फिल्म समीक्षा
अद्भुत और अनूठी माई नेम इज खान
धीरेन्द्र अस्थाना
जैसे अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘पा‘ का महत्व उसे देख कर ही समझा जा सकता है ठीक उसी तरह ‘माई नेम इज खान‘ का महत्व समझने के लिए उसे देखना जरूरी है। आम मुंबईकरों ने इस फिल्म को पुलिस के पहरे में टूट कर देखा। खबर है कि मुंबई के जिस भी सिनेमाघर में फिल्म चली वहां पहले दिन का प्रत्येक शो हाउसफुल था। आम जनता के ऐसे लाड़-दुलार की उम्मीद तो शायद फिल्म के निर्देशक करण जौहर और फिल्म के कलाकारों - शाहरुख खान, काजोल, जरीना वहाब को भी नहीं रही होगी। 12 फरवरी को मुंबई में जनता जीत गयी और राजनीति हार गयी।
कुछ भटकावों, विचलन और अतियों को नजरअंदाज कर दें तो ‘माई नेम इज खान‘ एक अनूठे अनुभव की यात्रा पर ले जाती है। फिल्म के केंद्र में रिजवान खान नामक एक युवक है जो एसपर्जर सिंड्रोम नामक बीमारी से पीड़ित है। इस बीमारी के बावजूद यह युवक (शाहरुख खान) अमेरिका जाता है, जहां उसका छोटा भाई जिमी शेरगिल एक कामयाब बिजनेसमैन है। छोटे भाई के ब्यूटी प्रोडक्ट बेच कर शाहरुख अपना जीवन आरंभ करता है और एक तलाकशुदा तथा एक बच्चे की मां काजोल से प्यार करने लगता है। शाहरुख की मासूमियत, सच्चाई और अपने बेटे के प्रति उसके प्यार को देख काजोल भी शाहरुख को चाहने लगती है और दोनों विवाह कर लेते हैं। इसके बाद घटता है वह हादसा जिसने अमेरिका ही नहीं पूरी दुनिया के भाईचारे और अमन चैन की बुनियाद ही तहस नहस कर दी। अमेरिका के वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर हुए आतंकवादी हमले ने रिश्तों के समीकरण ही गड़बड़ा दिए। एक मजहबी हमले में शाहरुख-काजोल का बेटा मारा गया। काजोल शाहरुख से विमुख हो गयी और शाहरुख के जीवन का एक ही मकसद रह गया - अमेरिकी राष्ट्रपति से मिलना और उनसे कहना ‘मिस्टर प्रेसीडेंट, माई नेम इज खान ऐंड आई एम नॉट ए टेरेरिस्ट।‘
शाहरुख खान, काजोल और जरीना वहाब ने अपने किरदारों को ‘विस्मय‘ में बदल दिया है। तीनों का अभिनय ‘परकाया प्रवेश‘ का जीवंत उदाहरण है। करण जौहर ने कहीं भी अपनी पकड़ कमजोर नहीं पड़ने दी है। शाहरुख खान के रिजवान खान वाले किरदार को महिमा मंडित करने के लिए उन्होंने कुछ ज्यादा ही कसरत कर दी है इसके बावजूद फिल्म बोझिल और अविश्वसनीय नहीं है। यह मनोरंजक नहीं, मकसद वाली फिल्म है और जिस मकसद से यह बनायी गयी, वह कामयाब हो गया है। फिल्म का एकमात्र संदेश है - दुनिया में दो ही तरह के लोग होते हैं। अच्छे लोग और बुरे लोग। फिल्म को अवश्य देखें।
निर्देशक: करण जौहर
कलाकार: शाहरुख खान, काजोल, जरीना वहाब, जिमी शेरगिल, सोनिया जहान, विनय पाठक
संगीत: शंकर-अहसान-लॉय
Saturday, February 13, 2010
Tuesday, February 9, 2010
सिनेमा में भी एक प्रेम रहता है
सिनेमा में भी एक प्रेम ‘रहता‘ है
धीरेन्द्र अस्थाना
वैज्ञानिक और तकनीकी तरक्की के साथ जिंदगी में दबे पांव दाखिल हुए ग्लोबलाइजेशन ने लाइफ स्टाइल के अलावा विचार और संवेदना को भी गहरे स्तर पर प्रभावित किया है। व्यापक जन समुदाय तक पहुंच रखने वाला विराट माध्यम सिनेमा इससे कैसे अप्रभावित रहता? सिनेमा के पास चार-पांच शाश्वत विषय हैं जिनमें ढाई अक्षर का ‘प्रेम‘ सर्वोपरि है। समय बदला, समाज बदला, विचार बदले, सरोकार बदला तो सिनेमा में प्रेम के साथ होने वाला सुलूक और अंदाज भी बदला। राजेन्द्र कुमार-राज कूपर-वैजयंती माला की ‘संगम‘, राजेश खन्ना-शर्मीला टैगोर की ‘अमर प्रेम‘, अमिताभ बच्चन-रेखा की ‘सिलसिला‘, संजीव कुमार-शर्मीला टैगोर की ‘मौसम‘, कमल हासन-श्रीदेवी की ‘सदमा‘ तथा ऋषी कपूर-डिंपल कपाड़िया की ‘बॉबी‘ जैसी प्रेम कहानियां बीते जमाने की मील का पत्थर भर रह गयीं क्योंकि इस बीच सिनेमा का बड़ा दर्शक वर्ग यानी ‘टार्गेट ओडियंस‘ युवा हो गया था। शॉपिंग मॉल्स , कॉरपोरेट कल्चर, मल्टीप्लेक्स, कॉल सेंटर, मोबाइल फोन, इंटरनेट, पब, डांस बार वगैरह वगैरह के आक्रामक लेकिन मखमली अंधेरों में जवान हुई, संख्या की दृष्टि से निर्णायक बन चुकी युवा पीढ़ी सबके निशाने पर आ गयी थी। ‘पल-पल दिल के पास तुम रहती हो‘ जैसे गाने इस पीढ़ी को ‘बोरिंग‘ और हास्यास्पद लग रहे थे और इस लगने में ‘लड़का-लड़की‘ दोनों शामिल थे। मोटर बाइक्स की तूफानी रफ्तार को पसंद करने वाली यह पीढ़ी प्यार में भी रफ्तार और छीन झपट की कायल थी। इसीलिए जब शाहरुख खान को प्यार के लिए विलेन बनने पर राजी करने वाली फिल्म ‘बाजीगर‘ आयी तो युवा दर्शक उस पर टूट पड़ा। यह फिल्म युवाओं के लगभग हिंसक प्रेम को आईना ही नहीं दिखाती थी, उसका समर्थन भी करती थी। फिल्म के सुपर डुपर हिट होने से बॉलीवुड निर्माताओं के दिमाग ठनक गये। वह मान गये कि सिनेमा में जो प्रेम रहता है उसके साथ नये बर्ताव का समय आ पहुंचा है। इस बीच दो परिवर्तन समानांतर हुए। कॉल सेंटरों में मर-खप रही युवा पीढ़ी में प्यार की एक नयी परिभाषा और अभिलाषा ने जन्म लिया। दिन में मिलो, रात में मौज-मस्ती करो, सुबह भूल जाओ। दो-चार बार डेटिंग करो। चार छह रातें बिस्तर पर गुजारो। मन मिले तो साथ रहो। न मिले तो अपना-अपना रास्ता नापो। प्रेम के इस दर्शन को नयी पीढ़ी ने नाम दिया ‘वन नाइट स्टैंड‘ और ‘लिव इन रिलेशनशिप‘। सिनेमा चूंकि बड़े दर्शक समूह का माध्यम है इसलिए वह प्यार के इस