Saturday, February 26, 2011

तनु वेड्स मनु

फिल्म समीक्षा

मजेदार मसालेदार ’तनु वेड्स मनु‘

धीरेन्द्र अस्थाना

कानपुर की चटपटी चुलबुली तनु और लंदन पलट शांत- शर्मीला मनु। इन दोनों के रोमांस में कॉमेडी का तड़का लगाकर ठेठ यूपी स्टाइल में एक मजेदार मसालेदार फिल्म बनाने की कोशिश की गयी है। जो अर्थपूर्ण फिल्में देखने के शौकीन हैं यह उनके मिजाज की फिल्म नहीं है। लेकिन जो हल्की-फुल्की, थोड़ी सी रोमांटिक, थोड़ी सी मजाकिया, जानदार संवादों वाली नाटकीय फिल्मों को देखने के आदी हैं, उन्हें यह फिल्म मनोरंजन के अच्छे अवसर प्रदान करती है। फिल्म की सिनेमेटोग्राफी बहुत यथार्थवादी और ‘लाइव’ है। फिल्म कानपुर, कपूरथला और दिल्ली में फिल्मायी गयी है। और यहां की अराजक, लापरवाह और निरंकुश जीवनशैली को छायांकन के जरिये दर्शाने में सफल हुई है। निर्देशक शुरू से अंत तक दर्शकों को बांधे रखने में सफल रहा है। लेकिन फिल्म का ‘अंत’ वह संभाल नहीं पाया है। तनु से शादी करने के लिए माधवन और जिमी शेरगिल दोनों का बारात लेकर आ जाना दर्शकों को एक ‘शॉक’ जरूर देता है, लेकिन पहले मरने मारने पर उतारू जिमी का बाद में एक डायलॉग बोलकर पलायन कर जाना अटपटा और नाटकीय हो गया है। जब जिमी को पहली बार पता चलता है कि जिस लड़की से वह शादी करने वाला है उसी लड़की से माधवन प्रेम करता है, ठीक उसी समय वह दोनों के बीच से हट जाता तो यह एक स्वाभाविक अंत होता और शालीन भी। लेकिन प्रेम कहानी का ऐसा अंत सैकड़ों लव स्टोरीज में दिखाया जा चुका है, इसलिए कुछ नया करने के चक्कर में थोड़ा सा ‘कन्फ्यूजिया’ गया है। सिगरेट और शराब पीने वाली, प्रेमी के नाम का ‘टेटू’ छाती पर गुदवाने वाली, अशोभन गालियां बकने वाली एक बेलौस, बिंदास और अपनी मर्जी का जीवन जीने वाली लड़की का किरदार निभाकर कंगना राणावत ने साबित किया है कि वह क्यों बिना किसी गॉड फादर के इंडस्ट्री में न सिर्फ जमी हुई है, बल्कि लगातार आगे भी बढ़ रही है। उसके अभिनय में एक आंच है, जिसकी तपिश निरंतर बढ़ती जा रही है। वह हिंदी फिल्मों का झोंका नहीं, स्थायी भाव बनने की दिशा में अग्रसर है। माधवन के अभिनय में एक सौम्य किस्म की गरिमा है, जो संजीव कुमार जैसी ऊंचाई की याद दिलाती है। संजीव कुमार एक बहुआयामी अभिनेता थे, जबकि माधवन ने उनके गरिमा वाले, शांत-सौम्य पहलू को पकड़ा है। यह फिल्म तीन कारणों से याद की जा सकती है। पहली इसकी सिनेमेटोग्राफी। दूसरा इसका गीत-संगीत पक्ष। और तीसरा इसके किरदारों का जीवंत और विश्वसनीय अभिनय। माधवन के दोस्त पप्पी के रोल में दीपक डोबरियाल ने भी शानदार काम किया है। भोजपुरी के स्टार हीरो रवि किशन का किरदार इसमें ‘फिलर’ जैसा है। उन्हें ऐसे रोल करने से इनकार करना चाहिए। जो भी हो एक स्वस्थ मनोरंजन के लिए फिल्म देखी जा सकती है।

