Saturday, October 29, 2011

रा.वन

फिल्म समीक्षा

फिल्म समीक्षा

दिल से नहीं तकनीक से ‘रा.वन‘

लगभग दो सौ करोड़ रुपए खर्च कर के बनायी गयी भव्य ‘रा.वन‘ अपनी लागत भले ही निकाल ले या उससे दो कदम आगे बढ़कर दो-चार गुना ज्यादा मुनाफा भी कमा ले लेकिन यह फिल्म न तो दर्शकों के दिल को छूती है और न ही शाहरुख खान की प्रतिभा में कोई इजाफा करती है। यह दिल से बनी हुई फिल्म नहीं है जिसके लिए शाहरुख खान पूरी दुनिया के दर्शकों के दिलों पर राज करते हैं। जो लोग शाहरुख खान को कुछ कुछ होता है, कभी हां कभी ना, कल हो ना हो, मोहब्बतें, देवदास, मैं हूं ना, वीर जारा, चक दे इंडिया और दिल से के लिए दिल दिए बैठे हैं वे ‘रा.वन‘ देखकर एक विराट उदासी से भर जाएंगे क्योंकि ‘रा.वन‘ शुद्ध रूप से एक साइंस फिक्शन है जिसमें तकनीक राज करती है। जिन दर्शकों का विज्ञान से राई-रत्ती का भी नाता नहीं है उनके लिए तो यह फिल्म एक अजीबो गरीब पहेली जैसी है। लगभग इंटरवल तक तो फिल्म पूरी तरह कम्प्यूटर की बारीकियों, उच्च तकनीक वाले वीडियो गेम, विज्ञान की गुत्थियों और बुराई के प्रतीक रा.वन तथा अच्छाई के प्रतीक जी.वन के निर्माण की प्रक्रिया में ही उलझी रहती है। बुराई का प्रतीक बना रा.वन शाहरुख खान द्वारा निर्मित गेम से बाहर आ जाता है और खुद अपनी मर्जी का मालिक बन बैठता है। उससे उलझने के दौरान शाहरुख खान मारा जाता है। पीछे छूट जाती है उसकी पत्नी करीना कपूर और उसका बेटा अरमान वर्मा। चूंकि अरमान ने गेम बीच में ही छोड़ दिया था इसलिए गेम से बाहर निकले रा.वन को अरमान की तलाश है ताकि वह उसे मार कर गेम पूरा कर सके। शाहरुख खान ने रा.वन के साथ-साथ अच्छाई के प्रतीक जी.वन का भी निर्माण किया था। अरमान इस जी.वन को गेम के भीतर से खोज निकालता है और उसे भी रा.वन की तरह गेम के बाहर वास्तविक दुनिया में ले आता है। यह जी.वन जो हू-ब-हू शाहरुख खान की कॉपी लगता है, अरमान और करीना की कदम कदम पर रक्षा करता है। फिर जैसा कि होना चाहिए अंतिम मुकाबले में जी.वन रा.वन को नष्ट कर देता है और स्वयं भी इस नश्वर दुनिया से विदा लेता है। फिल्म को नीरसता से बचाने के लिए फ्लैश बैक का इस्तेमाल किया गया है। फ्लैश बैक में शाहरुख खान का पारिवारिक जीवन दर्शाया गया है जिसमें करीना कपूर के साथ उसका रोमांस भी शामिल है। अगर यह हिस्सा नहीं रखा गया होता तो पता नहीं फिल्म का क्या बनता। इस संवेदनशील हिस्से ने शाहरुख खान की प्रतिष्ठा की लाज रख ली है। इसी हिस्से में शाहरुख और करीना का ‘छमक छल्लो‘ वाला महा पॉपुलर आइटम नंबर भी है। इस गाने और डांस से करीना अपने दर्शकों का दिल जीत लेती हैं। कुल मिलाकर एक बड़ी फिल्म है जो हमें एक नए अनुभव से गुजारती है।

निर्देशक: अनुभव सिन्हा
कलाकार: शाहरुख खान, करीना कपूर, अर्जुन रामपाल, अरमान वर्मा, सतीश शाह, शहाना गोस्वामी।
संगीत: विशाल-शेखर

Monday, October 17, 2011

माई फ्रेंड पिंटो

फिल्म समीक्षा

खुशी बांटता ‘माई फ्रेंड पिंटो’

