<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188</id><updated>2012-01-28T06:09:10.171-08:00</updated><category term='18 मई 2009'/><category term='2009'/><category term='राष्ट्रीय सहारा 20 नवंबर 2011'/><category term='राष्ट्रीय सहारा - 5 दिसंबर'/><category term='राष्ट्रीय सहारा 27-11-2010'/><category term='12 दिसंबर'/><category term='राष्ट्रीय सहारा कानपुर 23-07-2011'/><category term='राष्ट्रीय सहारा 9 अक्टूबर 2010'/><category term='23 जनवरी'/><category term='25 दिसंबर 2011'/><category term='राष्ट्रीय सहारा 30 अप्रैल 2011'/><category term='राष्ट्रीय सहारा 26 फरवरी 2011'/><category term='9 जनवरी'/><category term='2 जनवरी'/><category 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type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><link rel='next' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default?start-index=101&amp;max-results=100'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><generator version='7.00' 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ही बनायी गयी थी। लेकिन नयी ‘अग्निपथ‘ में कुछ चरित्र और घटनाएं अविश्वसनीय हो गयी हैं। करन मल्होत्रा की पटकथा भी थोड़ी  असंतुलित और लंबी हो गयी है। जब चरित्र नये हैं और नये समय की ‘अग्निपथ‘ है तो बेहतर होता कि नये ढंग से नयी कहानी के साथ फिल्म बनायी जाती। इस बार विजय दीनानाथ चौहान के रूप में रितिक रोशन हैं तो कांचा के रूप में संजय दत्त। रितिक की प्रेमिका बनी हैं प्रियंका चोपड़ा तो पुलिस अधिकारी का किरदार निभाया है ओम पुरी ने। मुंबई के माफिया डॉन रऊफ लाला का चरित्र ऋषि कपूर ने निभाया है। यह नयी ‘अग्निपथ‘ का नया चरित्र है। सब के सब महारथी हैं और सब ने लाजवाब अभिनय किया है। लेकिन कोई यह तो बताए कि मुंबई में कम उम्र लड़कियों की सार्वजनिक नीलामी वाला वैसा बाजार कब और कहां लगता था जैसा ‘अग्निपथ‘ में ऋषि कपूर लगाते हैं। कहानी को अतिरिक्त रोचकता देने के लिए जोड़ा गया यह दृश्य फिल्म में कृत्रिमता पैदा करता है। इसकी कोई जरूरत नहीं थी। जिस कांचा के साम्राज्य मांडवा में पुलिस दल जाने से घबराता है वहां रितिक रोशन अकेला पहुंच जाता है और कांचा की सुरक्षा व्यवस्था को धता बताते हुए बहुत सारे बमों से उसके तमाम ऊंचे-ऊंचे टावर उड़ा देता है। जिस रितिक रोशन के हाथों संजय दत्त को मरना है वह संजय दत्त न सिर्फ रितिक को मार-मार के अधमरा कर देता है बल्कि चार बार एक लंबा खंजर रितिक के पेट के आर-पार कर देता है। जिस बरगद के पेड़ पर रितिक के पिता को कांचा ने लटका कर मारा था वहां पहुंच कर मरणासन्न रितिक में फिर एक नकली जोश पैदा होता है और वह भारी पत्थर से संजय दत्त को घायल कर उसे उसी पेड़ पर लटका कर मार डालता है। फिर वह खुद भी मर जाता है। इससे पहले शादी के पहले दिन उसकी प्रेमिका प्रियंका चोपड़ा भी मारी जाती है। बहुत दिनों बाद कोई ऐसी फिल्म देखी जिसके सारे प्रमुख चरित्र अंत में मर जाते हैं। पता नहीं दर्शक इस फिल्म को आने वाले समय में कितना पचाएंगे? मगर पहले दिन तो सिनेमाई भाषा में टिकट विंडो टूट गईं। फिल्म की सबसे खतरनाक धड़कन कैटरीना कैफ का आइटम सॉन्ग है जिसने ‘जुलुम‘ ढा दिया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशक:   करन मल्होत्रा&lt;br /&gt;कलाकार:  रितिक रोशन, संजय दत्त, प्रियंका चोपड़ा, ऋषि कपूर, ओम पुरी, कैटरीना कैफ।&lt;br /&gt;संगीत:   अजय अतुल गोगावले &lt;br /&gt;गीत:    अमिताभ भट्टाचार्य&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-6267322085037527840?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/6267322085037527840/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2012/01/blog-post.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/6267322085037527840'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/6267322085037527840'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2012/01/blog-post.html' title='अग्निपथ'/><author><name>dhirendra 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दे दी।’ लेकिन हकीकत यह है कि दिलचस्प ढंग से फिल्माने के बावजूद यह एक साधारण मसाला फिल्म है। मूलरूप से ‘4084’ एक कॉमेडी थ्रिलर है लेकिन इसमें बॉलीवुड के सभी मसालों का तड़का लगाया गया है। इमोशन का, सेक्स का, आइटम नंबर का, हास्य का और एक्शन का। एक बहुत पुरानी फिल्म का गाना था- ‘जाते थे जापान पहुंच गये चीन, समझ गये न।’ बिल्कुल इसी तर्ज पर ‘4084’ की कहानी बुनी गयी है। चार टपोरी टाइप के चरित्र पुलिस भेष में पुलिस वैन 4084 चुराकर एक वीरान घर से 20 करोड़ के असली नोट हड़पने का प्लान बनाते हैं। इस घर में असली नोटों के बदले डबल करके नकली नोट दिए जा रहे हैं। चौथे दिन वहां बचेंगे सिर्फ असली नोट, जिसके रखवाले हैं केवल दो गुंडे। यह कहानी बताकर नसीर साहब अपने साथ के के मेनन, अतुल कुलकर्णी और रवि किशन को लेते हैं। चारों की चार कहानियां, चार अतीत और चार वर्तमान हैं। अगर बीस करोड़ मिल जाएं तो चारों अपने अतीत और वर्तमान से छुटकारा पाकर अपने-अपने सपनों के भविष्य में छलांग लगा सकते हैं। कहानी में यू टर्न तब आता है, जब इन चारों की वैन को एक सचमुच का पुलिस आफिसर रोक लेता है। इसे एक गैंगस्टर जाकिर हुसैन की तलाश है, जो द्वारका लॉज के किसी कमरे में छिपा है। वह इन चारों को अपनी मदद के लिए साथ में ले लेता है। अब ये चारों पुलिस वाले तो हैं नहीं, इसलिए पुलिस का काम करते समय कैसे इनके छक्के छूटते हैं, इस स्थिति से कॉमेडी पैदा की गयी है। फिल्म की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि फिल्म के चारों किरदार एकदम सड़क के स्वाभाविक टपोरी लगते हैं। अपने अब तक के करियर में अतुल कुलकर्णी ने पहली बार डांस किया है और झकास ठुमके लगाए हैं। के के तो स्वाभाविक अभिनय के मास्टर हैं। उनके और अतुल के बीच हुए कुछ संवाद चुटीले और मजेदार हैं। फिल्म की एक अलग अदा यह जरूर है कि कई घटनाक्रमों को पार करने के बाद अंत में इन चारों को बीस करोड़ के नोट हाथ लग ही जाते हैं। फिल्मों में चूंकि हीरोईन होती ही है, इसलिए इसमें भी है। नहीं भी होती तो कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि हीरोईन  श्वेता भारद्वाज से सिर्फ डांस करवाया गया है। फिल्म के दोनों आइटम नंबर ‘सेटिंग झाला’ और ‘बदमस्त’ छोटे शहरों में लोकप्रिय हो सकते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशक:  हृदय शेट्टी &lt;br /&gt;कलाकार: नसीरुद्दीन शाह, के के मेनन, रवि किशन, अतुल कुलकर्णी, जाकिर हुसैन, श्वेता भारद्वाज &lt;br /&gt;संगीत: ललित पंडित/विशाल राजन&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-3161958930003048997?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/3161958930003048997/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2012/01/4084.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/3161958930003048997'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/3161958930003048997'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2012/01/4084.html' title='4084'/><author><name>dhirendra 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उल्लेखनीय है कि दोनों ही फिल्मों की हीरोइन विद्या बालन हैं। पिछले कुछ वर्षों से ऐसा देखने में आ रहा है कि प्रयोगधर्मी और मनोरंजनधर्मी दोनों तरह के फिल्मकार हर साल कुछ ऐसी फिल्में बना लेते हैं जो यह भरोसा दिलाती हैं कि सिनेमा की दुनिया में सब कुछ ही बाजार के हवाले नहीं हो गया है। व्यापार के स्तर पर अपनी प्रत्येक फिल्म को हिट कर देने वाले आमिर खान भी अपनी फिल्मों में कुछ न कुछ सार्थक कर ही जाते हैं जबकि वह खुद को शुद्ध रूप से एंटरटेनर मानते हैं। &lt;br /&gt;सन् 2011 में सफल असफल लगभग 112 फिल्में रिलीज हुईं। इनमें से बाजार के स्तर पर ‘तनु वेड्स मनु‘, ‘रागिनी एमएमएस‘, ‘रेडी‘, ‘डबल धमाल‘, ‘मर्डर-2‘, ‘दिल्ली बेली‘, ‘नो वन किल्ड जेसिका‘, ‘जिंदगी ना मिलेगी दोबारा‘, ‘सिंघम‘, ‘आरक्षण‘, ‘बॉडीगार्ड‘, ‘मेरे ब्रदर की दुल्हन‘, ‘फोर्स‘, ‘रा डॉट वन‘, ‘रॉक स्टार‘, ‘देसी ब्वॉयज‘ और ‘द डर्टी पिक्चर‘ ने अच्छी कमाई की। शाहरुख अभिनीत ‘डॉन-2‘ भी वर्षांत की सबसे ज्यादा कारोबार करने वाली फिल्म साबित हो सकती है। लेकिन सिनेमा जैसे भारी पैसे की व्यापारिक दुनिया में रहने के बावजूद कुछ लोग हैं जिन्हें मनुष्य का दुख-दर्द भी महसूस होता है और उसके संघर्ष की आंच से उनका संवेदनशील मन उद्वेलित होता रहता है। यही लोग सिनेमा का एक मानवीय और अर्थपूर्ण अस्तित्व गढ़ते रहते हैं और इन्हीं लोगों के कारण सिनेमा के मानचित्र पर प्रत्येक वर्ष कुछ बेहतरीन दस्तखत चमक जाते हैं। सन् 2011 में ज्यादा तो नहीं लेकिन आठ से दस फिल्में जरूर ऐसी बनी हैं जो सार्थक सिनेमा के चाहने वालों को यह आश्वासन देती हैं कि मनोरंजन के नाम पर सब कुछ फूहड़ कॉमेडी और तर्क रहित एक्शन में विलीन नहीं हो गया है। &lt;br /&gt;7 जनवरी 2011 को रिलीज हुई राजकुमार गुप्ता की फिल्म ‘नो वन किल्ड जेसिका‘ एक साफ-सुथरी, मर्मस्पर्शी  और वैचारिक फिल्म थी। सत्ता के केंद्र दिल्ली में कैसे तंत्र  और धन की सांठ-गांठ के सामने आम जीवन असहाय और निहत्था है, इसका ज्वलंत विमर्श इस फिल्म ने पर्दे पर साकार कर दिया था। दिल्ली के एक बहुचर्चित मर्डर केस पर आधारित इस फिल्म को बेहद सधे हाथों और संवेदनशील मन से बुना गया था। 21 जनवरी को किरण राव द्वारा निर्देशित पहली फिल्म रिलीज हुई ‘धोबी घाट‘। एक फोटो ग्राफर की आंख से देखी गयी इस फिल्म में आमिर खान और प्रतीक बब्बर ने कमाल का काम किया है। फिल्म के प्रदर्शन से पहले ही निर्देशिका किरण राव ने स्वीकार कर लिया था कि यह अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों की फिल्म है। अपनी पहली ही फिल्म को मुंबई का विमर्श बना कर किरण राव ने साहस का परिचय दिया। इसमें उन्होंने चार समानांतर कहानियों के जरिए मुंबई के जटिल यथार्थ को खोलने की कोशिश की। 4 फरवरी को सार्थक फिल्मों के निर्देशक सुधीर मिश्रा ‘ये साली जिंदगी‘ के साथ सामने आए। जिन फिल्मों को कंटेंट इज किंग कह कर परिभाषित किया जाता है वैसी फिल्म तो ये थी ही अभिनय के स्तर पर भी बेमिसाल रही। इसमें जीवंतता, सहजता और सशक्तता की एक नई ऊंचाई पर खड़े मिले इरफान खान। एक पंक्ति में कहना हो तो ये स्टाइल, कंटेंट और एक्टिंग की फिल्म रही जो जिंदगी के खट्टे-मीठे खुरदुरे अनुभवों का कोलाज बन गयी। 29 अप्रैल को रिलीज हुई एकता कपूर की फिल्म ‘शोर‘ में भी निर्देशक राज नीदिमोरू और कृष्णा डीके ने सपनों के शहर मुंबई में अपने-अपने दम पर अपने अपने तरीके से संघर्ष कर रहे कुछ युवाओं की जद्दोजहद को प्रस्तुत किया। इस फिल्म में भी तीन कहानियां समानांतर चलती हैं। बेरोजगारी, चोरी चकारी, क्रिकेट, लोकल की भीड़, मारामारी, प्यार, तीज त्योहार, झोपड़पट्टी, पांच सितारा पार्टियां, बीयर बार, पुलिस इन सबको साथ लेकर चलने वाली यह छोटी सी फिल्म बड़े पर्दे पर एक सशक्त कविता की तरह उभरती है। बतौर निर्देशक तो नहीं लेकिन बतौर निर्माता अनुराग कश्यप की फिल्म ‘शैतान‘ ने भी वर्ष 2011 में अपनी जोरदार उपस्थिति दर्ज करायी। समय, समाज, कहानी, चरित्र एकदम यथार्थवादी लेकिन कहने का अंदाज फंतासी में लिपटा हुआ, बिल्कुल जादुई यथार्थवाद जैसा। मौजूदा उत्तर आधुनिक समय की जमीन पर खड़ी फिल्म ‘शैतान‘ उन युवाओं की नीच ट्रेजेडी का बखान करती है जिनकी दिशाएं खो गई हैं। ‘शैतान‘ सिनेमा में रचनात्मकता को संभव करती है। 15 जुलाई को रिलीज हुई जोया अख्तर की फिल्म ‘जिंदगी ना मिलेगी दोबारा‘ बेहद खूबसूरती और संवेदनशीलता के साथ यह सार्थक संदेश देने में कामयाब हुई कि जिंदगी अगर जंग है तो जंग कर, कि जिजीविषा ही जीवन का अंतिम सच होना चाहिए। फिल्म के तीनों नायकों रितिक रोशन, फरहान अख्तर और अभय देओल ने जिंदगी की आखिरी सांस तक संघर्ष करने वाले युवकों का सफल प्रतिनिधित्व किया। 12 अगस्त को रिलीज हुई प्रकाश झा की फिल्म ‘आरक्षण‘ जहां बॉक्स ऑफिस के मोर्चे पर कामयाब हुई वहीं उसने एक महत्वपूर्ण संदेश देने का काम भी किया। समय, समाज, राजनीति और आरक्षण जैसे मुद्दों पर गंभीर चर्चा करने वाली इस फिल्म ने मनोरंजन को भी साधे रखा। एक्टिंग के स्कूल कहे जाने वाले अमिताभ बच्चन ने पूरी फिल्म को अपने जीवंत अभिनय से बांधे रखा। वहीं सैफ अली खान और दीपिका पादुकोन भी संवेदनशील और मर्मस्पर्शी अभिनय करने में कामयाब हुए। अभिनय की दुनिया के एक बड़े नाम पंकज कपूर के निर्देशन की पहली फिल्म ‘मौसम‘ 23 सितंबर को रिलीज हुई। दंगों के बैकड्रॉप पर पहले भी संवेदनशील प्रेम कहानियां रची गयी हैं। ‘मौसम‘ भी उसी कड़ी की एक नाजुक सी फिल्म थी जो इसलिए असफल हो गयी क्योंकि पंकज कपूर एक ही फिल्म में देश दुनिया में हुए कई सारे दंगों और आतंकवादी गतिविधियों को दिखाने का मोह नहीं समेट पाए। लेकिन अच्छी फिल्मों की सूची में ‘मौसम‘ का नाम शामिल रहना चाहिए जिसे शाहिद और सोनम कपूर के सुंदर अभिनय के लिए याद किया जाएगा। 11 नवंबर को निर्देशक इम्तियाज अली एक गायक के जीवन और संघर्ष पर बनी खुरदुरी तथा बेचैन कर देने वाली फिल्म ‘रॉकस्टार‘ लेकर आए। इस फिल्म में रणबीर कपूर ने साबित किया कि वह कपूर खानदान के एकदम काबिल वारिस हैं। फिल्म में रणबीर का बहुआयामी अभिनय दर्शकों को अचंभित कर गया। वहीं ए.आर. रहमान ने इसमें यादगार संगीत दिया।  2 दिसंबर को एकता कपूर ‘द डर्टी पिक्चर‘ लेकर आयीं जिसमें प्रतिभाशाली विद्या बालन ने साउथ की सनसनी सिल्क स्मिता का रंगारंग लेकिन पेचीदा किरदार बोल्ड और ब्यूटीफुल ढंग से निभा कर न सिर्फ हिंदी सिनेमा को समृद्ध किया बल्कि बॉक्स ऑफिस पर सिक्कों की बारिश भी करवायी। सिल्क स्मिता के बहाने यह फिल्म जगमग उजालों के पीछे थरथराते उदास और गर्दिश में डूबे चेहरों की मार्मिक दास्तान बन गयी। चमकदार सिनेमा के दारुण यथार्थ को इस फिल्म ने एक मर्मांतक चीख की तरह पेश किया। देखना है कि अगले वर्ष सार्थक फिल्मों की यह लकीर और कितनी बड़ी होगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-4276164705858938768?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/4276164705858938768/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2012/01/2011.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/4276164705858938768'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/4276164705858938768'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2012/01/2011.html' title='2011 के मानचित्र पर सार्थक सिनेमा के दस्तखत'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' 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फेल कर देना, ऊंची बिल्डिंगों से कूदना आदि आदि के स्तर पर सिनेमा कितना आगे पहुंच गया है पर एक तार्किक, दमदार और भावप्रवण कहानी कहने से चूक जाती है। शाहरुख खान की जितनी भी यादगार और बेहतरीन फिल्में हैं, वे सब की सब अपनी मर्मस्पर्शी कहानियों के कारण उल्लेखनीय हैं। इसमें शक नहीं कि ’डॉन-टू‘ एक भव्य और महंगी फिल्म है, जिसकी विदेशी लोकेशन मन को बांधती हैं। इसमें भी शक नहीं कि इसमें शाहरुख खान का वह निराला अंदाज भी मौजूद है, जिसकी वजह से वह किंग खान हैं लेकिन एक उम्दा कथा-पटकथा के अभाव के चलते ’डॉन-टू‘ सिर्फ एक स्टाइलिश फिल्म बनकर रह गयी है। फिल्म के एक और खतरनाक डॉन बोमन ईरानी के आदेश के बावजूद जब प्रियंका चोपड़ा खुद गोली खा लेती है लेकिन शाहरुख खान पर गोली नहीं चला पाती, पूरी फिल्म में केवल यही एक दृश्य ऐसा है जो दर्शकों को भावना के स्तर पर स्पर्श करता है। प्रियंका चोपड़ा एक सीनियर पुलिस अधिकारी है, जो शाहरुख खान को जेल की सलाखों के पीछे देखने की तमन्ना में पूरी दुनिया में मारी-मारी घूम रही है। तो भी ऐन मौके पर वह कमजोर पड़ जाती है और खुद गोली खा लेती है। इससे जाहिर होता है कि शाहरुख खान को लेकर रागात्मकता का कोई बारीक सा तार प्रियंका के भीतर झनझना रहा है। बाकी तो पूरी फिल्म एक अंतरराष्ट्रीय बैंक की नोट छापने की मशीन हड़पने की कोशिशों पर केंद्रित है। नोटों की इन प्लेटों को अंत में शाहरुख खान हासिल करने में कामयाब भी हो जाता है और पुलिस के चंगुल से आजाद भी हो जाता है, इस मशहूर डायलॉग के साथ, ’डॉन को पकड़ना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।‘ अंतिम सीन में शाहरुख जिस बाइक से आता है, उसकी नंबर प्लेट पर लिखा है- ’डॉन-3‘ यानी पिक्चर अभी बाकी है दोस्त। &lt;br /&gt;निर्देशक:  फरहान अख्तर &lt;br /&gt;कलाकार:  शाहरुख खान, प्रियंका चोपड़ा, लारा दत्ता, ओम पुरी, कुणाल कपूर, बोमन ईरानी &lt;br /&gt;संगीत:   शंकर-अहसान-लॉय&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-2395633463093250595?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/2395633463093250595/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/12/blog-post_26.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/2395633463093250595'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/2395633463093250595'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/12/blog-post_26.html' title='डॉन टू'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' 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कुछ नया करने की कोशिश करेंगे। यह कोशिश उन्होंने की भी है। बनारस से विनय पाठक मुंबई आता है और मेडिकल रिप्रजेंटेटिव की नौकरी पकड़ लेता है। कोल्हापुर से नेहा धूपिया आती है और एक कोरियाग्राफर रजत कपूर के डांस ग्रुप में शामिल हो जाती है। नेहा को एक बड़ी डांसर बनना है और बॉलीवुड में अपना निजी स्पेस बनाना है। विनय पाठक जहां एक छोटे शहर का सीधा-साधा, संस्कारवान और ईमानदार युवक है वहीं नेहा धूपिया बददिमाग, बिंदास और बोल्ड लड़की के किरदार में है जो अपनी चाहतों को पूरा करने के लिए शहर में जिद की तरह बनी हुई है। सपनों के शहर मुंबई में इन दोनों को सेल्स टैक्स वालों की सरकारी कॉलोनी में एक दूसरे के सामने किराए पर फ्लैट मिलता है। एक रात सरकारी छापा पड़ने के बाद नेहा का फ्लैट सील हो जाता है और वह जबरन विनय पाठक के फ्लैट में कब्जा जमा लेती है लेकिन किराए का आधा पैसा जबरन देकर। इसके बाद शुरू होता है दो विपरीत मूल्यों, सपनों और इच्छाओं का अनंत टकराव। यह टकराव ही इस फिल्म को दिलचस्प भी बनाता है और बाकी फिल्मों से थोड़ा अलग भी करता है। नेहा बात-बात में विनय को पप्पू कह कर उसका मजाक उड़ाती है वहीं विनय भी मौका पड़ने पर नेहा को नैतिकता का पाठ पढ़ाने से बाज नहीं आता। एक दिन नेहा तमक कर कहती है कि नैतिकता की इतनी बात करते हो तो मुंबई में क्या कर रहे हो? जाते क्यों नहीं अपने बनारस? बात विनय को लग जाती है और वह बनारस लौट जाता है। यहां से कहानी में एक नया मोड़ सौरभ ने यह दिया है कि मुंबई और नेहा को छोड़कर आने के बाद विनय पाठक इन दोनों में और ज्यादा रहने लगता है। इस बिंदु पर खड़े विनय को नसीरुद्दीन शाह बताता है कि विनय को नेहा से मोहब्बत हो गई है और उसकी मुक्ति नेहा की दुनिया में ही है। विनय नेहा के पास लौट आता है और एक-दूसरे को जमकर नापसंद करने वाले ये दो लोग एक साथ हो जाते हैं। फिल्म का गीत-संगीत और संवाद पक्ष प्रभावित करता है। फिल्म थोड़ी लंबी और बोझिल हो गई है जिससे बचा जा सकता था। जिन फिल्मों के लिए नेहा धूपिया को याद किया जाएगा उनमें एक फिल्म बिना शक ‘पप्पू कांट डांस साला‘ भी होगी। अगर इस फिल्म का कायदे से प्रचार किया गया होता तो बॉक्स ऑफिस पर यह फिल्म सफल हो सकती थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशक:   सौरभ शुक्ला &lt;br /&gt;कलाकार:  विनय पाठक, नेहा धूपिया, रजत कपूर, संजय मिश्रा, नसीरुद्दीन शाह, सौरभ शुक्ला&lt;br /&gt;संगीत:   मल्हार पाटेकर&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-8106821230714120768?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/8106821230714120768/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/12/blog-post_19.