पिटे हुए चरित्र हैं। राहुल एक स्ट्रगलर एक्टर है जिसे अब तक किसी भी फिल्म में मौका नहीं मिला है। उसका अपनी बीबी तेजस्वनी से तलाक हो चुका है और वह हर शनिवार अपनी बेटी कली को अपने साथ ले जाता है। तेजस्वनी ने राहुल को छोड़ एक कठोर, निर्मम पुलिस ऑफिसर रोनित रॉय से शादी कर ली है लेकिन इस रिश्ते में भी उसके हाथ हताशा और वंचना ही आयी है। इस दौरान तेजस्वनी और राहुल की बेटी कली को एक उचक्का उठा ले जाता है। कली को बांध कर छुपाने के बाद वह उच्चका एक सड़क दुर्घटना में मारा जाता है। राहुल कली के किडनेप की खबर लिखाने पुलिस के पास जाता है और खुद ही अपहरण के शक में घर लिया जाता है। अनुराग ने यह बताने की कोशिश की है कि बच्ची के अपहरण की सही खोज कोई नहीं करता। सब इस अपहरण के नाम पर अपनी निजी कुंठाएं और दुश्मनी तथा फायदे सिद्ध करना चाहते हैं। रोनित को राहुल को फंसा कर अपने कॉलेज के दिनों की दुश्मनी निकालनी है। तेेजस्वनी का भाई बहन से फिरौती की रकम मांग कर ऐश करना चाहता है। राहुल का दोस्त रोनित से पैसे एेंठना चाहता है। तेजस्वनी अपने पति के कू्रर और ठंडे व्यवहार से आहत और दुखी है। सब अपने अपने हिस्से की एक थकी हुयी लड़ाई लड़ रहे हैं जबकि वह बच्ची जिसका अपहरण हुआ था एक गली में बंघी सड़ रही है। जिस जगह से बच्ची का अपहरण हुआ था अगर उस जगह के आस पास की पुलिस महकमा तलाशी लेता तो शायद लड़की को बचा लिया जाता। अपहरण कर्ता की जिस बुआ के साथ पुलिस अंत में सख्ती बरतती है उसके साथ अगर शुरू में ही सख्ती से पेश आती तो शायद बंघक लड़की तक पहुंचा जा सकता था। यही तो है अनुराग कश्यप का अंदाज। उन काले कोनों को उजागर करना जहां किसी की नजर नहीं जा पाती। अवश्य देख लें। कहानी, एक्टिंग, निमार्ण सब कुछ बेमिसाल है।

निर्देशक : अनुराग कश्यप
कलाकारः रोनित रॉय, राहुल भट्ट, तेजस्वनी कोल्हापुरे, सुरवीन चावला
संगीत : जीवी प्रकाशराव