धीरेन्द्र अस्थाना

आखिर प्रतिभाशाली युवा अभिनेता प्रतीक बब्बर के व्यक्तित्व को अभिव्यक्त करता हुआ एक चरित्र निर्देशक राघव डार ने खोज निकाला। राघव की फिल्म ‘माई फ्रेंड पिंटो’ में प्रतीक बब्बर का किरदार प्रतीक को एक नयी ऊंचाई और संभावना देगा। एक बार फिर सिद्ध हुआ कि अगर जरा भी अलग और फ्रेश सी कहानी हो तो बिना महंगे बजट और स्टार कास्ट के एक बेहतर फिल्म बनायी जा सकती है। ‘माई फ्रेंड पिंटो’ एक फन फिल्म है जो आपके ज्ञान या संवेदना में कोई इजाफा नहीं करती। लेकिन जितनी देर आप हॉल में हैं, पूरी तरह फिल्म में डूबे रहते हैं। पर्दे पर घटती घटनाओं का न सिर्फ मजा लेते रहते हैं बल्कि खुद को भी फिल्म का हिस्सा मानने लगते हैं। अपने रचना कर्म में दर्शकों को भी शामिल कर लेने का अच्छा कौशल राघव डार ने पेश किया है। यह एक रात की फिल्म है। प्रतीक अपने दोस्त से मिलने माया नगरी मुंबई आता है जहां शहर में विभिन्न जगहों पर घट रही अजीबो गरीब घटनाएं उससे टकराती हैं। इस एक रात में वह अपने दोस्त अर्जुन माथुर की नकचढ़ी और महत्वाकांक्षी बीबी से टकराता है। डॉन मकरंद देशपांडे से टकराता है। डांसर बनने मुंबई आयी कलकी कोचलिन से टकराता है। कुछ और भी जरूरी-गैर जरूरी चरित्र उसके जीवन में उस रात उतरते हैं। वह सबको खुश रखने का प्रयास करता है। मुंबई में वह खुद को बहुत ‘मिसफिट’ पाता है लेकिन अपनी मासूमियत से सबका दिल लूट लेता है, सबकी मदद करता है। एक घटना प्रधान फिल्म है जो बेहद मनोरंजक तथा दिलचस्प भी है। इंटरवल तक फिल्म को ले कर भ्रम बना रहता है कि यह क्या कहना चाहती है लेकिन इंटरवल के बाद फिल्म न सिर्फ गति पकड़ती है बल्कि एक शेप भी लेती जाती है। कलकी कोचलिन और प्रतीक बब्बर में भले ही ग्लैमर न हो लेकिन ये दोनों भविष्य की बड़ी उम्मीद हैं। मकरंद देशपांडे और राज जुत्शी की कॉमेडी कहीं कहीं लाउड हो गयी है लेकिन बोझिल नहीं लगती। प्रत्येक चरित्र को उसकी जरूरत के मुताबिक ही स्पेस दिया गया है। प्रतीक और कलकी का बादलों में डांस करने का एक फंतासी दृश्य लुभावना है तो फिल्म के गीतों में ताजगी तथा युवापन। युवा दर्शकों के लिए एक खुशनुमा और जिंदादिल फिल्म-लीक से हट कर।

निर्देशक: राघव डार
कलाकार: प्रतीक बब्बर, कलकी कोचलिन, दिव्या दत्ता, मकरंद देशपांडे, राज जुत्शी, अर्जुन माथुर
संगीत: अजय गोगावले, अतुल गोगावले, समीर टंडन, कविता सेठ