दर्शन का तो ताबड़तोड़ प्रदर्शन नहीं कर सका लेकिन उसने प्यार की नयी जमीन पर खड़े होना शुरू कर दिया। पिछले वर्ष 31 जुलाई को रिलीज सैफ अली खान-दीपिका पादुकोन स्टारर हिट फिल्म ‘लव आज कल‘ में तो बाकायदा आज के और बीते समय के प्यार का रोचक लेकिन तुलनात्मक अध्ययन पेश किया गया। इम्तियाज अली द्वारा निर्देशित इस फिल्म में दो युवाओं के प्यार को दो कालखंडों में पेश करके प्रेम की नयी-पुरानी व्याख्या को अंजाम दिया गया। एक सन् पैंसठ की दिल्ली है जिमसें ऋषी कपूर प्रेम करते हैं। एक सन् 2009 का लंदन है जिसमें सैफ-दीपिका का फटाफट प्यार है। इस मोहब्बत के बीच में विलेन बन कर खड़े हैं दोनों के करियर। दोनों सहर्ष अलग होते हैं। दोस्तों को ब्रेकअप पार्टी देते हैं। दोस्त भ्रमित हैं। इस मौके पर बधाई दें या अफसोस प्रकट करें। गिफ्ट क्या दें? ब्रेकअप पार्टी की यह अवधारणा दिलचस्प और अनूठी है। यह ब्रेकअप प्रतिबद्धता से पलायन का दर्शन है। नो डिमांड, नो कमिटमेंट। फिल्म में ऋषी कपूर का जुमला ‘प्यार एक ही बार होता है‘ अंतिम सत्य निकला। लेकिन यह फिल्म का अंतिम सत्य है, समाज का नहीं। ‘लार्जर दैन लाइफ‘ वाले फार्मूले पर टिकी फिल्म इंडस्ट्री में प्यार, प्रेम, इश्क, मोहब्बत को परिभाषित करने का नया जुनून, नयी जिद और नया उन्माद शिखरों पर जा बैठा।
प्रयोगधर्मी फिल्मकार अनुराग कश्यप की फिल्म ‘देव डी‘ ने तो प्यार की रोमानी छवि को ही तहस नहस कर दिया। उन्होंने ‘देवदास‘ की प्रचलित प्रतिमा का विध्वंस कर डाला। अनुराग ने ‘देव डी‘ में एक थीसिस यह दी कि देव ‘नारसिसस‘ है यानी ऐसा शख्स जो संसार में किसी से प्यार नहीं करता। वह सिर्फ खुद से मोहब्बत करता है। यह देवदास पारो के गम में शराब पी कर खून की उल्टियां करने वाला युवक नहीं है। यह एक नया देवदास है जो प्यार में शहीद होने को राजी नहीं है। यह फिल्म चल निकली तो निर्माताओं को लगा कि प्यार की नयी व्याख्या स्वीकार्य है। अब तो वह सिनेमा में रहने वाले पुराने प्रेम की तरफ से पूरी तरह पीठ फेर चुके हैं।
सिनेमा में प्यार की कुछ अलग तस्वीर पेश करने वाली हालिया फिल्मों में हम शाहरुख खान-अनुष्का शर्मा की ‘रब ने बना दी जोड़ी‘ करण जौहर निर्मित ‘दोस्ताना‘, अब्बास टायरवाला निर्देशित इमरान खान-जेनेलिया डिसूजा अभिनीत ‘जाने तू या जाने ना‘, तनूजा चंद्रा की ‘होप ऐंड ए लिटिल शुगर‘, फराह खान निर्देशित ‘ओम शांति ओम‘, संजय लीला भंसाली की ‘सांवरिया‘, आर बालकी की अमिताभ-तब्बू अभिनीत ‘चीनी कम‘, अनुराग बसु निर्देशित ‘मैट्रो‘ और राम गोपाल वर्मा की अमिताभ बच्चन अभिनीत ‘निःशब्द‘ का जिक्र कर सकते हैं। ये सभी फिल्में सिनेमा में बरसों से चले आ रहे प्यार के पुराने फलसफे को नकार कर नया मिजाज, नया मौसम और नया संस्कार रचने के संघर्ष में मुब्तिला हैं।
लेकिन...। और यह लेकिन एक विराट तथा बुनियादी शंका है कि क्या ‘प्यार‘ जैसा दुर्लभ, कीमती और असाधारण अहसास तमाम तकनीकी क्रांतियों के बावजूद अपनी मूल स्थापनाओं को अपदस्थ कर पाया है। शायद नहीं । साहित्य में तो वर्षों पहले कथाकार ममता कालिया ने घोषणा कर दी थी -‘प्यार शब्द घिसते घिसते चपटा हो गया है। हमारी समझ में अब सिर्फ सहवास आता है।‘ लेकिन सामाजिक जीवन में ऐसा हुआ क्या? शायद नहीं हुआ। इसकी तस्दीक करती है अभी अभी रिलीज हुई विशाल भारद्वाज निर्मित अभिषेक चैबे की फिल्म ‘इश्किया‘। इस फिल्म में मामा (नसीरुद्दीन शाह) और भांजा (अरशद वारसी) एक ही लड़की (विद्या बालन) से सच्चा इश्क कर बैठते हैं। इश्क के इस संग्राम में भांजे की जीत होती है और मामा हार जाता है। युवा धड़कनों का यह प्यार ही अप्रतिम और अजेय है। इस प्यार को कोई प्रयोग पराजित नहीं कर सकता। इसलिए सिनेमा हो या जीवन, मोहब्बत जिंदाबाद ही प्यार का इकलौता सच और विमर्श है।
धीरेन्द्र अस्थाना
वैज्ञानिक और तकनीकी तरक्की के साथ जिंदगी में दबे पांव दाखिल हुए ग्लोबलाइजेशन ने लाइफ स्टाइल के अलावा विचार और संवेदना को भी गहरे स्तर पर प्रभावित किया है। व्यापक जन समुदाय तक पहुंच रखने वाला विराट माध्यम सिनेमा इससे कैसे अप्रभावित रहता? सिनेमा के पास चार-पांच शाश्वत विषय हैं जिनमें ढाई अक्षर का ‘प्रेम‘ सर्वोपरि है। समय बदला, समाज बदला, विचार बदले, सरोकार बदला तो सिनेमा में प्रेम के साथ होने वाला सुलूक और अंदाज भी बदला। राजेन्द्र कुमार-राज कूपर-वैजयंती माला की ‘संगम‘, राजेश खन्ना-शर्मीला टैगोर की ‘अमर प्रेम‘, अमिताभ बच्चन-रेखा की ‘सिलसिला‘, संजीव कुमार-शर्मीला टैगोर की ‘मौसम‘, कमल हासन-श्रीदेवी की ‘सदमा‘ तथा ऋषी कपूर-डिंपल कपाड़िया की ‘बॉबी‘ जैसी प्रेम कहानियां बीते जमाने की मील का पत्थर भर रह गयीं क्योंकि इस बीच सिनेमा का बड़ा दर्शक वर्ग यानी ‘टार्गेट ओडियंस‘ युवा हो गया था। शॉपिंग मॉल्स , कॉरपोरेट कल्चर, मल्टीप्लेक्स, कॉल सेंटर, मोबाइल फोन, इंटरनेट, पब, डांस बार वगैरह वगैरह के आक्रामक लेकिन मखमली अंधेरों में जवान हुई, संख्या की दृष्टि से निर्णायक बन चुकी युवा पीढ़ी सबके निशाने पर आ गयी थी। ‘पल-पल दिल के पास तुम रहती हो‘ जैसे गाने इस पीढ़ी को ‘बोरिंग‘ और हास्यास्पद लग रहे थे और इस लगने में ‘लड़का-लड़की‘ दोनों शामिल थे। मोटर बाइक्स की तूफानी रफ्तार को पसंद करने वाली यह पीढ़ी प्यार में भी रफ्तार और छीन झपट