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/8106821230714120768'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/8106821230714120768'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/12/blog-post_19.html' title='पप्पू कांट डांस साला'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-3281200931273034443</id><published>2011-12-13T03:02:00.000-08:00</published><updated>2011-12-13T03:04:23.036-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा 11 दिसंबर 2011'/><title type='text'>लेडीज वर्सेस रिकी बहल</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साधारण है ‘लेडीज वर्सेस रिकी बहल’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशक वही, कलाकार वही और संगीतकार भी वही। फिर भी ‘लेडीज वर्सेस रिकी बहल’ वह करिश्मा नहीं कर सकी, जो यशराज बैनर की पिछले साल की हिट फिल्म ‘बैंड बाजा बारात’ ने किया था। केवल दिल्ली का परिवेश रखने और पंजाबी स्टाइल में डायलॉग बुलवा देने से कोई फिल्म दिलचस्प नहीं हो जाती। अच्छी फिल्म बनाने के लिए एक अच्छी कहानी का प्रभावशाली फिल्मांकन तो जरूरी है ही, चरित्रों का जीवंत और सहज होना भी अनिवार्य है। ‘लेडीज वर्सेस रिकी बहल’ की कहानी तो साधारण है ही, उसे फिल्माया भी किसी डॉक्यूमेंट्री की तरह गया है। अनुष्का शर्मा और रणवीर सिंह की जोड़ी ने ‘बैंड बाजा बारात’ में जो उम्मीद जगायी थी, उसे उन्होंने इस फिल्म में खुद ही तोड़ दिया। निर्देशक मनीष शर्मा इस बार इस जोड़ी से कुछ निकलवा नहीं पाये। निकलवाते भी कैसे? कहानी में कोई बात होती तब न, कोई करिश्मा किया जाता! रणवीर ंिसंह एक ठग हैं, जो लड़कियों को अपने जाल में फंसाकर उनके पैसे लूट लेता है। एक शहर की लड़की को बेवकूफ बनाकर वह दूसरे शहर की राह पकड़ लेता है। छोटे से जीवन में वह कुल 30 लड़कियों को ठग लेता है। प्रतिनिधि के रूप में कुल तीन लड़कियों को फिल्म में उसका शिकार दिखाया गया है। ये हैं मुंबई की दीपानिता शर्मा, लखनऊ की अदिति शर्मा ओैर दिल्ली की परिणति चोपड़ा। ठगे जाने के बाद तीनों एकजुट होती हैं और एक चतुर सेल्स गर्ल अनुष्का शर्मा को अपने साथ मिला गोवा पहुंचती हैं, जो रणवीर सिंह का नया ठिकाना है। नयी शिकार अनुष्का को ठगने की इस प्रक्रिया के दौरान रणवीर सिंह खुद शिकार बन जाता है। एक प्रसंग के दौरान वह जान जाता है कि उसे ठगा जा रहा है, लेकिन इस सच को जान लेने के बाद भी वह अपने पांव पीछे नहीं खींचता, क्योंकि तब तक उसे अनुष्का से सचमुच का प्यार हो जाता है। वह तीनों लड़कियों को उनका कुल एक करोड़ रुपया वापस लौटा देता है और अनुष्का से लाइफ का रियल पार्टनर बनने की गुजारिश करता है। हैप्पी एंड। ठगी का धंधा बड़ा हैरतअंगेज होता है। उसके लिए जबर्दस्त प्रतिभा चाहिए। रणवीर में इस प्रतिभा का अभाव दिखता है। अनुष्का इतनी जल्दी खुद को रिपीट करने लगेगी सोचा न था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशक:   मनीष शर्मा&lt;br /&gt;कलाकार:  रणवीर सिंह, अनुष्का शर्मा, परिणति, दीपानिता और अदिति।&lt;br /&gt;संगीत:   संगीतः सलीम सुलेमान&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-3281200931273034443?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/3281200931273034443/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/12/blog-post_13.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/3281200931273034443'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/3281200931273034443'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/12/blog-post_13.html' title='लेडीज वर्सेस रिकी बहल'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-1863160254544352242</id><published>2011-12-05T01:53:00.000-08:00</published><updated>2011-12-05T01:54:31.610-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा 4 दिसंबर 2011'/><title type='text'>द डर्टी पिक्चर</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बोल्ड एंड ब्यूटीफुल ‘द डर्टी पिक्चर’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कथा, पटकथा, संवाद और गीत के लिए 2011 के तमाम महत्वपूर्ण एवॉर्ड रजत अरोड़ा को मिलने वाले हैं। क्या संयोग है कि वर्ष की शुरुआत 7 जनवरी को रिलीज विद्या बालन की फिल्म ‘नो वन किल्ड जेसिका’ से हुई और लगभग अंत भी 2 दिसम्बर को रिलीज विद्या बालन की फिल्म ‘द डर्टी पिक्चर’ से हुआ। यकीनन इस वर्ष के कई एवॉर्ड की हकदार विद्या बालन भी हैं। इस फिल्म के माध्यम से विद्या बालन ने साबित कर दिया है कि वह एक प्रतिभाशाली, संवेदनशील और बहुआयामी अभिनेत्री हैं। आठवें दशक में साउथ की सुपरस्टार हीरोइन सिल्क स्मिता की रियल लाइफ पर आधारित इस चुनौतीपूर्ण किरदार को निभाने का साहस बॉलीवुड की कई मशहूर अभिनेत्रियां नहीं कर पायी थीं। ऐसे में विद्या बालन आगे आयीं और उन्होंने बता दिया कि वह ब्यूटीफुल तो हैं ही बोल्ड भी हैं। निर्माता एकता कपूर की यह विशेषता बनती जा रही है कि वह आरंभ तो किरदारों से करती हैं लेकिन अंततः परिवेश और समय को ही फिल्म का विमर्श और चरित्र बना देती हैं। यह फिल्म भी सिल्क स्मिता के बहाने तत्कालीन दक्षिण भारतीय सिनेमाई परिवेश और समय के साथ-साथ रोशनी के पीछे अंधकार के अस्तित्व को रेखांकित करती है। और चूंकि फिल्म हिन्दी में है, इसलिए यह पूरे हिन्दी सिनेमा वह वाला उदास और गर्दिश में डूबा चेहरा बन जाती है, जो जगमग उजालों के पीछे खड़ा थरथराता रहता है। निर्देशक मिलन लूथरिया ने सभी कलाकारों का श्रेष्ठ निकलवाने में कामयाबी पायी है लेकिन इंटरवल के बाद वह थोड़ा लड़खड़ा गये हैं। रियल लाइफ को ज्यादा से ज्यादा दर्शाने के मोह में उन्होंने फिल्म को बेवजह लंबा कर दिया है। इंटरवल के बाद वाले हिस्से को बड़ी सहजता से 15 से 20 मिनट छोटा किया जा सकता था। इससे फिल्म और कस जाती और ‘मेरा इश्क सूफियाना’ जैसे बेहतरीन गीत पर दर्शक हॉल से बाहर नहीं जाते। इसी गीत में विद्या बालन गजब की दिलकश और मोहक लगती हैं। बाकी फिल्म में तो उनका सेक्सी अवतार है। तुषार कपूर बहेतरीन काम कर गये हैं तो इमरान हाशमी ने भी बताया है कि वह केवल सीरियल किसर ही नहीं हैं, बल्कि अभिनय भी कर सकते हैं। फिल्म के अंत में सिल्क को लेकर अपने भीतर उमड़ते आवेग को इमरान ने खूबसूरत अभिव्यक्ति दी है। जब तक सिनेमा है, तब तक शायद ऐसी फिल्में बीच-बीच में बनती रहेंगी कि सिनेमा में हीरोइनों का किस कदर शोषण होता है। चमकदार सिनेमा के दारुण यथार्थ को मर्मांतक चीख की तरह अनुभव करने के लिए फिल्म जरूर देखनी चाहिए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशक:   मिलन लूथरिया &lt;br /&gt;कलाकार:  नसीरुद्दीन शाह, विद्या बालन, तुषार कपूर, इमरान हाशमी, अंजु महेन्द्रू &lt;br /&gt;लेखक:   रजत अरोड़ा &lt;br /&gt;संगीत:   विशाल-शेखर&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-1863160254544352242?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/1863160254544352242/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/12/blog-post.html#comment-form' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/1863160254544352242'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/1863160254544352242'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/12/blog-post.html' title='द डर्टी पिक्चर'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-3934839819738609267</id><published>2011-11-28T02:40:00.000-08:00</published><updated>2011-11-28T02:41:48.661-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा 27 नवंबर 2011'/><title type='text'>देसी ब्वायज</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जॉबलेस देसी ब्वायज&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कॉमेडी को सफलता का माई-बाप समझने की झोंक में कैसे एक संजीदा और इमोशनल सब्जेक्ट का कचरा किया जा सकता है, यह जानने के लिए ‘देसी ब्वायज’ देखनी चाहिए। अच्छे गीत-संगीत और लंदन की भव्य लोकेशन से सजी बड़ी स्टार कास्ट वाली यह फिल्म काफी बेहतर बन सकती थी। अगर इंटरवल के बाद निर्देशक को यह धुन सवार नहीं होती कि फिल्म को कॉमिक ट्रीटमेंट देना चाहिए। कॉमेडी फिल्मों के सरताज निर्देशक डेविड धवन के बेटे रोहित धवन की यह पहली निर्देशित फिल्म है। विश्व भर के लोगों को प्रभावित करने वाला विषय उठाकर रोहित ने एक सार्थक कदम उठाया। इंटरवल तक उस विषय को समझदारी और संवेदना के साथ भी फिल्माया। लगा कि रोहित एक गंभीर और मर्मस्पर्शी फिल्म बनाकर बॉलीवुड में अपना एक अलग मुकाम बनाएंगे। लेकिन इंटरवल के बाद पता नहीं किसकी सलाह पर उन्होंने यू टर्न लिया और कॉमेडी की डगर पर चल पड़े। इस डगर पर पांव धरते ही वह जो फिसले तो फिल्म उनकी पकड़ से छूट गयी। नतीजा, अपनी संपूर्णता में फिल्म न इमोशनल रह पायंी और न ही कॉमेडी बन पायी। दुख की बात यह भी हुई कि दीपिका पादुकोण और चित्रांगदा सिंह जैसी प्रतिभाशाली अभिनेत्रियों से कोई काम ही नहीं लिया जा सका। अक्षय कुमार और जॉन अब्राहम का अभिनय फिल्म को कितनी दूर ले जाता जब कथानक ही खो गया। सन् 2009 में जो विश्व्यापी मंदी आयी थी उसकी चपेट में लंदन में रहने वाले ये दो दोस्त अक्षय और जॉन भी आ जाते हैं। सब तरफ से हारकर इन्हें ‘मेल एस्कॉर्ट्स’ (पुरुष वेश्या) के धंधे में उतरना पड़ता है। जिस कारण जॉन को अपनी प्रेमिका और अक्षय को अपने भांजे से जुदा होना पड़ता है। दुखी जॉन अपने पंद्रह साल पुराने दोस्त अक्षय को अपने घर से निकाल देता है। इसके बाद बेरोजगार अक्षय कॉलेज वापस लौटता है अपनी पढ़ाई पूरी करने और जॉन अपनी रुठी हुई प्रेमिका दीपिका को मनाने के करतबों में जुट जाता है। दोनों के पास पैसा कहां से आता है, यह एक रहस्य है। अंत में जॉन को दीपिका मिल जाती है और अक्षय को उसका भांजा वीर। लंदन में जॉबलेस हुए देसी ब्वायज फिर से दोस्त बन जाते हैं और ‘बा- रोजगार’ भी। जॉन का काम बेहतरीन है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;निर्देशक:  रोहित धवन &lt;br /&gt;कलाकार:  अक्षय कुमार, जॉन अब्राहम, दीपिका पादुकोण, चित्रांगदा सिंह, ओमी वैद्य, संजय दत्त (मेहमान भूमिका) &lt;br /&gt;संगीत:   प्रीतम चक्रवर्ती&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-3934839819738609267?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/3934839819738609267/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/11/blog-post_28.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/3934839819738609267'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/3934839819738609267'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/11/blog-post_28.html' title='देसी ब्वायज'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-3321734065826544</id><published>2011-11-21T02:06:00.001-08:00</published><updated>2011-11-21T02:06:55.833-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा 20 नवंबर 2011'/><title type='text'>शकल पे मत जा</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘शकल पे मत जा‘&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अकल भी कहां है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शुभ द्वारा निर्देशित ‘शकल पे मत जा‘ माइंडलेस कॉमेडी नहीं माइंड घर पे रख कर बनायी गयी फिल्म है। बॉलीवुड में भी अजब गजब गोरखधंधा है। प्रतिभाशाली लोग या तो सिनेमा बना नहीं पाते, बना लेते हैं तो उन्हें रिलीज के लिए सिनेमा हॉल नहीं मिलते, एकाध सिनेमा हॉल मिल जाता है तो दर्शक फिल्म देखने नहीं आते। दूसरी तरफ कॉमेडी के नाम पर प्रोड्यूसर भी मिल जाता है, डिस्ट्रीब्ूयटर भी मिल जाता है और दर्शक भी झूमते-झामते फिल्म देखने पहुंच जाते हैं। ‘शकल पे मत जा‘ मानव श्रम और धन की बरबादी की उम्दा और कारुणिक मिसाल है। हालांकि निर्देशक ने जरूर यह मुगालता पाल लिया होगा कि वह युवाओं को संबोधित एक आधुनिक और मजाकिया फिल्म बनाने में कामयाब है लेकिन असल में यह हास्यप्रद नहीं हास्यास्पद और बचकानी फिल्म है जिसे देखते हुए लगातार रोना आता रहता है। नये लड़कों और थोड़े से पैसों को लेकर बनायी गयी यह फिल्म असल में कुछ गलतफहमियों के कारण पैदा हुई अराजकता पर फोकस करते हुए एक निकम्मी और कम अक्ल सुरक्षा व्यवस्था पर चोट करना चाहती है लेकिन चोट करने की अकल न होने के कारण एक बेतुकी और बोर नौटंकी में बदल जाती है। सौरभ शुक्ला और रघुवीर यादव जैसे प्रतिभावान लोग इन फिल्मों में काम करके खुद अपने ऊपर गोली दाग रहे हैं। क्या बॉलीवुड में काम की बहुत कमी है? फिल्म की कहानी कॉलेज के तीन लड़कों के प्रोजेक्ट से शुरू होती है। चौथा हीरो का 13 साल का भाई है। प्रोजेक्ट के तहत एक डॉक्यूमेंट्री बनानी है - आतंकवादी गतिविधियों पर केंद्रित। शूटिंग के दौरान दिल्ली एयरपोर्ट पर एक जहाज की लेंडिंग को शूट करते हुए चारों पुलिस द्वारा धर लिए जाते हैं। इन चारों की हास्यास्पद ढंग से की जा रही जांच में ही पिचहत्तर प्रतिशत फिल्म खप जाती है। बाकी पच्चीस प्रतिशत में बताया जाता है कि एयरपोर्ट पर असली आतंकवादी भी मौजूद थे जो हवाईजहाज उड़ाना चाहते थे। चारों लड़के तो केवल इसलिए फंस गये क्योंकि अपनी शूटिंग में उन्होंने एयरपोर्ट के अलावा राष्ट्रपति और संसद भवन भी शूट किया था और बम बनाने, हवाई जहाज उड़ाने तथा आरडीएक्स पर चर्चा भी की थी। आखिर में हीरो द्वारा असली बम को डिफ्यूज करने के शॉट पर फिल्म खत्म होती है और नेरेशन द्वारा फिल्म की कहानी समझायी जाती है। फिल्म देखने की कोई वजह नहीं है। दो गाने अच्छे हैं लेकिन उनका फिल्मांकन कमजोर है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशक:   शुभ&lt;br /&gt;कलाकार:  शुभ, प्रतीक कटारे, सौरभ शुक्ला, रघुवीर यादव, आमना शरीफ, जाकिर हुसैन, चित्रक, प्रदीप काबरा, हर्षल पारेख, राजकुमार कनौजिया&lt;br /&gt;संगीत:   सलीम-सुलेमान&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-3321734065826544?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/3321734065826544/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/11/blog-post_21.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/3321734065826544'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/3321734065826544'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/11/blog-post_21.html' title='शकल पे मत जा'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-7732069311548524054</id><published>2011-11-14T01:51:00.000-08:00</published><updated>2011-11-14T01:54:11.868-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा 13 नवम्बर 2011'/><title type='text'>रॉकस्टार</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अजब-गजब सा ‘रॉकस्टार’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इम्तियाज अली की इस तीसरी फिल्म को एआर रहमान के अद्भुत संगीत और रणबीर कपूर के बहुआयामी अभिनय के लिए देखना चाहिए। बहुत कम समय में रणबीर कपूर अभिनय के नये-नये अंदाज दिखा रहे हैं। इस फिल्म में तो उन्होंने  साबित कर दिया है कि वह एक चरित्र की कितनी सारी छायाओं को जी सकते हैं। दिल्ली के एक पंजाबी मुंडे जनार्दन जाखड़, उर्फ जेजे के, गायक बनने के लड़खड़ाते ख्वाब से शुरू हुआ उसका सफर यूरोप के रॉक स्टार जॉर्डन बनने के पायदान तक एक्टिंग के कई पन्ने पलटता है। इम्तियाज ने फिल्म को मजाकिया अंदाज में आरंभ किया था जिसका दर्शकों ने दिल खोलकर मजा भी लिया लेकिन इंटरवल के बाद फिल्म ने अचानक एक बोझिल और अराजक यू टर्न लिया। फिर तो फिल्म उनके हाथ से फिसलती ही चली गयी। पहली फिल्म के हिसाब से नरगिस फाखरी ने बेहतर काम करने की कोशिश की लेकिन उनका चरित्र इस कदर उलझा हुआ था कि वह खुद भी उसी में उलझ कर रह गयीं। रणबीर कपूर के साथ वह एक आवारा, अराजक, लंपट और बिंदास जीवन के कुछ क्षण बिताना चाहती हैं। बिताती भी हैं लेकिन एक अमीर एनआरआई के साथ ब्याह कर के विदेश (प्राग) भी चली जाती हैं। इधर दिल्ली में रणबीर अपने घर से धक्के देकर बाहर निकाल दिये जाने के बाद थोड़ा बहुत गा-बजाकर थोड़ा सा पहचाना चेहरा बन जाता है। नरगिस से मिलने की चाह में वह पीयूष मिश्रा की सारी शर्तें मान कर उनकी संगीत कंपनी के साथ सात देशों के टूर पर जाता है। जहां उसकी मुलाकात प्राग में नरगिस से हो जाती है। यहां नरगिस उलझ जाती है। वह अपना घर भी बचाए रखना चाहती है और रणबीर कपूर का जंगली और दीवाना आमंत्रण उसमें ऊर्जा भी भरता है। इस बीच रणबीर कपूर स्टार बनता चलता है लेकिन कभी अनुबंध तोड़कर, कभी मीडिया पर्सन से उलझकर, कभी किसी कंसर्ट में न पहुंच कर ठुकता-पिटता और जेल भी जाता रहता है। शरीर में खून न बनने की बीमारी के चलते नरगिस एक दिन दम तोड़ देती है और हमारा रॉक स्टार अपनी प्रेमिका की फेंटेसी में जीने लगता है। संगीत के बैकड्रॉप पर दो युवाओं की अजब-गजब प्रेम कहानी को इम्तियाज ने अपने अंदाज और मुहावरे में ढालने की पुरानी कोशिश की है लेकिन यह कोशिश उनके पहले प्रयोग ‘जब वी मेट’ जैसी कामयाब नहीं है। फिल्म में दिल्ली स्टाइल संवाद आकर्षित करते हैं। तमाम गाने पहले से ही हिट हो चुके हैं।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;निर्देशक:   इम्तियाज अली&lt;br /&gt;कलाकार:  रणबीर कपूर, नरगिस फाखरी, पीयूष मिश्रा, शेरनाज पटेल और शम्मी कपूर&lt;br /&gt;गीत:   इरशाद कामिल&lt;br /&gt;संगीत:   ए आर रहमान&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-7732069311548524054?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/7732069311548524054/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/11/blog-post_14.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/7732069311548524054'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/7732069311548524054'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/11/blog-post_14.html' title='रॉकस्टार'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image 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हैं जो किसी भी कमर्शियल फिल्म को कामयाब बनाते हैं। बड़े सितारे हैं, अद्भुत तो नहीं लेकिन एक ठीकठाक सी कहानी है, एक्शन है, थ्रिल है, डांस है और है एक नयी सी लोकेशन। पूरी फिल्म को थाइलैंड के नजदीक स्थित पटाया सिटी में शूट किया गया है जिसे देखना आंखों को अच्छा लगता है। पता नहीं अपने हिंदुस्तानी शहरों में साफ-सफाई क्यों नहीं रखी जाती? फिल्म की वन लाइन स्टोरी यह है कि मुंबई के चार लोकल गुंडे और टपोरी-सुनील शेट्टी, गोविंदा, जावेद जाफरी और महाअक्षय चक्रवर्ती (मिथुन दा के बेटे) एक लोकल डॉन के कहने पर पटाया में किसी अमीर आदमी का घर लूटने जाते हैं लेकिन लोकल संपर्क श्वेता भारद्वाज द्वारा किसी गलत पते पर भेज दिये जाने के कारण खुद फंस जाते हैं। वह गलती से पटाया के एक खतरनाक डॉन महेश मांजरेकर की तिजोरी साफ कर देते हैं। इसके बाद शुरू होता है एक से बढ़कर एक दुर्घटनाओं में उलझने का सिलसिला। खास न होने के बावजूद पूरी फिल्म शुरू से अंत तक बांधे रखती है और मजे को खंडित नहीं होने देती। हर एक्टर अपनी अलग-अलग छाप छोड़ता है। जावेद जाफरी का हास्य, सुनील शेट्टी का एक्शन, महाअक्षय का लड़कपन और सबसे ऊपर गोविंदा का दिलचस्प तमाशा तथा रोचक संवाद। रवि किशन ने भी अच्छा कॉमिक रोल किया है। राखी सावंत का आइटम नंबर फिल्म की यूएसपी बन सकता था लेकिन उसे फिल्म के समाप्त हो जाने के बाद दिखाने से वह नष्ट हो गया है। हिंदी-पंजाबी फिल्मों के हिट गायक मीका ने भी इस फिल्म में पटाया के लोकल गुंडे का किरदार निभाया है और क्या खूब निभाया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशक:   रजनीश ठाकुर &lt;br /&gt;कलाकार: गोविंदा, सुनील शेट्टी, जावेद जाफरी, महाअक्षय चक्रवर्ती, रवि किशन, महेश मांजरेकर किम शर्मा, प्रेम चोपड़ा&lt;br /&gt;संगीत:   श्रवण, शमीर, मीका&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-425875162844608064?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/425875162844608064/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/11/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/425875162844608064'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/425875162844608064'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/11/blog-post.html' title='लूट'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-8230538952228316368</id><published>2011-10-29T02:58:00.000-07:00</published><updated>2011-10-29T03:00:36.715-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा 29 अक्तूबर 2011'/><title type='text'>रा.वन</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल से नहीं तकनीक से ‘रा.वन‘&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लगभग दो सौ करोड़ रुपए खर्च कर के बनायी गयी भव्य ‘रा.वन‘ अपनी लागत भले ही निकाल ले या उससे दो कदम आगे बढ़कर दो-चार गुना ज्यादा मुनाफा भी कमा ले लेकिन यह फिल्म न तो दर्शकों के दिल को छूती है और न ही शाहरुख खान की प्रतिभा में कोई इजाफा करती है। यह दिल से बनी हुई फिल्म नहीं है जिसके लिए शाहरुख खान पूरी दुनिया के दर्शकों के दिलों पर राज करते हैं। जो लोग शाहरुख खान को कुछ कुछ होता है, कभी हां कभी ना, कल हो ना हो, मोहब्बतें, देवदास, मैं हूं ना, वीर जारा, चक दे इंडिया और दिल से के लिए दिल दिए बैठे हैं वे ‘रा.वन‘ देखकर एक विराट उदासी से भर जाएंगे क्योंकि ‘रा.