Saturday, October 8, 2011

रास्कल्स

फिल्म समीक्षा

‘रास्कल्स‘ देखो और भूल जाओ

धीरेन्द्र अस्थाना

संजय दत्त के होम प्रोडक्शन की पहली फिल्म थी इसलिए उन्होंने ऐसा कोई रिस्क लेना उचित नहीं समझा कि मामला घर फूंक तमाशा जैसा बन जाए। ‘रास्कल्स‘ का निर्देशन उन्होंने डेविड धवन को सौंपा जो ‘माइन्डलेस कॉमेडी‘ के उस्ताद हैं। डेविड धवन को सिनेमा की सार्थकता वगैरह में कोई दिलचस्पी नहीं है। वह चाहते हैं कि दर्शक उनकी फिल्म देखने आए। सिनेमा हॉल में फिल्म देखने के बाद खुश खुश घर जाए और मस्त रहे। ‘रास्कल्स‘ उनके इस उद्देश्य को पूरा करती है। फिल्म को देखने जाते समय दिमाग घर छोड़ जाएं, उसकी ‘रास्कल्स‘ में कोई जरूरत नहीं है। कौन, कहां क्यों है, क्या कर रहा है, क्यों कर रहा है, कैसे कर पा रहा है इस सब झमेले में नहीं पड़ना है। केवल अधनंगे जिस्मों को देख आंखें सेंकनी हैं, मजेदार संवाद सुनने हैं, अदभुत विदेशी लोकेशन्स देखनी हैं, कुछ मजेदार घटनाओं के कारण घटता हास्य एंजॉय करना है और इस यथार्थ का लुत्फ उठाना है कि संजय दत्त, अजय देवगन और कंगना रानावत जैसे प्रतिभाशाली कलाकार जो फैशन, वन्स अपऑन ए टाइम इन मुंबई, मुन्ना भाई एमबीबीएस, अपहरण, वास्तव तथा गंगाजल के कारण जाने जाते हैं, बाजार के सामने कितने लाचार नजर आते हैं! कंगना ने जिस कदर देह प्रदर्शन किया है उसे देख शायद अब कोई उन्हें फिर से इस तरह देखने की इच्छा में नहीं तड़पेगा। कहानी पर कोई बात अब तक इसलिए नहीं की गयी है क्योंकि इस फिल्म में कोई कहानी है ही नहीं। केवल कुछ घटनाओं को इकट्ठा कर उनका कोलाज जैसा बनाया गया है। अजय देवगन और संजय दत्त मुंबई के ठग टाइप के चरित्र हैं जो पूरी दुनिया में लोगों को ठगते हुए घूमते हैं और आपस में रंजिश भी रखते हैं। दोनों की जिंदगी में कंगना रानावत आती है। थोड़ी कॉमेडी और सेक्स कंगना को पटाने की प्रक्रिया में दिखाया जाता है। अर्जुन रामपाल का चरित्र डाल कर फिल्म को थ्रिलर का स्पर्श देने की भी कोशिश की गयी है। हास्य जुटाने के लिए एक टुकड़ा दृश्य में सतीश कौशिक को भी लपेटा गया है और जिस्मानी नुमाईश सजाने के लिए कंगना काफी नहीं थी तो लीसा हेडन को भी टपकाया गया है। आप बोर नहीं होंगे। हंसेंगे, मजा लेंगे और घर लौट आएंगे। कुछ लोग सिनेमा का यही मकसद समझते हैं। उनको यह फिल्म दशहरा उत्सव का गिफ्ट है।

निर्देशक: डेविड धवन
कलाकार: संजय दत्त, अजय देवगन, कंगना रानावत, सतीश कौशिक, अर्जुन रामपाल, लीसा हेडन
संगीत: विशाल-शेखर
गीत: इरशाद कामिल-अन्विता दत्त