की कायल थी। इसीलिए जब शाहरुख खान को प्यार के लिए विलेन बनने पर राजी करने वाली फिल्म ‘बाजीगर‘ आयी तो युवा दर्शक उस पर टूट पड़ा। यह फिल्म युवाओं के लगभग हिंसक प्रेम को आईना ही नहीं दिखाती थी, उसका समर्थन भी करती थी। फिल्म के सुपर डुपर हिट होने से बॉलीवुड निर्माताओं के दिमाग ठनक गये। वह मान गये कि सिनेमा में जो प्रेम रहता है उसके साथ नये बर्ताव का समय आ पहुंचा है। इस बीच दो परिवर्तन समानांतर हुए। कॉल सेंटरों में मर-खप रही युवा पीढ़ी में प्यार की एक नयी परिभाषा और अभिलाषा ने जन्म लिया। दिन में मिलो, रात में मौज-मस्ती करो, सुबह भूल जाओ। दो-चार बार डेटिंग करो। चार छह रातें बिस्तर पर गुजारो। मन मिले तो साथ रहो। न मिले तो अपना-अपना रास्ता नापो। प्रेम के इस दर्शन को नयी पीढ़ी ने नाम दिया ‘वन नाइट स्टैंड‘ और ‘लिव इन रिलेशनशिप‘। सिनेमा चूंकि बड़े दर्शक समूह का माध्यम है इसलिए वह प्यार के इस दर्शन का तो ताबड़तोड़ प्रदर्शन नहीं कर सका लेकिन उसने प्यार की नयी जमीन पर खड़े होना शुरू कर दिया। पिछले वर्ष 31 जुलाई को रिलीज सैफ अली खान-दीपिका पादुकोन स्टारर हिट फिल्म ‘लव आज कल‘ में तो बाकायदा आज के और बीते समय के प्यार का रोचक लेकिन तुलनात्मक अध्ययन पेश किया गया। इम्तियाज अली द्वारा निर्देशित इस फिल्म में दो युवाओं के प्यार को दो कालखंडों में पेश करके प्रेम की नयी-पुरानी व्याख्या को अंजाम दिया गया। एक सन् पैंसठ की दिल्ली है जिमसें ऋषी कपूर प्रेम करते हैं। एक सन् 2009 का लंदन है जिसमें सैफ-दीपिका का फटाफट प्यार है। इस मोहब्बत के बीच में विलेन बन कर खड़े हैं दोनों के करियर। दोनों सहर्ष अलग होते हैं। दोस्तों को ब्रेकअप पार्टी देते हैं। दोस्त भ्रमित हैं। इस मौके पर बधाई दें या अफसोस प्रकट करें। गिफ्ट क्या दें? ब्रेकअप पार्टी की यह अवधारणा दिलचस्प और अनूठी है। यह ब्रेकअप प्रतिबद्धता से पलायन का दर्शन है। नो डिमांड, नो कमिटमेंट। फिल्म में ऋषी कपूर का जुमला ‘प्यार एक ही बार होता है‘ अंतिम सत्य निकला। लेकिन यह फिल्म का अंतिम सत्य है, समाज का नहीं। ‘लार्जर दैन लाइफ‘ वाले फार्मूले पर टिकी फिल्म इंडस्ट्री में प्यार, प्रेम, इश्क, मोहब्बत को परिभाषित करने का नया जुनून, नयी जिद और नया उन्माद शिखरों पर जा बैठा।
प्रयोगधर्मी फिल्मकार अनुराग कश्यप की फिल्म ‘देव डी‘ ने तो प्यार की रोमानी छवि को ही तहस नहस कर दिया। उन्होंने ‘देवदास‘ की प्रचलित प्रतिमा का विध्वंस कर डाला। अनुराग ने ‘देव डी‘ में एक थीसिस यह दी कि देव ‘नारसिसस‘ है यानी ऐसा शख्स जो संसार में किसी से प्यार नहीं करता। वह सिर्फ खुद से मोहब्बत करता है। यह देवदास पारो के गम में शराब पी कर खून की उल्टियां करने वाला युवक नहीं है। यह एक नया देवदास है जो प्यार में शहीद होने को राजी नहीं है। यह फिल्म चल निकली तो निर्माताओं को लगा कि प्यार की नयी व्याख्या स्वीकार्य है। अब तो वह सिनेमा में रहने वाले पुराने प्रेम की तरफ से पूरी तरह पीठ फेर चुके हैं।
सिनेमा में प्यार की कुछ अलग तस्वीर पेश करने वाली हालिया फिल्मों में हम शाहरुख खान-अनुष्का शर्मा की ‘रब ने बना दी जोड़ी‘ करण जौहर निर्मित ‘दोस्ताना‘, अब्बास टायरवाला निर्देशित इमरान खान-जेनेलिया डिसूजा अभिनीत ‘जाने तू या जाने ना‘, तनूजा चंद्रा की ‘होप ऐंड ए लिटिल शुगर‘, फराह खान निर्देशित ‘ओम शांति ओम‘, संजय लीला भंसाली की ‘सांवरिया‘, आर बालकी की अमिताभ-तब्बू अभिनीत ‘चीनी कम‘, अनुराग बसु निर्देशित ‘मैट्रो‘ और राम गोपाल वर्मा की अमिताभ बच्चन अभिनीत ‘निःशब्द‘ का जिक्र कर सकते हैं। ये सभी फिल्में सिनेमा में बरसों से चले आ रहे प्यार के पुराने फलसफे को नकार कर नया मिजाज, नया मौसम और नया संस्कार रचने के संघर्ष में मुब्तिला हैं।
लेकिन...। और यह लेकिन एक विराट तथा बुनियादी शंका है कि क्या ‘प्यार‘ जैसा दुर्लभ, कीमती और असाधारण अहसास तमाम तकनीकी क्रांतियों के बावजूद अपनी मूल स्थापनाओं को अपदस्थ कर पाया है। शायद नहीं । साहित्य में तो वर्षों पहले कथाकार ममता कालिया ने घोषणा कर दी थी -‘प्यार शब्द घिसते घिसते चपटा हो गया है। हमारी समझ में अब सिर्फ सहवास आता है।‘ लेकिन सामाजिक जीवन में ऐसा हुआ क्या? शायद नहीं हुआ। इसकी तस्दीक करती है अभी अभी रिलीज हुई विशाल भारद्वाज निर्मित अभिषेक चैबे की फिल्म ‘इश्किया‘। इस फिल्म में मामा (नसीरुद्दीन शाह) और भांजा (अरशद वारसी) एक ही लड़की (विद्या बालन) से सच्चा इश्क कर बैठते हैं। इश्क के इस संग्राम में भांजे की जीत होती है और मामा हार जाता है। युवा धड़कनों का यह प्यार ही अप्रतिम और अजेय है। इस प्यार को कोई प्रयोग पराजित नहीं कर सकता। इसलिए सिनेमा हो या जीवन, मोहब्बत जिंदाबाद ही प्यार का इकलौता सच और विमर्श है।
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09 फरवरी,
2010,
राष्ट्रीय सहारा,
हस्तक्षेप
Saturday, January 30, 2010
रण
फिल्म समीक्षा
मीडिया के भीतर का ‘रण‘
धीरेन्द्र अस्थाना
रामगोपाल वर्मा धंधा करने के लिए आमतौर पर फिल्में नहीं बनाते। कुछ अपवादों को छोड़ दें जैसे ‘सत्या‘, ‘भूत‘, ‘कंपनी‘, ‘सरकार‘ तो उनकी फिल्में बड़ा धंधा करती भी नहीं हैं। बाॅलीवुड में रामू का अपना एक अलग अंदाज और मुहावरा है। हां, धंधे का समर्थन करने में उन्हें कोई ऐतरात नहीं है। याद करें यह गीत -‘गंदा है पर धंधा है।‘