निर्देशक: आनंद एल. राय
कलाकार: माधवन, कंगना राणावत, जिमी शेरगिल, रवि किशन, दीपक डोबरियाल, राजेन्द्र गुप्ता
गीत: राज शेखर
संगीत: क्रिस्ना
छायांकन: चिरंतन दास

Saturday, February 19, 2011

7 खून माफ

फिल्म समीक्षा

प्रयोगधर्मी लेकिन जटिल ‘7 खून माफ’

धीरेन्द्र अस्थाना

यूं तो विशाल भारद्वाज की फिल्में आम तौर पर प्रयोगधर्मी ही होती हैं, लेकिन वे मनोरंजक और स्पष्ट भी होती हैं। मगर इस बार उनकी फिल्म संरचना के स्तर पर बेहद जटिल हो गयी है। सिनेमा का जो बड़ा आम दर्शक वर्ग है और जिसे बॉक्स ऑफिस का माई-बाप कहा जाता है, उसे यह फिल्म शायद पसंद नहीं आयेगी। इस फिल्म को समझना और फिर पचाना बहुत आसान नहीं है। यह हिंदी के किसी अमूर्त और कठिन लेखक की दुर्बोध कहानी जैसी हो गयी है। अगर फिल्म का संदेश यह है कि पुरुषों की सामंतवादी सोच के विरुद्ध यह प्रियंका चोपड़ा का खूनी इंतकाम है तो यह संदेश ठीक से घटित नहीं होता। कारण कि कभी कभी प्रियंका कत्ल में मजा लेती दिखती है जो हिंसक प्रतिशोध का नहीं बीमार मानसिकता का प्रतीक बनता नजर आता है। पूरी फिल्म में प्रियंका छह पतियों का खून करती है। वास्तविक जीवन में ऐसा नहीं होता कि कोई छह छह खून करने के बाद भी पुलिस के हत्थे न चढ़े। मान लेते हैं कि यह फिल्म है। और इसमें ‘क्रियेटिव लिबर्टी’ लेने की गुंजाइश है, लेकिन खून जैसे सबसे बड़े जुर्म के पीछे कुछ भारी और विश्वसनीय कारण तो होने ही चाहिए थे। प्रियंका के रूसी पति का दोष तो सिर्फ इतना होता है कि वह ‘चीटर’ है। ‘चीटिंग’ की सजा ‘र्मडर’ नहीं हो सकती। एक बात और समझ नहीं आयी। अगर प्रियंका ने अपने छह पतियों का खून इसलिए किया चूंकि वह उनके दमन, अत्याचार, धोखेबाजी और जालसाजी से परेशान थी तो सातवां खून वह खुद अपना क्यों करती है? हिंसा का जवाब प्रति हिंसा से देने वाला कभी अपराधबोध से पीड़ित नहीं होता। प्रियंका क्यों होती है? जटिल होने के कारण एक ज्वलंत विमर्श अमूर्तन की खाई में फिसल गया है। इसमें शक नहीं कि इस फिल्म के लिए प्रियंका चोपड़ा को ढेर सारे अवार्ड मिलने वाले हैं। उसने अपने अब तक के करियर का सर्वाधिक विलक्षण अभिनय किया है। प्रियंका के बाद सबसे ज्यादा प्रभाव छोड़ा है उसके पहले पति नील नितिन मुकेश ने। एक नाजुक मिजाज शायर बिस्तर पर कितना बर्बर हो जाता है, यह चरित्र इरफान खान ने बहुत ऊंचाई पर ले जाकर निभाया है। प्रियंका और इरफान के रिश्तों में पसरी हिंसा से दर्शक सहम जाते हैं। नसीरुद्दीन शाह और अन्नू कपूर तो मंजे हुए एक्टर हैं लेकिन गायिका होने के बावजूद ऊषा उथुप ने बेहद सहज और जीवंत रोल किया है। वह फिल्म में प्रियंका की वफादार ‘मेड’ बनी हैं। फिल्म का संगीत भी विशाल भारद्वाज का है, जो बेहद प्रभावशाली है। फिल्म का ‘डार्लिंग डार्लिंग’ वाला गाना तो बहुत पहले से ही पॉपुलर हो चुका है। प्रतिभाशाली जॉन अब्राहम का ‘स्पेस’ सबसे कम है। उन्हें कुछ करने का मौका ही नहीं मिला। एक्सपेरिमेंटल फिल्में पसंद करने वाले दर्शक इसे अवश्य ही देख लें।