वन‘ शुद्ध रूप से एक साइंस फिक्शन है जिसमें तकनीक राज करती है। जिन दर्शकों का विज्ञान से राई-रत्ती का भी नाता नहीं है उनके लिए तो यह फिल्म एक अजीबो गरीब पहेली जैसी है। लगभग इंटरवल तक तो फिल्म पूरी तरह कम्प्यूटर की बारीकियों, उच्च तकनीक वाले वीडियो गेम, विज्ञान की गुत्थियों और बुराई के प्रतीक रा.वन तथा अच्छाई के प्रतीक जी.वन के निर्माण की प्रक्रिया में ही उलझी रहती है। बुराई का प्रतीक बना रा.वन शाहरुख खान द्वारा निर्मित गेम से बाहर आ जाता है और खुद अपनी मर्जी का मालिक बन बैठता है। उससे उलझने के दौरान शाहरुख खान मारा जाता है। पीछे छूट जाती है उसकी पत्नी करीना कपूर और उसका बेटा अरमान वर्मा। चूंकि अरमान ने गेम बीच में ही छोड़ दिया था इसलिए गेम से बाहर निकले रा.वन को अरमान की तलाश है ताकि वह उसे मार कर गेम पूरा कर सके। शाहरुख खान ने रा.वन के साथ-साथ अच्छाई के प्रतीक जी.वन का भी निर्माण किया था। अरमान इस जी.वन को गेम के भीतर से खोज निकालता है और उसे भी रा.वन की तरह गेम के बाहर वास्तविक दुनिया में ले आता है। यह जी.वन जो हू-ब-हू शाहरुख खान की कॉपी लगता है, अरमान और करीना की कदम कदम पर रक्षा करता है। फिर जैसा कि होना चाहिए अंतिम मुकाबले में जी.वन रा.वन को नष्ट कर देता है और स्वयं भी इस नश्वर दुनिया से विदा लेता है। फिल्म को नीरसता से बचाने के लिए फ्लैश बैक का इस्तेमाल किया गया है। फ्लैश बैक में शाहरुख खान का पारिवारिक जीवन दर्शाया गया है जिसमें करीना कपूर के साथ उसका रोमांस भी शामिल है। अगर यह हिस्सा नहीं रखा गया होता तो पता नहीं फिल्म का क्या बनता। इस संवेदनशील हिस्से ने शाहरुख खान की प्रतिष्ठा की लाज रख ली है। इसी हिस्से में शाहरुख और करीना का ‘छमक छल्लो‘ वाला महा पॉपुलर आइटम नंबर भी है। इस गाने और डांस से करीना अपने दर्शकों का दिल जीत लेती हैं। कुल मिलाकर एक बड़ी फिल्म है जो हमें एक नए अनुभव से गुजारती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशक:   अनुभव सिन्हा&lt;br /&gt;कलाकार:  शाहरुख खान, करीना कपूर, अर्जुन रामपाल, अरमान वर्मा, सतीश शाह, शहाना गोस्वामी।&lt;br /&gt;संगीत:   विशाल-शेखर&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-8230538952228316368?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/8230538952228316368/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/10/blog-post_29.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/8230538952228316368'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/8230538952228316368'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/10/blog-post_29.html' title='रा.वन'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-3972670400791217667</id><published>2011-10-17T03:23:00.000-07:00</published><updated>2011-10-17T03:25:03.891-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा 16-10-2011'/><title type='text'>माई फ्रेंड पिंटो</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खुशी बांटता ‘माई फ्रेंड पिंटो’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर प्रतिभाशाली युवा अभिनेता प्रतीक बब्बर के व्यक्तित्व को अभिव्यक्त करता हुआ एक चरित्र निर्देशक राघव डार ने खोज निकाला। राघव की फिल्म ‘माई फ्रेंड पिंटो’ में प्रतीक बब्बर का किरदार प्रतीक को एक नयी ऊंचाई और संभावना देगा। एक बार फिर सिद्ध हुआ कि अगर जरा भी अलग और फ्रेश सी कहानी हो तो बिना महंगे बजट और स्टार कास्ट के एक बेहतर फिल्म बनायी जा सकती है। ‘माई फ्रेंड पिंटो’ एक फन फिल्म है जो आपके ज्ञान या संवेदना में कोई इजाफा नहीं करती। लेकिन जितनी देर आप हॉल में हैं, पूरी तरह फिल्म में डूबे रहते हैं। पर्दे पर घटती घटनाओं का न सिर्फ मजा लेते रहते हैं बल्कि खुद को भी फिल्म का हिस्सा मानने लगते हैं। अपने रचना कर्म में दर्शकों को भी शामिल कर लेने का अच्छा कौशल राघव डार ने पेश किया है। यह एक रात की फिल्म है। प्रतीक अपने दोस्त से मिलने माया नगरी मुंबई आता है जहां शहर में विभिन्न जगहों पर घट रही अजीबो गरीब घटनाएं उससे टकराती हैं। इस एक रात में वह अपने दोस्त अर्जुन माथुर की नकचढ़ी और महत्वाकांक्षी बीबी से टकराता है। डॉन मकरंद देशपांडे से टकराता है। डांसर बनने मुंबई आयी कलकी कोचलिन से टकराता है। कुछ और भी जरूरी-गैर जरूरी चरित्र उसके जीवन में उस रात उतरते हैं। वह सबको खुश रखने का प्रयास करता है। मुंबई में वह खुद को बहुत ‘मिसफिट’ पाता है लेकिन अपनी मासूमियत से सबका दिल लूट लेता है, सबकी मदद करता है। एक घटना प्रधान फिल्म है जो बेहद मनोरंजक तथा दिलचस्प भी है। इंटरवल तक फिल्म को ले कर भ्रम बना रहता है कि यह क्या कहना चाहती है लेकिन इंटरवल के बाद फिल्म न सिर्फ गति पकड़ती है बल्कि एक शेप भी लेती जाती है। कलकी कोचलिन और प्रतीक बब्बर में भले ही ग्लैमर न हो लेकिन ये दोनों भविष्य की बड़ी उम्मीद हैं। मकरंद देशपांडे और राज जुत्शी की कॉमेडी कहीं कहीं लाउड हो गयी है लेकिन बोझिल नहीं लगती। प्रत्येक चरित्र को उसकी जरूरत के मुताबिक ही स्पेस दिया गया है। प्रतीक और कलकी का बादलों में डांस करने का एक फंतासी दृश्य लुभावना है तो फिल्म के गीतों में ताजगी तथा युवापन। युवा दर्शकों के लिए एक खुशनुमा और जिंदादिल फिल्म-लीक से हट कर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशक:   राघव डार&lt;br /&gt;कलाकार:  प्रतीक बब्बर, कलकी कोचलिन, दिव्या दत्ता, मकरंद देशपांडे, राज जुत्शी, अर्जुन माथुर&lt;br /&gt;संगीत:  अजय गोगावले, अतुल गोगावले, समीर टंडन, कविता सेठ&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-3972670400791217667?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/3972670400791217667/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/10/blog-post_17.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/3972670400791217667'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/3972670400791217667'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/10/blog-post_17.html' title='माई फ्रेंड पिंटो'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-1340787271709405202</id><published>2011-10-08T03:07:00.000-07:00</published><updated>2011-10-08T03:08:51.156-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='8-10-2011'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा'/><title type='text'>रास्कल्स</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘रास्कल्स‘ देखो और भूल जाओ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संजय दत्त के होम प्रोडक्शन की पहली फिल्म थी इसलिए उन्होंने ऐसा कोई रिस्क लेना उचित नहीं समझा कि मामला घर फूंक तमाशा जैसा बन जाए। ‘रास्कल्स‘ का निर्देशन उन्होंने डेविड धवन को सौंपा जो ‘माइन्डलेस कॉमेडी‘ के उस्ताद हैं। डेविड धवन को सिनेमा की सार्थकता वगैरह में कोई दिलचस्पी नहीं है। वह चाहते हैं कि दर्शक उनकी फिल्म देखने आए। सिनेमा हॉल में फिल्म देखने के बाद खुश खुश घर जाए और मस्त रहे। ‘रास्कल्स‘ उनके इस उद्देश्य को पूरा करती है। फिल्म को देखने जाते समय दिमाग घर छोड़ जाएं, उसकी ‘रास्कल्स‘ में कोई जरूरत नहीं है। कौन, कहां क्यों है, क्या कर रहा है, क्यों कर रहा है, कैसे कर पा रहा है इस सब झमेले में नहीं पड़ना है। केवल अधनंगे जिस्मों को देख आंखें सेंकनी हैं, मजेदार संवाद सुनने हैं, अदभुत विदेशी लोकेशन्स देखनी हैं, कुछ मजेदार घटनाओं के कारण घटता हास्य एंजॉय करना है और इस यथार्थ का लुत्फ उठाना है कि संजय दत्त, अजय देवगन और कंगना रानावत जैसे प्रतिभाशाली कलाकार जो फैशन, वन्स अपऑन ए टाइम इन मुंबई, मुन्ना भाई एमबीबीएस, अपहरण, वास्तव तथा गंगाजल के कारण जाने जाते हैं, बाजार के सामने कितने लाचार नजर आते हैं! कंगना ने जिस कदर देह प्रदर्शन किया है उसे देख शायद अब कोई उन्हें फिर से इस तरह देखने की इच्छा में नहीं तड़पेगा। कहानी पर कोई बात अब तक इसलिए नहीं की गयी है क्योंकि इस फिल्म में कोई कहानी है ही नहीं। केवल कुछ घटनाओं को इकट्ठा कर उनका कोलाज जैसा बनाया गया है। अजय देवगन और संजय दत्त मुंबई के ठग टाइप के चरित्र हैं जो पूरी दुनिया में लोगों को ठगते हुए घूमते हैं और आपस में रंजिश भी रखते हैं। दोनों की जिंदगी में कंगना रानावत आती है। थोड़ी कॉमेडी और सेक्स कंगना को पटाने की प्रक्रिया में दिखाया जाता है। अर्जुन रामपाल का चरित्र डाल कर फिल्म को थ्रिलर का स्पर्श देने की भी कोशिश की गयी है। हास्य जुटाने के लिए एक टुकड़ा दृश्य में सतीश कौशिक को भी लपेटा गया है और जिस्मानी नुमाईश सजाने के लिए कंगना काफी नहीं थी तो लीसा हेडन को भी टपकाया गया है। आप बोर नहीं होंगे। हंसेंगे, मजा लेंगे और घर लौट आएंगे। कुछ लोग सिनेमा का यही मकसद समझते हैं। उनको यह फिल्म दशहरा उत्सव का गिफ्ट है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;निर्देशक:   डेविड धवन&lt;br /&gt;कलाकार:  संजय दत्त, अजय देवगन, कंगना रानावत, सतीश कौशिक, अर्जुन रामपाल, लीसा हेडन&lt;br /&gt;संगीत:  विशाल-शेखर&lt;br /&gt;गीत: इरशाद कामिल-अन्विता दत्त&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-1340787271709405202?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/1340787271709405202/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/10/blog-post_08.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/1340787271709405202'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/1340787271709405202'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/10/blog-post_08.html' title='रास्कल्स'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-5163222878140371277</id><published>2011-10-04T03:00:00.000-07:00</published><updated>2011-10-04T03:03:49.915-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा 2 अक्तूबर 2011'/><title type='text'>फोर्स</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जॉन की ‘फोर्स‘ में जान है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस तरह से सिनेमा हॉल भरा हुआ था उसे देख लगता है, कि आज की युवा पीढ़ी भी पिछली पीढ़ी की तरह एक्शन फिल्में देखने को तरजीह देती है। शायद इसीलिए इस वर्ष की तीनों एक्शन फिल्में ‘सिंघम’, ‘बॉडीगार्ड’ और ‘फोर्स’ बॉक्स ऑफिस पर भीड़ खींचने में सफल रहीं। जबकि तीनों फिल्मों के हीरो अलग अलग हैं - अजय देवगन, सलमान खान और जॉन अब्राहम। फोर्स में निशिकांत कामत ने मारधाड़ और रोमांस के अलावा एक बारीक सा कथा तत्व यह भी रखा है कि पुलिस फोर्स के लोग भी आम लोगों की तरह परिवार, इमोशंस और रोमांस को जीते हैं, जीना चाहते हैं। उनका प्यार उन्हें कमजोर भी बनाता है लेकिन मृत्यु के भय से वह जीने की चाहत नहीं छोड़ देते हैं। फिल्म को निशिकांत कामत ने कहीं भी ढीला नहीं छोड़ा है। कहीं एक्शन, तो कहीं संवाद तो कहीं अभिनय के जरिये पूरी फिल्म लगातार देखे जाते जाने की अनिवार्यता में तनी रहती है। यूं ‘फोर्स‘ भी पूरी तरह मसाला फिल्म है। एक तरफ ‘ड्रग्स’ का धंधा करने वाले गिरोह और उनके खूंखार गुंडे, दूसरी तरफ पुलिस के जांबाज अधिकारी और दोनों के बीच चल रही खतरनाक जंग। इस जंग के समानांतर चलती जॉन अब्राहम और जेनेलिया डिसूजा की खामोश लव स्टोरी, जिसे जेनेलिया अपने चुलबुलेपन से रसीला बनाये रखने की भरपूर कोशिश करती है। फिल्म का अंत तो परंपरा के मुताबिक गुंडों के संपूर्ण सफाये के साथ ही होता है, लेकिन पुलिस फोर्स के प्रमुख लोग भी इस जंग में शहीद होते हैं। यहां तक कि जॉन की प्रेमिका जेनेलिया डिसूजा भी। जॉन की बाहों में मरते हुए जब वह कहती है, ‘तुम्हारी बांहों में चैन से मरने का अंतिम सपना तो पूरा हो गया, लेकिन बाकी तमाम सपने रह गये’ तो फिल्म एक कारुणिक अध्याय का पन्ना पलट देती है। विद्युत जामवाल के रूप में हिंदी सिनेमा को एक नया, ओजस्वी खलनायक मिला है जो खतरनाक होने के साथ साथ कूल भी है। लेकिन जॉन अब्राहम के अपोजिट गुड़िया जैसी जेनेलिया की जोड़ी जम नहीं पायी। अपनी तरफ से जेनेलिया ने अभिनय में कोई कसर नहीं छोड़ी, मगर इसका क्या करें कि लंबे चौड़े डील डौल वाले जॉन के सामने वह बच्ची जैसी नजर आती रही। गीत जावेद अख्तर के हैं। जाहिर है कि वे अच्छे हैं। कुछ संवाद भी ध्यान खींचते हैं। मार धाड़ पसंद करने वाले दर्शक इसे भी देख लें। फिल्म निराश नहीं करेगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशक:   निशिकांत कामत &lt;br /&gt;कलाकार:  जॉन अब्राहम, जेनेलिया डिसूजा, विद्युत जामवाल, राज बब्बर &lt;br /&gt;गीत:    जावेद अख्तर &lt;br /&gt;संगीत:   हैरिस जयराज/ललित पंडित&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-5163222878140371277?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/5163222878140371277/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/10/blog-post.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/5163222878140371277'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/5163222878140371277'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/10/blog-post.html' title='फोर्स'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-5719188191566387126</id><published>2011-09-26T03:15:00.000-07:00</published><updated>2011-09-26T03:16:51.757-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा 25-09-2011'/><title type='text'>मौसम</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संवेदनशील लेकिन बोझिल ’मौसम‘&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पंकज कपूर अभिनय की दुनिया का एक बड़ा नाम हैं। सिर्फ एक्टर ही नहीं हैं बल्कि रंगकर्म के प्रख्यात अध्येता भी हैं। इसलिए समझ नहीं आया कि क्यों और किस मोह के चलते उन्होंने तीन घंटे लंबी फिल्म बना दी। ‘दो घंटे का सिनेमा’ वाला दौर आये वॉलीवुड में जमाना बीत गया है तो फिर एक संवेदनशील और नाजुक सी प्रेम कहानी कोई तीन घंटे में फैली क्यों देखना चाहेगा। नतीजा, एक खूबसूरत और दिलचस्प फिल्म को दर्शक बीच में ही छोड़ कर जा रहे थे। दंगों के बैकड्रॉप पर पहले भी प्रेम कहानियां रची गयी हैं। ‘मौसम‘ भी उसी कतार की फिल्म है लेकिन एक ही फिल्म में बहुत कुछ नहीं सब कुछ दिखा देने की चाहत में पंकज ने फिल्म को बोझिल बना दिया है। वरना तो शाहिद कपूर और सोनम कपूर का अपना अपना विशेष युवा दर्शक वर्ग बन गया है। ‘मौसम‘ में शाहिद और सोनम ने डूब कर अभिनय किया है। और अपने-अपने चरित्रों को विश्वसनीयता तथा गहराई के साथ जिया है लेकिन दोनों के मिलकर बिछुड़ जाने के बाद फिर मिलने में इतनी देर लगा दी गयी है कि दर्शक का धैर्य जवाब दे जाता है। मिलन से पहले एक प्रसंग तो ऐसा आता है जब दर्शक मान बैठते हैं कि यह एक दुखांत फिल्म है, कि शाहिद ने सोनम को खो दिया है। लेकिन कुछ ही देर बाद पंकज इस थीसिस की एंटी थीसिस रचते नजर आते हैं और गुजरात दंगों की शिकार बनी सोनम अचानक शाहिद द्वारा बचा ली जाती है। दोनों के जीवन में प्यार का ‘मौसम’ लौट आता है। बड़ी सहजता से इस फिल्म को दो घंटे का बनाया जा सकता है। एक घंटे का संपादन इस फिल्म को ज्यादा सहज, गतिशील और कविता जैसा लयात्मक बना सकता था। पर पंकज की चेतना पर पता नहीं क्यों दंगे ज्यादा हावी थे। कश्मीर के दंगे, बाबरी मस्जिद का ध्वंस, मुंबई बम विस्फोट, अमेरिका में ट्विन टावर संहार, गुजरात के दंगे। इतने मार तमाम दंगों के साथ-साथ कारगिल युद्ध। इसके बावजूद पंकज बड़े पर्दे पर एक लंबी ही सही प्रेम कविता रचने में कामयाब हो गये हैं। दुख इसी बात का है कि एक बेहतरीन फिल्म को ‘प्रतिबद्ध दर्शकों’ का संग साथ ही मिल सकेगा। बॉलीवुड में चल रही समकालीन अश्लील हवाओं के विरुद्ध एक रचनात्मक मौसम संभव करने वाली इस फिल्म को देखना एक कर्तव्य बन जाता है। फिल्म के गाने पहले ही हिट हो चुके हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशक:   पंकज कपूर &lt;br /&gt;कलाकार:  शाहिद कपूर, सोनम कपूर, अनुपम खेर, अदिति शर्मा, सुप्रिया पाठक &lt;br /&gt;संगीत:   प्रीतम चक्रवर्ती&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-5719188191566387126?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/5719188191566387126/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/09/blog-post_26.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/5719188191566387126'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/5719188191566387126'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/09/blog-post_26.html' title='मौसम'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-1255694553076594019</id><published>2011-09-10T03:35:00.000-07:00</published><updated>2011-09-10T03:36:50.355-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कानपुर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='10 सितंबर 2011'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा'/><title type='text'>मेरे ब्रदर की दुल्हन</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बड़ी मसालेदार ‘मेरे ब्रदर की दुल्हन’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह जो कन्फ्यूज्ड सी, आज में जीने वाली, बहुत कमा कर उससे भी ज्यादा खर्च कर देने वाली भारत की युवा पीढ़ी है वह सिनेमा की ‘टार्गेट ऑडियंस’ है। इस पीढ़ी की जेब से पैसा निकालना है तो विषय भी ऐसे तलाशने होंगे जो इस पीढ़ी के मिजाज से मेल खाएं। यशराज बैनर की नयी फिल्म ‘मेरे ब्रदर की दुल्हन’ में ऐसा ही एक ‘फनी’ विषय उठाया गया है जो यंग जनरेशन को लुभा सके। अपनी इस कोशिश में फिल्म के निर्देशक अली अब्बास जफर कामयाब भी हुए हैं। फिल्म का एक गाना ‘कैसा ये इस्क है, अजब सा रिस्क है’ पहले से ही सुपरहिट हो गया है और गली कूचों में गूंज रहा है। संगीत निर्देशक सोहेल सेन ने इरशाद कामिल के गीतों को कर्णप्रिय और पॉपुलर दोनों बना दिया है। फिल्म की यूएसपी इसका गीत-संगीत ही है। परीक्षित साहनी के दो बेटे हैं, लव (अली जफर) व कुश (इमरान खान)। लव लंदन में रहता है और अपनी गर्लफ्रेंड से उसका ब्रेकअप हो गया है। वह अपने छोटे भाई इमरान खान को अपने लिए लड़की तलाशने की जिम्मेदारी सौंपता है। लड़की तलाशने के कुछ कॉमिक दृश्यों से फिल्म में हास्य जुटाया गया है। अंत में कंवलजीत सिंह के परिवार में मामला बनता दिखता है और इमरान खान उनके घर पहुंच जाता है। उनकी बेटी तो कैटरीना कैफ है, जिससे आगरा के एक स्टूडेंट कैंप में इमरान पांच साल पहले टकरा चुका था। तब दोनों ने एक दूसरे की मौजूदगी में फील गुड जैसा कुछ पाया था। अब कैटरीना के साथ मस्ती करते, शॉपिंग करते और धमाल मचाते हुए इमरान उसके और करीब आ जाता है। आखिर मां-बाप और भाई से बात करा कर इमरान कैटरीना को ‘भाईसाहब’ के लिए पसंद कर लेता है। भाई लंदन से दिल्ली के लिए निकल पड़ता है। उधर, कैटरीना और इमरान के बीच पनपी अंडरस्टैंडिंग और मस्ती प्यार में बदल गयी है इसका अहसास दोनों को तब होता है, जब कैटरीना की मंगनी इमरान के भाई से हो जाती है। यहां पहुंच कर मजेदार सी फिल्म एक इमोशनल मोड़ पर घूम जाती है। मंगनी कैसे टूटे और कैट-इमरान की जोड़ी कैसे बने, इसके लिए एक मसाला ढूंढ़ा गया है। फिल्म बांधे रखती है। यशराज बैनर की फिल्म है, इसलिए शालीनता और पारिवारिकता का ख्याल रखा गया है। एक हल्की-फुल्की टाइमपास फिल्म है जो मनोरंजक भी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशक:   अली अब्बास जफर &lt;br /&gt;कलाकार:  इमरान खान, कैटरीना कैफ, अली जफर, कंवल जीत सिंह, परीक्षित साहनी, तारा डिसूजा &lt;br /&gt;गीत:   इरशाद कामिल &lt;br /&gt;संगीत:   सोहेल सेन&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-1255694553076594019?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/1255694553076594019/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/09/blog-post_10.