Tuesday, October 4, 2011

फोर्स

फिल्म समीक्षा

जॉन की ‘फोर्स‘ में जान है

धीरेन्द्र अस्थाना

जिस तरह से सिनेमा हॉल भरा हुआ था उसे देख लगता है, कि आज की युवा पीढ़ी भी पिछली पीढ़ी की तरह एक्शन फिल्में देखने को तरजीह देती है। शायद इसीलिए इस वर्ष की तीनों एक्शन फिल्में ‘सिंघम’, ‘बॉडीगार्ड’ और ‘फोर्स’ बॉक्स ऑफिस पर भीड़ खींचने में सफल रहीं। जबकि तीनों फिल्मों के हीरो अलग अलग हैं - अजय देवगन, सलमान खान और जॉन अब्राहम। फोर्स में निशिकांत कामत ने मारधाड़ और रोमांस के अलावा एक बारीक सा कथा तत्व यह भी रखा है कि पुलिस फोर्स के लोग भी आम लोगों की तरह परिवार, इमोशंस और रोमांस को जीते हैं, जीना चाहते हैं। उनका प्यार उन्हें कमजोर भी बनाता है लेकिन मृत्यु के भय से वह जीने की चाहत नहीं छोड़ देते हैं। फिल्म को निशिकांत कामत ने कहीं भी ढीला नहीं छोड़ा है। कहीं एक्शन, तो कहीं संवाद तो कहीं अभिनय के जरिये पूरी फिल्म लगातार देखे जाते जाने की अनिवार्यता में तनी रहती है। यूं ‘फोर्स‘ भी पूरी तरह मसाला फिल्म है। एक तरफ ‘ड्रग्स’ का धंधा करने वाले गिरोह और उनके खूंखार गुंडे, दूसरी तरफ पुलिस के जांबाज अधिकारी और दोनों के बीच चल रही खतरनाक जंग। इस जंग के समानांतर चलती जॉन अब्राहम और जेनेलिया डिसूजा की खामोश लव स्टोरी, जिसे जेनेलिया अपने चुलबुलेपन से रसीला बनाये रखने की भरपूर कोशिश करती है। फिल्म का अंत तो परंपरा के मुताबिक गुंडों के संपूर्ण सफाये के साथ ही होता है, लेकिन पुलिस फोर्स के प्रमुख लोग भी इस जंग में शहीद होते हैं। यहां तक कि जॉन की प्रेमिका जेनेलिया डिसूजा भी। जॉन की बाहों में मरते हुए जब वह कहती है, ‘तुम्हारी बांहों में चैन से मरने का अंतिम सपना तो पूरा हो गया, लेकिन बाकी तमाम सपने रह गये’ तो फिल्म एक कारुणिक अध्याय का पन्ना पलट देती है। विद्युत जामवाल के रूप में हिंदी सिनेमा को एक नया, ओजस्वी खलनायक मिला है जो खतरनाक होने के साथ साथ कूल भी है। लेकिन जॉन अब्राहम के अपोजिट गुड़िया जैसी जेनेलिया की जोड़ी जम नहीं पायी। अपनी तरफ से जेनेलिया ने अभिनय में कोई कसर नहीं छोड़ी, मगर इसका क्या करें कि लंबे चौड़े डील डौल वाले जॉन के सामने वह बच्ची जैसी नजर आती रही। गीत जावेद अख्तर के हैं। जाहिर है कि वे अच्छे हैं। कुछ संवाद भी ध्यान खींचते हैं। मार धाड़ पसंद करने वाले दर्शक इसे भी देख लें। फिल्म निराश नहीं करेगी।

निर्देशक: निशिकांत कामत
कलाकार: जॉन अब्राहम, जेनेलिया डिसूजा, विद्युत जामवाल, राज बब्बर
गीत: जावेद अख्तर
संगीत: हैरिस जयराज/ललित पंडित

Monday, September 26, 2011

मौसम

फिल्म समीक्षा

संवेदनशील लेकिन बोझिल ’मौसम‘

धीरेन्द्र अस्थाना

पंकज कपूर अभिनय की दुनिया का एक बड़ा नाम हैं। सिर्फ एक्टर ही नहीं हैं बल्कि रंगकर्म के प्रख्यात अध्येता भी हैं। इसलिए समझ नहीं आया कि क्यों और किस मोह के चलते उन्होंने तीन घंटे लंबी फिल्म बना दी। ‘दो घंटे का सिनेमा’ वाला दौर आये वॉलीवुड में जमाना बीत गया है तो फिर एक संवेदनशील और नाजुक सी प्रेम कहानी कोई तीन घंटे में फैली क्यों देखना चाहेगा। नतीजा, एक खूबसूरत और दिलचस्प फिल्म को दर्शक बीच में ही छोड़ कर जा रहे थे। दंगों के बैकड्रॉप पर पहले भी प्रेम कहानियां रची गयी हैं। ‘मौसम‘ भी उसी कतार की फिल्म है लेकिन एक ही फिल्म में बहुत कुछ नहीं सब कुछ दिखा देने की चाहत में पंकज ने फिल्म को बोझिल बना दिया है। वरना तो शाहिद कपूर और सोनम कपूर का अपना अपना विशेष युवा दर्शक वर्ग बन गया है। ‘मौसम‘ में शाहिद और सोनम ने डूब कर अभिनय किया है। और अपने-अपने चरित्रों को विश्वसनीयता तथा गहराई के साथ जिया है लेकिन दोनों के मिलकर बिछुड़ जाने के बाद फिर मिलने में इतनी देर लगा दी गयी है कि दर्शक का धैर्य जवाब दे जाता है। मिलन से पहले एक प्रसंग तो ऐसा आता है जब दर्शक मान बैठते हैं कि यह एक दुखांत फिल्म है, कि शाहिद ने सोनम को खो दिया है। लेकिन कुछ ही देर बाद पंकज इस थीसिस की एंटी थीसिस रचते नजर आते हैं और गुजरात दंगों की शिकार बनी सोनम अचानक शाहिद द्वारा बचा ली जाती है। दोनों के जीवन में प्यार का ‘मौसम’ लौट आता है। बड़ी सहजता से इस फिल्म को दो घंटे का बनाया जा सकता है। एक घंटे का संपादन इस फिल्म को ज्यादा सहज, गतिशील और कविता जैसा लयात्मक बना सकता था। पर पंकज की चेतना पर पता नहीं क्यों दंगे ज्यादा हावी थे। कश्मीर के दंगे, बाबरी मस्जिद का ध्वंस, मुंबई बम विस्फोट, अमेरिका में ट्विन टावर संहार, गुजरात के दंगे। इतने मार तमाम दंगों के साथ-साथ कारगिल युद्ध। इसके बावजूद पंकज बड़े पर्दे पर एक लंबी ही सही प्रेम कविता रचने में कामयाब हो गये हैं। दुख इसी बात का है कि एक बेहतरीन फिल्म को ‘प्रतिबद्ध दर्शकों’ का संग साथ ही मिल सकेगा। बॉलीवुड में चल रही समकालीन अश्लील हवाओं के विरुद्ध एक रचनात्मक मौसम संभव करने वाली इस फिल्म को देखना एक कर्तव्य बन जाता है। फिल्म के गाने पहले ही हिट हो चुके हैं।

