Saturday, April 12, 2014

हाईवे

फिल्म समीक्षा

हाईवेः जिंदगी की सड़क पर निहत्थे और अकेले ’’’’

धीरेन्द्र अस्थाना

इंटरवल तक फिल्म में कुछ भी स्थापित और परिभाषित नहीं था। न कहानी, न चरित्र, न ही मंतव्य। एकाएक डर सा लगा कि क्या निर्देशक इम्तियाज अली इतनी जल्दी खत्म हो गये? लेकिन इंटरवल के तुरंत बाद इम्तियाज लौटे। प्रतिभा, सरोकार और फिल्म निर्माण के एक ज्यादा सशक्त अंदाज में। लेकिन ध्यान रहे, हाईवे इम्तियाज की पिछली फिल्मों से एकदम अलग हट कर है। यह फिल्म अपने देखे जाने के दौरान अतिरिक्त धैर्य और समझदारी की मांग करती है। यह पारंपरिक फिल्म नहीं है। यह सपने के भीतर रहता एक सपना है।  यह फंतासी के भीतर ठिठकी हुई एक और फंतासी है।यह जिंदगी की सड़क पर निहत्थे और अकेले छूट जाने की व्यथा कथा है। यह बीहड़ सामाजिक यथार्थ की आंखों में उंगली डाल कर निकाला गया विमर्श है जो स्थापित करता है कि हाईवे, जंगल, पहाड़ और वीरान खंडहरों या सुनसान ढाबों में नहीं महल सरीखे आलीशान घरों के भीतर स्त्री असुरक्षित है। स्त्री को डकैत या अपहरणकर्ता से नहीं अपने परिजनों से खतरा है। फिल्म के अंत में आलिया भट्ट कहती भी है-“अपहरण के दौरान मैं आजाद थी लेकिन घर के भीतर आ कर जेल में बंद हो गयी हूं।“ रिश्तों के नाजुक रेशों को फिल्म धीरे धीर खोलती है। आलिया को अपने मंगेतर के संग साथ में वह सुरक्षा नहीं मिलती जो वह अपने अपहरणकर्ता रणदीप हुडा के सानिध्य में पाती है। पुलिस से बचने के लिए रणदीप को मजबूरी में आलिया को किडनेप कर अपने ट्रक में भागना पड़ता है। वह फिरौती वाला किडनेपर नहीं है। वह ऐसे गिरोह का सदस्य है जो पैसे लेकर जमीन दबाने छुड़ाने का धंधा करते हैं। अपने अड्डे पर पहुंचकर अपने बॉस के जरिए उसे पता चलता है कि वह दिल्ली के सबसे बड़े रईस की बिटिया को उठा लाया है। गिरोह डर जाता है। उसे लगता है कि उसका अंत निकट है। सरगना रणदीप को फटकारता है। सरगना को इतना डरा हुआ देख बद दिमाग और गर्म मिजाज रणदीप आलिया को लेकर भाग निकलता है। साथ में दो तीन साथी भी हैं। ये लोग छुपते छुपाते पांच राज्यों से गुजरते हैं। इसी स्थूल कहानी के भीतर आलिया और रणदीप के जीवन का विद्रूप अतीत अपने कपड़े उतारता है। यहां तथाकथित निर्ममता के भीतर मानवीय उष्मा अपनी आंख चुपके से खोलती है। यहां एक क्रूर गंुड़ा आलिया जैसी युवा लडकी के सामने जार जार रोता है और अपने भीतर जाग गयी जिंदगी और स्नेह की चाह से डर डर जाता है। यहां आलिया को अपने अपहरणकर्ता से प्यार हो गया है । यह प्यार घर बसाने, शादी करने या बच्चे पालने जैसी छोटी कामनाओं से भरा हुआ नहीं है। यह आजाद रहने और आजाद रखने की गहरी इच्छा से लबरेज है। अंत में खोजी पुलिस के हाथों रणदीप मारा जाता है लेकिन घर लौटी आलिया फिर से निकल पड़ती है-पहाड़ों पर अपना स्पेस तलाशने और अपने अस्तित्व को आकार देने। गंभीर सिने प्रेमियों के लिए एक अनिवार्य फिल्म। रणदीप और आलिया का अभिनय अविस्मरणीय। रहमान का संगीत कर्णप्रिय। प्रकृति के नजारे दुर्लभ।