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/1255694553076594019'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/1255694553076594019'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/09/blog-post_10.html' title='मेरे ब्रदर की दुल्हन'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-8533957979628613836</id><published>2011-09-01T03:05:00.000-07:00</published><updated>2011-09-01T03:07:02.824-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कानपुर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='1 सितंबर 2011'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा'/><title type='text'>बॉडीगार्ड</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘बॉडीगार्ड’ की अजब प्रेम कहानी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ईद पर रिलीज हुई सलमान खान की यह तीसरी फिल्म है जो सुपर हिट होगी। बहुत दिनों के बाद पचासों दर्शकों को टिकट न मिलने के कारण निराश लौटते देखा। इससे पहले वर्ष 2010 में ‘दबंग’ और वर्ष 2009 में ‘वांटेड’ ईद पर ही रिलीज हुई थीं। दोनों सुपर हिट थीं और दोनों मुख्य धारा की फार्मूला फिल्में थीं। ‘बॉडीगार्ड’ भी कमर्शियल और फार्मूला फिल्म ही है। फर्क सिर्फ इतना है कि ‘बॉडीगार्ड’ केवल सलमान की फिल्म नहीं है बल्कि यह करीना कपूर की भी फिल्म है। अगर कहा जाए कि यह सलमान खान के माध्यम से करीना कपूर की फिल्म है तो भी कुछ ज्यादा गलत नहीं होगा। यह भी कह सकते हैं कि यह एक गजब ‘बॉडीगार्ड’ की अजब प्रेम कहानी है जिसमें जरा सी कॉमेडी और ज्यादा सा एक्शन डालकर रोचक बना दिया गया है। यहां भी एक्शन दृश्यों में सलमान की शर्ट उतरने पर हॉल में गूंजता दर्शकों का शोर है। सीटियां हैं। तालियां हैं। यह जादू टूटने वाला नहीं है क्योंकि आम दर्शक सलमान के भीतर खुद को प्रत्योरोपित कर देते हैं। दो सवा दो घंटे के लिए दर्शक एक ऐसी फेंटेसी जी लेते हैं जो वास्तविक जीवन में संभव नहीं है। सलमान को दर्शकों की यह कमजोरी पता है इसीलिए वह ऐसी फिल्मों में काम करने को ही तरजीह देते हैं। ‘गुजारिश’ जैसी ‘क्लासिक’ फिल्म उन्हें नहीं भाती। राज बब्बर अपनी बेटी करीना कपूर के लिए सलमान खान को ‘बॉडीगार्ड’ नियुक्त करते हैं लेकिन सलमान के हैरत अंगेज कारनामे और वफादारी को देख करीना को सलमान से प्यार हो जाता है। वह सलमान को छाया नामक नकली नाम से फोन करती है। सलमान छाया को देखे बिना भी उसके प्यार में पड़ जाता है। इधर राज बब्बर एक गलत सूचना के आधार पर विश्वासघाती सलमान को मार देना चाहते हैं। करीना पिता को बताती है कि सलमान ने तो उसकी जान बचायी है। सलमान उसे भगाकर नहीं ले जा रहा था। उसका प्यार तो छाया है जो रेलवे स्टेशन पर उसका इंतजार कर रही है। राज बब्बर सलमान को जाने देते हैं लेकिन सच्चाई जानने के लिए अपना ‘गनर’ भी पीछे भेज देते हैं। स्टेशन पर सलमान को करीना की ‘बेस्ट फ्रेंड’ माया मिलती है जो सलमान से छाया बन कर मिलती है। दोनों रियासत से दूर चले जाते हैं। लेकिन यह तो एक कमर्शियल फिल्म है। इसका अंत दुखद कैसे हो सकता है? किस फार्मूले के चलते सलमान और करीना मिल जाते हैं यह जानने के लिए फिल्म देख लें। फिल्म के शीषर्क गीत में कैटरीना ने फिर अपने जलवे दिखाए हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशक: 		सिद्दीकि &lt;br /&gt;कलाकार: 	सलमान खान, करीना कपूर, राजबब्बर, महेश मांजरेकर, कैटरीना कैफ, असरानी, आदित्य पंचोली &lt;br /&gt;संगीत: 		हिमेश रेशमिया, प्रीतम&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-8533957979628613836?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/8533957979628613836/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/09/blog-post.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/8533957979628613836'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/8533957979628613836'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/09/blog-post.html' title='बॉडीगार्ड'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-532339833790562827</id><published>2011-08-20T03:10:00.000-07:00</published><updated>2011-08-20T03:11:29.339-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कानपुर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='20 अगस्त 2011'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा'/><title type='text'>चतुर सिंह टू स्टार</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बचकानी ’चतुर सिंह टू स्टार‘&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बनी तो बीसियों होंगी लेकिन इस लेखक को याद नहीं आता कि उसने अपनी कुल जिंदगी में कोई इतनी बचकानी फिल्म कभी देखी होगी। ऐसा भी लगता है कि शायद यह फिल्म बहुत पुरानी है जो अब जाकर रिलीज हो पायी है। वरना तो संजय दत्त के खाते में एक से एक बेहतरीन फिल्में दर्ज हैं। एक्शन भी, कॉमेडी भी, संजीदा भी। आश्चर्य है कि कॉमेडी के नाम पर क्या क्या बनाया जा रहा है और पैसे को पानी में डाला जा रहा है। निर्देशक अजय चंडोक को फिल्म में काम करने के लिए संजय दत्त, अनुपम खेर, सतीश कौशिक, मुरली शर्मा, अमीषा पटेल, गुलशन ग्रोवर जैसे मंजे हुए कलाकार मिले थे, लेकिन वह एक भी कलाकार से अच्छा काम नहीं करवा सके। कॉमेडी के नाम पर विदूषकों की टोली बना डाली उन्होंने। यह टोली अपनी बचकानी हरकतों से एक वाहियात सी कहानी को फॉलो करती हुई एक बेतुके और फूहड़ से अंत पर पहुंचती है। न फिल्म के संवाद दिल को गुदगुदाते हैं और न ही नाच गाने प्रभावित करते हैं। अमीषा पटेल से निर्देशक ने दिल खोल कर देह प्रदर्शन करवाया है। लेकिन इंटरनेट और एक से एक खतरनाक वेबसाइटों के जमाने में अमीषा पटेल का देह प्रदर्शन देखने तो दर्शक सिनेमा हॉल में जाने से रहे। दर्शकों को बांधे रखने वाली कोई एक बात तो फिल्म में होती। शायद इसीलिए जो भी 8-10 दर्शक फिल्म देखने आए थे वे बार-बार उठ कर बाहर जा रहे थे। निर्देशक ने इतना भी नहीं सोचा कि पूरे के पूरे पुलिस महकमे को जोकरों जैसा चित्रित करके वह कोई तीर नहीं मार रहे हैं। संजय दत्त एक जासूस है जो जासूसी कम जोकरी ज्यादा करता है। एक र्मडर मिस्ट्री सुलझाने साउथ अफ्रीका जाता है। इस र्मडर के पीछे बेशकीमती हीरों की चोरी की कहानी है। जिस गैंगस्टर पर शक है उसकी याद्दाश्त चली गयी है, इसलिए वह भी जोकर बन गया है। उसे पीट पीटकर उसकी याद्दाश्त वापस लायी जाती है। फिर उसका पीछा करके हीरे हड़प लिए जाते हैं। मर्डर मिस्ट्री सॉल्व हो जाती है, क्योंकि जिसका मर्डर हुआ है उसकी पत्नी साउथ अफ्रीका में प्रकट होकर बताती है कि मर्डर उसने किया है। क्या क्या सोचते और बनाते हैं लोग।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशक: 		अजय चंडोक &lt;br /&gt;कलाकार: 	संजय दत्त, अमीषा पटेल, अनुपम खेर, सतीश कौशिक, गुलशन ग्रोवर &lt;br /&gt;संगीत: 		साजिद-वाजिद &lt;br /&gt;गीत: 		जलीस शेरवानी&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-532339833790562827?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/532339833790562827/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/08/blog-post_20.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/532339833790562827'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/532339833790562827'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/08/blog-post_20.html' title='चतुर सिंह टू स्टार'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-8332025005586008382</id><published>2011-08-16T02:58:00.000-07:00</published><updated>2011-08-16T03:00:49.459-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कानपुर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='13 अगस्त'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='2011'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा'/><title type='text'>आरक्षण</title><content type='html'>विमर्श&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेमतलब है ‘आरक्षण’ पर बवाल&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;याद नहीं आता कि इससे पहले कोई फिल्म पुलिस के पहरे में देखी थी। पुलिस सिनेमा हॉल के भीतर भी थी और बाहर भी। फिल्म देखकर हॉल से बाहर निकलने के काफी देर बाद तक भी समझ नहीं आया कि प्रकाश झा की नयी फिल्म ‘आरक्षण’ में ऐसा क्या आपत्तिजनक है, जिस पर कुछ लोग बवाल मचा रहे हैं। प्रकाश झा अर्थपूर्ण सिनेमा बनाते आये हैं। फर्क सिर्फ इतना आया है कि अब वह बड़ी स्टार कास्ट को लेकर बड़े बजट की फिल्म बनाते हैं। इसका एक लाभ यह हुआ कि अब उनके संदेशपरक सिनेमा को पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा दर्शक मिल जाते हैं, लेकिन केवल नाम को लेकर जो हंगामा मचाया गया उससे दर्शक डर गये और इस कारण इस सार्थक फिल्म को देखने उस मात्रा में नहीं आये, जिसका अनुमान लगाया गया था। पंजाब, आंध्र और यूपी में फिल्म पर प्रतिबंध है। तीन प्रदेशों के दर्शक एक विचारोत्तेजक और संवेदनशील फिल्म को अकारण नहीं देख पाएंगे, जबकि इस फिल्म में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिससे किसी की भावनाएं आहत होती हों। फिल्म अमिताभ बच्चन के माध्यम से यह संदेश देती है कि शिक्षा का हक सभी को है। अमिताभ आरक्षण को समय की मांग मानते हैं और अपने विचारों के समर्थन में अपनी नौकरी, अपना घर गंवाकर भी खड़े रहते हैं। मिथिलेश सिंह यानी मनोज वाजपेयी के माध्यम से फिल्म यह संदेश देती है कि उनके जैसे धनलोलुप लोग किस तरह ऊंची शिक्षा का लाभ एक मलाईदार तबके तक सीमित रखान चाहते हैं कि कैसे देश में कोचिंग क्लासेज के जरिये शिक्षा का व्यापारीकरण कर दिया गया है। फिल्म सैफ अली खान के माध्यम से संदेश देती है कि कैसे एक जाति विशेष में जन्म लेने के कारण उसे कदम-कदम पर अनाचार का दंश झेलना पड़ता है। फिल्म कहीं से भी आरक्षण के पक्ष या विपक्ष में नहीं है। देश में मौजूद एक ज्वलंत मुद्दे पर विमर्श करने वाली फिल्म को नाहक ही राजनीति का शिकार बनाया जा रहा है। अगर कुछ गलत होता तो भला सेंसर बोर्ड फिल्म को हरी झंडी क्यों देता? फिल्म के सभी कलाकारों से प्रकाश झा ने बेहतर काम लिया है। दुख है कि अश्लील फिल्मों का कोई विरोध नहीं होता मगर गंभीर विमर्श को खारिज किया जाता है। एक नाजुक मुद्दे पर पूरी फिल्म एक सार्थक और साझा सहमति बनाना चाहती है लेकिन साझा सहमति चाहता कौन है। &lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-8332025005586008382?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/8332025005586008382/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/08/blog-post.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/8332025005586008382'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/8332025005586008382'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/08/blog-post.html' title='आरक्षण'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-9196083861261881816</id><published>2011-07-23T03:45:00.000-07:00</published><updated>2011-07-23T03:47:05.704-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा कानपुर 23-07-2011'/><title type='text'>सिंघम</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;गुंडा राज के विरुद्ध ‘सिंघम‘&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशक रोहित शेट्टी की नयी फिल्म ‘सिंघम‘ एक ‘एक्शन पैक्ड‘ ड्रामा है जो दर्शकों को शुरू से अंत तक न सिर्फ बांधे रखता है बल्कि कई दृश्यों में दर्शक सीट पर उछल उछल कर तालियां भी बजाते हैं। जब दर्शक खुद को फिल्म के साथ पूरी तरह जोड़ लें तो इसका मतलब है कि फिल्म कामयाब है। ‘वांटेड‘ और ‘दबंग‘ के बाद ‘सिंघम‘ भी इस दौर की फिल्मों में अपने एक्शन के लिए याद की जाएगी। अजय देवगन पूरी फिल्म में उसी तरह छाये हुए हैं जैसे ‘दबंग‘ में सलमान खान छाए हुए थे। मगर ‘सिंघम‘ तो ‘दबंग‘ से भी दो कदम इसलिए आगे है क्योंकि यह पुलिस विभाग का एक नया विमर्श बनती नजर आती है। नेता और माफिया के सामने पुलिस की मजबूरी, पुलिस का अपना द्वंद्व और सिस्टम के सामने समर्पण की मजबूरी पहले भी कई फिल्मों का कथ्य बना है। पर ‘सिंघम‘ उन सबसे आगे बढ़ कर एक नया पाठ यह पेश करती है कि जिस तरह जनता एकजुट हो कर कोई भी सत्ता बदल सकती है उसी तरह यदि पुलिस भी एकजुट हो जाए तो गुंडों और सत्ता का गठजोड़ उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। ‘सिंघम‘ सत्ता के खिलाफ पुलिस विद्रोह का नहीं गुंडा राज के विरुद्ध निर्णायक युद्ध का विमर्श बनती है। वह भी कानून के दायरे में रह कर। रोहित शेट्टी ने अपना कॉमेडी वाला पुट ‘सिंघम‘ में भी कई जगह बनाये रखा है। अभिनेता प्रकाश राज ने विलक्षण अभिनय किया है या कहें कि रोहित उनका श्रेष्ठतम निकलवाने में सफल हुए हैं। पूरी फिल्म अजय देवगन और प्रकाश राज के बीच ही घटती है। अजय देवगन ने सिद्ध किया है कि बतौर सोलो एक्टर भी वह फिल्म को हिट करवा सकते हैं। फिल्म के संवाद दमदार और लोकप्रियता का असर लिए हुए हैं। चाहे गांव की आम जनता हो या शहर का पुलिस विभाग, ‘सिंघम‘ समूह की ताकत को रेखांकित करती है। फिल्म की अभिनेत्री काजल अग्रवाल बस ठीक ठाक हैं लेकिन सचिन खेडेकर जैसे गंभीर अभिनेता ने उम्दा कॉमेडी की है। कॉमेडी का शालीन तड़का फिल्म को रिलीफ देता है। ‘बदमाश दिल‘ और ‘सिंघम सिंघम‘ वाले गीत प्रभावित करते हैं। बेहतरीन एक्शन फिल्म है। देख लेनी चाहिए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशक:   रोहित शेट्टी&lt;br /&gt;कलाकार:  अजय देवगन, काजल अग्रवाल, प्रकाश राज, सचिन खेडेकर, गोविंद नामदेव&lt;br /&gt;गीत: स्वानंद किरकिरे&lt;br /&gt;संगीत: अजय एवं अतुल गोगावाले&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-9196083861261881816?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/9196083861261881816/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/07/blog-post_23.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/9196083861261881816'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/9196083861261881816'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/07/blog-post_23.html' title='सिंघम'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-5465367414277771611</id><published>2011-07-09T00:04:00.000-07:00</published><updated>2011-07-09T00:06:56.323-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='rashtriya sahara'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='9.7.11'/><title type='text'>murder 2</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;दहशत और रोमांच की पटकथा ’र्मडर-2‘&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;निर्देशक : मोहित सूरी कलाकार : इमरान हाशमी, जैकलीन फर्नाडिज, प्रशांत नारायण, सुधांशु पांडेय। संगीत : हषिर्त सक्सेना, संगीत हल्दीपुर सिनेमेटोग्राफी : रवि वालिया (यह फिल्म का बेहतरीन पक्ष है।)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि ‘र्मडर-2’ को एक सेक्सी फिल्म के तौर पर प्रचारित किया गया है, लेकिन सेक्स इसमें सिर्फ छौंक या तड़के की तरह है। इसे एक र्मडर मिस्ट्री या साइको किलर की अजीब दास्तान जैसा कुछ कह सकते हैं। इस बार भट्ट कैंप दहशत और रोमांच की एक कामयाब पटकथा लिखने में सफल रहा है। पूरी फिल्म में थर्रा देने वाले कई दृश्य हैं। स्त्री-पुरुष संबंधों के जटिल मनोविज्ञान की मुश्किल सी कहानी को बड़ी रोचकता से मोहित सूरी ने एक समानांतर कथा के रूप में पेश किया है। इस कथा के दो पात्र हैं, इमरान हाशमी और जैकलीन फर्नाडिज। दोनों के बीच देह का आदान प्रदान है, लेकिन इमरान इसे प्यार नहीं औरत की आदत बताता है, जबकि जैकलीन इस रिश्ते को प्यार मानना चाहती है। इमरान पुलिस की नौकरी छोड़कर भाई गिरी करता है तो जैकलीन एक सस्ती सी मॉडल है। दोनों गोवा में रहते हैं। गोवा में लड़कियां सप्लाई करने वाले एक सरगना की कई लड़कियां रहस्यमय ढंग से गायब हो रही हैं। इस केस को सुलझाने के लिए सरगना इमरान हाशमी की सेवाएं लेता है। दूसरी कथा यहां से शुरू होती है। धीरज पंडित नाम का एक किन्नर है जो लड़कियों को ग्राहक बनकर अपने बंगले में बुलाता है। उजाड़, सुनसान बंगले में वह लड़कियों को धंधा करने के जुर्म में तड़पा तड़पाकर मारता है, फिर उनके टुकड़े-टुकड़े करके बंगले के पास बने एक कुएं में फेंक देता है। नोएडा में हुए निठारी कांड की याद आती है। भट्ट कैंप ने माना भी है कि फिल्म की प्रेरणा उन्हें नोएडा स्थित निठारी कांड से मिली है। हां दोनों में फर्क भी बहुत है। फिल्म का हत्यारा सेक्स नहीं करता, वह लड़कियों को सेक्स करने की सजा देता है। बहुत जटिल कथानक है फिल्म का, जिसे मोहित सूरी के निर्देशन ने बेहद कुशलता से साधा है। फिल्म का गीत-संगीत बेहतर भी है और कथा की व्याख्या भी करता है। इमरान हाशमी ‘सीरियल किसर’ की इमेज में बंध गए हैं। जैकलीन को थोड़ा सा ही ‘स्पेस’ मिला है। जिसमें वह प्रभावित करती हैं। इस वर्ष की दूसरी छमाही की तीसरी हिट फिल्म है ‘र्मडर-2’ पहली दो हैं ‘देहली बैली’ और बुड्ढा होगा तेरा बाप’। धीरेन्द्र अस्थाना&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-5465367414277771611?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/5465367414277771611/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/07/murder-2.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/5465367414277771611'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/5465367414277771611'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/07/murder-2.html' title='murder 2'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-3410023898097954769</id><published>2011-07-02T09:43:00.000-07:00</published><updated>2011-07-02T09:45:11.187-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='rashtriya sahara'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='02.07.11'/><title type='text'>बुड्ढा होगा तेरा बाप</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाप रे बाप: बुड्ढा होगा तेरा बाप&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अड़सठ बरस की उम्र में अगर कोई युवाओं से कहीं बेहतर डांस कर सकता है, मारधाड़ मचा सकता है, रुला सकता है, हंसा सकता है तो वह सचमुच कोई बाप ही होगा। बिला शक यह बाप अमिताभ बच्चन हैं जिनके अभिनय से सजी नयी फिल्म ‘बुड्ढा होगा तेरा बाप‘ कमाल की एंटरटेनिंग फिल्म है। सही मायने में मसाला यानी मुख्यधारा की फिल्म है। जिसमें रोमांस है, एक्शन है, कॉमेडी है, डायलॉग है, नाच गाने हैं और है गति। सोनू सूद पूरी फिल्म में बिग बी के सामने नर्वस नजर आये हैं जबकि रवीना टंडन की बेटी का रोल निभाने वाली नयी लड़की चार्मी ने बिग बी के सामने बड़ा लाइव अभिनय किया है। पूरी फिल्म अमिताभ बच्चन की फिल्म है लेकिन उसमें सोनू सूद, सोनल चौहान, चार्मी और हेमा मालिनी को भी पर्याप्त स्पेस मिला है। ‘गो मीरा‘ वाले आइटम सांग में बिग बी की पुरानी फिल्मों के कई हिट गीतों के टुकड़े डाल कर नयी पीढ़ी को उनके जादू से परिचित कराने की अच्छी कोशिश की गयी है। फिल्म के संवादों में दम है और पटकथा कसी हुई है। पुरी जगन्नाथ ने पूरी फिल्म को बेहतरीन ढंग से फिल्माया है और दर्शकों को एक पल के लिए भी बोर होने का मौका नहीं दिया है। सोनू सूद मुंबई के एसीपी हैं जो शहर का माफिया राज खत्म करने पर आमादा हैं लेकिन लंबा समय पेरिस में बिता कर बिग बी फिर से मुंबई लौटे हैं। वह शहर के पूर्व माफिया किंग रह चुके हैं और कदम कदम पर सोनू सूद को गुंडों से बचाते हैं। सोनू सूद को नहीं पता कि अमिताभ बच्चन  उसके पिता हैं क्योंकि अमिताभ की पत्नी हेमा मालिनी ने यह बात कभी अपने बेटे सोनू को नहीं बताई कि उसका पिता कौन है? इस जानकारी को उजागर किए बिना अमिताभ का वापस पेरिस लौटने का फैसला दर्शकों को भावुक कर देता है। फिल्म मंे जगह जगह पर कॉमेडी का भी तड़का है लेकिन शालीन कॉमेडी का, जो भली लगती है। फिल्म को अवश्य देखना चाहिए। आखिर बाप की फिल्म है न !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशक: पुरी जगन्नाथ&lt;br /&gt;कलाकार: अमिताभ बच्चन, हेमा मालिनी, सोनू सूद, सोनल चौहान,               रवीना टंडन, चार्मी और प्रकाश राज&lt;br /&gt;संगीत: विशाल-शेखर&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-3410023898097954769?