निर्देशक: विशाल भारद्वाज
कलाकार: प्रियंका चोपड़ा, जॉन अब्राहम, नील नितिन मुकेश, नसीरुद्दीन शाह, अन्नू कपूर।
संगीत: विशाल भारद्वाज

Saturday, February 12, 2011

पटियाला हाउस

फिल्म समीक्षा

संवेदनशील और जीवंत ‘पटियाला हाउस’

धीरेन्द्र अस्थाना

निखिल आडवाणी की ‘पटियाला हाउस’ में अक्षय कुमार को संवेदनशील और मर्मस्पर्शी अभिनय करते देखना उन सबको अच्छा लगेगा जो मानते हैं कि अक्षय एक बेहतर एक्टर हैं। ‘सिंह इज किंग’ की अपार सफलता के बाद से वह लगातार एक अच्छी फिल्म की प्रतीक्षा में हैं। उनकी प्रतीक्षा ‘पटियाला हाउस’ पर आकर पूरी हुई है। बॉक्स ऑफिस पर ‘पटियाला हाउस’ का क्या बनेगा यह तो आने वाला समय बताएगा लेकिन कहानी, निर्देशन, गीत-संगीत, भावना प्रधान अभिनय, संपादन और छायांकन के स्तर पर ‘पटियाला हाउस’ एक उम्दा फिल्म है। क्रिकेट के बैकड्रॉप पर बनी यह फिल्म मूलतः पिता-पुत्र के टकराव को तो बयान करती ही है, तानाशाह मानसिकता के विरुद्ध लोकतांत्रिक इच्छाओं को भी रेखांकित करती है। फूहड़ मजाक और माइंडलेस कॉमेडी से बहुत दूर एक संवेदनशील और जीवंत ‘पटियाला हाउस’ ही असल में अक्षय कुमार का सही घर है। ऐसे ही घर दर्शकों के दिलों में उन्हें स्थायी बसेरा दिला सकते हैं। फिल्म की मुख्य कहानी यह है कि ऋषी कपूर अपने लंबे चौड़े कुनबे के साथ लंदन के साउथ हॉल में रहते हैं। अपने अकेले के दम पर लंदन में वह एक मिनी पंजाब खड़ा करते हैं और अंग्रेजों से नफरत करते हैं। अंग्रेजों का हिंदुस्तानियों के प्रति नस्लवादी रवैया उन्हें इस बात की इजाजत नहीं देता कि उनका अपना बेटा अक्षय कुमार ब्रिटिश टीम की तरफ से खेले। असल में अंग्रेजों से लड़ते-भिड़ते वह खुद तानाशाह बन जाते हैं। ‘पटियाला हाउस’ में सांस लेता लंबा चौड़ा परिवार एक तरह से कामनाओं का मकबरा बन जाता है। सत्रह साल क्रिकेट से दूर रहने के बाद अंततः अक्षय कुमार अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध जाकर इंग्लैंड की टीम में क्रिकेट खेलते हैं और इंग्लैंड को लगातार जीत दिलाकर खुद का होना सिद्ध करते हैं। ऋषी कपूर को पहले क्रोध आता है लेकिन बाद में कुछ इमोशनल ड्रामे के बाद उन्हें अपनी गलती का एहसास होता है। वह अपनी जिद और एकाधिकारवादी सोच में नहीं अपने बेटे की खुशी और जीत में सार्थकता तलाशते हैं। एक स्पंदनहीन, इच्छा रहित, लगभग गुलाम पटियाला हाउस अपने-अपने सपनों के द्वार पर दस्तक देता नजर आता है। ऋषी कपूर, डिंपल और अक्षय कुमार तो मंजे हुए अभिनेता हैं लेकिन अनुष्का शर्मा ने एक बार फिर पंजाबी कुड़ी के किरदार में जान डाल दी है। उन्होंने रोचक और ‘रीयल’ अभिनय किया है। शंकर-अहसान-लॉय का संगीत दिल को भाता है।