निर्देशकः इम्तियाज अली
कलाकारः रणदीप हुडा, आलिया भट्ट,
संगीतः ए ़आर ़ रहमान

हंसी तो फंसी

फिल्म समीक्षा

अजब प्यार की गजब कहानी: हंसी तो फंसी ’’’

धीरेन्द्र अस्थाना

निर्माताओं में करण जौहर और अनुराग कश्यप का नाम हो तो फिल्म खराब होने का तो सवाल ही नहीं है। करण के कारण फिल्म में इमोशन और मनोरंजन है तो अनुराग के कारण फिल्म आरंभ में थोड़ी जटिल  हो गयी है। यह निर्देशक का कमाल है कि उन्होंने फिल्म को पूरी तरह जटिल होने से पहले ही बचा लिया और उसे आम दर्शक के लिए भी सहज बनाये रखा। मगर इतनी उम्दा फिल्म का शीर्षक बहुत खराब है और यह फिल्म की कहानी से भी मेल नहीं खाता। शायद युवा दर्शकों को पकड़ने के लिए यह नाम रखा गया हो लेकिन निर्माता यह भूल रहे हैं कि युवा दर्शक उतने कोरे भी नहीं हैं जितना सिनेमा बनाने वाले उन्हें समझते हैं।बहरहाल सि़़द्धार्थ मलहोत्रा और परिणीति चोपड़ा की यह बेहतरीन फिल्म देखते समय रणबीर कपूर और प्रियंका चोपड़ा की फिल्म बरफी की याद अनायास ही आती रहती है। परिणीति ने भी बहन प्रियंका की तरह एक जटिल चरित्र को मूर्त करने में कामयाबी पायी है। निर्देशक ने फिल्म के सभी किरदारों को बेहद खूबसूरती से स्थापित भी किया है और परिभाषित भी किया है। सिद्धार्थ ने भी अपने चरित्र को सहजता और आत्मविश्वास के साथ साकार किया है। और परिणीति ने तो इस फिल्म से बता दिया है कि वह भी अपनी बहन प्रियंका की तरह बहुत आगे जाने वाली है। दर्शक इस फिल्म को अवश्य देखें लेकिन उनसे फिल्म को समझने कि लिए थोड़ा दिमाग लगाने की भी गुजारिश है।
 सिद्धार्थ एक पुलिस अधिकारी का बेटा है। वह एक विवाह समारोह में साड़ी किंग मनोज जोशी की बेटी अदा शर्मा से मिलता है और उसे दिल दे बैठता है। सात साल बाद दोनों शादी के बंधन में बंधने वाले हैं कि तभी एक नाटकीय घटना क्रम के चलते सिद्धार्थ के जीवन में अदा की छोटी बहन परिणीति आ जाती है। परिणीति एक विद्रोही, आजाद खयाल, सनकी किस्म की प्रतिभाशाली लड़की है जो चीन में अपना कोई प्रोजेक्ट पूरा करने के लिए घर से पैसे चुरा कर भागी लडकी के लांछन को जी रही है। वह एंटी डिप्रेशन की गोलियां खाती रहती है जबकि घर वाले उसे ड्रग एडिक्ट और चोर घोषित कर उपेक्षित कर चुके है। खास कर उसके काका, पिता का बड़ा भाई, और बहनें। इस बार वह फिर से चोरी करने आयी है क्योंकि उसे चीन में दस करोड़ का कर्ज अदा करना है। सिद्धार्थ उससे सहानुभूतिवश जुड़ता है लेकिन उसकी मासूमियत और प्रतिभा के कारण उससे प्यार करने लगता है। वह उसे चोरी करने के बजाय घर वालों से माफी मांगने और पिता से पैसे मांगने की सलाह देता है। इसके बाद क्या होता है यह आप फिल्म में ही देखें। हम सिर्फ इतना बता देते हैं कि शादी वाले दिन फेरों के वक्त सिद्धार्थ अदा को छोड़ देेता है और परिणीति की खोज में दौड़ पड़ता है जो वापस चीन जा रही है। दोनों के मिल जाने से फिल्म का सुखद अंत हो जाता है। फिल्म का गीत संगीत भी बेहतर है। नये मिजाज की फिल्म है, देख लें।