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/3410023898097954769/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/07/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/3410023898097954769'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/3410023898097954769'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/07/blog-post.html' title='बुड्ढा होगा तेरा बाप'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-3326838744108015963</id><published>2011-06-25T03:11:00.000-07:00</published><updated>2011-06-25T03:13:15.012-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='kanpur'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='25 June 2011'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='rashtriya sahara'/><title type='text'>बिन भेजे की डबल धमाल</title><content type='html'>धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;जिसे माइंडलेस कॉमेडी कहते हैं उसकी सवरेत्तम मिसाल है ‘डबल धमाल’। इन्द्र कुमार की मूल फिल्म ‘धमाल’ का यह सीक्वेल पहले जितना कमाल का तो नहीं है लेकिन हंसने हंसाने, मौज, मजा, नाच, गाना, मस्ती का तगड़ा इंतजाम किया गया है ‘डबल धमाल’ में। इन्द्र कुमार ने फिल्म में कहीं भी झोल नहीं आने दिया है। ढाई घंटे की फिल्म बांधे रखती है यह इसका सबसे बड़ा कमाल है। मुन्नी और शीला के बाद अब जलेबी की बारी है। मल्लिका शेरावत का आइटम सांग जलेबी बाई पूरी तरह पैसा वसूल है जिसे अगली बेंच के दर्शक झूम कर देखेंगे। अगर आप शुद्ध मनोरंजन के हिमायती हैं तो फिल्म देखने जरूर जाएं लेकिन अपना दिमाग घर छोड़ दें क्योकि इस फिल्म की कुछ कहानी यह है कि अरशद वारसी, जावेद जाफरी, रितेश देशमुख और आशीष चौधरी की चौकड़ी पाती है कि संजय दत्त तो बहुत पैसे वाला है, जबकि उसने भी उन लोगों की तरह अपना सारा पैसा डोनेट कर दिया था। सच का पता लगाने चारों पहले उसके दफ्तर फिर उसके घर में सेंध लगाते हैं और संजय को ब्लैकमेल कर उसकी कंपनी के पार्टनर बनने में सफल हो जाते हैं। इन चारों को बेवकूफ बना कर संजय इनके जरिए बाटा भाई (सतीश कौशिक)का 250 करोड़ अपनी फर्जी तेल कंपनी में लगवाता है और पैसा लेकर कंगना रानावत तथा मल्लिका शेरावत के साथ मकाऊ के लिए उड़ जाता है। ये चारों संजय को फाइनेंशियली और इमोशनली बर्बाद कर देने की शपथ लेकर मकाऊ पहुंचते हैं। चारों भेस बदल कर संजय के कैसीनो और जीवन में सेंध लगाते हैं और फिश टैंक में रखा एक हजार करोड़ रुपया लेकर चंपत होने की फिराक में धर लिए जाते हैं। बाद में पर्दाफाश होता है कि संजय दत्त को चारों की योजना का पहले से पता था और वह इनको बेवकूफ बना रहा था। यह है डबल धमाल। फिल्म में सिचुएशन से हास्य पैदा किया गया है। सभी पात्रों ने अभिनय से फिल्म को ज्यादा कॉमिक बनाने का प्रयत्न किया है। बॉलीवुड में असुरक्षा का आलम यह है कि कंगना रानावत जैसी प्रतिभाशाली हीरोईन को बहन के रोल में उतरना पड़ा। यह भी लगता है कि आइटम डांस फिर से फिल्मों का अनिवार्य हिस्सा बनता जा रहा है। फिल्म की यूएसजी उसका गीत संगीत और आइटम डांस ही है।&lt;br /&gt;निर्देशक : इन्द्र कुमार कलाकार : सं जय दत्त, अरशद वारसी, जावेद जाफरी, रितेश देशमुख, आशीष चौधरी, सतीश कौशिक, कंगना रानावत, मल्लिका शेरावत। संगीत : आनंद राज आनंद&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-3326838744108015963?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/3326838744108015963/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/06/blog-post_25.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/3326838744108015963'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/3326838744108015963'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/06/blog-post_25.html' title='बिन भेजे की डबल धमाल'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-3311411325403872242</id><published>2011-06-18T03:09:00.000-07:00</published><updated>2011-06-18T03:11:04.356-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='rashtriya sahara'/><title type='text'>भेजा फ्राई</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;भेजा फ्राई से भेजा गायब&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन दर्शकों ने कुछ वर्ष पहले सागर बेल्लारी द्वारा निर्देशित फिल्म ‘भेजा फ्राई’ देखी होगी, भेजा फ्राई-टू देखकर उनका भेजा तड़क जाएगा। पहली बात तो यह कि यह फिल्म ‘भेजा फ्राई’का सीक्वेंस नहीं है इसलिए इसका नाम ‘भेजा फ्राई-टू’ ही गलत है। पिछली फिल्म की अपार लोकप्रियता का लाभ उठाने के लिए नाम दोहराया गया है। शुरू के दिनों में दर्शक नाम के झांसे में आ भी सकते हैं। दूसरी बात यह कि ‘भेजा फ्राई’ में एक छोटी सी, प्यारी सी ऐसी कहानी थी जिसे लिखने में दिमाग का इस्तेमाल हुआ था। लेकिन ‘भेजा फ्राई-टू’ से भेजा ही गायब है। यह एक ऐसी कॉमेडी फिल्म हैजिस पर निरंतर रोते रहने का मन करता है। पता नहीं क्या सोचकर सागर बेल्लारी की टीम ने इस फिल्म पर काम किया। केके मेनन अतीत में बेहद शानदार फिल्में कर चुके हैं। कॉमेडी उनका क्षेत्र नहीं है क्योकि एक स्वाभाविक संजीदगी उनके व्यक्तित्व का स्थायी भाव है। कह सकते हैं कि कॉमेडी उनकी बॉडी लैंग्वेज के साथ छत्तीस का रिश्ता रखती है। विनय पाठक अपने फॉर्म में थे और पूरी फिल्म का केन्द्र बिंदु भी वही हैं लेकिन अकेला आदमी दर्शकों को कितनी देर तक उलझाये रख सकता है वह भी एक ऐसी फिल्म में जिसमे कथा के नाम भर लगभग शून्य हों। रियल लाइफ में कौन बिजनेस टायकून किसी इनकम टैक्स इंस्पेक्टर से इतना डरता है जितना केके को विनय पाठक से डरता दिखाया गया है। रियलिटी शो ‘आओ गेस करें’&lt;br /&gt;में विनर बन कर विनय पाठक एक क्रूज पर पहुंचते हैं जहां केके ऐंड पार्टी का जश्न हो रहा है। विनय पाठक चूंकि पेशे से इनकम टैक्स इंस्पेक्टर हैं इसलिए केके उन्हें क्रूज से धक्का देने के प्रयत्न में खुद समुद्र में गिर जाते हैं। बाद में केके का सिक्युरिटी पर्सन विनय को भी समुद्र में फेंक देता है। दोनों एक निर्जन टापू पर साथ साथ हैं जहां संवादों के जरिए दर्शकों को हंसाने का प्रयत्न किया जाता है। टापू पर उन्हें अमोल गुप्ते का घर मिल जाता है। जो एकाकी जीवन जी रहा है। यहां भी कुछ बेतुकी घटनाओं के जरिए हास्य पैदा करने की कोशिश की गयी है जो बोर करती है। एक लम्बे, बोझिल घटनाक्रम के बाद अमोल के घरमेंबम फटता है और सब बेहोश हो जाते हैं। होश में आने पर पहले केके अपने लोगों के साथ और बाद में विनय पाठक अपने सहयोगी इंस्पेक्टर सुरेश मेनन के साथ टापू से विदा लेते हैं और मिनीषा लांबा? वह इस पिक्चर में क्यो थीं, वह खुद उन्हें ही समझ नहीं आया होगा।&lt;br /&gt;निर्देशक : सागर बेल्लारी कलाकार : विनय पाठक, केके मेनन, अमोल गुप्ते, सुरेश मेनन, मिनीषा लांबा, वीरेन्द्र सक्सेना संगीत : इश्क बेक्टर, स्नेहा खान वालकर, सागर देसाई संवाद : शरद करारिया&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-3311411325403872242?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/3311411325403872242/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/06/blog-post_18.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/3311411325403872242'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/3311411325403872242'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/06/blog-post_18.html' title='भेजा फ्राई'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-3439847860155826159</id><published>2011-06-11T04:24:00.000-07:00</published><updated>2011-06-11T04:25:20.887-07:00</updated><title type='text'>’शैतान‘</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;’शैतान‘ यानी खोई हुई दिशाएं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;अनुराग कश्यप प्रोडक्शन की फिल्म ‘शैतान’ का निर्देशन भले ही बिजोय नंबियार ने किया है लेकिन यह एकदम अनुराग छाप फिल्म है। समय, समाज, कहानी, चरित्र एकदम यथार्थवादी लेकिन कहने का अंदाज फंतासी में लिपटा हुआ। बिल्कुल ‘जादुई यथार्थवाद’ जैसा। इसीलिए थोड़ा पेचीदा, थोड़ा अजीबो गरीब लेकिन अपने भीतर एक ऐंद्रजालिक उपस्थिति लिए हुए। मौजूदा उत्तर आधुनिक समय की जमीन पर खड़ी फिल्म ‘शैतान’ उन युवाओं की नीच ट्रेजेडी का बखान करती है जिनकी दिशाएं खो गयी हैं। राजीव खंडेलवाल और कलकी कोचलिन के अलावा बाकी नये लोगों को लेकर कम बजट में बनायी गयी ‘शैतान’ सिनेमा में रचनात्मकता को संभव करती है। यह नया सिनेमा है जो मनोरंजन के साथ-साथ दर्शकों की चेतना को संपन्न और सक्रिय करने की जिम्मेदारी भी उठाना चाहता है। कम से कम सार्थक सिनेमा के पैरोकारों को इस किस्म के सिनेमा का स्वागत करना ही चाहिए। इस फिल्म में राजीव खंडेलवाल एक ऐसे गुस्सैल पुलिस ऑफीसर के रोल में है जो कुछ भी गलत बर्दाश्त नहीं कर पाता। एक भ्रष्ट नेता को पहले माले से नीचे फेंक देने के जुर्म में वह सस्पेंड चल रहा है। एक कलकी कोचलिन है जिसकी मां ने तब आत्महत्या कर ली थी जब कलकी छोटी थी। पिता की नयी पत्नी के सामने वह खुद को कंफर्ट फील नहीं करती और फ्रस्ट्रेट रहती है। एक पार्टी में उसे गुलशन उर्फ केसी मिलता है जिससे आकर्षित हो कर वह उसके बाकी दोस्तों से मिलती है। इस प्रकार कुल पांच युवक- युवतियों का गैंग तैयार होता है जो मौज मस्ती को जीने का मंत्र मानता है। सब के सब बिगड़े दिल शहजादे टाइप के हैं। एक रात इनकी तेज गाड़ी के नीचे दो लोग आकर कुचल जाते हैं। ये लोग छुप जाते हैं लेकिन एक पुलिस वाला इन्हें खोज लेता है। वह केस दबाने के लिए इनसे पच्चीस लाख रुपये मांगता है। कलकी का बाप चूंकि सबसे ज्यादा अमीर है इसलिए ये लोग कलकी के अपहरण का ड्रामा करते हैं और उसके पिता से पचास लाख मांगते हैं। बाप पैसे देने के बजाय पुलिस में चला जाता है और होम मिनिस्ट्री की सोर्स ले आता है। कमिश्नर दबाव में आ जाता है और इस केस को हल करने के लिए सस्पेंड हो चुके राजीव खंडेलवाल को काम पर लगाता है। लड़के एक से दूसरे ट्रैप में उलझते जाते हैं और अंततः उनकी दिशाएं खो जाती हैं। मोटे तौर पर युवा फ्रस्ट्रेशन, फन, फिलॉसफी और अराजकता को इस फिल्म में इस स्लोगन से परिभाषित किया गया है- अपने भीतर के शैतान से सामना कीजिए। फिल्म को देखना चाहिए। एक्सपेरीमेंट को सपोर्ट करें। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशकः बिजोय नंबियार &lt;br /&gt;कलाकारः राजीव खंडेलवाल, कलकी कोचलिन, शिव पंडित, रजित कपूर, गुलशन, कीर्ति &lt;br /&gt;संगीतः प्रशांत पिल्लई, अमर मोहिले, रंजीत बारोट &lt;br /&gt;संवादः अभिजीत देशपांडे&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-3439847860155826159?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/3439847860155826159/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/06/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/3439847860155826159'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/3439847860155826159'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title='’शैतान‘'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-6655924223912975611</id><published>2011-05-28T23:05:00.000-07:00</published><updated>2011-05-28T23:07:58.192-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='rashtriya sahara'/><title type='text'>फिल्म समीक्षा</title><content type='html'>उम्दा अभिनय साधारण किस्सा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ लव जैसा &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  बहुत दिनों के बाद शेफाली शाह को बड़े पर्दे पर काम करते देखना अच्छा लगता है। पूरी फिल्म की कहानी शेफाली को कें्रद में रख कर ही बुनी गयी है इसलिए यह स्वभावतः स्त्री केंद्रित फिल्म हो गयी है। अगर फिल्म की कहानी पर ज्यादा मेहनत की गयी होती और उसे कोई नया कोण या आयाम दिया जाता तो ‘कुछ लव जैसा‘ ऑफबीट फिल्मों में शुमार हो सकती थी। शेफाली शाह और राहुल बोस के उम्दा अभिनय से सजी इस फिल्म को बस इन दोनों के अभिनय के कारण ही देखा जा सकता है। कहानी जैसी भी है लेकिन इतनी कसी हुई है कि शुरु से अंत तक बांधे रखती है। बरनाली शुक्ला का निर्देशन सशक्त और गतिवान है। उसमें कहीं भी झोल नहीं है। संवाद बेहद दो टूक, संक्षिप्त मगर सार्थक हैं। गीत पात्रों के भीतर चल रही कशमकश को प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति देने में सफल भी हैं और सुनने में भी अच्छे लगते हैं। तो फिर ऐसा क्या है कि इतने सारे सकारात्मक कारणों के बावजूद फिल्म औसत से उपर नहीं जा पाती? एक मात्र वजह है फिल्म की कहानी में नयापन न होना और उपकथाओं का अतार्किक होना। उच्च मध्यवर्ग की असंतुष्ट पत्नियों के त्रास और एकाकी छूट रहे जीवन के व्यर्थता बोध से साहित्य और सिनेमा अटा पड़ा है। पहले प्रेम फिर विवाह और अंततः अलगाव।&lt;br /&gt; रोजमर्रा के कामकाजी तनाव के चलते पति-पत्नी के बीच का अनुराग सूखते जाना और रिश्तों में एक धूमिल सी उदासी का पसरना। इस उदासी को उतार कर जीवन में फिर से उतर कर अपने होने का अर्थ तलाशना। यहां तक तो ठीक है लेकिन पूरा दिन एक अनजाने क्रिमिनल के साथ यहां वहां और एक होटल के कमरे में बिता देना रियल लाइफ में संभव ही नहीं है। एक आदमी की पत्नी पूरा दिन घर से गायब है। उसका फोन नॉट रीचेबल है और पति आराम से ऑफिस में बैठा है। लड़की के मां बाप भी चैन से हैं। लड़की के बच्चों को भी ममा की खास चिंता नहीं है। पूरा दिन बाहर बिता कर औरत  घर लौटी है और जिंदगी सामान्य है। घर में उसके जन्मदिन की पार्टी आयोजित है मगर औरत दिन भर क्रिमिनल के साथ बिताए कुछ क्षणों को कुछ लव जैसा फील कर रही है। रागात्मक संबंधों की दुनिया में इस तरह के विचार तार्किक नहीं लगते। तो भी इतना जरुर है कि शेफाली ने एक उद्विग्न, बैचेन, चिंतित और दुविधाग्रस्त स्त्री के किरदार में जान डाल दी है। राहुल बोस का अभिनय हमेशा की तरह कूल और सधा हुआ है। असल में इस फिल्म में अभिनय ही इसकी ‘यूएसपी‘ है। शेफाली को फिल्मों में बने रहना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशकः बरनाली शुक्ला&lt;br /&gt;कलाकारः राहुल बोस, शेफाली शाह, सुमीत राघवन, ओम पुरी, नीतू चंद्रा।&lt;br /&gt;संगीतः प्रीतम चक्रवर्ती&lt;br /&gt;गीतः इरशाद कामिल&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-6655924223912975611?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/6655924223912975611/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/05/blog-post_28.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/6655924223912975611'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/6655924223912975611'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/05/blog-post_28.html' title='फिल्म समीक्षा'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-4314951854360031856</id><published>2011-05-21T09:26:00.000-07:00</published><updated>2011-05-21T09:28:30.763-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='rashtriya sahara'/><title type='text'>pyar ka panchnama</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;युवाओं के प्यार का पंचनामा&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा नहीं है कि आज की युवा पीढ़ी केवल खाने पीने और मौज मजा करने मंे ही यकीन करती है। बदलते हुए सिनेमा के इस नये दौर में ऐसे युवा भी दस्तक दे रहे हैं जो अपनी पीढ़ी के संघर्ष, विफलता, स्वप्न,प्यार,अविश्वास और असुरक्षा को विमर्ष का विषय बना रहे हैं। ’प्यार का पंचनामा‘ ऐसी ही फिल्म है जो पूरी तरह युवाओं के बारे में बनायी गयी है। फिल्म का नाम जरुर पुराना लगता है लेकिन फिल्म का विषय एकदम आधुनिक है। आज से पच्चीस तीस साल पहले स्त्री-पुरुष की जो रिलेशनशिप होती थी आज वह पूरी तरह बदल गयी है। स्त्रियों की दुनिया में कई बुनियादी बदलाव आ गये हैं। लड़कियां उच्च शिक्षा प्राप्त हैं, आत्मनिर्भर हैं, अपने जीवन के निर्णय खुद ले रही हैं। अब वे अपना एक ‘स्पेस‘ चाहती हैं। अपनी आजादी उन्हें सबसे ज्यादा प्रिय है। अब अपनी प्रॉब्लम्स पर वे बहस करती हैं। लड़ती-झगड़ती हैं। रिश्ते दिल से नहीं दिमाग से तय करती हैं। और लड़कियों का यह नया वजूद ही लड़कांे की नयी समस्या है। मोटे तौर पर इस फिल्म की यही कहानी है जिसे दिल्ली में घटित होता दिखाया गया है-दिल्ली के भदेसपन और उद्दंड चरित्र के साथ। दिल्ली की मस्ती और अराजकता के मनोभावों के बीच। और हां दिल्ली की गालियों सहित। तीन दोस्तों की कहानी है। एक साथ रहते हैं। अपने अपने काम पर जाते हैं और फ्रस्ट्रेट रहते हैं। तीनों की जिंदगियों में लड़कियां आती हैं तो लगता है कि जीवन को एक अर्थ मिल गया है। एक लंबा भांय भांय करता खालीपन भर रहा है। लेकिन गजब कि लड़कियां उनके जीवन में खुशबू की तरह नही उतरतीं। वे आती हैं तूफान की तरह और लड़कों के जीवन का हर सुंदर पल उड़ा ले जाना चाहती हैं। प्यार का स्वर्ग पाने की चाह लड़कों को प्यार का नरक पकड़ा देेती है। उन्हंे लगता है कि प्यार पाने के चक्कर में वह दुम हिलाने वाले कुत्ते हो कर रह गये हैं। लड़कियों के ‘स्पेस‘ ने उनका अपना ‘स्पेस‘ हड़प लिया है। तीनों अपने अपने तरीके से उन लड़कियों से अपना पिंड छुडाते हैं और फिर से अपने पुराने घर में एक साथ लौट आते हैं। इस सबके बीच में पीना-पिलाना, सेक्स करना, डांस-मस्ती-नशाखोरी भी चलती है। बेबाक गालियां भी और रोना उदास होना भी चलता रहता है। नये होने के बावजूद निर्देशक की कहानी पर गहरी पकड़ बनी रहती है। फिल्म का ‘कुत्ता‘ वाला गाना आज के मिजाज को सटीक अभिव्यक्ति देता है। सारे कलाकार नये ही हैं लेकिन उन्होंने जम कर अभिनय किया है। नये जमाने की फिल्म है। नये-पुराने दोनों वर्ग के दर्शकों को फिल्म का आस्वाद लेना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशकः लव रंजन&lt;br /&gt;कलाकारः कार्तिकेय तिवारी, रेयो, दिवयेंदु शर्मा, ईशिता, नुसरत, सोनाली।&lt;br /&gt;गीतः लव रंजन&lt;br /&gt;संगीतः हितेश, क्लिंटन, लव&lt;br /&gt;---------------------------------------&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-4314951854360031856?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/4314951854360031856/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/05/pyar-ka-panchnama_21.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/4314951854360031856'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/4314951854360031856'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/05/pyar-ka-panchnama_21.html' title='pyar ka panchnama'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-4511848724396870186</id><published>2011-05-21T09:24:00.000-07:00</published><updated>2011-05-21T09:26:18.661-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='rashtriya sahara'/><title type='text'>pyar ka panchnama</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;युवाओं के प्यार का पंचनामा&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा नहीं है कि आज की युवा पीढ़ी केवल खाने पीने और मौज मजा करने मंे ही यकीन करती है। बदलते हुए सिनेमा के इस नये दौर में ऐसे युवा भी दस्तक दे रहे हैं जो अपनी पीढ़ी के संघर्ष, विफलता, स्वप्न,प्यार,अविश्वास और असुरक्षा को विमर्ष का विषय बना रहे हैं। ’प्यार का पंचनामा‘ ऐसी ही फिल्म है जो पूरी तरह युवाओं के बारे में बनायी गयी है। फिल्म का नाम जरुर पुराना लगता है लेकिन फिल्म का विषय एकदम आधुनिक है। आज से पच्चीस तीस साल पहले स्त्री-पुरुष की जो रिलेशनशिप होती थी आज वह पूरी तरह बदल गयी है। स्त्रियों की दुनिया में कई बुनियादी बदलाव आ गये हैं। लड़कियां उच्च शिक्षा प्राप्त हैं, आत्मनिर्भर हैं, अपने जीवन के निर्णय खुद ले रही हैं। अब वे अपना एक ‘स्पेस‘ चाहती हैं। अपनी आजादी उन्हें सबसे ज्यादा प्रिय है। अब अपनी प्रॉब्लम्स पर वे बहस करती हैं। लड़ती-झगड़ती हैं। रिश्ते दिल से नहीं दिमाग से तय करती हैं। और लड़कियों का यह नया वजूद ही लड़कांे की नयी समस्या है। मोटे तौर पर इस फिल्म की यही कहानी है जिसे दिल्ली में घटित होता दिखाया गया है-दिल्ली के भदेसपन और उद्दंड चरित्र के साथ। दिल्ली की मस्ती और अराजकता के मनोभावों के बीच। और हां दिल्ली की गालियों सहित। तीन दोस्तों की कहानी है। एक साथ रहते हैं। अपने अपने काम पर जाते हैं और फ्रस्ट्रेट रहते हैं। तीनों की जिंदगियों में लड़कियां आती हैं तो लगता है कि जीवन को एक अर्थ मिल गया है। एक लंबा भांय भांय करता खालीपन भर रहा है। लेकिन गजब कि लड़कियां उनके जीवन में खुशबू की तरह नही उतरतीं। वे आती हैं तूफान की तरह और लड़कों के जीवन का हर सुंदर पल उड़ा ले जाना चाहती हैं। प्यार का स्वर्ग पाने की चाह लड़कों को प्यार का नरक पकड़ा देेती है। उन्हंे लगता है कि प्यार पाने के चक्कर में वह दुम हिलाने वाले कुत्ते हो कर रह गये हैं। लड़कियों के ‘स्पेस‘ ने उनका अपना ‘स्पेस‘ हड़प लिया है। तीनों अपने अपने तरीके से उन लड़कियों से अपना पिंड छुडाते हैं और फिर से अपने पुराने घर में एक साथ लौट आते हैं। इस सबके बीच में पीना-पिलाना, सेक्स करना, डांस-मस्ती-नशाखोरी भी चलती है। बेबाक गालियां भी और रोना उदास होना भी चलता रहता है। नये होने के बावजूद निर्देशक की कहानी पर गहरी पकड़ बनी रहती है। फिल्म का ‘कुत्ता‘ वाला गाना आज के मिजाज को सटीक अभिव्यक्ति देता है। सारे कलाकार नये ही हैं लेकिन उन्होंने जम कर अभिनय किया है। नये जमाने की फिल्म है। नये-पुराने दोनों वर्ग के दर्शकों को फिल्म का आस्वाद लेना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशकः लव रंजन&lt;br /&gt;कलाकारः कार्तिकेय तिवारी, रेयो, दिवयेंदु शर्मा, ईशिता, नुसरत, सोनाली।