Saturday, October 31, 2009

लंडन ड्रीम्स

फिल्म समीक्षा

लंदन जो एक ड्रीम है।

धीरेन्द्र अस्थाना

विषय पुराना हो तो भी उसे नये तथा आकर्षक अंदाज में कैसे बयान किया जाए, यह कला निर्देशक विपुल शाह को बखूबी आती है। अपनी नयी फिल्म ‘लंडन ड्रीम्स‘ में उन्होंने अपनी इस कला का बेहतरीन नमूना पेश किया है। दो दोस्तों की बचपन की मोहब्बत, उनकी प्रतिभाओं का टकराव, अभिमान की गांठ, पश्चाताप की आग और फिर मेल-मिलाप। इस पचासों बार कही गयी कहानी को विपुल शाह ने ‘लंडन ड्रीम्स‘ में थोड़ा अलग ढंग से कहा है। संगीत की पृष्ठभूमि पर प्रतिभाओं के टकराव तथा दोस्ती के द्वंद्व को विपुल ने भव्य और प्रभावशाली तरीके से रचा है। एक गंभीर यात्रा के बीच में रह-रह कर पड़ता पंजाब का तड़का फिल्म को रोचक बनाये रखता है। सलमान खान ने पंजाबी मुंडे के बिंदास तथा बेलौस चरित्र में मानो खुद को ही उतार दिया है। इसीलिए उनका किरदार जीवंत होने के साथ-साथ विश्वसनीय भी लगता है। ‘गजनी‘ के बाद असिन ने भी मौका गंवाया नहीं है। अपने किरदार के उतार-चढ़ाव को उन्होंने पूरी प्रतिभा और निष्ठा से निभाया है। अजय देवगन का चरित्र संजीदा है जो उनके मूल व्यक्तित्व से मेल भी खाता है। पता नहीं क्यों अजय देवगन कॉमेडी के बजाय गंभीर चरित्रों को ज्यादा सहज और प्रभावी ढंग से निभाते नजर आते हैं। संगीत के स्तर पर भी फिल्म प्रभावित करती है। संगीत की पृष्ठभूमि पर आधारित फिल्म का संगीत तो सबसे पहले प्राणवाण होना चाहिए, जो कि है। प्रसून जोशी के गीतों में न सिर्फ ताजगी है बल्कि वे सार्थक और अर्थपूर्ण भी हैं। बहुत दिनों के बाद मुख्यधारा की कोई फिल्म अपनी संपूर्णता में अच्छी बनी है। एक साफ-सुथरा मनोरंजन पसंद करने वालों को फिल्म पसंद आएगी। स्पष्ट कर दें कि ‘लंडन ड्रीम्स‘ अर्थपूर्ण सिनेमा वाली कतार के बाहर खड़ी फिल्म है। युवा दर्शकों को आकर्षित करने के कई मसाले फिल्म में मौजूद हैं। शायद इसीलिए युवाओं का बड़ा प्रतिशत यह फिल्म देख रहा है। ‘वांटेड‘ के बाद सलमान खान को एक बार फिर सफलता का स्वाद चखने को मिला है। पंजाब और लंदन का कोलाज विपुल शाह का ‘ट्रेड मार्क‘ बनता जा रहा है।

निर्देशक: विपुल शाह
कलाकार: अजय देवगन, सलमान खान, असिन, ओम पुरी
गीत: प्रसून जोशी
संगीत: शंकर-अहसान-लॉस