निर्देशक: निखिल आडवाणी
कलाकार: अक्षय कुमार, अनुष्का शर्मा, ऋषी कपूर, डिंपल कपाड़िया, हार्ड कौर
संगीत: शंकर-अहसान- लॉय

Saturday, February 5, 2011

ये साली जिंदगी

फिल्म समीक्षा

जोरदार है ‘ये साली जिंदगी’

धीरेन्द्र अस्थाना


जिन फिल्मों को ‘कंटेंट इज किंग’ कहकर परिभाषित किया जाता है वैसी फिल्म तो है ही ‘ये साली जिंदगी’। एक कदम आगे बढ़कर अभिनय के स्तर पर भी लाजवाब और बेमिसाल है सुधीर मिश्रा की यह फिल्म। इरफान खान कमाल के एक्टर हैं लेकिन इस फिल्म में जीवंतता, सहजता और सशक्तता की नयी ऊंचाई पर खड़े मिले हैं वह। एक खुरदुरी और उतार चढ़ाव से लबरेज जिंदगी का हतप्रभ आशिक वाला किरदार निभा कर उन्होंने प्रतिभा के अपने प्रमाण को रेखांकित किया है। नये अभिनेता अरुणोदय सिंह ने अपने अभिनय की विराट रेंज से चकित किया लेकिन डर है कि कहीं उन्हें अब लगातार गैंगस्टर का रोल न मिलने लगे। चित्रांगदा सिंह तो पहले भी अपने अभिनय के जौहर दिखा चुकी हैं लेकिन नयी लड़की अदिति राव हैदरी ने अपने बोल्ड और बिंदास रोल से युवा ब्रिगेड में पहली पंक्ति में अपना स्थान सुनिश्चित कर लिया है। सौरभ शुक्ला, सुशांत सिंह, यशपाल शर्मा और विपिन शर्मा ने भी अपना होना दर्ज किया है। सबसे ज्यादा प्रभावित करता है फिल्म का शीषर्क गीत, जो फिल्म की व्याख्या भी करता है। कथ्य के स्तर पर ‘ये साली जिंदगी’ खट्टे-मीठे- खुरदरे अनुभवों का जोरदार कोलाज है जो दिल्ली की गलियों में दिल्ली की भाषा में, धूम-धड़ाम ढंग से घटता है। दरअसल, मुंबई का बहुत दोहन हो चुका इसलिए दिल्ली अब सिनेमा की नयी मंडी है। जैसा कि आजकल के नये सिनेमा का ट्रेंड है, इस फिल्म में भी कोई एक सीधी सादी कहानी नहीं है। इसमें इरफान खान और चित्रांगदा सिंह, अरुणोदय सिंह और अदिति राव हैदरी, चित्रांगदा सिंह और विपुल गुप्ता, सौरभ शुक्ला और इरफान खान, यशपाल शर्मा और प्रशांत नारायण, सुशांत सिंह और अन्य की समानांतर जिंदगियां टुकड़ों में घटित होती रहती हैं और एक दिलचस्प कोलाज बनाती हैं। एक पंक्ति में कहना हो तो यह स्टाइल, कंटेंट और एक्टिंग की फिल्म है। भविष्य के एक्टर जिन फिल्मों से एक्टिंग का पाठ सीख सकेंगे उनमें यकीनन ‘ये साली जिंदगी’ और विशेष कर इसमें इरफान खान का अभिनय शुमार किया जाएगा। सुधीर मिश्रा ने एक बार फिर साबित किया है कि अच्छे सिनेमा को सुपर स्टारों की नहीं बेहतरीन कंटेंट की जरूरत है। फिल्म का संगीत निशात खान ने दिया है जो अंतरराष्ट्रीय ख्याति के संगीतकार हैं। फिल्म के संवाद फिल्म का ‘ट्रेड मार्क’ बन सकते हैं। दिल्ली और हरियाणवी भाषा में बोली गयी गालियां एक नये, मजेदार अनुभव से गुजारती हैं। दिल्ली का चांदनी चौक, करौल बाग, छतरपुर और हरियाणा बॉर्डर वाला एरिया कैमरे की आंख से भव्य और दिव्य लगता है। एक आवश्यक रूप से देखने लायक फिल्म।