लेकिन अपनी नयी फिल्म ‘रण‘ में उन्होंने पूरी ताकत से यह संदेश देना चाहा है कि मीडिया एक मिशन है। उसे धंधा बनने से बचाओ। शायद पहली बार रामू ने मीडिया विमर्श पर केंद्रित फिल्म बनायी है और बहुत दिनों बाद वह एक विचारोत्तेजक तथा सरोकारों वाला विषय लेकर आए हैं। वरना तो उनकी छवि माफियाओं और भूतों वाले फिल्मकार की होने लगी थी। पहले विचार कर लें कि मीडिया से आम जनता का नाता कितना है? इसलिए मीडिया के भीतर चल रही मारकाट, स्पर्धा, षड्यंत्र और चालबाजी को आम आदमी कितना और क्यों आत्मसात करेगा? स्पष्ट कर दें कि सिनेमा आम आदमी का माध्यम है और मीडिया खास आदमी का। खास आदमी के माध्यम के भीतर चल रही साजिशों में आम आदमी क्यों दिलचस्पी लेगा? यही कारण है कि एक सार्थक, महत्वपूर्ण और सरोकारों से जुड़ी होने के बावजूद रामू की ‘रण‘ बाॅक्स आॅफिस पर लड़खड़ा गयी है। विमर्श के मोर्चे पर ‘रण‘ सफल है लेकिन व्यवसाय के मोर्चे पर असफल। काश, ऐसी फिल्में धंधे के मोर्चे पर भी सफल होतीं तो आज बाॅलीवुड का चेहरा कुछ और ही होता। अभिनय के स्तर पर ‘रण‘ कुल मिला कर अमिताभ बच्चन और परेश रावल की फिल्म है। एक सच्चे और खरे चैनल के प्रमुख की भूमिका में अमिताभ ने प्रभावशाली तथा जीवंत अभिनय किया है। उनके बरक्स एक भ्रष्ट और चालबाज नेता के रोल में परेश रावल ने फिल्म को दमदार बना दिया है। लंबे समय बाद राजपाल यादव को एक बेहतर किरदार निभाने को मिला जिसे उन्होंने बेहतरीन ढंग से निभाया। उनका शिष्ट हास्य फिल्म को ‘काॅमिक रिलीफ‘ देता है। एक युवा रिपोर्टर के रूप में रितेश देशमुख की सादगी और पवित्रता भली भली सी लगती है लेकिन एकाध जगह उनका जासूस जैसा चरित्र खटकता है। पात्रों के चयन के संबंध में यह बात तो खुद रामू ही बता सकते हैं कि अमिताभ के वारिस, युवा चैनल मालिक के इतने लंबे और महत्वपूर्ण रोल के लिए उन्हें सुदीप क्यों मिले? और अगर दक्षिण के इस सितारे को लेना ही था तो उनसे ऐसे दृश्य क्यों नहीं करवाये जिनमें वह अपनी अभिनय प्रतिभा दिखा सकते? फिल्म में स्त्री पात्रों के लिए उचित ‘स्पेस‘ नहीं रखा गया है। मीडिया पर केंद्रित फिल्म के लिए अगर रामू ‘लार्जर दैन लाइफ‘ वाला फार्मूला इस्तेमाल नहीं करते तो ‘रण‘ ज्यादा प्रामाणिक, सहज और तार्किक हो सकती थी। फिल्म देख लें।
निर्देशक: राम गोपाल वर्मा
कलाकार: अमिताभ बच्चन, परेश रावल, रितेश देशमुख, सुदीप, सुचित्रा कृष्णमूर्ति, नीतू चंद्रा, राजपाल यादव, गुल पनाग
मीडिया के भीतर का ‘रण‘
धीरेन्द्र अस्थाना
रामगोपाल वर्मा धंधा करने के लिए आमतौर पर फिल्में नहीं बनाते। कुछ अपवादों को छोड़ दें जैसे ‘सत्या‘, ‘भूत‘, ‘कंपनी‘, ‘सरकार‘ तो उनकी फिल्में बड़ा धंधा करती भी नहीं हैं। बाॅलीवुड में रामू का अपना एक अलग अंदाज और मुहावरा है। हां, धंधे का समर्थन करने में उन्हें कोई ऐतरात नहीं है। याद करें यह गीत -‘गंदा है पर धंधा है।‘
लेकिन अपनी नयी फिल्म ‘रण‘ में उन्होंने पूरी ताकत से यह संदेश देना चाहा है कि मीडिया एक मिशन है। उसे धंधा बनने से बचाओ। शायद पहली बार रामू ने मीडिया विमर्श पर केंद्रित फिल्म बनायी है और बहुत दिनों बाद वह एक विचारोत्तेजक तथा सरोकारों वाला विषय लेकर आए हैं। वरना तो उनकी छवि माफियाओं और भूतों वाले फिल्मकार की होने लगी थी। पहले विचार कर लें कि मीडिया से आम जनता का नाता कितना है? इसलिए मीडिया के भीतर चल रही मारकाट, स्पर्धा, षड्यंत्र और चालबाजी को आम आदमी कितना और क्यों आत्मसात करेगा? स्पष्ट कर दें कि सिनेमा आम आदमी का माध्यम है और मीडिया खास आदमी का। खास आदमी के माध्यम के भीतर चल रही साजिशों में आम आदमी क्यों दिलचस्पी लेगा? यही कारण है कि एक सार्थक, महत्वपूर्ण और सरोकारों से जुड़ी होने के बावजूद रामू की ‘रण‘ बाॅक्स आॅफिस पर लड़खड़ा गयी है। विमर्श के मोर्चे पर ‘रण‘ सफल है लेकिन व्यवसाय के मोर्चे पर असफल। काश, ऐसी फिल्में धंधे के मोर्चे पर भी सफल होतीं तो आज बाॅलीवुड का चेहरा कुछ और ही होता। अभिनय के स्तर पर ‘रण‘ कुल मिला कर अमिताभ बच्चन और परेश रावल की फिल्म है। एक सच्चे और खरे चैनल के प्रमुख की भूमिका में अमिताभ ने प्रभावशाली तथा जीवंत अभिनय किया है। उनके बरक्स एक भ्रष्ट और चालबाज नेता के रोल में परेश रावल ने फिल्म को दमदार बना दिया है। लंबे समय बाद राजपाल यादव को एक बेहतर किरदार निभाने को मिला जिसे उन्होंने बेहतरीन ढंग से निभाया। उनका शिष्ट हास्य फिल्म को ‘काॅमिक रिलीफ‘ देता है। एक युवा रिपोर्टर के रूप में रितेश देशमुख की सादगी और पवित्रता भली भली सी लगती है लेकिन एकाध जगह उनका जासूस जैसा चरित्र खटकता है। पात्रों के चयन के संबंध में यह बात तो खुद रामू ही बता सकते हैं कि अमिताभ के वारिस, युवा चैनल मालिक के इतने लंबे और महत्वपूर्ण रोल के लिए उन्हें सुदीप क्यों मिले? और अगर दक्षिण के इस सितारे को लेना ही था तो उनसे ऐसे दृश्य क्यों नहीं करवाये जिनमें वह अपनी अभिनय प्रतिभा दिखा सकते? फिल्म में स्त्री पात्रों के लिए उचित ‘स्पेस‘ नहीं रखा गया है। मीडिया पर केंद्रित फिल्म के लिए अगर रामू ‘लार्जर दैन लाइफ‘ वाला फार्मूला इस्तेमाल नहीं करते तो ‘रण‘ ज्यादा प्रामाणिक, सहज और तार्किक हो सकती थी। फिल्म देख लें।
निर्देशक: राम गोपाल वर्मा