Saturday, October 10, 2009

एसिड फैक्ट्री

फिल्म समीक्षा

भव्य लेकिन निस्तेज ‘एसिड फैक्ट्री‘

धीरेन्द्र अस्थाना

निर्माता संजय गुप्ता की लंबे समय से मीडिया में छायी हुई फिल्म ‘एसिड फैक्ट्री‘ दर्शक जुटाने में कामयाब नहीं हो सकी। संजय गुप्ता की फिल्में बहुत खर्चीली, भव्य, चकाचैंध में डूबी और तेज गति की होती हैं। यह भी वैसी ही फिल्म है। इस कदर ‘एक्शन पेक्ड‘ की कहानी के बारे में सोचने की मोहलत भी न मिले। इस फिल्म से दीया मिर्जा भी स्टंट कर सकने वाली हीरोईनों में शुमार हो गयी हैं। लेकिन फिल्म के अंत में उनका विलेन का किरदार स्थापित हुआ है जो बतौर हीरोईन उन्हें नुकसान पहुंचा सकता है।
फिल्म में एक साधारण सी कहानी यह है कि फरदीन खान, मनोज बाजपेयी, दीनो मोरिया, आफताब शिवदासानी, डैनी डेनजोंग्पा और दीया मिर्जा एक फैक्ट्री में बेहोश पड़े हैं। सबसे पहले फरदीन खान को होश आता है फिर एक-एक कर बाकी सब को। ये लोग एक ‘एसिड फैक्ट्री‘ में बंद हैं। तमाम लोगों की याद्दाश्त चली गयी है। सब एक-दूसरे पर शक कर रहे हैं। बीच-बीच में एक फोन आता है जो इरफान खान का है। उस फोन से पता चलता है कि फैक्ट्री में बंद कुछ लोग इरफान खान के बंदे हैं और दो लोग बंधक हैं। उनमें से एक बंधक बिजनेसमैन सार्थक है जिसकी पत्नी से तीस मिलियन डाॅलर वसूल कर इरफान खान फैक्ट्री की तरफ आ रहा है। पुलिस उसके पीछे है। पुलिस के साथ इरफान खान की लोमहर्षक मुठभेड़ है जिसमें कई दर्जन कारों को तोड़ा फोड़ा गया है। इधर फैक्ट्री के भीतर एक घटनाक्रम के तहत सबको क्रमशः याद आता है कि वह कौन है और कैसे बेहोश हुआ था। सिर्फ फरदीन खान है जो पुलिस आॅफीसर है। वह इरफान खान का नेटवर्क तोड़ने के लिए उसके गैंग में शामिल हुआ था। लेकिन यह बात फैक्ट्री में बंद किसी भी अपराधी को पता नहीं। इस बीच पुलिस को झांसा देकर इरफान खान ‘एसिड फैक्ट्री‘ में आ पहुंचता है। वह घोषणा करता है कि हममें से कोई पुलिस का आदमी है। थोड़ी बहुत नाटकीयता के बाद खुलासा हो जाता है कि फरदीन खान ही पुलिस अधिकारी है। भयानक मारधाड़ चलती है। फरदीन एसिड सिलेंडरों को गोलियों से उड़ा कर बाहर भाग जाता है। दमघोंटू गैस के फैलने से अपराधी फिर बेहोश हो जाते हैं। तभी पुलिस आ जाती है और पिक्चर का ‘दी एंड‘ हो जाता है। सार्थक और उसकी पत्नी का पुनर्मिलन हो जाता है। दीया मिर्जा समेत बाकी सबको पुलिस पकड़ कर ले जाती है। फिल्म ‘सत्या‘ के बाद पहली बार मनोज वाजपेयी ने बहुत दमदार और यादगार अभिनय किया है। गीत-संगीत साधारण है तो सिनेमेटोग्राफी अद्भुत है।

निर्माता: संजय गुप्ता
निर्देशक: सुपर्ण वर्मा
कलाकार: फरदीन खान, इरफान खान, मनोज वाजपेयी, दीनो मोरिया, आफताब शिवदासानी, डैनी डेनजोंग्पा, दीया मिर्जा
संगीत: शमीर टंडन, रंजीत बारोट, मानसी, बप्पा लाहिरी