Sunday, December 21, 2014

पी के

फिल्म समीक्षा

एलियन की प्रेम कहानी: पी के

धीरेन्द्र अस्थाना

जब यह खबर बाहर आयी कि इस बार आमिर की फिल्म में कोई संदेश नहीं है। कि वह शुद्ध कॉमेडी फिल्म है जो दर्शकों को हंसा हंसा कर लोटपोट कर देगी। फिल्म के ट्रेलर से भी कोई अंदाजा नहीं लगा पा रहा था और आमिर खान के इंटरव्यूज से भी इस बात का खुलासा नहीं हो रहा था कि आखिर पीके नाम की इस फिल्म की कहानी क्या है। जो भी हो दिल यह मानने को तैयार नहीं था कि आमिर खान जैसा मिस्टर परफैक्शनिस्ट सिर्फ कॉमेडी करके दर्शकों का दिल बहलाएगा। इस काम के लिए तो बॉलीवुड में एक्टरों की कतारें लगी हुयी हैं। तो क्या आमिर भी उसी कतार में? लेकिन फिल्म ने आंखों में पड़े सारे धुंधलके साफ कर दिये। फिल्म में न सिर्फ संदेश है बल्कि बड़ा करारा संदेश है। ऐसा संदेश कि जिसके लिए लोहे का कलेजा चाहिए। धर्म चाहे जो भी हो यह फिल्म हर धर्म के भगवान के मैनेजरों के खिलाफ युद्ध का ऐलान करती है। धर्म के ठकेदारों से टकराते टकराते यह फिल्म एक एलियन की खामोश प्रेम कहानी में ढल जाती है। इस एलियन और उसकी मासूमियत के माध्यम से निर्देशक राजकुमार हिरानी ने समाज के कई ज्वलंत मुद्दों को बेधक सवालों से बेपर्दा किया है। यह एलियन है आमिर खान जो अपने ग्रह से पृथ्वी पर आया है यह जानने के लिए कि क्या उनके ग्रह जैसा जीवन किसी और ग्रह पर भी है। उसके गले में एक लॉकेट है जो दरअसल उसका रिमोट कंट्रोल है। इसके जरिए वह अपने यान को बुलाकर वापस अपने ग्रह लौट सकता है। उसके ग्रह पर लोग नंगे रहते हैं इसलिए वह भी पृथ्वी पर नंगा ही उतरता है। लेकिन राजस्थान के जिस गांव में वह उतरता है वहां एक चोर उसका रिमोट छीन कर भाग जाता है। अब पृथ्वी की भाषा बोली आचरण व्यवहार और पोशाकों से कतई अनजान एक एलियन कैसे सर्वाइव करे। कुल मिला कर फिल्म का यही संघर्ष है और इस संघर्ष की प्रक्रिया में एलियन टकराता है खुदा के विभिन्न सौदागरों से। इसी दौरान उसकी मुलाकात टीवी रिपोर्टर अनुष्का शर्मा से होती है जो सरफराज नामक प्रेमी से धोखा खाए बैठी है। एलियन अनुष्का की तरफ आकर्षित होने लगता है और अंततः उसे प्यार कर बैठता है। चोर ने एलियन का रिमोट कंट्रोल देश के एक बहुत बड़े स्वामीजी को चालीस हजार में बेच दिया था। अनुष्का एलियन और स्वामीजी के बीच में एक टीवी शो करवा कर वह रिमोट वापस पाने का चक्कर चलाती है। ताकि एलियन फिर से अपने घर अपने ग्रह लौट सके। जब एलियन अपने ग्रह लौट रहा होता है तब उजागर होती है एलियन यानी पीके की खामोश प्रेम कहानीे। लेकिन तब तक तो दोनों के जीवन में बहुत कुछ बुनियादी रूप से बदल चुका होता है। जिसे अनहुआ नहीं किया जा सकता। फिल्म शब्द और उसके अर्थ का एक नया पाठ भी आपके सामने रखती है जिससे गुजरते समय आप आवाक रह जाएंगें।सुंदर, मार्मिक, बेहतरीन और अर्थपूर्ण फिल्म है जिसमें मनोरंजन का भी भरपूर ध्यान रखा गया है। अनुष्का और आमिर दोनों ही अब तक के नये लुक में हैं। एक करिश्माई फिल्म जिसका जादू सिर पर देर तक चढ़ा रहता है। अवश्य देखें। 

निर्देशक: राज कुमार हिरानी
कलाकारः आमिर खान, अनुष्का शर्मा, बोमन ईरानी, सुशांत सिेह राजपूत, संजय दत्त, सौरभ शुक्ला
संगीत: शांतनु मौइ़त्रा