निर्देशक: विनिल मैथ्यू
कलाकार: सिद्धार्थ मलहोत्रा, परिणीति चोपड़ा, अदा शर्मा, शरत सक्सेना, मनोज जोशी
संगीत: विशाल/शेखर 

Monday, February 3, 2014

वन बाई टू

फिल्म समीक्षा

दो दुखों की एक नाव: वन बाई टू

धीरेन्द्र अस्थाना

एक फिल्म में दो, तीन, चार, दस कहानियां पहले भी आ चुकी हैं। उनमें से कुछ बहुत अच्छी फिल्में भी साबित हुईं। जैसे दस कहानियां, मेट्रो, रांझना आदि। लेकिन इस दृष्टि से ‘वन बाई टू‘ थोड़ा निराश करती है। यह दो दुखों की एक नाव तो बनती है लेकिन हिचकोले खाने वाली डगमग नाव। एक लीक से हटकर कलात्मक फिल्म बनाने का यह अर्थ नहीं है कि निर्देशक दर्शकों की तरफ पीठ फेर कर फिल्म बनाये। आप दर्शक की अनदेखी करेंगे तो दर्शक फिल्म को ठुकरा देगा। यही कारण है कि एक तो फिल्म को बहुत कम शो हासिल हुए और जितने भी हुए उनमें दर्शकों की संख्या बस खाने में नमक के बराबर ही थी। इतनी भी जटिल और अबूझ फिल्म बनाने का क्या मतलब है कि दर्शक सोचता ही रह जाए कि यह पर्दे पर चल क्या रहा है। पूरी फिल्म में एक-दो नहीं ऐसी सात आठ घटनाएं हैं जिनका कोई सिर-पैर ही नहीं है। इंटरवल तक तो फिल्म पकड़ में ही नहीं आती। इंटरवल के बाद तब थोड़ी राहत मिलती है जब अहसास होता है कि चलो फिल्म पटरी पर तो आई। उससे पहले तो बिना कोई राह पकड़े जिस तिस दिशा में फिल्म ऐसे आती जाती है कि सिर घूमने लगता है। कला के नाम पर पैसों के साथ ऐसे क्रूर मजाक नहीं किए जाने चाहिए। सिनेमा में अभय देओल ने अपना एक अलग रास्ता पकड़ कर एक अलग इमेज बनायी है। लेकिन इस तरह की फिल्में अगर उन्होंने जारी रखीं तो शायद उनका नसीब उनके लिए गुमनामी बुन देगा। इस फिल्म में उनका अभिनय भी उनके किरदार की तरह बोरिंग और अझेल है।
फिल्म में अभय देओल और प्रीति देसाई की दो अलग कहानियां एक साथ खुलती हैं लेकिन यह तथ्य दर्शकों के सामने इंटरवल के बाद खुलता है। दो घंटे उन्नीस मिनट की फिल्म के तीस मिनट केवल ‘डांस वार‘ नामक रियलिटी शो में बीत जाते हैं। अभय देओल को उसकी प्रेमिका ने छोड़ दिया है और प्रीति देसाई को उसके पिता ने। पिता ने दरअसल अपनी पत्नी को छोड़ा था और प्रीति ने पिता के बजाए मां के साथ रहने को प्राथमिकता दी। इन दोनों अलगावों के कारणों को न जस्टीफाई किया गया न ही स्थापित। प्रेमिका के बिछोह के कारण अभय देओल का जीवन असंतुलित और असहज हो गया है लेकिन जब प्रेमिका उसके जीवन में फिर से लौटने की पेशकश करती है तो अभय इस प्रस्ताव को ठुकरा देता है। दूसरी तरफ प्रीति के जीवन में उसका लंदन निवासी पिता वापस लौटता है और उसे लंदन में डांस अकेडमी खोलने का प्रस्ताव देता है। प्रीति यह प्रस्ताव ठुकरा देती है क्योंकि उसे मां को नहीं छोड़ना है। मां दिन-रात शराब पीकर पड़ी रहती है। प्रीति डांस शो में विनर के पायदान तक पहुंचती है लेकिन इस घोषणा से पहले कार्यक्रम से गायब हो जाती है। इसका भी कोई कारण नहीं दिखाया गया है। फिल्म के अंत में एक भद्दे और बेहूदे टॉयलेट सीन के बाद प्रीति अभय को अपनी मां से मिलवाती है और स्क्रीन पर टाइटल उभरने लगते हैं। दी एंड।