Saturday, October 3, 2009

डू नॉट डिस्टर्ब

फिल्म समीक्षा

डेविड धवन ने कुनबा जोड़ा

धीरेन्द्र अस्थाना

बड़ी पुरानी कहावत है - कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा, भानुमति ने कुनबा जोड़ा। वशु भगनानी जैसे बड़े निर्माता की महंगी फिल्म ‘डू नॉट डिस्टर्ब‘ में निर्देशक डेविड धवन ने भी यही किया है। मुख्य धारा सिनेमा के कुछ लोग मानते हैं कि कॉमेडी एक ऐसा नुस्खा है जो बॉक्स ऑफिस पर कभी फ्लॉप नहीं होता है। बात कुछ हद तक सही भी है। इस भागमभाग, मारकाट, दुख-संताप और गले गले तक गम में डूबी दुनिया का कौन सा ऐसा नागरिक है जो यह कहेगा कि साहब, मैं हंसना नहीं चाहता। जन मानस की इसी कमजोरी को भांप कर कॉमेडी किंग डेविड धवन ने फिर एक माइंडलेस कॉमेडी बनायी है। अगर आपकी दिलचस्पी सिर्फ हंसने-हंसाने में है और सिनेमा का काम आप सिर्फ मनोरंजन करना मानते हैं तो फिल्म को देख आइए। प्रदर्शन के पहले दिन की रिपोर्ट कहती है कि गोविंदा-सुष्मिता-लारा-रितेश देशमुख अभिनीत इस फिल्म को देखने हजारों दर्शक पहुंचे।
यकीनन फिल्म में हंसने हंसाने की कई जबर्दस्त स्थितियां पैदा की गयी हैं। भंगिमाओं से भी, संवादों से भी और सिचुएशंस से भी। कहानी बड़ी साधारण सी है। सुष्मिता सेन एक करोड़पति बिजनेस वुमेन है। गोविंदा उसका पति है जिसे बार बार सुष्मिता यह अहसास दिलाती रहती है कि गोविंदा उसकी कंपनी का कर्मचारी है। लारा दत्ता गोविंदा की गर्लफ्रेंड है जबकि सोहेल खान लारा का सच्चा आशिक है।
सुष्मिता सेन को शक है कि गोविंदा का टांका कहीं और भिड़ा हुआ है। वह प्राइवेट डिटेक्टिव रणवीर शोरी को गोविंदा की जासूसी के लिए तैनात करती है। इधर गोविंदा एक गरीब लेकिन ऐशो आराम पसंद युवक रितेश देशमुख को खरीद कर उसे लारा दत्ता का नकली आशिक बना देता है ताकि प्राइवेट जासूस नाकाम रहे। इस स्थूल सी कहानी के इर्द-गिर्द कुछ उपकथाएं और स्थितियां निर्मित कर पूरी फिल्म बनायी गयी है। गोविंदा हंसाने में माहिर माने जाते हैं। माहिर हैं भी। लेकिन उन्हें अपना वजन कम करना चाहिए। वह काफी थुलथुल नजर आने लगे हैं। सुष्मिता सेन भी मोटी दिखती हैं। हालांकि अदाकारा वह अच्छी हैं। लारा दत्ता और रितेश देशमुख ने भी दर्शकों को हंसाने की भरपूर कोशिश की है। राजपाल यादव तो मूलतः हास्य कलाकार ही हैं। रणवीर शोरी को कॉमेडी नहीं करनी चाहिए। वह उनके बस की बात नहीं है। वह एक संजीदा कलाकार हैं। उन्हें के के मेनन की तरह गंभीर भूमिकाएं ही करनी चाहिए। कॉमेडी और गंभीर अभिनय के बीच का असमंजस उनकी बॉडी लैंग्वेज से साफ पता चलता है। फिल्म के दस गायकों ने मिल कर भी एक गाना ऐसा नहीं गाया जिसे गुनगुनाया जा सके। गीत-संगीत एकदम औसत है। हां, फिल्म की कुछ लोकेशंस आकर्षक हैं।

निर्माता: वशु भगनानी
निर्देशक: डेविड धवन
कलाकार: गोविंदा, सुष्मिता सेन, रितेश देशमुख, लारा दत्ता, सोहेल खान, राजपाल यादव
गीतकार: समीर