निर्माता: प्रकाश झा
निर्देशक: सुधीर मिश्रा
कलाकार: अरुणोदय सिंह, अदिति राव हैदरी, इरफान खान, चित्रांगदा सिंह, सौरभ शुक्ला, सुशांत सिंह
संगीत: निशात खान
गीत: स्वानंद किरकिरे, मानवेंद्र

Saturday, January 29, 2011

दिल तो बच्चा है जी

फिल्म समीक्षा

‘दिल तो बच्चा है जी’ थोड़ा सच्चा है जी

धीरेन्द्र अस्थाना

मधुर भंडारकर ऐसा सिनेमा बनाने के कारण चर्चित हुए हैं जो अर्थपूर्ण तथा यथार्थवादी भी है और बाजार में भी टिकता है। ‘ट्रैफिक सिग्नल‘, ‘कॉरपोरेट‘, पेज थ्री‘, ‘फैशन‘ उनकी व्यावसायिक रूप से सफल गंभीर फिल्में हैं। इस बार उन्होंने एक कॉमेडी फिल्म बनाने की ठानी थी। लेकिन हुआ यह कि जैसे एक साहित्यकार गुलशन नंदा या प्रेम वाजपेयी की तरह के उपन्यास नहीं लिख सकता वैसे ही मधुर भंडारकर भी वैसी कॉमेडी नहीं बना सके जो हिट होती है। उन्होंने कॉमेडी के भेष में एक गंभीर फिल्म बना दी है और यह इस रूप में अच्छा ही हुआ कि अब ‘मीनिंगफुल सिनेमा’ के दर्शकों को ‘एक संजीदा निर्देशक की विदाई का खतरा’ नहीं रहा। ‘दिल तो बच्चा है जी’ एक कमाल की सच्ची और अच्छी फिल्म है। फिल्म की कहानी में ताजगी है। कहानी के तीन आयाम हैं। तीन दिल तन्हा हैं। एक को सच्चे प्रेम की तलाश है, यानी ओमी वैद्य। दूसरे को तलाक के बाद फिर से घर बसाना है, यानी अजय देवगन। तीसरा दैनिक लड़कीबाजी से थककर ‘जेनुइन लव’ की खोज में एक जगह रुकता है, यानी इमरान हाशमी। तीनों दिल बेआवाज टूट जाते हैं। फिल्म को कॉमेडी का टच देने के लिए तीनों ‘बच्चे दिल’ फिर से रोमांस के भंवर में प्रवेश करते दिखाए गए हैं। लेकिन फिल्म का मूल स्वर यही उभर कर आता है कि आज की व्यापारिक और गलाकाट दुनिया में सब एक दूसरे का इस्तेमाल भर कर रहे हैं। प्यार एक छलावा है। इमोशन एक अत्याचार है। रिश्ता एक समझौता है। अजय देवगन एक बैंक के लोन मैनेजर हैं जो अपनी पत्नी से तलाक के बाद अपने मां-बाप (स्वर्गीय) के बड़े से बंगले में रहने आते हैं। एकांत से बचने के लिए वह ओमी वैद्य और इमरान हाशमी को बतौर पेइंग गेस्ट रख लेते हैं। कालांतर में तीनों दोस्त बन जाते हैं और अपनी अपनी प्रेम कहानियों में डूबते-उतराते हैं। इन तीनों दिलों की धड़कन बनी हैं श्रुति हसन, श्रद्धा दास और शहजहान पद्मसी। फिल्म के सभी कलाकारों ने बेहतर अभिनय किया है। इस फिल्म में भी ओमी वैद्य की धड़कन बनी श्रद्धा दास के चरित्र के माध्यम से मधुर भंडारकर ने ग्लैमर र्वल्ड के पीछे का संघर्ष और अंधेरा दिखा ही दिया है। ओमी वैद्य का चरित्र फिल्म की गंभीरता में ‘कॉमिक रिलीफ’ की तरह है। उनकी ‘हिंग्लिश पोयेट्री’ दिलचस्प है और सच्चे प्रेम को लेकर उनकी तड़प भली-भली सी लगती है। अपने दिल फेंक चरित्र की निरर्थकता के अहसास को इमरान हाशमी ने सशक्त अभिव्यक्ति दी है। 48 साल के किरदार अजय देवगन जिस तरह अपने से 17 साल छोटी युवती के प्रेम में पड़ते हैं और टूटते हैं, वह इमोशन जीवंत रूप में घटित हुआ है। अभिनय, निर्देशन, कथा और गीत-संगीत के स्तर पर ‘दिल तो बच्चा है जी’ एक साफ सुथरी और उम्दा फिल्म है। सिनेमा के आम दर्शक शायद इसमें ज्यादा दिलचस्पी नहीं ले पाएंगे।
निर्देशक: मधुर भंडारकर
कलाकार: अजय देवगन, इमरान हाशमी, ओमी वैद्य, श्रद्धादास, श्रुति हसन, शहजहान पद्मसी
संगीत: प्रीतम चक्रवर्ती