निर्देशक:     देविका भगत
कलाकार:     अभय देओल, प्रीति देसाई, रति अग्निहोत्री, दर्शन जरीवाला, स्मिता जयकर
संगीत:       शंकर-अहसान-लॉय



Monday, January 27, 2014

जय हो

फिल्म समीक्षा

सलमान का नया करिश्मा ‘जय हो‘

धीरेन्द्र अस्थाना

यह जानते हुए भी कि पर्दे पर सचमुच का जीवन नहीं बल्कि एक काल्पनिक फिल्म चल रही है, दर्शक सलमान खान के एंट्री लेते ही चीखने चिल्लाने और सीटियां बजाने लगते हैं। फिल्मों में सलमान की एंट्री होती भी बड़े नाटकीय तरीके से है। जैसा कि होता है सलमान की नयी फिल्म भी एक करिश्मा है। दर्शकों का क्रेज देख लगता है कि अभी कुछ वर्षों तक सलमान का जादू छाया रहेगा। ‘वांटेड‘ और ‘दबंग‘ की ही श्रृंखला में ‘जय हो‘ भी एक कड़ी है लेकिन कुछ अलग अंदाज, नये तेवर और संदेशपरक फंडे के साथ। इस बार सलमान आम आदमी की खातिर गुंडों की तोड़ा ताड़ी कर रहे हैं। ऐसे गुंडे जिन्हें राजनैतिक संरक्षण मिला हुआ है। फिल्म में उनका नारा है -‘आम आदमी सोता हुआ शेर है। उंगली मत करो वरना सब चीर फाड़ देगा।‘ उनका संदेश है - थैंक्यू मत बोलो। किन्हीं तीन लोगों की मदद करो। उन तीन लोगों से बोलो कि वे अगले तीन तीन लोगों की मदद करें। इससे जो चेन बनेगी वो करोड़ों लोगों की होगी। संदेशपरक होने के बावजूद फिल्म पूरी तरह कमर्शियल मसालों से भरी हुई है मगर इन मसालों से एसीडिटी नहीं होती। राहत मिलती है कि एक पूरी तरह मनोरंजक और इमोशनल फिल्म देखने को मिली। फिल्म की एक उल्लेखनीय बात यह है कि इसमें सलमान बहुत सारे गुम हो चुके कलाकारों को लाए हैं। यह एक तरह से उन गुम कलाकारों के करिअर का चमकदार अवतार है। सलमान की फिल्म आम तौर पर केवल सलमान की फिल्म होती है लेकिन ‘जय हो‘ में बहुत सारे लोगों को अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिला है। फिल्म में नादिरा बब्बर, तब्बू, मुकुल देव, डैनी, रेशम टिपणिस, अश्मित पटेल, यश टोंक, सना खान, मोहनीश बहल, आदित्य पंचोली, शरद कपूर, नौहीद आदि को काम करता देख सलमान की उदारता और साथी भाव पर दुलार उमड़ता है। लेकिन भरपूर मौका मिलने के बावजूद सलमान के अपोजिट अभिनेत्री डेजी शाह ने खुद को प्रमाणित नहीं किया। दरअसल सलमान के अपोजिट कोई आक्रामक तेवरों वाली हीरोईन ही जंचती है। जैसे कैटरीना कैफ, करीना कपूर और सोनाक्षी सिन्हा आदि। सुनील शेट्टी आर्मी ऑफीसर के किरदार में अपनी छाप छोड़ते हैं तो ऑटो वाले के रूप में महेश मांजरेकर और क्रूर गृहमंत्री के किरदार में डैनी डेनजोंग्पा याद रह जाते हैं। फिल्म के तीन गाने सुपरहिट रहेंगे। इतनी मारधाड़ वाली फिल्म में गुजराती तड़के वाली कॉमेडी ‘रिलीफ‘ लेकर आती है। सोहेल खान ने एक पल के लिए भी निर्देशन पर अपनी पकड़ ढीली नहीं पड़ने दी है। वर्ष की पहली सुंदर, सार्थक और मनोरंजक फिल्म। अवश्य देखें। 