Saturday, September 26, 2009

व्हाट्स योर राशि

फिल्म समीक्षा

बारह कहानियों की एक राशि
धीरेन्द्र अस्थाना

आशुतोष गोवारीकर आम तौर पर लंबी फिल्में ही बनाते हैं लेकिन 'व्हाट्स योर राशि' बना कर तो उन्होंने अपना ही रिकॉर्ड तोड़ दिया है। दो घंटे का सिनेमा वाले आज के समय में पौने चार घंटे की फिल्म ... 'मेरा नाम जोकर' की याद आ गयी जो चार घंटे और दो इंटरवल वाली फिल्म थी। फिल्म की एक मात्र विषता प्रियंका चोपड़ा हैं जिन्होंने बारह राशि के बारह विभिन्न किरदारों को अंजाम देने के मामले में यह विश्व रिकॉर्ड है। इससे पहले संख्या और गुणवत्ता के संदर्भ में सिर्फ संजीव कुमार को याद किया जाता है जिन्होंने फिल्म 'नया दिन नयी रात' में नौ चरि़त्र निभाये थे।

प्रियंका के कम से कम दो चरित्र ऑफ बीट हैं। एक सबसे पहला, लगभग गंवई लड़की का। दूसरा एक नाबालिग किशोरी का जो पढ़ना चाहती है लेकिन जिसका पिता पंद्रह साल की छोटी सी उम्र में ही उसका ब्याह रचा देना चाहता है। बारह राशियों की बारह कहानियां हैं जिन पर पूरे विस्तार के साथ बारह राशियों की बारह कहानियां हैं जिन पर पूरे विस्तार के साथ बारह फिल्में बनायी जा सकती थीं। निर्देशक ने बारह जिंदगियों से जुड़ी दास्तानों को एक ही फिल्म में पिरो दिया है। फिल्म तो लंबी बनी ही थी। लंबाई के ही डर से प्रत्येक कहानी को स्पर्श भर किया गया है। कुछ राशियों से जुड़ी प्रियंका के चरित्र, जीवन संघर्ष, स्वप्नों और संवेदना को गहराई और विस्तार से बुना जा सकता था। प्रियंका ने साबित किया है कि वह एक बहुआयामी और बहुमुखी प्रतिभा की धनी अदाकारा हैं। प्रियंका के जीवंत अभिनय के सामने हरमन बावेजा अशक्त नजर आते हैं। फिल्म में प्रियंका के अपोजिट सैफ अली खान होते या ऋतिक रोशन तो फिल्म में जान आ जाती। आशुतोष गोवारीकर को इस बात की बधाई देनी चाहिए कि इतनी लंबी फिल्म को कहानी, संपादन, बुनावट, दृश्यांकन आदि के विभिन्न स्तरों पर उन्होंने इतनी कुशलता से साधे रखा। आश्चर्य कि दर्शन फिल्म को बीच में छोड़ कर नहीं भागे।

कहानी के स्तर पर फिल्म में नयापन यह है कि हरमन बावेजा को दस दिन में शादी करनी है। उसके वैवाहिक विज्ञापन के जवाब में 176 लड़कियों ने आवेदन किया है इसिलए वह प्रत्येक राशि की एक लड़की से मिलना तय करता है। ये बारह मुलाकातें ही फिल्म की रोचकता को बनाए रखती हैं। फिल्म में राजेश विवेक की जासूसी वाला प्रसंग एकदम निरर्थक और उबाउ है। फिल्म का संगीत भी बहुत थका- थका और प्राचीन है। तो भी एक बार देखने लायक फिल्त तो है।
निर्देशक - आशुतोष गोवारीकर
कलाकार - हरमन बावेजा, प्रियंका चोपड़ा, दर्शन जरीवाला 'इनके कारण फिल्म गतिशील रहती है', अंजन श्रीवास्तव, राजेश विवेक।
गीत - जावेद अख्तर
संगीत - सोहेल खान