Saturday, January 22, 2011

धोबीघाट

फिल्म समीक्षा

मुंबई दर मुंबई वाया ‘धोबीघाट’

धीरेन्द्र अस्थाना

मुंबई अनंत कथाओं, घटनाओं और चरित्रों का शहर है। एक आम कहावत है कि इस शहर में आदमी की पूरी जिंदगी लग जाती है तो भी यह शहर अनजाना-अनपहचाना सा बना रहता है। निर्देशिका किरण राव ने अपनी पहली फिल्म ‘धोबीघाट’ में इसी मुंबई को चार समानांतर कहानियों के जरिये खोलने-बताने की कोशिश की है। धोबीघाट से फिल्म का इतना भर नाता है कि फिल्म का युवा नायक प्रतीक बब्बर कपड़े धोने का काम करता है और एक्टर बनने का सपना संजोये हुए है। आमिर खान एक पेंटर हैं। मोनिका डोगरा विदेश से मुंबई आयी है फोटोग्राफी करने और शहर को जानने-समझने। पहले वह कुछ क्षण के लिए आमिर खान के जीवन में उतरती है फिर प्रतीक बब्बर के। अंत में दोनों ही उसके जीवन से ‘छूट’ जाते हैं। फिल्म में आमिर, प्रतीक और मोनिका के अलावा चौथी कहानी कृति मल्होत्रा की है जो तीन कैसेट्स के जरिये पर्दे पर घटित होती है। ये कैसेट्स आमिर खान को उस घर में मिलते हैं, जिस घर को उसने किराये पर लिया है। असल में ‘धोबीघाट’ एक वैचारिक और बारीक संवेदना वाली फिल्म है। सिनेमा के आम दर्शकों या बाजार के लिए इसे बनाया भी नहीं गया है। वह तो आमिर खान प्रोडक्शन की फिल्म है इसलिए पहले दिन काफी संख्या में इसे दर्शक मिल भी गए। वरना, जैसा कि खुद किरण राव ने एक साक्षात्कार में कहा था कि यह अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों की फिल्म है। आमिर तो खैर एक मंजे हुए कलाकार हैं इसलिए उनके बारे में क्या कहना? हां, प्रतीक बब्बर ने कमाल की एक्टिंग की है। यह सही मायने में प्रतीक की लांचिंग की पहली फिल्म है और अपनी इस फिल्म से वह भविष्य की उम्मीद बन गये हैं। मोनिका डोगरा का अभिनय भी जीवंत और सहज है। चार कहानियों वाली इस यथार्थवादी फिल्म को बड़ी सहजता से सवा दो घंटे में लाया जा सकता था। पता नहीं क्यों किरण राव ने इसे पिच्चानबे मिनट में समेट दिया। इस फिल्म से दर्शक मनोरंजन की उम्मीद न करें। इसे पेंटिंग की तरह ‘फील’ करने और कविता की तरह आत्मसात करने के लिए बनाया गया है। अपनी पहली ही फिल्म को ‘विमर्श’ की तरह पेश करके किरण राव ने साहस का परिचय दिया है। अंत में यह कि फोटोग्राफर की आंख से देखी गयी मुंबई वाली इस फिल्म की फोटोग्राफी में जान है।

निर्देशक: किरण राव
कलाकार: आमिर खान, प्रतीक बब्बर, मोनिका डोगरा, कृति मल्होत्रा
संगीत: गुस्ताव सांता ओलाला

Saturday, January 15, 2011

यमला पगला दीवाना

फिल्म समीक्षा

मसालेदार ‘यमला पगला दीवाना’