कलाकार: अमिताभ बच्चन, परेश रावल, रितेश देशमुख, सुदीप, सुचित्रा कृष्णमूर्ति, नीतू चंद्रा, राजपाल यादव, गुल पनाग
Saturday, January 23, 2010
वीर
फिल्म समीक्षा
साम्राज्य के विरुद्ध वीर
धीरेन्द्र अस्थाना
पहले दो-तीन बातें संक्षेप में। ‘वीर‘ एक पीरियड फिल्म है जिसकी कहानी फिल्म के हीरो सलमान खान ने लिखी है। प्रचारित किया गया है कि इस कहानी के साथ सलमान खान पिछले बीस साल से रह रहे थे। यह सलमान खान का एक बेहद विशेष और महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट है जिसमें खुद को एक पिंडारी योद्धा का ‘लुक‘ देने के लिए सलमान ने अनथक मेहनत की। ‘वीर‘ बड़े बजट की भव्य फिल्म है जिसके युद्ध दृश्य ‘मुगले आजम‘ और ‘जोधा अकबर‘ की याद दिलाते हैं।
अब बात पूरी फिल्म की। ऐसा लगता है कि सलमान खान की कहानी के ‘थॉट‘ को शक्तिमान तलवार की पटकथा संभाल और सहेज नहीं पायी है। इसीलिए कभी यह युद्ध के बैकड्रॉप पर प्रेम कथा लगती है, कभी ब्रिटिश सल्तनत के विरुद्ध राजे-रजवाड़ों की एकता की गाथा तो कभी पिंडारी योद्धाओं के प्रतिनिधि नायक वीर के माध्यम से देशभक्ति की कहानी नजर आती है। पटकथा में दो चूक और हुई हैं। सलमान का लंदन प्रवास मूल कथा से भटकाव को दर्शाता है। सलमान की मृत्यु का दृश्य अव्यवहारिक और आम दर्शक की मूल चाहत ‘हीरो की विजय‘ के विरुद्ध है। बिना मृत्यु दिखाए भी देश की एकता प्रकट की जा सकती थी।
पूरी फिल्म सलमान खान की है और वह शुरू से अंत तक फिल्म में छाये हुए हैं। उनका पिंडारी योद्धा तथा ब्रिटिश लुक दोनों अच्छे लगते हैं। पिंडारी कबीले के जन नायक ‘दद्दे‘ के रूप में मिथुन चक्रवर्ती ने कमाल का अभिनय किया है लेकिन सलमान खान की नयी खोज जरीन खान ने एक बहुत बड़े मौके को गंवा दिया। सलमान खान जैसे सुपर स्टार के अपोजिट इतने विशाल बजट की फिल्म में इतना लंबा रोल मिलना लॉटरी लग जाने जैसा था। लेकिन न तो अपने ‘लुक‘ और बॉडी लैंग्वेज से जरीन ने प्रभावित किया और न ही अपनी अभिनय प्रतिभा से। प्रचारित हुआ था कि वह कैटरीना कैफ जैसी हैं। लेकिन ऐसा नहीं है। कभी कभी एक धूमिल सी झलक में वह कैटरीना जैसी नजर आती हैं लेकिन सौंदर्य और अभिनय दोनों में वह कैटरीना से कोसों दूर हैं। एक जमाने के बाद अभिनय सम्राट राजकुमार के बेटे पुरू को पर्दे पर काम करते देख सुखद लगा। नीना गुप्ता भी जंचती हैं।
बेहतरीन ढंग से संगीतबद्ध किये हुए ताजगी भरे गीत फिल्म की विशेष उपलब्धि हैं जिसके लिए दर्शकों को गुलजार साहब का आभारी होना चाहिए। ‘वीर‘ अपनी भारी लागत वसूल पायेगी या नहीं, यह वक्त और दर्शक तय करेंगे लेकिन सलमान की फिल्मोग्राफी में एक और उल्लेखनीय फिल्म की संख्या बढ़ गयी है। देख लें।
निर्माता: वियज गलानी
निर्देशक: अनिल शर्मा
कलाकार: सलमान खान, सोहेल खान, मिथुन चक्रवर्ती, नीना गुप्ता, जरीन खान, पुरू राजकुमार
गीत: गुलजार
संगीत: साजिद-वाजिद
साम्राज्य के विरुद्ध वीर
धीरेन्द्र अस्थाना
पहले दो-तीन बातें संक्षेप में। ‘वीर‘ एक पीरियड फिल्म है जिसकी कहानी फिल्म के हीरो सलमान खान ने लिखी है। प्रचारित किया गया है कि इस कहानी के साथ सलमान खान पिछले बीस साल से रह रहे थे। यह सलमान खान का एक बेहद विशेष और महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट है जिसमें खुद को एक पिंडारी योद्धा का ‘लुक‘ देने के लिए सलमान ने अनथक मेहनत की। ‘वीर‘ बड़े बजट की भव्य फिल्म है जिसके युद्ध दृश्य ‘मुगले आजम‘ और ‘जोधा अकबर‘ की याद दिलाते हैं।
अब बात पूरी फिल्म की। ऐसा लगता है कि सलमान खान की कहानी के ‘थॉट‘ को शक्तिमान तलवार की पटकथा संभाल और सहेज नहीं पायी है। इसीलिए कभी यह युद्ध के बैकड्रॉप पर प्रेम कथा लगती है, कभी ब्रिटिश सल्तनत के विरुद्ध राजे-रजवाड़ों की एकता की गाथा तो कभी पिंडारी योद्धाओं के प्रतिनिधि नायक वीर के माध्यम से देशभक्ति की कहानी नजर आती है। पटकथा में दो चूक और हुई हैं। सलमान का लंदन प्रवास मूल कथा से भटकाव को दर्शाता है। सलमान की मृत्यु का दृश्य अव्यवहारिक और आम दर्शक की मूल चाहत ‘हीरो की विजय‘ के विरुद्ध है। बिना मृत्यु दिखाए भी देश की एकता प्रकट की जा सकती थी।
पूरी फिल्म सलमान खान की है और वह शुरू से अंत तक फिल्म में छाये हुए हैं। उनका पिंडारी योद्धा तथा ब्रिटिश लुक दोनों अच्छे लगते हैं। पिंडारी कबीले के जन नायक ‘दद्दे‘ के रूप में मिथुन चक्रवर्ती ने कमाल का अभिनय किया है लेकिन सलमान खान की नयी खोज जरीन खान ने एक बहुत बड़े मौके को गंवा दिया। सलमान खान जैसे सुपर स्टार के अपोजिट इतने विशाल बजट की फिल्म में इतना लंबा रोल मिलना लॉटरी लग जाने जैसा था। लेकिन न तो अपने ‘लुक‘ और बॉडी लैंग्वेज से जरीन ने प्रभावित किया और न ही अपनी अभिनय प्रतिभा से। प्रचारित हुआ था कि वह कैटरीना कैफ जैसी हैं। लेकिन ऐसा नहीं है। कभी कभी एक धूमिल सी झलक में वह कैटरीना जैसी नजर आती हैं लेकिन सौंदर्य और अभिनय दोनों में वह कैटरीना से कोसों दूर हैं। एक जमाने के बाद अभिनय सम्राट राजकुमार के बेटे पुरू को पर्दे पर काम करते देख सुखद लगा। नीना गुप्ता भी जंचती हैं।
बेहतरीन ढंग से संगीतबद्ध किये हुए ताजगी भरे गीत फिल्म की विशेष उपलब्धि हैं जिसके लिए दर्शकों को गुलजार साहब का आभारी होना चाहिए। ‘वीर‘ अपनी भारी लागत वसूल पायेगी या नहीं, यह वक्त और दर्शक तय करेंगे लेकिन सलमान की फिल्मोग्राफी में एक और उल्लेखनीय फिल्म की संख्या बढ़ गयी है। देख लें।