निर्देशक: सोहेल खान
कलाकार: सलमान खान, तब्बू, डैनी, जेनेलिया डीसूजा, डेजी शाह, सुनील शेट्टी आदि। 

संगीत: साजिद-वाजिद

Monday, January 20, 2014

कर ले प्यार कर ले

फिल्म समीक्षा

कर ले प्यार कर ले

ऐसी पिक्चर का क्या करें

धीरेन्द्र अस्थाना

            बड़े फिल्म निर्माता की संतान होने का एक फायदा यह हो जाता है कि सिनेमा में संघर्ष आसान हो जाता है। लेकिन यह कतई जरूरी नहीं है कि बड़े अभिनेता, निर्माता या लेखक का बेटा भी वही बने जो उसका पिता है। समझदार लोग संतान मोह में नहीं फंसते। वह अपनी संतानों के लिए उनकी प्रतिभा, परिश्रम और व्यक्तित्व के अनुरूप उनके करिअर का चुनाव करते-करवाते हैं। लेकिन कुछ लोग संतान मोह में फंस कर संतान को अभिनेता या अभिनेत्री बनाने के लिए फिल्म लांच कर देते हैं। निर्माता सुनील दर्शन ने भी यही किया है। बेटे को लेकर एक एक्शन लव स्टोरी ‘कर ले प्यार कर ले‘ बना डाली। कुल फिल्म का हासिल शून्य है। फिल्म में अगर किसी के काम की तारीफ की जा सकती है तो हीरोईन की मां अमनदीप कौर और विलेन के बेटे अहम शर्मा की। एक-दो लोगों को छोड़ कर फिल्म के सभी कलाकार नये हैं लेकिन उन्होंने ठीक-ठाक काम करने की पूरी कोशिश की है। फिल्म के हीरो शिव दर्शन और हीरोईन हसलीन कौर के भीतर ‘एक्टिंग मैटीरियल‘ है ही नहीं। जिम जा कर बॉडी बना लेने से एक्टर बन जाने वाले दिन अब लद गये। अब एक्टर बनने के लिए अभिनय का ज्ञान होना भी लाजिमी है। यह बात सुनील दर्शन के बेटे शिव दर्शन को समझनी होगी। बेहतर होगा कि वह कुछ समय का गैप लेकर अभिनय की बारीकियों को समझें। सलमान, शाहरुख, आमिर के अभिनय को गौर से देखें। और उसके बाद पूरी तैयारी से दूसरी पारी में उतरें। पहली पारी में तो दर्शकों ने उन्हें सिरे से नकार दिया है। फिल्म आलोचकों की नजर में ही नहीं बॉक्स ऑफिस पर भी औंधे मुंह गिर पड़ी है। गलती सुनील दर्शन की नहीं है। वह पैसा लगा सकते थे, लगाया लेकिन उनका चुनाव गड़बड़ा गया। उन्होंने निर्देशक भी ऐसा चुना जो फिल्म को संभाल ही नहीं पाया। पटकथा लेखकों ने केवल ‘पट‘ रहने दिया और ‘कथा‘ को नष्ट कर दिया। एक बेहद थकी हुई पटकथा में तो नसीरुद्दीन शाह जैसे कलाकार भी कोई करिश्मा नहीं कर सकते। यहां तो कलाकार भी नौसिखिये थे। नये खलनायक रूमी खान ने प्रख्यात खलनायक प्रकाश राज को कॉपी करने की काफी कोशिश की है मगर उनकी आवाज में वह दम नहीं है जिसके लिए प्रकाश राज जाने जाते हैं। फिल्म का जो उदास गाना बेहद पॉपुलर चल रहा है उसका फिल्मांकन बेहद अनर्गल है और गायिकी फटे बांस जैसी है। फिल्म देखने का एक भी कारण फिल्म में मौजूद नहीं है। बेहतर है कि इस हफ्ते के फिल्मी बजट की चाट खा लें। 

निर्देशक:          राजेश पांडे
कलाकार:         शिव दर्शन, हसलीन कौर, अहमद शर्मा, अमनदीप कौर, रूमी खान, महेश ठाकुर
सगीत:            रेयान अमीन, राशिद खान आदि।