धीरेन्द्र अस्थाना

समीर कर्णिक द्वारा निर्देशित ‘यमला पगला दीवाना’ कोई वैचारिक या कालजयी फिल्म नहीं है। यह एक मसालेदार आम मुंबइया फिल्म है जो अपने मकसद में काफी हद तक कामयाब हुई है। मकसद है बिना अश्लील हुए दर्शकों का साफ सुथरा मनोरंजन करना। इस मकसद के लिए फिल्म में नाच-गाना-हंसी-मजाक-मारधाड़- इमोशन-प्यार यानी तमाम मसाले डाले गये हैं और मूल स्वर ‘लाउड कॉमेडी’ का रखा गया है। शुद्ध रूप से ‘माइंडलेस कॉमेडी’ ऐसी ही फिल्मों को कहते हैं। इससे पहले फिल्म ‘अपने’ में पूरी देओल तिकड़ी (धम्रेन्द्र, सनी, बॉबी) अपने अभिनय के जलवे दिखा चुकी है। लेकिन ‘अपने’ एक संवेदनशील और भावप्रधान फिल्म थी। जबकि ‘यमला पगला दीवाना’ में यह तिकड़ी पहली बार कॉमेडी कर रही है। कहानी बहुत पुरानी और दर्जनों बार दोहरायी जा चुकी है। इसलिए फिल्म के आरंभ में ‘परिवार के बिछुड़ने और अंत में मिल जाने’ वाली कई फिल्मों के टुकड़े दिखाकर हल्के-फुल्के ढंग से स्वीकार लिया गया है कि यह भी वैसी ही फिल्म है, लेकिन नए अंदाज में। सनी देओल अपनी मां और विदेशी पत्नी के साथ कनाडा में रहता है। एक प्रसंग से उद्घाटित होता है कि उसका पिता धर्मेन्द्र और भाई बॉबी देओल बनारस में कहीं हैं। मां के आग्रह पर वह उन दोनों को खोजने बनारस आता है। बनारस आते ही वह बॉबी देओल के हाथों ठगा जाता है। दरअसल बनारस में रहकर धर्मेन्द्र और बॉबी लोगों को ठगने का ही धंधा करते हैं। सनी समझ जाता है कि वह सही जगह पहुंचा है। वह चुपचाप बॉबी के और उसके कारण धर्मेन्द्र के करीब होता जाता है। दो-तीन गंभीर संकटों से दोनों बाप-बेटों को सनी बाहर निकालता है। इसी दौरान बॉबी को साहिबा (कुलराज रंधावा) से प्यार हो जाता है। लेकिन साहिबा के भाई बॉबी को पीटकर साहिबा को अपने साथ पटियाला ले जाते हैं। बॉबी को उसका प्यार वापस दिलाने के लिए सनी बॉबी के साथ पटियाला जाता है। इस प्रकार फिल्म पंजाब और उसके कल्चर में एंट्री लेती है। बीच-बीच में कई उप प्रसंगों के जरिए हास्य के क्षण जुटाए जाते रहते हैं। साहिबा के भाई बॉबी के बजाय सनी से शादी को तैयार होते हैं तो उसके जरिए कॉमेडी का एक नया रंग उभरता है। दोनों की शादी के विज्ञापन को देख कनाडा से सनी की पत्नी भी पटियाला पहुंच जाती है। अंत में फिल्म का सुखद अंत होता है। सबकी गलत फहमियां दूर होती हैं। बॉबी-कुलराज की शादी होती है और बिछुड़ा परिवार समृद्ध होकर कनाडा लौटता है। फिल्म की सबसे बड़ी खामी यह है कि यह जरूरत से ज्यादा लंबी हो गयी है। कम से कम बीस मिनट का संपादन इसे चुस्त कर सकता था। मनोरंजन प्रेमी दर्शकों के लिए टाइम पास है।

निर्देशक: समीर कर्णिक
कलाकार: धर्मेन्द्र, सनी देओल, बॉबी देओल, कुलराज रंधावा, नफीसा अली, अनुपम खेर, जॉनी लीवर
संगीत: प्यारेलाल, संदेश शांडिल्य, अनु मलिक आदि।