निर्माता: वियज गलानी
निर्देशक: अनिल शर्मा
कलाकार: सलमान खान, सोहेल खान, मिथुन चक्रवर्ती, नीना गुप्ता, जरीन खान, पुरू राजकुमार
गीत: गुलजार
संगीत: साजिद-वाजिद
Saturday, January 16, 2010
चांस पे डांस
फिल्म समीक्षा
हीरो बनने के चांस पे डांस
धीरेन्द्र अस्थाना
एक युवक दिल्ली, कोलकाता, पटना, भोपाल, आगरा, कानपुर लखनऊ, इंदौर या अमृतसर से हीरो बनने के लिए मुंबई आता है। मुंबई जैसे विराट, तेज रफ्तार और अजनबी महानगर में रहने, खाने, जीने और कुछ बन जाने का दम तोड़ और अनवरत स्ट्रगल करता है। जब वह पूरी तरह से थक कर टूटने को होता है तो किस्मत मेहरबान होकर उसे एक चांस देती है। खुद को साबित करने का इकलौता चांस। वह इस चांस में सफल हो जाता है। सफलता उसके कदम चूमती है और उसका हीरो बनने का मायावी सपना सच होकर उसे छूता है, खिलखिलाता है और मस्त-मस्त डांस करता है। हीरो बनने के इस स्ट्रगल पर कितनी फिल्में देख सकता है दर्शक! कम से कम दो दर्जन से ज्यादा फिल्में इस विषय पर नये-नये दृष्टिकोण और आयाम के साथ आ चुकी हैं। इसलिए निर्देशक केन घोष की फिल्म ‘चांस पे डांस‘ में विषय के लेकर कोई नयी बात नहीं है। माना कि विषय तो दस-बारह ही होते हैं लेकिन उन्हें कहने और फिल्माने का अंदाज तो कुछ अलग और अनूठा होना चाहिए न! तभी न दर्शक को एक नया आस्वाद मिल सकेगा। लेकिन ‘चांस पे डांस‘ हर मामले में एक साधारण फिल्म है। इस फिल्म की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह बेहद चुस्त दुरूस्त और कसी हुई फिल्म है। साधारण होने के बावजूद फिल्म शुरू से अंत तक दर्शकों को बांधे रखती है। ‘जब वी मेट‘ और ‘कमीने‘ जैसी अद्वितीय फिल्में दे चुके शाहिद कपूर को सोच-समझ कर फिल्मों का चुनाव करना होगा क्योंकि किसी फिल्म का सबसे बड़ा हीरो उसका कथा तत्व ही होता है। सिर्फ अभिनय के सहारे कोई भी बहुत दूर तक नहीं जा पाया है। हर बड़े सितारे की कामयाबी के पीछे एक नायाब कहानी भी टिमटिमा रही है। शाहिद का अभिनय अच्छा है। जेनेलिया डिसूजा ने भी सहज अभिनय किया है। दोनों की जोड़ी जमती है। लगता है एक डांसर के तौर पर शाहिद ने काफी मेहनत की है। फिल्म में उनके डांस वाले दृश्य आकर्षित करते हैं। सिनेमा के आसमान पर छा जाने का सपना देखने वाले लाखों युवक मुंबई में कैसा मारक और संहारक संघर्ष कर रहे हैं, इस पर थोड़ा रिसर्च किया गया होता तो यह फिल्म स्ट्रगलर्स के जीवन की एक यादगार पटकथा बन सकती थी। सिर्फ टाइमपास बन कर रह गयी। एक बार देख सकते हैं।
निर्माता: रोनी स्क्रूवाला
निर्देशक: केन घोष
कलाकार: शाहिद कपूर, जेनेलिया डिसूजा
संगीत: प्रीतम चक्रवर्ती, अदनान सामी, केन घोष
हीरो बनने के चांस पे डांस
धीरेन्द्र अस्थाना
एक युवक दिल्ली, कोलकाता, पटना, भोपाल, आगरा, कानपुर लखनऊ, इंदौर या अमृतसर से हीरो बनने के लिए मुंबई आता है। मुंबई जैसे विराट, तेज रफ्तार और अजनबी महानगर में रहने, खाने, जीने और कुछ बन जाने का दम तोड़ और अनवरत स्ट्रगल करता है। जब वह पूरी तरह से थक कर टूटने को होता है तो किस्मत मेहरबान होकर उसे एक चांस देती है। खुद को साबित करने का इकलौता चांस। वह इस चांस में सफल हो जाता है। सफलता उसके कदम चूमती है और उसका हीरो बनने का मायावी सपना सच होकर उसे छूता है, खिलखिलाता है और मस्त-मस्त डांस करता है। हीरो बनने के इस स्ट्रगल पर कितनी फिल्में देख सकता है दर्शक! कम से कम दो दर्जन से ज्यादा फिल्में इस विषय पर नये-नये दृष्टिकोण और आयाम के साथ आ चुकी हैं। इसलिए निर्देशक केन घोष की फिल्म ‘चांस पे डांस‘ में विषय के लेकर कोई नयी बात नहीं है। माना कि विषय तो दस-बारह ही होते हैं लेकिन उन्हें कहने और फिल्माने का अंदाज तो कुछ अलग और अनूठा होना चाहिए न! तभी न दर्शक को एक नया आस्वाद मिल सकेगा। लेकिन ‘चांस पे डांस‘ हर मामले में एक साधारण फिल्म है। इस फिल्म की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह बेहद चुस्त दुरूस्त और कसी हुई फिल्म है। साधारण होने के बावजूद फिल्म शुरू से अंत तक दर्शकों को बांधे रखती है। ‘जब वी मेट‘ और ‘कमीने‘ जैसी अद्वितीय फिल्में दे चुके शाहिद कपूर को सोच-समझ कर फिल्मों का चुनाव करना होगा क्योंकि किसी फिल्म का सबसे बड़ा हीरो उसका कथा तत्व ही होता है। सिर्फ अभिनय के सहारे कोई भी बहुत दूर तक नहीं जा पाया है। हर बड़े सितारे की कामयाबी के पीछे एक नायाब कहानी भी टिमटिमा रही है। शाहिद का अभिनय अच्छा है। जेनेलिया डिसूजा ने भी सहज अभिनय किया है। दोनों की जोड़ी जमती है। लगता है एक डांसर के तौर पर शाहिद ने काफी मेहनत की है। फिल्म में उनके डांस वाले दृश्य आकर्षित करते हैं। सिनेमा के आसमान पर छा जाने का सपना देखने वाले लाखों युवक मुंबई में कैसा मारक और संहारक संघर्ष कर रहे हैं, इस पर थोड़ा रिसर्च किया गया होता तो यह फिल्म स्ट्रगलर्स के जीवन की एक यादगार पटकथा बन सकती थी। सिर्फ टाइमपास बन कर रह गयी। एक बार देख सकते हैं।
निर्माता: रोनी स्क्रूवाला
निर्देशक: केन घोष
कलाकार: शाहिद कपूर, जेनेलिया डिसूजा
संगीत: प्रीतम चक्रवर्ती, अदनान सामी, केन घोष
Saturday, January 9, 2010
प्यार इंपासिबल
फिल्म समीक्षा