Saturday, September 19, 2009

वांटेड

फिल्म समीक्षा

सलमान का नया अवतार: वांटेड

धीरेन्द्र अस्थाना


बहुत दिनों के बाद सिनेमाघरों में दर्शकों का जुनून और भागीदारी देखने को मिली। सहारा वन मोशन पिक्चर्स और बोनी कपूर की संयुक्त फिल्म ‘वांटेड‘ आने वाले दिनों में और ज्यादा भीड़ बटोरेगी। खतरनाक खून खराबे के बीच निर्विकार भाव से घटती सलमान खान-आयशा टकिया की प्रेम कहानी बहुत दिलचस्प और ताजगी भरी है। रोमांस और एक्शन सलमान की प्रिय अभिव्यक्तियां हैं लेकिन ‘वांटेड‘ में ये दोनों अभिव्यक्तियां शिखर पर हैं। तीन घंटे लंबी फिल्म में एक पल भी ऐसा नहीं आता कि बोरियत का अहसास हो। पूरी तरह एक्शन पैक्ड फिल्म है। फिल्म के निर्देशक प्रभु देवा हैं इसलिए फिल्म में डांस के नये नये आयाम और स्टेप्स भी देखने का सुख जुड़ जाता है। फिल्म का संपादन बहुत स्तरीय और कसावट लिये हुए है। एक भी फ्रेम ढीला-ढाला या अप्रासंगिक नहीं है। इसके लिए संपादक दिलीप देव को बधाई देनी होगी कि इतनी लंबी फिल्म में भी उन्होंने कोई झोल नहीं रहने दिया है। फिल्म का गीत-संगीत भी दिलकश और कर्णप्रिय है। सलमान के खतरनाक स्टंट और फाइट दृश्यों पर दर्शक जिस तरह ताली और सीटी बजा रहे थे वह युवाओं में उनकी लोकप्रियता का प्रतीक है। फिल्म के अंतिम दृश्य में जब अपनी जलती हुई शर्ट उतार कर सलमान अपना दमकता चमकता गठीला जिस्म दिखाते हैं और गुंडों पर कहर बन कर टूटते हैं उस वक्त तो युवाओं का समूह कुर्सियों से खड़ा होकर नाचने लग जाता है।
फिल्म के खुशगवार डांस आइटम में गोविंदा, अनिल कपूर और प्रभु देवा भी डांस के जलवे दिखाते हैं। इससे फिल्म की स्टार वेल्यू बढ़ गयी है। फिल्म में विनोद खन्ना भी अपने सशक्त अंदाज में मौजूद हैं। फिल्म का रहस्य अंत तक बरकरार रहता है। पैसा लेकर किसी का भी बर्बरता पूर्वक मर्डर करने वाले सलमान अंत में देशभक्त पुलिस आॅफीसर निकलते हैं जो अंडरवल्र्ड के खतरनाक गुर्गों का सफाया करने के काम में लगे हैं। विनोद खन्ना उन्हीं के पिता हैं जो इंटरनेशनल डाॅन गनी भाई के हाथों मारे जाते हैं। जाहिर है, अब गनी भाई को सलमान तड़पा तड़पा कर मारते हैं। दक्षिण के प्रसिद्ध कलाकार प्रकाश राज ने माफिया डाॅन के रूप में यादगार और अलहदा किरदार निभाया है। गोविंद नामदेव और महेश मांजरेकर ने अपने पुलिसिया चरित्रों के साथ न्याय किया है। तनाव, मारधाड़, नाच-गाना, मौज-मजा, रोमांस और मस्ती का एक जीवंत गुलदस्ता जैसी है ‘वांटेड‘ जिसे शुद्ध मनोरंजन की दृष्टि से बनाया गया है। अपने उद्देश्य में फिल्म सफल है। लंबे समय बाद आयशा टकिया ने भी कुछ कर दिखाने का प्रयास किया है। फिल्म में कहीं कहीं हास्य के क्षण भी हैं, जो गुदगुदाते हैं और फिल्म में ‘रिलीफ‘ की तरह आते हैं।

निर्माता: सहारा वन मोशन पिक्चर्स - बोनी कपूर
निर्देशक: प्रभु देवा
कलाकार: सलमान खान, आयशा टकिया, महेश मांजरेकर,, प्रकाश राज, विनोद खन्ना, गोविंद नामदेव, असीम मर्चेन्ट, महक चहल
संगीतकार: साजिद-वाजिद