Thursday, December 18, 2014

एक्शन जैक्सन

फिल्म समीक्षा
एक्शन जैक्सन केवल एक्शन
धीरेन्द्र अस्थाना
पता नहीं दर्शकों को कैसे पता लग जाता है कि कौन सी फिल्म देखनी है और कौन सी नहीं। वरना तो जितना इस फिल्म का प्रचार हुआ है उसे देख कर लग रहा था कि अजय की यह फिल्म कहीं उनकी ही सुपर हिट फिल्म सिंघम का रिकॉर्ड न तोड़ दे। मगर अजय देवगन जैसा आजमाया हुआ एक्शन स्टार, सुपर हिट सोनाक्षी और प्रभु देवा जैसे हिट निर्देशक के बावजूद दर्शकों ने फिल्म को ठुकरा दिया। कुल तीस चालीस लोग अपने साथ यह एक्शन पैक्ड नाटक देखने पहुंचे थे। दरअसल दिक्कत यह है कि बार बार यह लिखने के बावजूद कि सिनेमा की सफलता के लिए एक अदद अच्छी और तार्किक कहानी का होना बहुत जरूरी है, निर्माता निर्देशक बस कहानी पर ही ध्यान नहीं देते। उनकी लोकेशन लाजवाब, उनका बजट बेमिसाल, उनका गीत संगीत धमाल। गायब है तो सिर्फ एक अच्छी और थोड़ी सी नयी कहानी। एक्शन जैक्शन में तो नयी या अच्छी क्या कहानी ही नहीं है। पूरी फिल्म आरंभ से अंत तक सिर्फ मारधाड से भरी है। इंटरवल के बाद थोड़ा सा कॉमिक रिलीफ दिया गया है जो बहुत बेतुका है और फिल्म की थोड़ी बहुत लय को भी गड़बड़ा देता है। फिल्म की सबसे बड़ी विशेषता उसके गाने और हिमेश रेशमिया का संगीत है। सभी गाने बहुत पहले ही हिट हो चुके हैं। हिमेश को सिर्फ संगीत में ही रहना चाहिए। वही उनका असली मुकाम है। बड़े ही अजीबो गरीब चेहरों वाले खलनायकों को तो सिनेमा वाले पकड़ ही लाते हैं लेकिन इस बार मनस्वी ममगांई नाम की जिस लड़की को खलनायिका के रूप में उतारा गया है वह काबिले तारीफ है। वह अपने लुक से ही नहीं अपने पूरे हाव भाव से भी वैंप लगती है। डर है कि कहीं इस नयी लड़की को अब सिर्फ ऐसे ही रोल ना ऑफर होने लगें। सोनाक्षी सिन्हा को देखकर अजय देवगन का यह कहना कि जब जब पैंट उतारता हूं, सामने आ जाती है, बहुत भद्दा और अश्लील लगता है। इस डायलॉग को एवॉइड किया जा सकता था लेकिन सिनेमा जो ना कराए। सोनाक्षी ने अपने हिसाब से मनोरंजक काम किया है लेकिन वह फिर से मोटापे की तरफ बढ़ रही है। यमी गौतम के लिए ज्यादा स्पेस नहीं था। जितना था उसमें उसने अपना होना जस्टीफाई किया। अब बचे अजय देवगन। वह डबल रोल में हैं। दोनों गुंडे हैं। एक लोकल एक इंटरनेशनल। दोनों की जिंदगी में एक अदद लड़की आती है और दोनों अपराध की दुनियां से निकल कर साफ सुथरी जिंदगी बिताना चाहतें हैं। मगर ऐसा होता थोड़े ही है। एक बार जो अंधेरी गलियों में उतर गया उसका रौशन सड़क पर लौटना संभव ही नहीं है। एक अजय मुंबई का लोकल गुंडा है दूसरा अजय एशिया के सबसे बड़े डॉन का राइट हैंड है। दोनो को अपनी अपनी प्रेमिकाओं के लिए अच्छा आदमी बनना है लेकिन भाई लोग बनने ही नहीं देते। अब क्या करें। एक ही रास्ता है कि येन केन प्रकारेण जुर्म और जुल्म के सरदारों का सत्यानाश करो और फिल्म की हैप्पी एंडिंग को अंजाम दो। यही रास्ता इस फिल्म के लिए भी आजमाया गया है। डॉन का अंत होता है और दोनों देवगन अपनी अपनी प्रेमिकाओं के साथ प्यार की खुशनुमा गली में उतर जाते हैं। जो मारधाड और मारकाट के शौकीन हैं उनके लिए यह फिल्म टकाटक है। बाजार के खिलाफ जाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। 

निर्देशक: प्रभु देवा
कलाकारः अजय देवगन, यमी गौेतम, सोनाक्षी सिन्हा, मनस्वी ममगांई
संगीत: हिमेश रेशमिया