Monday, January 13, 2014

डेढ़ इश्किया

फिल्म समीक्षा

लंपट ठगों का मोहब्बतनामा

डेढ़ इश्किया

धीरेन्द्र अस्थाना

अपने एक साक्षात्कार में नसीरुद्दीन शाह ने कहा है - डेढ़ इश्किया इश्किया से ज्यादा बेहतर फिल्म है। फिल्म देख कर निकले तो मानना पड़ा कि नसीर की बात में दम है। दोनों फिल्मों की कहानी अलग है। मगर ‘डेढ़ इश्किया‘ को बड़े पर्दे पर उतारने का अंदाज निराला है। एक बात और रेखांकित कर दें कि अरशद वारसी के जिस किरदार को सबसे जुदा और बेमिसाल माना जाता है वह है सरकिट का किरदार, फिल्म मुन्ना भाई एमबीबीएस में। उसी कड़ी में ‘डेढ़ इश्किया‘ का बब्बन भी खड़ा हुआ है। निर्देशक अभिषेक चौबे ने इस फिल्म में अरशद को एक अनूठे, दिलचस्प और जमीन से जुड़े चरित्र के तौर पर पेश किया है। बब्बन एक लंपट सर्वहारा है। मोहब्बत उसके भीतर एक जुनूनी इबादत भर देती है। वह ठग और बदमाश होने के बावजूद मोहब्बत के पवित्र आलोक से भर उठता है। चोरी उसका पेशा था तो हुमा कुरैशी उसका मकसद है। फिल्म में हुमा कुरैशी ने भी जान लगा दी है। इस अभिनेत्री ने बहुत जल्दी खुद को साबित कर दिया है। अब हम इसे भविष्य की उम्मीद के तमगे से नवाज सकते हैं। माधुरी दीक्षित और नसीर तो मंजे हुए, तपे हुए कलाकार हैं। यहां उनके अभिनय का एक नया ही आयाम देखने को मिलता है। यूं तो नसीर का चरित्र भी एक लंपट ठग का ही है लेकिन उनके किरदार को निर्देशक ने थोड़ी पाकीजगी और थोड़ी रूमानियत भी बख्शी है। वह चोर हैं लेकिन इस बार वह मोहब्बत में गिरफ्तार एक शायर के अवतार में हैं। जो बात शुरू में बतानी चाहिए थी वह अब बता रहे हैं कि यह फिल्म आम आदमी के लिए नहीं है। इस फिल्म को देखने के लिए दिमाग को घर पर छोड़ कर नहीं आना है बल्कि साथ लेकर आना है। यह मनोरंजक नहीं मेधावी फिल्म है जिसे ठीक से समझ कर ही इसका लुत्फ उठाया जा सकता है। 30 नवंबर 2007 को रिलीज माधुरी दीक्षित की फिल्म ‘आजा नच ले‘ को माधुरी की कमबैक फिल्म कहा गया था जो वह फ्लॉप होने के कारण सिद्ध नहीं हो सकी थी। लेकिन ‘डेढ़ इश्किया‘ को हम पूरे विश्वास के साथ माधुरी की वापसी फिल्म कह सकते हैं। इस वापसी पर ठप्पा लगाने आ रही है उनकी एक और फिल्म ‘गुलाब गैंग‘ जिसमें माधुरी का एक अलग ही रूप नजर आने वाला है। ‘डेढ़ इश्किया‘ ढाई घंटे की फिल्म है। इसे बहुत आसानी से पूरे दो घंटे की किया जा सकता था। तब शायद यह आम पब्लिक को भी हजम हो जाती। चोरी, ठगी, मोहब्बत, प्रतिशोध, शायरी, एक्शन और मारधाड़ से भरपूर इस फिल्म में शायराना इश्क का चेप्टर कुछ ज्यादा लंबा हो गया है। इसे छोटा किया जा सकता था। फिल्म के अंत में इस फिल्म का सीक्वेल बनाने की गुंजाईश को खुला रखा गया है। पैसा वसूल तो माधुरी दीक्षित के डांस से ही हो जाता है। बाकी सब तो बोनस है। फिल्म का गीत-संगीत भी उम्दा और यादगार है। 