&lt;br /&gt;गीतः लव रंजन&lt;br /&gt;संगीतः हितेश, क्लिंटन, लव&lt;br /&gt;---------------------------------------&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-4511848724396870186?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/4511848724396870186/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/05/pyar-ka-panchnama.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/4511848724396870186'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/4511848724396870186'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/05/pyar-ka-panchnama.html' title='pyar ka panchnama'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-462247225326753850</id><published>2011-05-14T03:09:00.000-07:00</published><updated>2011-05-14T03:12:38.518-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा 14 मई 2011'/><title type='text'>रागिनी एमएमएस</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सेक्स और डर की जुगलबंदी: रागिनी एमएमएस&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डर बेच कर घर भरने के मामले में एकता कपूर रामगोपाल वर्मा और विक्रम भट्ट दोनों से आगे निकल गयी हैं। डर के निर्माण और डर के कारोबार दोनों को उनकी नयी फिल्म ‘रागिनी एमएमएस‘ ने बेहद कुशलता से साधा है। विक्रम भट्ट की हालिया फिल्म ‘हॉन्टेड‘ जहां डर की इमोशनल पटकथा थी, जिसके धागे डर की पारंपरिक फिल्मों और अनुभव से जुड़े हुए थे। वहीं ‘रागिनी एमएमएस‘ एक यथार्थवादी फिल्म है जो आज के उत्तर आधुनिक समय में खड़ी है। यंग जेनरेशन के कल्चर और अंदाज पर फोकस करने वाली एकता कपूर की यह फिल्म सेक्स के साथ डर की जुगलबंदी पेश करती है और तकनीक, छायांकन तथा संगीत के दम पर दर्शकों को डराने में कामयाब हो जाती है। यहां डर सचमुच एक डरावने अहसास में तब्दील हो जाता है। यूं ‘रागिनी एमएमएस‘ एक धोखेबाज फिल्म भी है। छोटे शहरों के जो दर्शक इसे एक सेक्सी फिल्म समझकर सिनेमाघरों पर टूटेंगे वे खुद को एक डरावने मायालोक में खड़ा पाएंगे। लेकिन डर का यह साक्षात्कार उन्हें फिल्म की मेकिंग के स्तर पर सुखद लगेगा। बिना स्टार कास्ट और बिना भव्य विदेशी लोकेशंस के बेहद कम बजट में बनी यह फिल्म कमाई का कीर्तिमान इस स्तर पर बनाएगी कि लागत से दस-बीस गुना ज्यादा कैसे आता है। फिल्म का हीरो राजकुमार अपनी गर्लफ्रेंड कैनाज मोतीवाला के साथ माथेरान के एक सुनसान घर में मौज-मजा करने पहुंचता है, जहां हिडेन कैमरे मौजूद हैं। एक्टर बनने की मंशा में वह गर्लफ्रेंड का सेक्सी एमएमएस बनवाने पर भी राजी हो जाता है। लेकिन उस घर में एक आत्मा का निवास है जिसे उसके घर वालों ने चुड़ैल कह कहकर मार मार डाला था। यह आत्मा अपने घर में किसी को गलत काम नहीं करने देती। लड़का चूंकि प्यार के नाम पर सेक्स क्लिप बनाना चाहता है अतः आत्मा का शिकार बनता है। लड़की चूंकि घर से झूठ बोलकर मस्ती करने आयी है इसलिए आत्मा उसे भी शारीरिक दंड देती है। बस इतनी सी कथा है जिसे खूबसूरती से बुना गया है। इंटरवल से पहले फिल्म जितनी कसी हुई है इंटरवल के बाद थोड़ी खिंच गयी है। नंगे संवादों के चलते भी चर्चित होगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रोडयूसर:  एकता कपूर, शोभा कपूर &lt;br /&gt;निर्देशक:  पवन कृपलानी &lt;br /&gt;कलाकार:  राजकुमार यादव, कैनाज मोतीवाला &lt;br /&gt;संगीत:   शमीर टंडन, फैजान हुसैन, बप्पी लाहिरी&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-462247225326753850?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/462247225326753850/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/05/blog-post_14.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/462247225326753850'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/462247225326753850'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/05/blog-post_14.html' title='रागिनी एमएमएस'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-2411049427608955737</id><published>2011-05-07T03:49:00.000-07:00</published><updated>2011-05-07T03:50:56.205-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा 7-5-2011'/><title type='text'>हॉन्टेड</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डर की इमोशनल पटकथा: हॉन्टेड&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छोटे बजट और नये चेहरों के साथ एक बेहतर फिल्म बनाने के लिए प्रसिद्ध विक्रम भट्ट इस बार ‘हॉन्टेड‘ लेकर आये हैं। यह डर की इमोशनल पटकथा है। यानी डर के अदृश्य द्वार के पार एक प्यार है जिसे ईविल (दुष्टता) के शिकंजे से मुक्ति दिलानी है। यह प्यार है नयी अभिनेत्री टीया बाजपेयी जो पिछले 80 साल से एक बंगले में चीख-तड़प रही है। उसकी आत्मा उसके रेपिस्ट प्रोफेसर की बुरी आत्मा के कब्जे में है जिसे टीया ने मार डाला था। टीया की अच्छी आत्मा को मुक्ति दिलाने के लिए नये नाम महाअक्षय के साथ मिथुन चक्रवर्ती के साहबजादे मिमोह उपस्थित हैं, न सिर्फ नये नाम बल्कि नये लुक के भी साथ। एक फकीर की सलाह पर महाअक्षय 80 साल पीछे के समय में लौटते हैं और सन् 1936 में जी रही टीया की जिंदगी में उतरते हैं। अब रेपिस्ट प्रोफेसर और टीया वाली पटकथा में महाअक्षय भी हैं जो टीया का प्रेम जीत चुके हैं। टीया को शैतानी साये से मुक्ति दिलाने के बाद महाअक्षय वापस उन्नीस सौ ग्यारह के समय में लौट आते हैं। अब उनके पैतृक बंगले से टीया की चीखें आनी बंद हो गयी हैं। एक अच्छी फैंटेसी रची है विक्रम ने जिसमें डर, प्यार और संस्पेंस का संतुलित कोलाज बनाया है। कुछ डर का माया लोक, कुछ थ्री डी फॉर्मेट का आकर्षण, ‘हॉन्टेड‘ को छोटे और मझोले शहरों में अच्छी ओपनिंग मिलने की खबर है। मुंबई में दर्शकों की संख्या ठीक-ठाक रही। अगर इसे हिट फिल्म नहीं कहेंगे तो फ्लॉप फिल्म भी नहीं कही जाएगी। केवल कहानी के दम पर खड़ी हुई फिल्म अपनी लागत से ज्यादा वसूल लेती है तो उसे सफल ही कहा जाएगा। शैतान से मुक्ति चाहने की तंत्र-मंत्र की प्रक्रिया के चलते फिल्म थोड़ी बोझिल और नाटकीय जरूर हो गयी है, लेकिन बांधे रखती है। चिरंतन भट्ट का संगीत फिल्म की कथा के अनुरूप है। फिल्म के दो गीत भावप्रवण और मर्म स्पर्शी हैं। सेट लगाकर और कैमरे के जरिए 1936 के समय को रिक्रिएट करना कामयाब रहा है। यूं तो पूरी फिल्म की सिनेमेटोग्राफी ही उम्दा है। हालांकि डरावनी फिल्में देख-देख कर दर्शक डरना छोड़ चुके हैं फिर भी विक्रम भट्ट की विशेषता है कि इस फिल्म में उन्होंने डर का एक विश्वसनीय मंजर रचने की सफल कोशिश की है। महाअक्षय और टीया दोनों का अभिनय सामान्य से अच्छा है लेकिन दोनों को और मेहनत करनी होगी। भावों की अभिव्यक्ति में महाअक्षय को कुछ और विविधता लानी होगी। फिल्म देखी जा सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशक:   विक्रम भट्ट&lt;br /&gt;कलाकार: महाअक्षय, टीया बाजपेयी, अचिंत कौर, आरिफ जकरिया, मोहन कपूर&lt;br /&gt;गीत:    शकील आजमी, जुनैद वसी&lt;br /&gt;संगीत:   चिरंतन भट्ट&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-2411049427608955737?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/2411049427608955737/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/05/blog-post.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/2411049427608955737'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/2411049427608955737'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/05/blog-post.html' title='हॉन्टेड'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' 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में कुछ भी छूट गया सा या आधा अधूरा नहीं लगता। हम जिस मध्यवर्गीय समाज में अपने कुछ सपनों और अरमानों के साथ जीते रह कर लड़ते-टूटते रहते हैं इसकी प्रभावशाली तथा मार्मिक प्रस्तुति बन गयी है यह फिल्म। बड़े पर्दे पर छोटी मगर सशक्त कविता जैसा मंचन। करोड़ों रुपये फूंककर, मेन स्ट्रीम सिनेमा के नाम पर, घटिया फिल्में बनाने वाले इस फिल्म से काफी कुछ सीख सकते हैं। कथा-पटकथा-गीत-संगीत सिनेमेटोग्राफी-संपादन और सबसे अंत में अभिनय तथा निर्देशन हर मोर्चे पर ‘शोर इन द सिटी‘ एक नायाब अनुभव बन कर उभरती है। अब तक तुषार कपूर की कॉमेडी पसंद करने वाले उसे एक नये, थोड़ा हटकर रूप में देखेंगे और तुषार का यह रूप ज्यादा जीवंत, ज्यादा मौलिक, ज्यादा सहज और ज्यादा आकर्षक लगता है। फिल्म के सभी कलाकारों- तुषार कपूर, प्रीति देसाई, सेंढिल राममूर्ति, पिताबोश, निखिल द्विवेदी, संदीप किशन और राधिका आप्टे ने जमकर मेहनत की है और अपने संघर्षशील किरदारों में जान डाल दी है। छोटी-छोटी उपकथाएं मूल कहानी को गति भी देती हैं और समाज के विभिन्न क्षेत्रों में फैले अनाचार को भी रेखांकित करती हैं। पूरी फिल्म अपनी मूल प्रकृति में गंभीर है लेकिन कॉमेडी का शालीन इस्तेमाल फिल्म को हल्का फुल्का भी बनाये रखता है। निर्देशन और सिनेमेटोग्राफी का सबसे बड़ा कमाल यह है कि हम अपनी देखी हुई मुंबई को नये सिरे से, नये अनुभव के साथ पकड़ पाते हैं। युवाओं पर केंद्रित फिल्म है। इसलिए इसे बनाने का अंदाज और इसका गीत-संगीत पूरी तरह युवापन लिए हुए है। प्यार, बेरोजगारी, चोरी-चकारी, क्रिकेट, लोकल की भीड़, हफ्ता वसूली, मारामारी, दो नंबर का धंधा, तीज त्योहार, झोपड़पट्टी, पांच सितारा पार्टियां, बियरबार, पुलिस इतने बड़े कथ्य का कैनवास लेकर चलने वाली इस फिल्म को अनिवार्यतः देखा जाना चाहिए। भले ही इसे समझने के लिए दिमाग पर कुछ अतिरिक्त जोर क्यों न डालना पड़े। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रोड्यूसर:  एकता कपूर, शोभा कपूर&lt;br /&gt;निर्देशक:  राज निदिमोरू, कृष्णा डीके&lt;br /&gt;कलाकार:  तुषार कपूर, प्रीति देसाई, सेंढिल राममूर्ति, पिताबोश, निखिल द्विवेदी, राधिका आप्टे &lt;br /&gt;गीत:   समीर, प्रिया पांचाल &lt;br /&gt;संगीत:   सचिन, जिगर, हरप्रीत&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-5700423276576592964?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/5700423276576592964/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/04/blog-post_30.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/5700423276576592964'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/5700423276576592964'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/04/blog-post_30.html' title='शोर इन द सिटी'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-2655404693559283535</id><published>2011-04-23T03:22:00.000-07:00</published><updated>2011-04-23T03:23:54.544-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा 23 अप्रैल 2011'/><title type='text'>दम मारो दम</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेहतर से थोड़ा कम: दम मारो दम&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;आज कल एक फिल्म के भीतर तीन चार कहानियां कहने का जो चलन है उसी की एक मिसाल ‘दम मारो दम‘ भी है। साल में तीन सौ पैंसठ दिन छुट्टी पर रहने वाले गोवा के ड्रग माफिया पर आधारित रोहन सिप्पी की यह फिल्म स्टाइलिश तो है, लेकिन अंत तक आते-आते कहानी के स्तर पर बिखर जाती है। फिल्म के अंत में अभिषेक बच्चन का मर्डर दिखाने की जरा भी जरूरत नहीं थी। अभिषेक का मरना फिल्म के उद्देश्य और संदेश को कमजोर करता है। ड्रग माफिया के लौह शिकंजे को ध्वस्त कर देने वाले एक जांबाज पुलिस ऑफिसर की मौत बुराई पर अच्छाई की विजय वाले फंडे को शिथिल कर देती है। पूरी तरह कमर्शियल फिल्म है और अभिषेक बच्चन समेत सभी कलाकारों ने अपना बेहतर देने का प्रयत्न भी किया है, लेकिन कहानी में कोई नयापन न होने के कारण बांध नहीं पाती। वरिष्ठ अदाकार देव आनंद की फिल्म ‘हरे रामा हरे कृष्णा‘ के अमर गाने ‘दम मारो दम‘ का रीमिक्स प्रभावित नहीं करता। हां उसकी फिल्मिंग बेहद उम्दा और प्रभावशाली बन पड़ी है। इस गाने पर दीपिका पादुकोन का डांस मदमस्त है। ड्रग माफिया की कहानी पर दर्शक बीसियों फिल्में देख चुके हैं। कथ्य के स्तर पर कोई नया आयाम या अर्थ देकर फिल्म को नया अंदाज दिया जाता तो कुछ कमाल हो सकता था। अपनी ऊंची-ऊंची महत्वाकांक्षाओं के कारण अपने हंसते खेलते जीवन को नर्क बना लेने वाली युवती के रोल को बिपाशा बसु ने तार्किक और संवेदनशील परिणति दी है। टीन एज युवा को ड्रग सौदागरों द्वारा कैसे फंसा लिया जाता है, इस मार्मिक कथा को प्रतीक बब्बर ने अपने निर्दोष अभिनय से अच्छी अभिव्यक्ति दी है। युवा संगीतकार के रोल में साउथ के सितारे राणा दग्गू बत्ती भी जंचते हैं। अभिषेक बच्चन का अभिनय तो फिल्म की जान है ही। गोविन्द नामदेव ने अभिनय का सहज पाठ पेश किया है। गीत-संगीत फिल्म का एक मजबूत पक्ष है। फोटोग्राफी लाइव तथा आकर्षक है। संवादों में दम है। ‘दम मारो दम‘ में कुछ बेदम है तो वह है पटकथा। प्रतीक, राणा, बिपाशा, अभिषेक सबकी अलग अलग कहानियां मिलकर कोई एक केंद्रीय विमर्श नहीं बन सकीं। बन जातीं तो यह कोई अलग और बेहतरीन फिल्म होती। कुल मिलाकर देखने लायक फिल्म तो है ही। अपने ट्रीटमेंट में एक ‘युवापन‘ लिए हुए है। रमेश सिप्पी के कैंप से निकली है इसलिए ‘भव्य‘ तो है ही। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशक:  रोहन सिप्पी &lt;br /&gt;कलाकार:  अभिषेक बच्चन, बिपाशा बसु, राणा दग्गू बत्ती, प्रतीक बब्बर, गोविन्द नामदेव &lt;br /&gt;संगीत:   प्रीतम चक्रवर्ती &lt;br /&gt;गीत:   जयदीप साहनी&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-2655404693559283535?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/2655404693559283535/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/04/blog-post_23.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/2655404693559283535'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/2655404693559283535'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/04/blog-post_23.html' title='दम मारो दम'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-2543275849886351580</id><published>2011-04-16T03:10:00.000-07:00</published><updated>2011-04-16T03:11:35.587-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा 16 अप्रैल 2011'/><title type='text'>तीन थे भाई</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गहरी है खाई: तीन थे भाई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;यह अंदाजा नहीं था कि जिन लोगों पर हम भरोसा करते हैं वे लोग भी हमे गच्चा दे सकते हैं। फिल्म पर बतौर प्रोड्यूसर राकेश ओमप्रकाश मेहरा का नाम था इसलिए सोचा कि यकीनन लीक से हटकर बनी होगी। फिल्म के शुरुआती आधे घंटे तक लगता रहा कि कहीं यह फिल्म बच्चों के लिए तो नहीं बनायी गयी है, लेकिन बाद में समझ आया कि यह तो निहायत बचकानी फिल्म है। कॉमेडी के नाम पर ‘हास्य व्यंग्य‘ जैसी ताकतवर विधा का कचरा कर दिया है लेखकों ने। ‘तीन थे भाई‘ के तीन पक्ष हैं। पहला कथा पक्ष जो निहायत ही लचर और बेसिर-पैर है, दूसरा अभिनय पक्ष जो दुखद है। तीसरा गीत संगीत पक्ष जो थोड़ा बहुत सुकून देता है। लीक से हटकर फिल्म बनाने के चक्कर में निर्देशक फिल्म की पूरी कास्ट के साथ एक गहरी खाई में जा गिरा है। मूल कहानी से छिटककर जब तीनों भाई क्रमशः अपने अतीत में जाते हैं उस समय के कुछ टुकड़े संवेदनशील और जीवंत लगते हैं, लेकिन दिक्कत यह है कि दर्शक किसी फिल्म को टुकड़ों में नहीं समग्रता में देखने जाते हैं। कुल मिलाकर ‘तीन थे भाई‘ एक असफल फिल्म है जो खराब फिल्म के अच्छे उदाहरण के रूप में याद की जाएगी। ओम पुरी, श्रेयस तलपदे और दीपक डोबरियाल तीन सगे भाई हैं जिनमें आपस में जरा भी नहीं बनती। असल में तो तीनों एक दूसरे को नफरत की हद तक नापसंद करते हैं। तीनों अपने दादा की मनमानी और सख्ती के चलते गांव से पलायन करते हैं और शहर में एक निम्न मध्य वर्गीय जीवन उच्च वर्गीय सपनों के साथ बिता रहे होते हैं। तभी उन्हें पता चलता है कि हिमाचल प्रदेश के एक कस्बे में उनके दादा ने एक प्रोपर्टी छोड़ी है जिसके वारिस वे तीनों हैं। पर एक कठोर शर्त है कि तीनों को प्रत्येक वर्ष उस पहाड़ी पर पहुंचकर एक रात बितानी पड़ेगी। शर्त पूरी होने पर प्रोपर्टी बेच कर जो पैसा मिलेगा वो तीनों में बंट जाएगा। इस कहानी को अगर थोड़ी संजीदगी से फिल्मा दिया जाता तो एक ठीक-ठाक फिल्म बन सकती थी। लेकिन फिल्म में कॉमेडी का पूरा ढाई सौ ग्राम का पैकेट उंड़ेल कर फिल्म को कड़वा बना दिया गया है। नये अभिनेता दीपक डोबरियाल ने एक बार फिर अच्छा काम किया है। ओम पुरी पर दर्शकों को अभिमान है। उन्हें कैसी भी फिल्म साइन करके दर्शकों को दुख नहीं देना चाहिए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशक:  मृगदीप सिंह लांबा &lt;br /&gt;कलाकार:  ओम पुरी, श्रेयस तलपदे, दीपक डोबरियाल, रागिनी खन्ना, योगराज सिंह &lt;br /&gt;गीत:   गुलजार &lt;br /&gt;संगीत:   दलेर मेहंदी, रणजीत बारोट आदि&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-2543275849886351580?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/2543275849886351580/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/04/blog-post_16.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/2543275849886351580'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/2543275849886351580'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/04/blog-post_16.html' title='तीन थे भाई'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-5173486453478088768</id><published>2011-04-09T02:58:00.000-07:00</published><updated>2011-04-09T03:00:07.535-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा 9 अप्रैल 2011'/><title type='text'>थैंक यू</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेवफाई के साइड इफेक्ट: थैंक यू&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बार निर्देशक अनीस बज्मी ने अपने कॉमेडी के ताने-बाने को थोड़ा सा भावनात्मक स्पर्श देने की कोशिश की है। असल में मुख्य धारा सिनेमा के ज्यादातर निर्देशक कॉमेडी में ही अपनी मुक्ति ढूंढ़ते हैं। वह भी ‘मांइडलेस कॉमेडी‘ में। लेकिन बिना कहानी वाला सिचुएशनल हास्य कितना गढ़ा जाएगा सो नया कुछ करने के नुस्खे तलाशे जाते हैं। ‘थैक्यू‘ का नुस्खा है हंसी-मजाक में भावना का तड़का। निर्देशक ने फिल्म में एक मोटी सी कहानी भी रखी है। वह कहानी है तीन दोस्तों द्वारा अपनी-अपनी पत्नी को धोखे में रखकर नयी-नयी लड़कियों से फ्लर्ट करने की। एक लाइन में कहें तो इस बार अनीस बज्मी ने प्यार के नहीं बेवफाई के साइड इफेक्ट दिखाने का प्रयास किया है। अक्षय कुमार फिल्म के प्रमुख हीरो हैं, लेकिन इरफान खान अपने अभिनय और संवाद अदायगी के चलते सब पर भारी पड़े हैं। इरफान गजब के एक्टर हैं। उन्हें परकाया प्रवेश में महारत हासिल है। वह करेक्टर के भीतर सहजता से घुस जाते हैं और इरफान खान भी बने रहते हैं। सिनेमा में जो नयी पीढ़ी सक्रिय है उससे तुरंत पहले वाले बैच के इरफान खान एक्टिंग के स्कूल बनते जा रहे हैं। इरफान, बॉबी और सुनील शेट्टी तीन दोस्त हैं, जो गाहे बगाहे अपनी पत्नियों से छुपकर दूसरी लड़कियों से इश्क का छीन झपट्टा करते रहते हैं। जब जब वह एक्सपोज होने वाले होते हैं, एक -दूसरे की मदद से खुद को बचा ले जाते हैं। अक्षय कुमार एक प्राइवेट जासूस हैं, जो पतियों की बेवफाई की पोल खोलने का धंधा करते हैं। सोनम कपूर बॉबी देओल की पत्नी हैं जो बॉबी का पर्दाफाश करने के लिए सेलीना जेटली की सलाह पर अक्षय कुमार की मदद लेती हैं। पोल खोलने के इस क्रम में प्यार के घात-प्रतिघात, दोस्ती की ‘थीसिस-एंटी थीसिस‘ और बेवफाई के साइड इफेक्ट भी रेखांकित होते चलते हैं। बीच में एक विदूषक किस्म का डॉन भी आता है। बॉबी सोनम को डाइवोर्स दे देता है। लेकिन अक्षय कुमार दोनों की फिर से शादी करवा देता है। अंत में पता चलता है कि टूटे हुए दिलों को जोड़ने का काम करने वाला अक्षय अपने दिलफेंक स्वभाव के चलते अपनी बहुत प्यारी पत्नी को खो चुका है। पत्नी की मेहमान भूमिका में विद्या बालन हैं। फिर एक छोटा सा भाषण है कि लोगों को अपनी अपनी पत्नियों को क्यों एक निश्छल प्यार करना चाहिए। यही इस फिल्म का संदेश भी माना जा सकता है। फिल्म के तीन गाने अच्छे हैं जिनमे से ‘रजिया फंस गयी..‘ पहले ही हिट हो चुका है। टाइम पास फिल्म है। एक ऊबी हुई दोपहर से बचने के लिए थियेटर जा सकते हैं। &lt;br /&gt;निर्देशक:  अनीस बज्मी&lt;br /&gt;कलाकार:  अक्षय कुमार, बॉबी देओल, इरफान खान, सुनील शेट्टी, सोनम कपूर, सेलीना जेटली, रिमी सेन, विद्या बालन, मल्लिका शेरावत&lt;br /&gt;संगीत: प्रीतम चक्रवर्ती&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-5173486453478088768?