Saturday, September 12, 2009

बाबर

फिल्म समीक्षा

अंडरवर्ल्ड का नया अध्याय: बाबर

धीरेन्द्र अस्थाना

रामगोपाल वर्मा की फिल्म ‘सत्या‘ के बाद अंडरवर्ल्ड की सरजमीन पर फिल्में तो कई आयीं लेकिन वह कोई नया सिनेमाई अहसास नहीं दे पायीं। लंबे समय के बाद अपराध फिल्मों के नक्शे पर ‘बाबर‘ के रूप में एक नया अध्याय दर्ज हुआ है। ऐसी फिल्मों के लिए अब तक मुंबई को ही आदर्श माना जाता था। लेकिन पिछले कुछ समय से अपराध पर मुंबई का दबदबा कमजोर हुआ है। गैंगवार या जुर्म की काली दुनिया के रूप में अब उत्तर भारत पर फोकस किया जा रहा है। ‘बाबर‘ का इलाका भी कानपुर और आसपास है।

‘बाबर‘ का कथानक नया नहीं है लेकिन उसे प्रस्तुत करने का अंदाज ताजगी भरा है। फिल्म का शिल्प बहुत ताकतवर और बुनावट सधी हुई है। पूरी फिल्म एकदम अंत तक दर्शकों को बांधे रखने में सफल है। काफी समय बाद कोई इतनी तेज गति वाली फिल्म देखी है कि सांसों की आवा-जाही का भी ख्याल नहीं आता। फिल्म का शाश्वत संदेश है - जब तक अपराध के कारणों को नष्ट नहीं किया जाएगा तब तक नये नये माफिया सरगना पैदा होते रहेंगे। और कारणों को जड़ से खत्म नहीं किया जा सकता क्योंकि कारण सत्ता के गलियारों और गरीबी के नरक में बजबजा रहे हैं। असमानता से पैदा होता है अपराध। ‘बाबर‘ इसी विमर्श का अत्यंत जीवंत और विश्वसनीय पाठ पेश करती है।

अगर कोई सिनेमाई साजिश नहीं हुई और बाबर बने नवोदित एक्टर सोहम शाह को काम मिलता रहा तो वह लंबी सीढ़ियां चढ़ेगा। लड़के में दम है - लड़ने भिड़ने का भी और भावनाओं को प्रभावी तरीके व्यक्त करने का भी। फिल्म में वह तमाम मसाले हैं जो ऐसी फिल्मों के लिए जरूरी होते हैं। खून-खराबा, मारा-मारी, गाली-गलौज, नाच-गाना, राजनीति, कोर्ट-कचहरी और पुलिस। लेकिन इस सबका बेहद संतुलित कॉकटेल पेश किया है निर्देशक आशू त्रिखा ने। सोहम शाह के अलावा बाकी सब महारथी कलाकार हैं। ओम पुरी, मिथुन चक्रवर्ती, गोविंद नामदेव, टीनू आनंद, शक्ति कपूर, मुकेश तिवारी, सुशांत सिंह। सब मंजे हुए एक्टर हैं। इन सबके प्रभावशाली अभिनय ने भी फिल्म को एक लयात्मक गति देने का काम किया है। उर्वशी शर्मा का ‘आइटम डांस‘ अच्छा है। फिल्म में उसका ‘स्पेस‘ बहुत कम है। फिल्म का ‘मौला मौला‘ वाला गीत कर्णप्रिय और अर्थपूर्ण तो है ही फिल्म में घटती घटनाओं पर टिप्पणी करने की भी भूमिका निभाता है। फिल्म को देख लेना चाहिए, घाटा नहीं होगा।

निर्देशक: आशू त्रिखा
कलाकार: सोहम शाह, मिथुन चक्रवर्ती, ओम पुरी, गोविंद नामदेव, उर्वशी शर्मा, मुकेश तिवारी।
संगीतकार: आनंद राज आनंद