Sunday, November 30, 2014

उंगली

फिल्म समीक्षा

नेक इरादों की थकी उंगली

धीरेन्द्र अस्थाना

नेक इरादों को लेकर थकी पटकथा के साथ बनायी गयी एक औसत फिल्म। करण जौहर के धर्मा प्रोडक्शन से ऐसी फिल्म निकलने की उम्मीद नहीं थी। कलाकारों के नाम देख कर दर्शक ज्यादा बड़ी उम्मीदें ले कर न जाएं। करप्ट सिस्टम के खिलाफ हिंदी में एक से एक नायाब फिल्में बनी हैं। यह फिल्म भी उसी कतार में है लेकिन पिछली पंक्ति में। सिस्टम से लड़ने के लिए निर्देशक ने एक नया और युवा अंदाज जरूर चुना लेकिन उसे एक बेहतरीन अमली जामा नहीं पहना पाए। कंगना के भाई को एक बड़े फिक्सर का बेटा जान से मारने की कोशिश करता है। भाई कोमा में चला जाता है। न पुलिस में फरियाद होती है न न्याय में। हर जगह करप्शन है या बाहुबल है। क्रिमिनल तो बन नहीं सकते इसलिए सिस्टम को सुधारने के लिए चार दोस्त मिल कर उंगली गैंग बनाते हैं। इस गैंग में हैं कंगना रनौत, रणदीप हुडा, अंगद बेदी और नील भूपलम। एसएम जहीर दो साल से पेंशन दफ्तर के चक्कर काट रहे हैं मगर उन्हें पैसे नहीं मिलते। ये पेंशन बाबू बनते हैं उंगली गैंग के पहले शिकार। उंगली गैंग इन्हें अगवा करके इनके शरीर में नकली बम बांध कर स्टेडियम में दौड़ने को कहता है-इस धमकी के साथ कि अगर वे रूके तो बम फट जाएगा। फिर इसकी खबर वे पुलिस और मीडिया को दे देते हैं। पूरा देश खबर देखता है और उंगली गैंग पब्ल्कि के बीच लोकप्रिय हो जाता है। उनका दूसरा शिकार बनता है शहर का एक प्रभावशाली लेकिन करप्ट नेता जिसके जन्म दिन पर उंगली गैंग उसके घर के चप्पे चप्पे पर उंगली के पोस्टर लगवा देते हैं। उंगली गैंग को पकड़ने के लिए एसीपी काले यानी संजय दत्त को बुलाया जाता है जिसकी इमेंज पुलिस महकमें में एक इमानदार और सख्त पुलिस ऑफिसर की है। संजय अपनी मदद के लिए इस मिशन में इमरान हाशमी को शामिल करता है जो खुद भी एक सनकी पुलिस ऑफिसर है। इमरान उंगली गैंग में घुसने के लिए उंगली गैंग जैसे ही दो कारनामे करता है। पहला, लम्बा भाड़ा चाहने वाले ऑटो चालक को उसी के ऑटो में बांध कर माल गाड़ी से दिल्ली रवाना करने का। दूसरा, नगर पालिका कमिश्नर के घर के सामने वाली चमचमाती सड़क पर बम फोड़ कर सड़क को तहस नहस करने का। उंगली गैंग चक्कर में पड़ जाता है क्योंकि दोनो कारनामे उंगली गैंग के नाम पर हुए हैं। उंगली गैंग के सदस्य इमरान हाशमी से मिलते हैं और काफी पूछताछ तथा जांच पडताल के बाद इमरान को अपने गैंग में शामिल कर लेते हैं। इसके बाद की कहानी बतायी तो फिल्म में आप की दिलचस्पी खत्म हो जाएगी इसलिए फिल्म देखिए क्योंकि एक बार तो देखना बनता है। जो सरोकारों की फिल्म हो उसे एक बार तो देखना ही चाहिए। फिल्म वाले सिनेमाई लिबर्टी के नाम पर जो छूट ले लेते हैं वह कई बार बहुत कोफ्त पैदा करती है। इस फिल्म में भी पुलिस महकमें को ले कर ऐसी छूट ली गयी है। कभी भी कहीं भी पूरा काला या पूरा सफेद नहीं होता। अगर ऐसा हो तो देश चलना तो दूर रेंग भी नहीं सकता। लेकिन कोई बात नहीं। अच्छे इरादों की फिल्म है इसलिए यह छूट भी स्वीकार है।

निर्देशक : रेंसिल डिसिल्वा
कलाकारः संजय दत्त, इमरान हाशमी, रणदीप हुडा, कंगना रनौत, नेहा धूपिया, अंगद बेदी
संगीत : सलीम सुलेमान, सचिन जिगर