संभव हो सकता है ‘प्यार इंपासिबल‘
धीरेन्द्र अस्थाना
यह तो नये साल का सबसे बड़ा कमाल हो गया! फिल्म विश्लेषकों, निर्माताओं और पत्रकारों ने जिसे आज तक गंभीरता से बतौर एक्टर स्वीकार नहीं किया, उसने मर्मस्पर्शी, जीवंत और सहज अभिनय की एक चमकती और नयी लकीर ही खींच दी। इससे पहले ‘सोलो एक्टिंग‘ का मौका ही कहां मिला कि उदय चोपड़ा अपनी अभिनय प्रतिभा साबित कर सकते। इसीलिए ‘प्यार इंपासिबल‘ खुद बना कर उन्हें जमाने को दिखाना पड़ा कि वह कितने काबिल एक्टर और कितने संवेदनशील संवाद लेखक हैं। दुनिया के सबसे पुराने विषय प्यार की एक नयी पटकथा है ‘प्यार इंपासिबल‘ जो मुहब्बत का एक खामोश ख्वाब चुपचाप बुनती है। कंप्यूटर, डेमो,सॉफ्टवेयर, पासवर्ड, प्रोग्रामर प्यार की इस दुनिया को आधुनिक तकनीक का बैकड्राॅप और आयाम देते हैं। यह फिल्म एक अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश देती है - सवाल यह नहीं है कि आप कितने चालाक या ताकतवर हैं, सवाल यह है कि आप को अपने ऊपर कितना विश्वास है? है भी या नहीं? महान रूसी लेखक गोर्की ने कहा था - यह विश्वास करो कि तुम दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति हो। इतना बड़ा आत्मविश्वास तो नहीं लेकिन ‘प्यार इंपासिबल‘ युवा पीढ़ी को यह विश्वास दिलाने में जरूर कामयाब हुई है कि किसी का प्यार पाने के लिए खूबसूरत, बलशाली और धनवान होना ही इकलौती शर्त नहीं है। आप साधारण होकर भी एक असाधारण प्यार पा सकते हैं। इसी कहानी को निर्देशक जुगल हंसराज रोचक और दिलचस्प अंदाज में पेश करते हैं। इंटरवल के बाद तो फिल्म की पटकथा इतनी कस गयी है कि दर्शक जुंबिश लिये बगैर फिल्म देखता है। प्रियंका चोपड़ा ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वह बहु आयामी अभिनेत्री हैं और चरित्र में प्राण फूंकने की ताकत रखती हैं। बॉक्स ऑफिस कलेक्शन भले ही किसी और को नंबर वन ठहराये लेकिन अभिनय के लिहाज से फिलहाल प्रियंका चोपड़ा पहले पायदान पर हैं। जब जब बाॅलीवुड की बीस प्रेम फिल्मों की लिस्ट बनेगी तब तब ‘प्यार इंपासिबल‘ को उसमें शामिल करना जरूरी होगा। यह फिल्म मोहब्बत की बारीकियों को गंभीरता के स्तर पर स्पर्श करती है इसलिए ‘बाजार‘ में कितना टिकेगी नहीं कह सकते लेकिन भावनाओं के ‘संसार‘ में फिल्म चमकती रहेगी। पूरी फिल्म मूलतः उदय चोपड़ा-प्रियंका चोपड़ा की ही है, डीनो मोरिया के कारण कहानी को गति और मोड़ मिलते हैं। गीत-संगीत कर्ण प्रिय है।
निर्माता: उदय चोपड़ा
निर्देशक: जुगल हंसराज
कलाकार: उदय चोपड़ा, प्रियंका चोपड़ा, डीनो मोरिया, अनुपम खेर।
संगीत: सलीम-सुलेमान
संभव हो सकता है ‘प्यार इंपासिबल‘
धीरेन्द्र अस्थाना
यह तो नये साल का सबसे बड़ा कमाल हो गया! फिल्म विश्लेषकों, निर्माताओं और पत्रकारों ने जिसे आज तक गंभीरता से बतौर एक्टर स्वीकार नहीं किया, उसने मर्मस्पर्शी, जीवंत और सहज अभिनय की एक चमकती और नयी लकीर ही खींच दी। इससे पहले ‘सोलो एक्टिंग‘ का मौका ही कहां मिला कि उदय चोपड़ा अपनी अभिनय प्रतिभा साबित कर सकते। इसीलिए ‘प्यार इंपासिबल‘ खुद बना कर उन्हें जमाने को दिखाना पड़ा कि वह कितने काबिल एक्टर और कितने संवेदनशील संवाद लेखक हैं। दुनिया के सबसे पुराने विषय प्यार की एक नयी पटकथा है ‘प्यार इंपासिबल‘ जो मुहब्बत का एक खामोश ख्वाब चुपचाप बुनती है। कंप्यूटर, डेमो,सॉफ्टवेयर, पासवर्ड, प्रोग्रामर प्यार की इस दुनिया को आधुनिक तकनीक का बैकड्राॅप और आयाम देते हैं। यह फिल्म एक अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश देती है - सवाल यह नहीं है कि आप कितने चालाक या ताकतवर हैं, सवाल यह है कि आप को अपने ऊपर कितना विश्वास है? है भी या नहीं? महान रूसी लेखक गोर्की ने कहा था - यह विश्वास करो कि तुम दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति हो। इतना बड़ा आत्मविश्वास तो नहीं लेकिन ‘प्यार इंपासिबल‘ युवा पीढ़ी को यह विश्वास दिलाने में जरूर कामयाब हुई है कि किसी का प्यार पाने के लिए खूबसूरत, बलशाली और धनवान होना ही इकलौती शर्त नहीं है। आप साधारण होकर भी एक असाधारण प्यार पा सकते हैं। इसी कहानी को निर्देशक जुगल हंसराज रोचक और दिलचस्प अंदाज में पेश करते हैं। इंटरवल के बाद तो फिल्म की पटकथा इतनी कस गयी है कि दर्शक जुंबिश लिये बगैर फिल्म देखता है। प्रियंका चोपड़ा ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वह बहु आयामी अभिनेत्री हैं और चरित्र में प्राण फूंकने की ताकत रखती हैं। बॉक्स ऑफिस कलेक्शन भले ही किसी और को नंबर वन ठहराये लेकिन अभिनय के लिहाज से फिलहाल प्रियंका चोपड़ा पहले पायदान पर हैं। जब जब बाॅलीवुड की बीस प्रेम फिल्मों की लिस्ट बनेगी तब तब ‘प्यार इंपासिबल‘ को उसमें शामिल करना जरूरी होगा। यह फिल्म मोहब्बत की बारीकियों को गंभीरता के स्तर पर स्पर्श करती है इसलिए ‘बाजार‘ में कितना टिकेगी नहीं कह सकते लेकिन भावनाओं के ‘संसार‘ में फिल्म चमकती रहेगी। पूरी फिल्म मूलतः उदय चोपड़ा-प्रियंका चोपड़ा की ही है, डीनो मोरिया के कारण कहानी को गति और मोड़ मिलते हैं। गीत-संगीत कर्ण प्रिय है।
निर्माता: उदय चोपड़ा
निर्देशक: जुगल हंसराज
कलाकार: उदय चोपड़ा, प्रियंका चोपड़ा, डीनो मोरिया, अनुपम खेर।
संगीत: सलीम-सुलेमान
Saturday, January 2, 2010