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/5173486453478088768/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/04/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/5173486453478088768'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/5173486453478088768'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/04/blog-post.html' title='थैंक यू'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-1634414020839621479</id><published>2011-02-26T02:22:00.000-08:00</published><updated>2011-02-26T02:23:17.343-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा 26 फरवरी 2011'/><title type='text'>तनु वेड्स मनु</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मजेदार मसालेदार ’तनु वेड्स मनु‘&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कानपुर की चटपटी चुलबुली तनु और लंदन पलट शांत- शर्मीला मनु। इन दोनों के रोमांस में कॉमेडी का तड़का लगाकर ठेठ यूपी स्टाइल में एक मजेदार मसालेदार फिल्म बनाने की कोशिश की गयी है। जो अर्थपूर्ण फिल्में देखने के शौकीन हैं यह उनके मिजाज की फिल्म नहीं है। लेकिन जो हल्की-फुल्की, थोड़ी सी रोमांटिक, थोड़ी सी मजाकिया, जानदार संवादों वाली नाटकीय फिल्मों को देखने के आदी हैं, उन्हें यह फिल्म मनोरंजन के अच्छे अवसर प्रदान करती है। फिल्म की सिनेमेटोग्राफी बहुत यथार्थवादी और ‘लाइव’ है। फिल्म कानपुर, कपूरथला और दिल्ली में फिल्मायी गयी है। और यहां की अराजक, लापरवाह और निरंकुश जीवनशैली को छायांकन के जरिये दर्शाने में सफल हुई है। निर्देशक शुरू से अंत तक दर्शकों को बांधे रखने में सफल रहा है। लेकिन फिल्म का ‘अंत’ वह संभाल नहीं पाया है। तनु से शादी करने के लिए माधवन और जिमी शेरगिल दोनों का बारात लेकर आ जाना दर्शकों को एक ‘शॉक’ जरूर देता है, लेकिन पहले मरने मारने पर उतारू जिमी का बाद में एक डायलॉग बोलकर पलायन कर जाना अटपटा और नाटकीय हो गया है। जब जिमी को पहली बार पता चलता है कि जिस लड़की से वह शादी करने वाला है उसी लड़की से माधवन प्रेम करता है, ठीक उसी समय वह दोनों के बीच से हट जाता तो यह एक स्वाभाविक अंत होता और शालीन भी। लेकिन प्रेम कहानी का ऐसा अंत सैकड़ों लव स्टोरीज में दिखाया जा चुका है, इसलिए कुछ नया करने के चक्कर में थोड़ा सा ‘कन्फ्यूजिया’ गया है। सिगरेट और शराब पीने वाली, प्रेमी के नाम का ‘टेटू’ छाती पर गुदवाने वाली, अशोभन गालियां बकने वाली एक बेलौस, बिंदास और अपनी मर्जी का जीवन जीने वाली लड़की का किरदार निभाकर कंगना राणावत ने साबित किया है कि वह क्यों बिना किसी गॉड फादर के इंडस्ट्री में न सिर्फ जमी हुई है, बल्कि लगातार आगे भी बढ़ रही है। उसके अभिनय में एक आंच है, जिसकी तपिश निरंतर बढ़ती जा रही है। वह हिंदी फिल्मों का झोंका नहीं, स्थायी भाव बनने की दिशा में अग्रसर है। माधवन के अभिनय में एक सौम्य किस्म की गरिमा है, जो संजीव कुमार जैसी ऊंचाई की याद दिलाती है। संजीव कुमार एक बहुआयामी अभिनेता थे, जबकि माधवन ने उनके गरिमा वाले, शांत-सौम्य पहलू को पकड़ा है। यह फिल्म तीन कारणों से याद की जा सकती है। पहली इसकी सिनेमेटोग्राफी। दूसरा इसका गीत-संगीत पक्ष। और तीसरा इसके किरदारों का जीवंत और विश्वसनीय अभिनय। माधवन के दोस्त पप्पी के रोल में दीपक डोबरियाल ने भी शानदार काम किया है। भोजपुरी के स्टार हीरो रवि किशन का किरदार इसमें ‘फिलर’ जैसा है। उन्हें ऐसे रोल करने से इनकार करना चाहिए। जो भी हो एक स्वस्थ मनोरंजन के लिए फिल्म देखी जा सकती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशक:  आनंद एल. राय &lt;br /&gt;कलाकार:  माधवन, कंगना राणावत, जिमी शेरगिल, रवि किशन, दीपक डोबरियाल, राजेन्द्र गुप्ता &lt;br /&gt;गीत:   राज शेखर &lt;br /&gt;संगीत:   क्रिस्ना &lt;br /&gt;छायांकन:  चिरंतन दास&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-1634414020839621479?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/1634414020839621479/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/02/blog-post_26.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/1634414020839621479'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/1634414020839621479'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/02/blog-post_26.html' title='तनु वेड्स मनु'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-5958978462638889134</id><published>2011-02-19T02:03:00.000-08:00</published><updated>2011-02-19T02:04:48.426-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा कानपुर 19 फरवरी 2011'/><title type='text'>7 खून माफ</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रयोगधर्मी लेकिन जटिल ‘7 खून माफ’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;यूं तो विशाल भारद्वाज की फिल्में आम तौर पर प्रयोगधर्मी ही होती हैं, लेकिन वे मनोरंजक और स्पष्ट भी होती हैं। मगर इस बार उनकी फिल्म संरचना के स्तर पर बेहद जटिल हो गयी है। सिनेमा का जो बड़ा आम दर्शक वर्ग है और जिसे बॉक्स ऑफिस का माई-बाप कहा जाता है, उसे यह फिल्म शायद पसंद नहीं आयेगी। इस फिल्म को समझना और फिर पचाना बहुत आसान नहीं है। यह हिंदी के किसी अमूर्त और कठिन लेखक की दुर्बोध कहानी जैसी हो गयी है। अगर फिल्म का संदेश यह है कि पुरुषों की सामंतवादी सोच के विरुद्ध यह प्रियंका चोपड़ा का खूनी इंतकाम है तो यह संदेश ठीक से घटित नहीं होता। कारण कि कभी कभी प्रियंका कत्ल में मजा लेती दिखती है जो हिंसक प्रतिशोध का नहीं बीमार मानसिकता का प्रतीक बनता नजर आता है। पूरी फिल्म में प्रियंका छह पतियों का खून करती है। वास्तविक जीवन में ऐसा नहीं होता कि कोई छह छह खून करने के बाद भी पुलिस के हत्थे न चढ़े। मान लेते हैं कि यह फिल्म है। और इसमें ‘क्रियेटिव लिबर्टी’ लेने की गुंजाइश है, लेकिन खून जैसे सबसे बड़े जुर्म के पीछे कुछ भारी और विश्वसनीय कारण तो होने ही चाहिए थे। प्रियंका के रूसी पति का दोष तो सिर्फ इतना होता है कि वह ‘चीटर’ है। ‘चीटिंग’ की सजा ‘र्मडर’ नहीं हो सकती। एक बात और समझ नहीं आयी। अगर प्रियंका ने अपने छह पतियों का खून इसलिए किया चूंकि वह उनके दमन, अत्याचार, धोखेबाजी और जालसाजी से परेशान थी तो सातवां खून वह खुद अपना क्यों करती है? हिंसा का जवाब प्रति हिंसा से देने वाला कभी अपराधबोध से पीड़ित नहीं होता। प्रियंका क्यों होती है? जटिल होने के कारण एक ज्वलंत विमर्श अमूर्तन की खाई में फिसल गया है। इसमें शक नहीं कि इस फिल्म के लिए प्रियंका चोपड़ा को ढेर सारे अवार्ड मिलने वाले हैं। उसने अपने अब तक के करियर का सर्वाधिक विलक्षण अभिनय किया है। प्रियंका के बाद सबसे ज्यादा प्रभाव छोड़ा है उसके पहले पति नील नितिन मुकेश ने। एक नाजुक मिजाज शायर बिस्तर पर कितना बर्बर हो जाता है, यह चरित्र इरफान खान ने बहुत ऊंचाई पर ले जाकर निभाया है। प्रियंका और इरफान के रिश्तों में पसरी हिंसा से दर्शक सहम जाते हैं। नसीरुद्दीन शाह और अन्नू कपूर तो मंजे हुए एक्टर हैं लेकिन गायिका होने के बावजूद ऊषा उथुप ने बेहद सहज और जीवंत रोल किया है। वह फिल्म में प्रियंका की वफादार ‘मेड’ बनी हैं। फिल्म का संगीत भी विशाल भारद्वाज का है, जो बेहद प्रभावशाली है। फिल्म का ‘डार्लिंग डार्लिंग’ वाला गाना तो बहुत पहले से ही पॉपुलर हो चुका है। प्रतिभाशाली जॉन अब्राहम का ‘स्पेस’ सबसे कम है। उन्हें कुछ करने का मौका ही नहीं मिला। एक्सपेरिमेंटल फिल्में पसंद करने वाले दर्शक इसे अवश्य ही देख लें। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशक:  विशाल भारद्वाज &lt;br /&gt;कलाकार:  प्रियंका चोपड़ा, जॉन अब्राहम, नील नितिन मुकेश, नसीरुद्दीन शाह, अन्नू कपूर। &lt;br /&gt;संगीत:   विशाल भारद्वाज&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-5958978462638889134?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/5958978462638889134/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/02/7.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/5958978462638889134'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/5958978462638889134'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/02/7.html' title='7 खून माफ'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-3406048332733934252</id><published>2011-02-12T02:50:00.000-08:00</published><updated>2011-02-12T02:53:48.893-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा कानपुर 12 फरवरी 2011'/><title type='text'>पटियाला हाउस</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संवेदनशील और जीवंत ‘पटियाला हाउस’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निखिल आडवाणी की ‘पटियाला हाउस’ में अक्षय कुमार को संवेदनशील और मर्मस्पर्शी अभिनय करते देखना उन सबको अच्छा लगेगा जो मानते हैं कि अक्षय एक बेहतर एक्टर हैं। ‘सिंह इज किंग’ की अपार सफलता के बाद से वह लगातार एक अच्छी फिल्म की प्रतीक्षा में हैं। उनकी प्रतीक्षा ‘पटियाला हाउस’ पर आकर पूरी हुई है। बॉक्स ऑफिस पर ‘पटियाला हाउस’ का क्या बनेगा यह तो आने वाला समय बताएगा लेकिन कहानी, निर्देशन, गीत-संगीत, भावना प्रधान अभिनय, संपादन और छायांकन के स्तर पर ‘पटियाला हाउस’ एक उम्दा फिल्म है। क्रिकेट के बैकड्रॉप पर बनी यह फिल्म मूलतः पिता-पुत्र के टकराव को तो बयान करती ही है, तानाशाह मानसिकता के विरुद्ध लोकतांत्रिक इच्छाओं को भी रेखांकित करती है। फूहड़ मजाक और माइंडलेस कॉमेडी से बहुत दूर एक संवेदनशील और जीवंत ‘पटियाला हाउस’ ही असल में अक्षय कुमार का सही घर है। ऐसे ही घर दर्शकों के दिलों में उन्हें स्थायी बसेरा दिला सकते हैं। फिल्म की मुख्य कहानी यह है कि ऋषी कपूर अपने लंबे चौड़े कुनबे के साथ लंदन के साउथ हॉल में रहते हैं। अपने अकेले के दम पर लंदन में वह एक मिनी पंजाब खड़ा करते हैं और अंग्रेजों से नफरत करते हैं। अंग्रेजों का हिंदुस्तानियों के प्रति नस्लवादी रवैया उन्हें इस बात की इजाजत नहीं देता कि उनका अपना बेटा अक्षय कुमार ब्रिटिश टीम की तरफ से खेले। असल में अंग्रेजों से लड़ते-भिड़ते वह खुद तानाशाह बन जाते हैं। ‘पटियाला हाउस’ में सांस लेता लंबा चौड़ा परिवार एक तरह से कामनाओं का मकबरा बन जाता है। सत्रह साल क्रिकेट से दूर रहने के बाद अंततः अक्षय कुमार अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध जाकर इंग्लैंड की टीम में क्रिकेट खेलते हैं और इंग्लैंड को लगातार जीत दिलाकर खुद का होना सिद्ध करते हैं। ऋषी कपूर को पहले क्रोध आता है लेकिन बाद में कुछ इमोशनल ड्रामे के बाद उन्हें अपनी गलती का एहसास होता है। वह अपनी जिद और एकाधिकारवादी सोच में नहीं अपने बेटे की खुशी और जीत में सार्थकता तलाशते हैं। एक स्पंदनहीन, इच्छा रहित, लगभग गुलाम पटियाला हाउस अपने-अपने सपनों के द्वार पर दस्तक देता नजर आता है। ऋषी कपूर, डिंपल और अक्षय कुमार तो मंजे हुए अभिनेता हैं लेकिन अनुष्का शर्मा ने एक बार फिर पंजाबी कुड़ी के किरदार में जान डाल दी है। उन्होंने रोचक और ‘रीयल’ अभिनय किया है। शंकर-अहसान-लॉय का संगीत दिल को भाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशक:  निखिल आडवाणी &lt;br /&gt;कलाकार:  अक्षय कुमार, अनुष्का शर्मा, ऋषी कपूर, डिंपल कपाड़िया, हार्ड कौर &lt;br /&gt;संगीत:   शंकर-अहसान- लॉय&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-3406048332733934252?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/3406048332733934252/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/02/blog-post_12.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' 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2011'/><title type='text'>ये साली जिंदगी</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जोरदार है ‘ये साली जिंदगी’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन फिल्मों को ‘कंटेंट इज किंग’ कहकर परिभाषित किया जाता है वैसी फिल्म तो है ही ‘ये साली जिंदगी’। एक कदम आगे बढ़कर अभिनय के स्तर पर भी लाजवाब और बेमिसाल है सुधीर मिश्रा की यह फिल्म। इरफान खान कमाल के एक्टर हैं लेकिन इस फिल्म में जीवंतता, सहजता और सशक्तता की नयी ऊंचाई पर खड़े मिले हैं वह। एक खुरदुरी और उतार चढ़ाव से लबरेज जिंदगी का हतप्रभ आशिक वाला किरदार निभा कर उन्होंने प्रतिभा के अपने प्रमाण को रेखांकित किया है। नये अभिनेता अरुणोदय सिंह ने अपने अभिनय की विराट रेंज से चकित किया लेकिन डर है कि कहीं उन्हें अब लगातार गैंगस्टर का रोल न मिलने लगे। चित्रांगदा सिंह तो पहले भी अपने अभिनय के जौहर दिखा चुकी हैं लेकिन नयी लड़की अदिति राव हैदरी ने अपने बोल्ड और बिंदास रोल से युवा ब्रिगेड में पहली पंक्ति में अपना स्थान सुनिश्चित कर लिया है। सौरभ शुक्ला, सुशांत सिंह, यशपाल शर्मा और विपिन शर्मा ने भी अपना होना दर्ज किया है। सबसे ज्यादा प्रभावित करता है फिल्म का शीषर्क गीत, जो फिल्म की व्याख्या भी करता है। कथ्य के स्तर पर ‘ये साली जिंदगी’ खट्टे-मीठे- खुरदरे अनुभवों का जोरदार कोलाज है जो दिल्ली की गलियों में दिल्ली की भाषा में, धूम-धड़ाम ढंग से घटता है। दरअसल, मुंबई का बहुत दोहन हो चुका इसलिए दिल्ली अब सिनेमा की नयी मंडी है। जैसा कि आजकल के नये सिनेमा का ट्रेंड है, इस फिल्म में भी कोई एक सीधी सादी कहानी नहीं है। इसमें इरफान खान और चित्रांगदा सिंह, अरुणोदय सिंह और अदिति राव हैदरी, चित्रांगदा सिंह और विपुल गुप्ता, सौरभ शुक्ला और इरफान खान, यशपाल शर्मा और प्रशांत नारायण, सुशांत सिंह और अन्य की समानांतर जिंदगियां टुकड़ों में घटित होती रहती हैं और एक दिलचस्प कोलाज बनाती हैं। एक पंक्ति में कहना हो तो यह स्टाइल, कंटेंट और एक्टिंग की फिल्म है। भविष्य के एक्टर जिन फिल्मों से एक्टिंग का पाठ सीख सकेंगे उनमें यकीनन ‘ये साली जिंदगी’ और विशेष कर इसमें इरफान खान का अभिनय शुमार किया जाएगा। सुधीर मिश्रा ने एक बार फिर साबित किया है कि अच्छे सिनेमा को सुपर स्टारों की नहीं बेहतरीन कंटेंट की जरूरत है। फिल्म का संगीत निशात खान ने दिया है जो अंतरराष्ट्रीय ख्याति के संगीतकार हैं। फिल्म के संवाद फिल्म का ‘ट्रेड मार्क’ बन सकते हैं। दिल्ली और हरियाणवी भाषा में बोली गयी गालियां एक नये, मजेदार अनुभव से गुजारती हैं। दिल्ली का चांदनी चौक, करौल बाग, छतरपुर और हरियाणा बॉर्डर वाला एरिया कैमरे की आंख से भव्य और दिव्य लगता है। एक आवश्यक रूप से देखने लायक फिल्म। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्माता:   प्रकाश झा &lt;br /&gt;निर्देशक:  सुधीर मिश्रा &lt;br /&gt;कलाकार:  अरुणोदय सिंह, अदिति राव हैदरी, इरफान खान, चित्रांगदा सिंह, सौरभ शुक्ला, सुशांत सिंह &lt;br /&gt;संगीत:   निशात खान &lt;br /&gt;गीत:   स्वानंद किरकिरे, मानवेंद्र&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-3384377485496475908?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/3384377485496475908/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/02/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/3384377485496475908'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/3384377485496475908'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/02/blog-post.html' title='ये साली जिंदगी'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-5334297898450076786</id><published>2011-01-29T02:12:00.000-08:00</published><updated>2011-01-29T02:15:11.361-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा कानपुर 29 जनवरी 2011'/><title type='text'>दिल तो बच्चा है जी</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘दिल तो बच्चा है जी’ थोड़ा सच्चा है जी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मधुर भंडारकर ऐसा सिनेमा बनाने के कारण चर्चित हुए हैं जो अर्थपूर्ण तथा यथार्थवादी भी है और बाजार में भी टिकता है। ‘ट्रैफिक सिग्नल‘, ‘कॉरपोरेट‘, पेज थ्री‘, ‘फैशन‘ उनकी व्यावसायिक रूप से सफल गंभीर फिल्में हैं। इस बार उन्होंने एक कॉमेडी फिल्म बनाने की ठानी थी। लेकिन हुआ यह कि जैसे एक साहित्यकार गुलशन नंदा या प्रेम वाजपेयी की तरह के उपन्यास नहीं लिख सकता वैसे ही मधुर भंडारकर भी वैसी कॉमेडी नहीं बना सके जो हिट होती है। उन्होंने कॉमेडी के भेष में एक गंभीर फिल्म बना दी है और यह इस रूप में अच्छा ही हुआ कि अब ‘मीनिंगफुल सिनेमा’ के दर्शकों को ‘एक संजीदा निर्देशक की विदाई का खतरा’ नहीं रहा। ‘दिल तो बच्चा है जी’ एक कमाल की सच्ची और अच्छी फिल्म है। फिल्म की कहानी में ताजगी है। कहानी के तीन आयाम हैं। तीन दिल तन्हा हैं। एक को सच्चे प्रेम की तलाश है, यानी ओमी वैद्य। दूसरे को तलाक के बाद फिर से घर बसाना है, यानी अजय देवगन। तीसरा दैनिक लड़कीबाजी से थककर ‘जेनुइन लव’ की खोज में एक जगह रुकता है, यानी इमरान हाशमी। तीनों दिल बेआवाज टूट जाते हैं। फिल्म को कॉमेडी का टच देने के लिए तीनों ‘बच्चे दिल’ फिर से रोमांस के भंवर में प्रवेश करते दिखाए गए हैं। लेकिन फिल्म का मूल स्वर यही उभर कर आता है कि आज की व्यापारिक और गलाकाट दुनिया में सब एक दूसरे का इस्तेमाल भर कर रहे हैं। प्यार एक छलावा है। इमोशन एक अत्याचार है। रिश्ता एक समझौता है। अजय देवगन एक बैंक के लोन मैनेजर हैं जो अपनी पत्नी से तलाक के बाद अपने मां-बाप (स्वर्गीय) के बड़े से बंगले में रहने आते हैं। एकांत से बचने के लिए वह ओमी वैद्य और इमरान हाशमी को बतौर पेइंग गेस्ट रख लेते हैं। कालांतर में तीनों दोस्त बन जाते हैं और अपनी अपनी प्रेम कहानियों में डूबते-उतराते हैं। इन तीनों दिलों की धड़कन बनी हैं श्रुति हसन, श्रद्धा दास और शहजहान पद्मसी। फिल्म के सभी कलाकारों ने बेहतर अभिनय किया है। इस फिल्म में भी ओमी वैद्य की धड़कन बनी श्रद्धा दास के चरित्र के माध्यम से मधुर भंडारकर ने ग्लैमर र्वल्ड के पीछे का संघर्ष और अंधेरा दिखा ही दिया है। ओमी वैद्य का चरित्र फिल्म की गंभीरता में ‘कॉमिक रिलीफ’ की तरह है। उनकी ‘हिंग्लिश पोयेट्री’ दिलचस्प है और सच्चे प्रेम को लेकर उनकी तड़प भली-भली सी लगती है। अपने दिल फेंक चरित्र की निरर्थकता के अहसास को इमरान हाशमी ने सशक्त अभिव्यक्ति दी है। 48 साल के किरदार अजय देवगन जिस तरह अपने से 17 साल छोटी युवती के प्रेम में पड़ते हैं और टूटते हैं, वह इमोशन जीवंत रूप में घटित हुआ है। अभिनय, निर्देशन, कथा और गीत-संगीत के स्तर पर ‘दिल तो बच्चा है जी’ एक साफ सुथरी और उम्दा फिल्म है। सिनेमा के आम दर्शक शायद इसमें ज्यादा दिलचस्पी नहीं ले पाएंगे। &lt;br /&gt;निर्देशक:  मधुर भंडारकर &lt;br /&gt;कलाकार:  अजय देवगन, इमरान हाशमी, ओमी वैद्य, श्रद्धादास, श्रुति हसन, शहजहान पद्मसी &lt;br /&gt;संगीत:   प्रीतम चक्रवर्ती&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-5334297898450076786?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/5334297898450076786/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/01/blog-post_29.