निर्देशक: पंकज कपूर
कलाकार: शाहिद कपूर, सोनम कपूर, अनुपम खेर, अदिति शर्मा, सुप्रिया पाठक
संगीत: प्रीतम चक्रवर्ती

Saturday, September 10, 2011

मेरे ब्रदर की दुल्हन

फिल्म समीक्षा

बड़ी मसालेदार ‘मेरे ब्रदर की दुल्हन’

धीरेन्द्र अस्थाना

यह जो कन्फ्यूज्ड सी, आज में जीने वाली, बहुत कमा कर उससे भी ज्यादा खर्च कर देने वाली भारत की युवा पीढ़ी है वह सिनेमा की ‘टार्गेट ऑडियंस’ है। इस पीढ़ी की जेब से पैसा निकालना है तो विषय भी ऐसे तलाशने होंगे जो इस पीढ़ी के मिजाज से मेल खाएं। यशराज बैनर की नयी फिल्म ‘मेरे ब्रदर की दुल्हन’ में ऐसा ही एक ‘फनी’ विषय उठाया गया है जो यंग जनरेशन को लुभा सके। अपनी इस कोशिश में फिल्म के निर्देशक अली अब्बास जफर कामयाब भी हुए हैं। फिल्म का एक गाना ‘कैसा ये इस्क है, अजब सा रिस्क है’ पहले से ही सुपरहिट हो गया है और गली कूचों में गूंज रहा है। संगीत निर्देशक सोहेल सेन ने इरशाद कामिल के गीतों को कर्णप्रिय और पॉपुलर दोनों बना दिया है। फिल्म की यूएसपी इसका गीत-संगीत ही है। परीक्षित साहनी के दो बेटे हैं, लव (अली जफर) व कुश (इमरान खान)। लव लंदन में रहता है और अपनी गर्लफ्रेंड से उसका ब्रेकअप हो गया है। वह अपने छोटे भाई इमरान खान को अपने लिए लड़की तलाशने की जिम्मेदारी सौंपता है। लड़की तलाशने के कुछ कॉमिक दृश्यों से फिल्म में हास्य जुटाया गया है। अंत में कंवलजीत सिंह के परिवार में मामला बनता दिखता है और इमरान खान उनके घर पहुंच जाता है। उनकी बेटी तो कैटरीना कैफ है, जिससे आगरा के एक स्टूडेंट कैंप में इमरान पांच साल पहले टकरा चुका था। तब दोनों ने एक दूसरे की मौजूदगी में फील गुड जैसा कुछ पाया था। अब कैटरीना के साथ मस्ती करते, शॉपिंग करते और धमाल मचाते हुए इमरान उसके और करीब आ जाता है। आखिर मां-बाप और भाई से बात करा कर इमरान कैटरीना को ‘भाईसाहब’ के लिए पसंद कर लेता है। भाई लंदन से दिल्ली के लिए निकल पड़ता है। उधर, कैटरीना और इमरान के बीच पनपी अंडरस्टैंडिंग और मस्ती प्यार में बदल गयी है इसका अहसास दोनों को तब होता है, जब कैटरीना की मंगनी इमरान के भाई से हो जाती है। यहां पहुंच कर मजेदार सी फिल्म एक इमोशनल मोड़ पर घूम जाती है। मंगनी कैसे टूटे और कैट-इमरान की जोड़ी कैसे बने, इसके लिए एक मसाला ढूंढ़ा गया है। फिल्म बांधे रखती है। यशराज बैनर की फिल्म है, इसलिए शालीनता और पारिवारिकता का ख्याल रखा गया है। एक हल्की-फुल्की टाइमपास फिल्म है जो मनोरंजक भी है।