Wednesday, November 26, 2014

हैप्पी एंडिंग

फिल्म समीक्षा

ट्रेजेडी में बदली हैप्पी एंडिंग 

धीरेन्द्र अस्थाना

युवा पीढ़ी के कौन से सच का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं हिंदी सिनेमा वाले। अपनी जान पहचान के पूरे देश में जो सैकड़ों हजारों युवक हैं उनमें से तो एक भी ऐसा नहीं मिला जो लड़की के साथ केवल मौज मजा करना चाहता है, मगर कमिटमेंट या जिम्मेदारी से बचता है। एकाध ऐसे परिचित जरूर हैं जिन्होंने अपनी मर्जी से विवाह किया मगर विवाह के एक दो साल बाद ही रिश्ता टूट गया। लेकिन एक दो केस के आधार पर इसे नियम नहीं बनाया जा सकता कि नयी पीढ़ी के लड़के आत्मकेंद्रित, सेल्फिश और जिम्मेदारी से भागने वाले होते हैं। मगर फिल्म हैप्पी एंडिंग का सच और सार यही है। शायद इसी कारण यंग जेनरेशन ने फिल्म को नकार दिया। यूं भी जिस थॉट को फिल्म में स्टैब्लिश किया गया है उसका प्रतिनिधित्व सैफ अली खान नहीं अली जाफर या अली फजल जैसे एकदम नये कलाकार कर सकते हैं। सैफ अली अब वरिष्ठों की कतार में आ गये हैं। बहरहाल, सैफ अली अमेरिका में बसे एक लेखक हैं जिनका इकलौता उपन्यास बेस्ट सेलर बन कर बाजार में छा गया था। वह लड़कियों के साथ रिश्ते तो बनाते हैं पर उन पर टिकते नहीं। अमेरिका में उनका एक मात्र दोस्त रणवीर शौरी है। धीरे धीरे सैफ के सारे पैसे खत्म हो जाते हैं। उन्हें नया उपन्यास लिखने की प्रेरणा नहीं मिलती। इसी बीच मार्केट में एक नयी लेखिका आंचल का सिक्का जम जाता है। यह आंचल यानी इलियाना सैफ अली का नया प्यार या कहें नया शिकार है। मगर इलियाना खुद भी सैफ टाइप की ही है यानी उसे भी प्यार व्यार में कोई यकीन नहीं है। अमेरिका में कुछ दिन सैफ के साथ बिता कर जब वह इंडिया लौट जाती है तो सैफ को एहसास होता है कि उसे जिंदगी में पहली बार प्यार हो गया है। इस बीच वह सिंगल स्क्रीन के सुपर स्टार गोविंदा के लिए एक फिल्म की पटकथा लिख रहा है जो खुद उसी के जीवन पर आधारित है लेकिन फिल्म का अंत नहीं सूझ रहा है। इस अंत की तलाश में वह भारत जाता है और इलियाना से मिलता है। वहां वह यह साबित करने में कामयाब हो जाता है कि वह बदल गया है, उसकी सोच बदल गयी है। और वह सचमुच इलियाना के प्यार में उतर गया है। दोनों मिल जाते हैं और सैफ को अपनी फिल्म की हैप्पी एंडिंग मिल जाती है। वह पटकथा पूरी करता है जो गोविंदा पर शूट होती है। फिल्म में छोड़ी गयी प्रेमिकाओं के रूप में प्रिति जिंटा, करीना कपूर और कल्की कोचलीन है। सैफ और इलियाना समेत सभी कलाकारों ने उम्दा अभिनय किया है मगर सुस्त पटकथा और अतार्किक कहानी के चलते फिल्म एक ट्रेजेडी में बदल गयी है। गोविंदा और सैफ के जरिये प्रोडयूसर की दबंगई और डायरेक्टर की बेचारगी को दिलचस्प अंदाज में पेश किय गया है। दरअसल यही फिल्म की यूएसपी भी है। किल दिल के बाद गोविंदा एक बार फिर नये अवतार में हैं। लगता है उनकी दूसरी पारी शानदार होने वाली है। संपूर्णता में नहीं टुकड़ों मे फिल्म दिलचस्प है।

निर्देशक : डीके-राज
कलाकारः सैफ अली खान, इलियाना डिक्रूज, गोविंदा, रणवीर शौरी, कल्की कोचलीन, प्रिति जिंटा, करीना कपूर
संगीत : सचिन जिगर