रात गयी बात गयी
फिल्म समीक्षा
यह बात है एक नशीली रात की
धीरेन्द्र अस्थाना
एक जमाने के विख्यात अंग्रेजी पत्रकार-संपादक प्रीतिश नंदी के बैनर तले बनी फिल्म है ‘रात गयी बात गयी‘। ‘भेजा फ्राई‘ जैसी छोटे बजट की कामयाब टीम फिल्म से जुड़ी है। तो यह कैसे मान लेते कि फिल्म खराब होगी। और फिल्म खराब है भी नहीं। लेकिन यह कैसा विचार-विमर्श से भारी सिनेमा हिंदी के दर्शकों को परोस रहे हैं कुछ लोग। ‘रात गयी बात गयी‘ कहने के लिए हिंदी फिल्म है लेकिन यह उस युवा पीढ़ी को ध्यान में रख कर बनायी गयी है जो दिल्ली-मुंबई के काॅल सेंटरों में मर-खप रही है। ‘वन नाइट स्टैंड‘ का कल्चर काॅल सेंटरों से ही निकला है। इसका मतलब है एक रात में दो लोगों के बीच जो रिश्ता बना वो किसी ‘कमिटमेंट‘ की, किसी दायित्व की, किसी अपराधबोध की फिक्र नहीं करता। एक नशीली रात में मोमबत्ती की लौ की तरह भक्क से बुझ जाने वाले इस संबंध की तो छोटे शहर के युवा कल्पना भी नहीं कर सकते। स्त्री-पुरुष के ऐसे युवा तथा आधुनिक विमर्श वाली फिल्म देखने के लिए महानगरों के अलावा बाकी शहरों के दर्शक जुटेंगे, लगता तो नहीं है। सिर के ऊपर से गुजर जाने वाली एक व्यर्थ किस्म की जिरह को महानगरों के युवा दर्शक भी शायद ही पसंद करेंगे। एक ऐसे समय में जब पूरे देश में आमिर खान की ‘थ्री ईडियट्स‘ की आंधी चल रही है, ‘रात गयी बात गयी‘ को दर्शक नसीब होंगे, इसमें शक है।
फिल्म के निर्देशक सौरभ शुक्ला हैं। उन्होंने फिल्म को थियेटर स्टाइल में बना दिया है। थियेटर भी कैसा? स्वांतः सुखाय लेखन जैसा। कुछ बुद्धिजीवियों की पार्टी चल रही है। वहां सब एक दूसरे से ‘फ्लर्ट‘ करने में मशगूल हैं। आठ पैग शराब पी लेने के बाद रजत कपूर ने बोल्ड नेहा धूपिया के साथ क्या किया, उसे कुछ याद नहीं। यही फिल्म का रहस्य है। इसी रहस्य में से कुछ ‘एडल्ट‘ संवादों के जरिए थोड़ा सा हास्य जुटाने की कोशिश भी की गयी है। प्रिंट मीडिया अभी इतना बिंदास नहीं हुआ है कि वैसे संवाद लिखे जाएं। बीच में नेहा धूपिया ने कुछ सार्थक फिल्में पकड़ी थीं जिनके लिए उनकी तारीफ भी हुई। लगता है वह फिर से अपनी पुरानी बोल्ड छवि के करीब जा रही हैं। फिल्म के तमाम कलाकार मंजे हुए हैं। सबका अभिनय उम्दा है। लेकिन यह उम्दा अभिनय आम दर्शक तक कैसे पहुंचेगा। पाठक से मुंह मोड़ कर कहानी लिखी जा सकती है लेकिन दर्शक से मुंह मोड़ कर सिनेमा बनाना भारी पड़ सकता है!
निर्माता: प्रीतिश नंदी कम्युनिकेशंस
निर्देशक: सौरभ शुक्ला
कलाकार: रजत कपूर, विनय पाठक, नेहा धूपिया, दिलीप ताहिल, नवनीत निशान, इरावती हर्षे।
संगीतकार: अंकुर तिवारी
यह बात है एक नशीली रात की
धीरेन्द्र अस्थाना
एक जमाने के विख्यात अंग्रेजी पत्रकार-संपादक प्रीतिश नंदी के बैनर तले बनी फिल्म है ‘रात गयी बात गयी‘। ‘भेजा फ्राई‘ जैसी छोटे बजट की कामयाब टीम फिल्म से जुड़ी है। तो यह कैसे मान लेते कि फिल्म खराब होगी। और फिल्म खराब है भी नहीं। लेकिन यह कैसा विचार-विमर्श से भारी सिनेमा हिंदी के दर्शकों को परोस रहे हैं कुछ लोग। ‘रात गयी बात गयी‘ कहने के लिए हिंदी फिल्म है लेकिन यह उस युवा पीढ़ी को ध्यान में रख कर बनायी गयी है जो दिल्ली-मुंबई के काॅल सेंटरों में मर-खप रही है। ‘वन नाइट स्टैंड‘ का कल्चर काॅल सेंटरों से ही निकला है। इसका मतलब है एक रात में दो लोगों के बीच जो रिश्ता बना वो किसी ‘कमिटमेंट‘ की, किसी दायित्व की, किसी अपराधबोध की फिक्र नहीं करता। एक नशीली रात में मोमबत्ती की लौ की तरह भक्क से बुझ जाने वाले इस संबंध की तो छोटे शहर के युवा कल्पना भी नहीं कर सकते। स्त्री-पुरुष के ऐसे युवा तथा आधुनिक विमर्श वाली फिल्म देखने के लिए महानगरों के अलावा बाकी शहरों के दर्शक जुटेंगे, लगता तो नहीं है। सिर के ऊपर से गुजर जाने वाली एक व्यर्थ किस्म की जिरह को महानगरों के युवा दर्शक भी शायद ही पसंद करेंगे। एक ऐसे समय में जब पूरे देश में आमिर खान की ‘थ्री ईडियट्स‘ की आंधी चल रही है, ‘रात गयी बात गयी‘ को दर्शक नसीब होंगे, इसमें शक है।
फिल्म के निर्देशक सौरभ शुक्ला हैं। उन्होंने फिल्म को थियेटर स्टाइल में बना दिया है। थियेटर भी कैसा? स्वांतः सुखाय लेखन जैसा। कुछ बुद्धिजीवियों की पार्टी चल रही है। वहां सब एक दूसरे से ‘फ्लर्ट‘ करने में मशगूल हैं। आठ पैग शराब पी लेने के बाद रजत कपूर ने बोल्ड नेहा धूपिया के साथ क्या किया, उसे कुछ याद नहीं। यही फिल्म का रहस्य है। इसी रहस्य में से कुछ ‘एडल्ट‘ संवादों के जरिए थोड़ा सा हास्य जुटाने की कोशिश भी की गयी है। प्रिंट मीडिया अभी इतना बिंदास नहीं हुआ है कि वैसे संवाद लिखे जाएं। बीच में नेहा धूपिया ने कुछ सार्थक फिल्में पकड़ी थीं जिनके लिए उनकी तारीफ भी हुई। लगता है वह फिर से अपनी पुरानी बोल्ड छवि के करीब जा रही हैं। फिल्म के तमाम कलाकार मंजे हुए हैं। सबका अभिनय उम्दा है। लेकिन यह उम्दा अभिनय आम दर्शक तक कैसे पहुंचेगा। पाठक से मुंह मोड़ कर कहानी लिखी जा सकती है लेकिन दर्शक से मुंह मोड़ कर सिनेमा बनाना भारी पड़ सकता है!
निर्माता: प्रीतिश नंदी कम्युनिकेशंस
निर्देशक: सौरभ शुक्ला
कलाकार: रजत कपूर, विनय पाठक, नेहा धूपिया, दिलीप ताहिल, नवनीत निशान, इरावती हर्षे।
संगीतकार: अंकुर तिवारी
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