निर्देशक: अली अब्बास जफर
कलाकार: इमरान खान, कैटरीना कैफ, अली जफर, कंवल जीत सिंह, परीक्षित साहनी, तारा डिसूजा
गीत: इरशाद कामिल
संगीत: सोहेल सेन

Thursday, September 1, 2011

बॉडीगार्ड

फिल्म समीक्षा

‘बॉडीगार्ड’ की अजब प्रेम कहानी

धीरेन्द्र अस्थाना

ईद पर रिलीज हुई सलमान खान की यह तीसरी फिल्म है जो सुपर हिट होगी। बहुत दिनों के बाद पचासों दर्शकों को टिकट न मिलने के कारण निराश लौटते देखा। इससे पहले वर्ष 2010 में ‘दबंग’ और वर्ष 2009 में ‘वांटेड’ ईद पर ही रिलीज हुई थीं। दोनों सुपर हिट थीं और दोनों मुख्य धारा की फार्मूला फिल्में थीं। ‘बॉडीगार्ड’ भी कमर्शियल और फार्मूला फिल्म ही है। फर्क सिर्फ इतना है कि ‘बॉडीगार्ड’ केवल सलमान की फिल्म नहीं है बल्कि यह करीना कपूर की भी फिल्म है। अगर कहा जाए कि यह सलमान खान के माध्यम से करीना कपूर की फिल्म है तो भी कुछ ज्यादा गलत नहीं होगा। यह भी कह सकते हैं कि यह एक गजब ‘बॉडीगार्ड’ की अजब प्रेम कहानी है जिसमें जरा सी कॉमेडी और ज्यादा सा एक्शन डालकर रोचक बना दिया गया है। यहां भी एक्शन दृश्यों में सलमान की शर्ट उतरने पर हॉल में गूंजता दर्शकों का शोर है। सीटियां हैं। तालियां हैं। यह जादू टूटने वाला नहीं है क्योंकि आम दर्शक सलमान के भीतर खुद को प्रत्योरोपित कर देते हैं। दो सवा दो घंटे के लिए दर्शक एक ऐसी फेंटेसी जी लेते हैं जो वास्तविक जीवन में संभव नहीं है। सलमान को दर्शकों की यह कमजोरी पता है इसीलिए वह ऐसी फिल्मों में काम करने को ही तरजीह देते हैं। ‘गुजारिश’ जैसी ‘क्लासिक’ फिल्म उन्हें नहीं भाती। राज बब्बर अपनी बेटी करीना कपूर के लिए सलमान खान को ‘बॉडीगार्ड’ नियुक्त करते हैं लेकिन सलमान के हैरत अंगेज कारनामे और वफादारी को देख करीना को सलमान से प्यार हो जाता है। वह सलमान को छाया नामक नकली नाम से फोन करती है। सलमान छाया को देखे बिना भी उसके प्यार में पड़ जाता है। इधर राज बब्बर एक गलत सूचना के आधार पर विश्वासघाती सलमान को मार देना चाहते हैं। करीना पिता को बताती है कि सलमान ने तो उसकी जान बचायी है। सलमान उसे भगाकर नहीं ले जा रहा था। उसका प्यार तो छाया है जो रेलवे स्टेशन पर उसका इंतजार कर रही है। राज बब्बर सलमान को जाने देते हैं लेकिन सच्चाई जानने के लिए अपना ‘गनर’ भी पीछे भेज देते हैं। स्टेशन पर सलमान को करीना की ‘बेस्ट फ्रेंड’ माया मिलती है जो सलमान से छाया बन कर मिलती है। दोनों रियासत से दूर चले जाते हैं। लेकिन यह तो एक कमर्शियल फिल्म है। इसका अंत दुखद कैसे हो सकता है? किस फार्मूले के चलते सलमान और करीना मिल जाते हैं यह जानने के लिए फिल्म देख लें। फिल्म के शीषर्क गीत में कैटरीना ने फिर अपने जलवे दिखाए हैं।

निर्देशक: सिद्दीकि
कलाकार: सलमान खान, करीना कपूर, राजबब्बर, महेश मांजरेकर, कैटरीना कैफ, असरानी, आदित्य पंचोली
संगीत: हिमेश रेशमिया, प्रीतम