निर्देशक: अभिषेक चौबे
कलाकार: नसीरुद्दीन शाह, माधुरी दीक्षित, अरशद वारसी, हुमा कुरैशी, विजय राज
संगीत: विशाल भारद्वाज
गीत: गुलजार 



Monday, January 6, 2014

मिस्टर जो. बी. करवाल्हो

फिल्म समीक्षा

मिस्टर जो. बी. करवाल्हो

ऐसे भी तो संभव है बुरा सिनेमा

धीरेन्द्र अस्थाना

            थियेटर में घुसने से पहले यह अंदाजा तो था कि ‘मिस्टर जो. बी. करवाल्हो‘ एक साधारण फिल्म होगी। लेकिन यह भरोसा भी था कि फिल्म में अरशद वारसी, सोहा अली खान, जावेद जाफरी, विजय राज, वीरेन्द्र सक्सेना और शक्ति कपूर जैसे जांचे-परखे अभिनेता काम कर रहे हैैं तो फिल्म का टाइमपास होना लाजिमी है। मगर यह क्या? इस भरोसे का तो कत्ल हो गया। यहां तो सारे कलाकार इस तरह बर्ताव कर रहे थे कि पैसे के लिए जो भी करवा लो। यह अंदाजा बिल्कुल नहीं था कि साल की शुरुआत में साल की सबसे बुरी फिल्म से पाला पड़ जाएगा। स्टार देने का नियम है इसलिए खराब फिल्म वाला एक स्टार दिया है वरना असल में तो यह एक स्टारलेस मूवी है जिसने खराब फिल्म का वर्ल्ड रिकॉर्ड अपने नाम पर कर लिया है। फिल्म देखने के बाद यह पड़ताल जरूरी थी कि क्यों बॉलीवुड में अनुराग कश्यप की अदभुत फिल्म ‘ब्लैक फ्रायडे‘ को पूरे आठ साल तक प्रोड्यूसर और थियेटर नहीं मिले और क्यों इस फिल्म को देश भर में इतने सारे थियेटर मिल गये? पता चला, मामला इमोशनल अत्याचार का है। फिल्म के प्रोड्यूसर भोलाराम मालवीय अमिनेता अरशद वारसी के लंबे समय से सेक्रेट्री हैं। अब सेक्रेट्री निर्माता बनेगा तो रिश्ते के इमोशन में फंसना ही होगा न। बेचारे अरशद वारसी भी हो गये इमोशनल अत्याचार के शिकार। इन्हीं अरशद वारसी की अगले शुक्रवार ‘डेढ़ इश्किया‘ जैसी अजब-गजब फिल्म प्रदर्शित होने जा रही है। अनुमान लगाया जा सकता है कि फिल्म के बाकी कलाकारों ने भी किसी न किसी इमोशनल ब्लैकमेल के तहत फिल्म की होगी। वरना यूं ही कोई घटिया सिनेमा में नहीं उतर जाता। फिल्म देखने का कोई कारण नहीं है इसलिए इस हफ्ते की फिल्म के टिकट के पैसों का खाने-पीने में सदुपयोग कर लें तो ज्यादा बेहतर होगा। रिवाज है इसलिए कुछ तो फिल्म के बारे में भी बताना ही होगा। फिल्म को कॉमेडी जोनर की बताया गया है मगर यह ऐसी कॉमेडी है जिस पर रोना ही आ सकता है। अरशद वारसी एक प्राइवेट जासूस है जिसे घर से भागी, एक अमीर सौतेले बाप की बेटी का प्रेम विवाह रुकवाने का महंगी फीस वाला केस मिलता है। जावेद जाफरी एक इंटरनेशनल हत्यारा है जिसे पकड़ने के लिए सोहा अली खान को तैनात किया जाता है। सोहा एक पुलिस अधिकारी है जो बचपन से अरशद से प्यार करती आयी है मगर अरशद को ही इंटरनेशनल किलर समझ उससे नफरत करने लगी है। परंपरा के अनुसार फिल्म की हैप्पी एंडिंग हो जाती है और खलनायक नदारद हो जाते हैं।
निर्देशक:      समीर तिवारी
कलाकार:     अरशद वारसी, जावेद जाफरी, सोहा अली खान, विजय राज, शक्ति कपूर, वीरेन्द्र सक्सेना

संगीत:             अमर्त्य राहत