Tuesday, November 18, 2014

किल दिल

फिल्म समीक्षा

एक कहानी कितनी बार 

धीरेन्द्र अस्थाना

 हिंदी का कमर्शियल सिनेमा बाजार के ऐसे दुश्चक्र में फंसा हुआ है कि लीक से थोड़ा भी इधर उधर होने का रिस्क उठाने से डरता है। हांलाकि इस डर का कोई बड़ा लाभ भी नहीं मिलता। फिल्म देखकर सामान्य दर्शक भी दो एक नेगेटिव कमेंट पास कर ही देते हैं। किल दिल के साथ भी यही ट्रेजडी घटित हुई है। पचासों बार फिल्मायी गयी कहानी एक बार फिर सामने है बस कलाकार नये हैं। कहानी में कोई नया डायमेंशन, कोई नयी उपकथा ही डाल देते तो भी कुछ राहत मिलती। नये ट्र्रैक के नाम पर इंटरवल के बाद कॉमेडी तड़का लगाया है जो बोरियत पैदा करता है। दो अनाथ बच्चे हैं जिन्हें एक डॉन पालता पोसता है। दोनों भागते भागते बड़े हो जाते हैं और डॉन के शूटर में बदल जाते हैं। दोनों जिगरी यार हैं। फिर एक की जिंदगी में एक लड़की का प्रवेश होता है। लड़की का साथ पा कर लड़के का सुधरने का मन करता है जिस कारण डॉन नाराज हो जाता है। तो भी बागी लड़का सुधार के रास्ते पर ही चलता जाता है और लड़की का दिल जीत लेता है। अब एंटी क्लाइमेक्स यह कि जब लडका सुधर जाता है तो लड़की को पता चल जाता है कि उसका आशिक तो शूटर था। लड़की रिश्ता तोड़ लेती है। फिर दो चार बेतुकी घटनाओं के बाद लड़का लड़की के प्यार की हैप्पी एंडिंग हो जाती है। डॉन का साम्राज्य नष्ट हो जाता है। इसी पुरानी कहानी को रणवीर सिंह, अली जफर और परिणति चोपड़ा जैसे नयी पीढ़ी के प्रतिभाशाली कलाकारों के जरिए फिर से पर्दे पर उतारा गया है। केवल अंग्रेजी में नाम रख देने से थोड़े ही अठारह से पच्चीस साल के युवक फिल्म देखने दौड़े चले आएंगे। डॉन बने गोविंदा ने भैयाजी के किरदार में पूरी फिल्म को लूट लिया। नहीं समझ आया कि जब गोविंदा इतना शानदार अभिनय कर सकते हैं तो फिर कई दफा फूहड़ कॉमेडी के शिकंजे में क्यूं फंस जाते हैं। रणवीर और अली पूरी दिल्ली में कहीं भी किसी भी गली, नुक्कड़, होटल, बाजार और कार में जा कर शूट कर आते हैं और शहर में प्रशासनिक स्तर पर कोई हरकत भी नहीं होती। कहीं कोई खबर भी नहीं चलती या छपती। फिल्म में गानों की भी भरमार है। शायद दो घंटे सात मिनट की फिल्म में चालीस पचास मिनट तो गानों के फिल्मांकन में निकल गये होंगे। यह अलग बात है कि गाने गुलजार के हैं इसलिए स्वाभाविक रूप से अच्छे हैं और शंकर अहसान लाय ने उन्हें बेहतर ढंग से संगीतबद्ध भी किया है। परिणति अपनी अदाओं को रिपीट कर रही है। ऐसा करने से उन्हें बचना चाहिए और बहन प्रियंका के बहुरंगी, बहुआयामी अभिनय से पाठ लेना चाहिए। लुटेरा और रामलीला जैसी फिल्मों के बाद रणवीर सिंह का किल दिल करना शोभा नहीं दिया। ऐसी फिल्में करेंगे तो उनके पास बी ग्रेड फिल्मों की कतार लग जाएगी। फिल्म को केवल गोविंदा के अभिनय के कारण देखा जा सकता है। शाद अली भी सोच लें कि उन्हें इम्तियाज अली, अनुराग कश्यप और विशाल भारद्वाज की तरह अपनी लकीर खींचनी है या फिर पिटी पिटाई राह पर चलना है।
निर्देशक : शाद अली
कलाकारः रणवीर सिंह, अली जाफर,परिणति चोपड़ा, गोविंदा
संगीत : शंकर अहसान लाय