Saturday, September 5, 2009

थ्री

फिल्म समीक्षा

सफल नहीं हुआ ‘थ्री‘ का फंडा

धीरेन्द्र अस्थाना

इतनी खराब फिल्म भी नहीं है कि एक बार भी न देखी जा सके। दर्शक बटोरने के लिए विक्रम भट्ट ने ‘थ्री‘ का न्यूमरोलॉजिकल फंडा भी अपनाया था लेकिन टिकट खिड़की पर यह फंडा सफल नहीं हुआ। तीन पात्रों वाली फिल्म ‘थ्री‘ को अच्छी ओपनिंग नहीं मिल सकी। मल्टीप्लेक्स थियेटरों में किसी भी फिल्म का कोई शो तभी चलाया जाता है जब उसे देखने कम से कम छह दर्शक आएं। सिनेमेक्स, मीरा रोड में ऐन शो के वक्त एक युवा जोड़े के आ जाने से कोरम पूरा हुआ वरना ‘थ्री‘ का तीन बजे का पहला शो रद्द होने वाला था।
फिल्म में एक रहस्यमयी प्रेम कहानी कहने का अच्छा प्रयास किया गया है। फिल्म को बुना भी ढंग से गया है। कहीं कोई अश्लीलता भी नहीं है। फिल्म के संवाद सशक्त हैं जो प्रभावित करते हैं। फिल्म के तीनों पात्रों ने अपने अपने स्तर पर अच्छा अभिनय करने का प्रयत्न किया है। पूरी फिल्म में सस्पेंस भी कायम रहता है। लोकेशंस भी अच्छे हैं। गीत-संगीत भी ठीक-ठाक है। इस सबके बावजूद दर्शक फिल्म देखने नहीं पहुंचे तो इसका एक ही कारण हो सकता है कि फिल्म का सुनियोजित और व्यापक प्रचार नहीं किया गया। एक वजह यह भी रही कि इस बार एक साथ छह फिल्में रिलीज हुईं। दर्शक भ्रमित भी हुए और बंट भी गये।
आरंभ में ऐसा आभास होता है कि ‘थ्री‘ एक विवाहेतर रिश्तों पर बनी आम फिल्म है, जिसे कुछ नये अंदाज में पेश किया जा रहा है। बाद में पता चलता है कि यह प्यार के नाम पर ब्लैकमेलिंग की कहानी है जिसे आशीष चैधरी अंजाम दे रहा है। सबसे अंत में इस रहस्य से पर्दा उठता है कि नौशीन अली की करोड़ों रुपये की कोठी पर कब्जा करने के लिए पति अक्षय कपूर और तथाकथित प्रेमी आशीष चैधरी की संयुक्त साजिश है। मतलब एक स्त्री के साथ दो पुरुषों ने मिल कर ‘इमोशनल अत्याचार‘ किया है। कमीनेपन के इस क्रूर खेल में दोनों पुरुषों को अपने बौद्धिक कौशल से नौशीन परास्त कर देती है। पति नौशीन के हाथों मारा जाता है लेकिन जब आशीष अक्षय को दफना रहा होता है तब पुलिस के हाथों धर लिया जाता है। नौशीन पुलिस को फोन करके बता देती है कि आशीष उसे घायल कर के पति को मारने गया है। इस प्रकार प्यार में घायल औरत अपना इंतकाम ले लेती है और पुनः अपनी पैतृक कोठी में बच्चों को वायलिन सिखाने का काम शुरू कर देती है। इस प्रकार एक क्रूर दुनिया में वह अपना ‘स्पेस‘ बचा लेती है। दोनों पुरुष एक्टरों के मुकाबले नयी नौशीन ने ज्यादा परिपक्व, संवेदनशील और बेहतर अभिनय किया है। एक बार देखी जा सकती है यह फिल्म।
निर्माता: विक्रम भट्ट
निर्देशक: विशाल पंड्या
कलाकार: आशीष चैधरी, नौशीन अली, अक्षय कपूर
संगीत: चिरंतन भट्ट