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/5334297898450076786'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/5334297898450076786'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/01/blog-post_29.html' title='दिल तो बच्चा है जी'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-503872616227191704</id><published>2011-01-22T02:10:00.000-08:00</published><updated>2011-01-22T02:12:13.137-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा 22 जनवरी 2011'/><title type='text'>धोबीघाट</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुंबई दर मुंबई वाया ‘धोबीघाट’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुंबई अनंत कथाओं, घटनाओं और चरित्रों का शहर है। एक आम कहावत है कि इस शहर में आदमी की पूरी जिंदगी लग जाती है तो भी यह शहर अनजाना-अनपहचाना सा बना रहता है। निर्देशिका किरण राव ने अपनी पहली फिल्म ‘धोबीघाट’ में इसी मुंबई को चार समानांतर कहानियों के जरिये खोलने-बताने की कोशिश की है। धोबीघाट से फिल्म का इतना भर नाता है कि फिल्म का युवा नायक प्रतीक बब्बर कपड़े धोने का काम करता है और एक्टर बनने का सपना संजोये हुए है। आमिर खान एक पेंटर हैं। मोनिका डोगरा विदेश से मुंबई आयी है फोटोग्राफी करने और शहर को जानने-समझने। पहले वह कुछ क्षण के लिए आमिर खान के जीवन में उतरती है फिर प्रतीक बब्बर के। अंत में दोनों ही उसके जीवन से ‘छूट’ जाते हैं। फिल्म में आमिर, प्रतीक और मोनिका के अलावा चौथी कहानी कृति मल्होत्रा की है जो तीन कैसेट्स के जरिये पर्दे पर घटित होती है। ये कैसेट्स आमिर खान को उस घर में मिलते हैं, जिस घर को उसने किराये पर लिया है। असल में ‘धोबीघाट’ एक वैचारिक और बारीक संवेदना वाली फिल्म है। सिनेमा के आम दर्शकों या बाजार के लिए इसे बनाया भी नहीं गया है। वह तो आमिर खान प्रोडक्शन की फिल्म है इसलिए पहले दिन काफी संख्या में इसे दर्शक मिल भी गए। वरना, जैसा कि खुद किरण राव ने एक साक्षात्कार में कहा था कि यह अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों की फिल्म है। आमिर तो खैर एक मंजे हुए कलाकार हैं इसलिए उनके बारे में क्या कहना? हां, प्रतीक बब्बर ने कमाल की एक्टिंग की है। यह सही मायने में प्रतीक की लांचिंग की पहली फिल्म है और अपनी इस फिल्म से वह भविष्य की उम्मीद बन गये हैं। मोनिका डोगरा का अभिनय भी जीवंत और सहज है। चार कहानियों वाली इस यथार्थवादी फिल्म को बड़ी सहजता से सवा दो घंटे में लाया जा सकता था। पता नहीं क्यों किरण राव ने इसे पिच्चानबे मिनट में समेट दिया। इस फिल्म से दर्शक मनोरंजन की उम्मीद न करें। इसे पेंटिंग की तरह ‘फील’ करने और कविता की तरह आत्मसात करने के लिए बनाया गया है। अपनी पहली ही फिल्म को ‘विमर्श’ की तरह पेश करके किरण राव ने साहस का परिचय दिया है। अंत में यह कि फोटोग्राफर की आंख से देखी गयी मुंबई वाली इस फिल्म की फोटोग्राफी में जान है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशक:  किरण राव &lt;br /&gt;कलाकार:  आमिर खान, प्रतीक बब्बर, मोनिका डोगरा,  कृति मल्होत्रा &lt;br /&gt;संगीत:   गुस्ताव सांता ओलाला&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-503872616227191704?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/503872616227191704/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/01/blog-post_22.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/503872616227191704'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/503872616227191704'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/01/blog-post_22.html' title='धोबीघाट'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-6164348783396913545</id><published>2011-01-15T02:52:00.000-08:00</published><updated>2011-01-15T02:55:51.621-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा कानपुर 15 जनवरी 2011'/><title type='text'>यमला पगला दीवाना</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मसालेदार ‘यमला पगला दीवाना’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समीर कर्णिक द्वारा निर्देशित ‘यमला पगला दीवाना’ कोई वैचारिक या कालजयी फिल्म नहीं है। यह एक मसालेदार आम मुंबइया फिल्म है जो अपने मकसद में काफी हद तक कामयाब हुई है। मकसद है बिना अश्लील हुए दर्शकों का साफ सुथरा मनोरंजन करना। इस मकसद के लिए फिल्म में नाच-गाना-हंसी-मजाक-मारधाड़- इमोशन-प्यार यानी तमाम मसाले डाले गये हैं और मूल स्वर ‘लाउड कॉमेडी’ का रखा गया है। शुद्ध रूप से ‘माइंडलेस कॉमेडी’ ऐसी ही फिल्मों को कहते हैं। इससे पहले फिल्म ‘अपने’ में पूरी देओल तिकड़ी (धम्रेन्द्र, सनी, बॉबी) अपने अभिनय के जलवे दिखा चुकी है। लेकिन ‘अपने’ एक संवेदनशील और भावप्रधान फिल्म थी। जबकि ‘यमला पगला दीवाना’ में यह तिकड़ी पहली बार कॉमेडी कर रही है। कहानी बहुत पुरानी और दर्जनों बार दोहरायी जा चुकी है। इसलिए फिल्म के आरंभ में ‘परिवार के बिछुड़ने और अंत में मिल जाने’ वाली कई फिल्मों के टुकड़े दिखाकर हल्के-फुल्के ढंग से स्वीकार लिया गया है कि यह भी वैसी ही फिल्म है, लेकिन नए अंदाज में। सनी देओल अपनी मां और विदेशी पत्नी के साथ कनाडा में रहता है। एक प्रसंग से उद्घाटित होता है कि उसका पिता धर्मेन्द्र और भाई बॉबी देओल बनारस में कहीं हैं। मां के आग्रह पर वह उन दोनों को खोजने बनारस आता है। बनारस आते ही वह बॉबी देओल के हाथों ठगा जाता है। दरअसल बनारस में रहकर धर्मेन्द्र और बॉबी लोगों को ठगने का ही धंधा करते हैं। सनी समझ जाता है कि वह सही जगह पहुंचा है। वह चुपचाप बॉबी के और उसके कारण धर्मेन्द्र के करीब होता जाता है। दो-तीन गंभीर संकटों से दोनों बाप-बेटों को सनी बाहर निकालता है। इसी दौरान बॉबी को साहिबा (कुलराज रंधावा) से प्यार हो जाता है। लेकिन साहिबा के भाई बॉबी को पीटकर साहिबा को अपने साथ पटियाला ले जाते हैं। बॉबी को उसका प्यार वापस दिलाने के लिए सनी बॉबी के साथ पटियाला जाता है। इस प्रकार फिल्म पंजाब और उसके कल्चर में एंट्री लेती है। बीच-बीच में कई उप प्रसंगों के जरिए हास्य के क्षण जुटाए जाते रहते हैं। साहिबा के भाई बॉबी के बजाय सनी से शादी को तैयार होते हैं तो उसके जरिए कॉमेडी का एक नया रंग उभरता है। दोनों की शादी के विज्ञापन को देख कनाडा से सनी की पत्नी भी पटियाला पहुंच जाती है। अंत में फिल्म का सुखद अंत होता है। सबकी गलत फहमियां दूर होती हैं। बॉबी-कुलराज की शादी होती है और बिछुड़ा परिवार समृद्ध होकर कनाडा लौटता है। फिल्म की सबसे बड़ी खामी यह है कि यह जरूरत से ज्यादा लंबी हो गयी है। कम से कम बीस मिनट का संपादन इसे चुस्त कर सकता था। मनोरंजन प्रेमी दर्शकों के लिए टाइम पास है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशक:  समीर कर्णिक&lt;br /&gt;कलाकार:  धर्मेन्द्र, सनी देओल, बॉबी देओल, कुलराज रंधावा, नफीसा अली, अनुपम खेर, जॉनी लीवर&lt;br /&gt;संगीत:  प्यारेलाल, संदेश शांडिल्य, अनु मलिक आदि।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-6164348783396913545?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/6164348783396913545/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/01/blog-post_15.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/6164348783396913545'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/6164348783396913545'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/01/blog-post_15.html' title='यमला पगला दीवाना'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-1672794280474294623</id><published>2011-01-08T02:15:00.000-08:00</published><updated>2011-01-08T02:16:50.902-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा 8 जनवरी 2011'/><title type='text'>नो वन किल्ड जेसिका</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नो वन किल्ड जेसिका&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तंत्र का तमाशा बनाम तमाशे का तंत्र&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली के एक बहुचर्चित मर्डर केस पर आधारित इस ‘कल्पना प्रधान’ फिल्म की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे बेहद सधे हाथों और संवेदनशील ढंग से बुना गया है। फिल्म में घोषणा की गयी है कि यह सत्य घटना पर आधारित काल्पनिक फिल्म है। पर इससे क्या? आम जनता तक अपना संदेश पहुंचाने के मकसद में निर्देशक कामयाब हुआ है। काश, इतनी बेहतरीन और सामाजिक यथार्थ से जुड़ी फिल्में किसी रोज व्यापक दर्शक समूह से भी जुड़ सकें। ‘दबंग‘ देखने के आदी दर्शक जिस दिन ‘जेसिका’ को अपना व्यापक समर्थन देने लगेंगे, तंत्र की ताकत धरी रह जाएगी। एक साफ सुथरी, मर्मस्पर्शी और वैचारिक फिल्म है ‘नो वन किल्ड जेसिका।‘ सत्ता के केन्द्र दिल्ली में कैसे तंत्र और धन की सांठ-गांठ के सामने आम जीवन असहाय और निहत्था है, इसका ज्वलंत विमर्श पेश करती है फिल्म। एक पैग दारू के लिए सपना देखती एक युवा जिंदगी कुचल दी जाती है। तीन सौ लोगों की पार्टी में तमाम लोग मर्डर से पहले ही घर चले जाते हैं। बचे हुए कुल सात गवाह खरीद लिए जाते हैं। उन्हें एक करोड़ रुपये या एक गोली के बीच चुनाव करना है। जाहिर है बेदिल दिल्ली में लोग रुपये को चुनते हैं। केस दाखिल दफ्तर हो जाता है। फैसला है ‘नो वन किल्ड जेसिका।’ यहां तक की फिल्म विद्या बालन और केस की है। यह मध्यांतर है। और अब इसी पथरीली दिल्ली का दूसरा चेहरा उभरता है। अब शुरू होती है रानी मुखर्जी की फिल्म। रानी एक बिंदास टीवी पत्रकार है। वह अपनी खोजी रिपोर्टों से दफन हो चुके किस्से को पुनर्जीवित करती है। जेसिका के मुद्दे पर दिल्ली में जन जागरण आरंभ होता है, जिसमें रानी की महती भूमिका है। दिल्ली के नेतृत्व में पूरा देश जेसिका के हक में खड़ा होता है और अंततः न्याय होता है। लेकिन यह फिल्म है। वास्तविक जिंदगी में दबंगई ही जीतती है आम तौर पर। तंत्र के सामने आम आदमी का तमाशा ही बनता है अक्सर। रानी और विद्या दोनों ने अपने अभिनय से फिल्म में जान डाल दी है। एक ने आहत और टूटी हुई लड़की का तो दूसरी ने दबंग पत्रकार का किरदार विश्वसनीयता के साथ निभाया है। अब रानी को ऐसे ही अर्थ पूर्ण चरित्र निभाने चाहिए। फिल्म का गीत-संगीत भी उसकी एक बड़ी ताकत है। ‘दिल्ली दिल्ली’ वाला शीर्षक गीत जमता है। ऐसी फिल्मों को अनिवार्यतः देखकर निर्देशक की हौसला आफजाई करनी चाहिए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशक:  राजकुमार गुप्ता &lt;br /&gt;कलाकार:  रानी मुखर्जी, विद्या बालन, श्रीश शर्मा, मोहम्मद जीशान, मायरा&lt;br /&gt;संगीत:   अमित त्रिवेदी&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-1672794280474294623?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/1672794280474294623/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/01/blog-post.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/1672794280474294623'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/1672794280474294623'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2011/01/blog-post.html' title='नो वन किल्ड जेसिका'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-763546465815823777</id><published>2010-12-25T01:06:00.000-08:00</published><updated>2010-12-25T01:08:07.538-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा 25-12-2010'/><title type='text'>तीस मार खां</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नौटंकी स्टाइल के ‘तीस मार खां‘&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शीला की जवानी ने इतना बड़ा तूफान रच दिया कि ‘तीस मार खां‘ के पहले दिन के शो हाउसफुल चले गये। कैटरीना कैफ पर फिल्माया गीत शीला की जवानी ही फिल्म की जान भी है लेकिन केवल एक आइटम डांस के दम पर फिल्में न बाजार में टिकती हैं, न ही लोगों के दिल दिमाग में। कॉमेडी फराह खान जैसी संवेदनशील निर्देशिका का क्षेत्र नहीं है। पता नहीं वह इस बीहड़ में क्यों उतरीं? हंसाना बहुत  कठिन काम है। यह ऐसा इलाका है जहां अच्छे अच्छे तीरंदाज गच्चा खा जाते हैं। एक सार्थक और तार्किक हास्य फिल्म बनाना सचमुच बहुत चुनौती भरा काम है। बारह फिल्में फ्लॉप हो जाती हैं तब जाकर तेरहवीं फिल्म कामयाब होती है। अक्षय कुमार को इस फिल्म से बहुत उम्मीदें थीं। दर्शकों को भी इससे भारी उम्मीदें थीं। सबको निराशा ही हाथ लगेगी। फराह खान ने पूरी फिल्म में पुराने जमाने की नौटंकी का ताना बाना अपनाया है लेकिन मौजूदा युवा पीढ़ी को यह जानकारी नहीं है कि नौटंकी नामक भी कोई शैली होती थी इसलिए इस स्टाइल को वह आत्मसात नहीं कर पायी। ‘तीस मार खां‘ फिल्म का नौटंकी स्टाइल मसखरापन इसीलिए मजा नहीं दे पाता। फिल्म में जहां जहां कमर्शियल फिल्मों का मजाक उड़ाया गया है वह टुकड़े अच्छे लगते हैं लेकिन उनका फिल्म की मूल कहानी से कोई लेना-देना नहीं है। मूल कहानी यह है कि अक्षय कुमार एक अंतरराष्ट्रीय ठग है जिसे कोई जेल अपने भीतर नहीं रख पाती। वह हर जेल से फरार हो जाता है। कैटरीना कैफ उसकी प्रेमिका है जो हीरोईन बनना चाहती है। अक्षय की मां को यह जानकारी नहीं है कि उसका बेटा ठग या अपराधी है। वह उसे फिल्मों का डायरेक्टर समझती है। अपने अपराधी जीवन का सबसे चुनौती पूर्ण काम अक्षय को मिलता है। उसे एक चलती ट्रेन से पांच सौ करोड़ के आभूषण, सोना, दुलर्भ मूर्तियां लूटनी हैं। इसके लिए वह सुपरस्टार अक्षय खन्ना और कैटरीना कैफ को लेकर एक फिल्म की नकली शूटिंग को अंजाम देता है जिसमें ट्रेन डकैती का दृश्य असली है। वह गांव वालों की मदद से ट्रेन लूट लेता है। पकड़ा भी जाता है लेकिन फिर फरार हो जाता है। फिल्म का प्रत्येक चरित्र कॉमेडी के रंग में रंगा हुआ है। अपराधी भी, पुलिस कमिश्नर भी, प्रेमिका भी, मां भी और गांव वाले भी। फिल्म का आरंभिक नेरेशन संजय दत्त की आवाज में है। सलमान खान और अनिल कपूर ने अतिथि भूमिकाएं निभायी हैं। फिल्म से जुड़े सब लोगों को रुक कर सोचना होगा- ‘कहां से चले कहां के लिए?‘&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशक:  फराह खान&lt;br /&gt;कलाकार:  अक्षय कुमार, कैटरीना कैफ, अक्षय खन्ना, आर्य बब्बर, सचिन खेडेकर&lt;br /&gt;संगीत:   शिरीष कुंदेर, विशाल, शेखर&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-763546465815823777?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/763546465815823777/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/12/blog-post_25.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/763546465815823777'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/763546465815823777'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/12/blog-post_25.html' title='तीस मार खां'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-1448281514530300944</id><published>2010-12-11T02:54:00.000-08:00</published><updated>2010-12-11T02:56:53.127-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा  कानपुर 11-12-2010'/><title type='text'>नो प्रॉब्लम</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;’नो प्रॉब्लम‘ में प्रॉब्लम ही प्रॉब्लम&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबसे ज्यादा दुख यह देख कर हुआ कि पांच ऐसे सितारे जिनकी फिल्में देखना दर्शक पसंद करते हैं और जो अपने अभिनय का लोहा मनवा चुके हैं, उनके सामने ऐसी क्या प्रॉब्लम थी, जो उन्हें ’नो प्रॉब्लम‘ जैसी फिल्म में काम करना पड़ा। दूसरा दुख यह देखकर हुआ कि जिस निर्देशक को कॉमेडी का सरताज कहा जाता है वह अपनी नयी फिल्म में कॉमेडी का ककहरा भी नहीं रच सका। तीसरा दुख शाश्वत और फिल्म इंडस्ट्री के जन्म से चला आ रहा है। वह यह कि एक से एक काबिल और कल्पनाशील निर्देशक नायाब पटकथाएं लेकर दर-दर भटकते रहते हैं मगर उन्हें निर्माता नहीं मिलते तो नहीं ही मिलते। जिसके संपर्क हैं, नाम है या खानदान है वह कुछ भी बना कर करोड़ों रुपये पानी में गला देता है। इस फिल्म में भी पैसा पानी की तरह बहाया गया है और पानी में ही बहाया गया है। क्या ग्लैमर और वैभव की इस फिल्म नगरी में अस्तित्व को लेकर सचमुच इतनी गहरी असुरक्षा है कि बड़ा से बड़ा एक्टर भी अपनी इमेज के बारे में कुछ नहीं सोचता, बस काम करने लगता है, फिर चाहे पटकथा कैसी भी हो! और ’नो प्रॉब्लम‘ में तो कोई कहानी ही नहीं है। फिल्म की कोई सीधी, सुचिंतित पटकथा नहीं है। वह कहीं से भी कैसे भी घटने लगती है। और किसी भी घटना का कोई औचित्य या तर्क भी नहीं है। संजय दत्त और अक्षय खन्ना दो लुटेरे हैं। परेश रावल एक गांव का बैंक मैनेजर है। दोनों परेश का बैंक लूटकर डरबन भाग जाते हैं। परेश उन्हें ढूंढने डरबन आता है। सुनील शेट्टी एक बड़ा लुटेरा व गैगस्टर है। अनिल कपूर एक सीनियर पुलिस इंस्पेक्टर है जिसकी पत्नी सुष्मिता सेन को दिन में एक बार पागलपन का दौरा पड़ता है। इस दौरे के दौरान वह अनिल कपूर को मारने का प्रयत्न करती है। कंगना रानावत सुष्मिता की छोटी बहन है जो अक्षय खन्ना को पसंद करती है। दोनों पुलिस कमिश्नर की बेटियां हैं। नीतू चन्द्रा सुनील शेट्टी के साथ है। इस कथा विहीन फिल्म में चंद नकली परिस्थितियां खड़ी करके दर्शकों को हंसाने का जबरन प्रयास किया गया है। फिल्म में अधनंगी लड़कियों की भरमार है। डांस है, ड्रामा है, एक्शन है, कॉमेडी है, गाना है, लेकिन सब कुछ सिर्फ तानाबाना है। इस ताने बाने से कथ्य नदारद है, तथ्य नदारद है और लक्ष्य नदारद है। फिल्म के सभी पात्र विदूषकों के चोले में हैं। सब के सब मंजे हुए कलाकार हैं और अपनी तरफ से हंसाने का भरपूर प्रयत्न भी करते हैं लेकिन हंसने का भी तो एक तर्क और कारण होता है। जब वह कारण ही नहीं है तो दर्शक क्यों हंसेगा? जहां-जहां हंसी का कार्य-कारण तत्व उपस्थित होता है। वहां-वहां दर्शक न सिर्फ हंसते हैं, बल्कि खुलकर हंसते हैं। हंसाने की इस भूमिका का सबसे अच्छा निर्वाह परेश रावल ने ही किया है। एक अच्छी, सुचिंतित, तार्किक पटकथा के अभाव में कैसे कुछ बेहतरीन सितारे अपने सफर में प्रॉब्लम खड़ी कर लेते हैं, इसका दिलचस्प उदाहरण है ’नो प्रॉब्लम।‘ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशक:  अनीस बज्मी &lt;br /&gt;कलाकार:  अनिल कपूर, संजय दत्त, अक्षय खन्ना, सुनील शेट्टी, परेश रावल, सुष्मिता सेन, कंगना रानावत, नीतू चंद्रा, शक्ति कपूर &lt;br /&gt;संगीत:   साजिद-वाजिद, प्रीतम, आनंद राज आनंद&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-1448281514530300944?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/1448281514530300944/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/12/blog-post_11.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/1448281514530300944'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/1448281514530300944'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/12/blog-post_11.html' title='नो प्रॉब्लम'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-7319981115032705139</id><published>2010-12-04T02:20:00.000-08:00</published><updated>2010-12-04T02:21:59.615-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा 4-12-2010'/><title type='text'>रक्तचरित्र-दो</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजनीति का वर्गचरित्र: रक्तचरित्र-दो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपनी पिछली फिल्म ‘रक्तचरित्र‘ में रामगोपाल वर्मा ने हिंसा का एक वैचारिक पाठ पेश करने की कोशिश की थी। इस पाठ का निहितार्थ यह था कि दलित और वंचित, सर्वहारा किस्म की जनता पर अत्याचार हद से ज्यादा बढ़ जाता है तो वह निरंकुश राजसत्ता के विरुद्ध हथियार उठाने से भी नहीं चूकती। एक प्रकार से रामू का यह सिनेमाई पाठ अतिवादी वाम राजनीति की सीमाओं को स्पर्श करता नजर आता था। इस पाठ के भीतर से रामू एक नया अध्याय लोकतांत्रिक राजनीति का निकाल कर लाये थे जिसका प्रतिनिधित्व उन्होंने विवेक ओबेराय से करवाया था - उसे राजनीति में उतार कर। दुश्मनों को मिटा कर, राजनीति के विशाल बरगद की छांव में विवेक ओबेराय सत्ता सुख में सराबोर है। यह थी ‘रक्त चरित्र‘ की पटकथा।&lt;br /&gt;’रक्तचरित्र-दो‘ में आरम्भ के लगभग बीस मिनट तक पहले भाग का ट्रेलर दिखाने के बाद फिल्म का अगला भाग शुरू होता है, सूर्या की एंट्री से। अपने पिता की हत्या का बदला लेने के लिए विवेक के हाथों सूर्या के खानदान का विनाश हुआ था। नये भाग में वैचारिक सरसराहट दूर-दूर तक नहीं है। यहां सत्ता के विरुद्ध दबी कुचली जनता का प्रतिशोध सिरे से नदारद है। यहां सिर्फ और सिर्फ एक अंधा बदला और उसे व्याख्यायित करने वाली एक हिंसक पटकथा है। इस पटकथा के नायक सूर्या हैं, खलनायक होने के बावजूद। और इस बार खलनायक के रोल में हैं विवेक ओबेराय, जो पहले पार्ट में नायक थे। पिछली बार राजनीति ने अपने हित में विवेक ओबेराय के क्रोध को भुनाया था। इस बार राजनीति सूर्या के क्रोध का इस्तेमाल करती है। राजनीति और हिंसक प्रतिरोध की यह दुरभिसंधि (गठजोड़) ही सत्ता का वर्ग चरित्र है। इस बार विवेक ओबेराय मारा जाता है और सूर्या जेल से छूटने की प्रतीक्षा में है। कोई आश्चर्य नहीं कि ’रक्तचरित्र-तीन‘ भी बने जिसमें विवेक ओबेराय का बेटा (जो दिखा दिया गया है) सूर्या का वध करता नजर आए। हिंसा-प्रतिहिंसा और और हिंसा। हिंसा की बहती धारा में गले-गले तक डूबे हिन्दी के व्यावसायिक सिनेमा का यह समकालीन और उत्तर आधुनिक आख्यान है। अगर भयावह खून खराबा, वीभत्स हत्याएं, बनैली राजनीति का नसें चटखाता शोर आपको लुभाता है तो तत्काल यह फिल्म देख आइए। एक अंधे गुस्से में छटपटाते युवक के हाहाकार को सूर्या ने ओजस्वी अभिव्यक्ति दी है। पहले पार्ट के मुकाबले इस बार शत्रुघ्न सिन्हा ज्यादा परिपक्व राजनेता के किरदार में हैं और प्रभावित भी करते हैं। फिल्म का गीत संगीत चूंकि कथा और घटनाओं को परिभाषित करने के लिए इस्तेमाल हुआ है इसलिए अच्छा तो लगता है लेकिन याद रहने वाला नहीं है। निर्देशन कसा हुआ है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशक:  राम गोपाल वर्मा&lt;br /&gt;कलाकार:  शत्रुध्न सिन्हा, विवेक ओबेराय, सूर्या, प्रियमणि, अनुपम श्याम, जरीना वहाब &lt;br /&gt;संगीत: धरम संदीप, कोहिनूर मुखर्जी, अमर देसाई, सुखविंदर सिंह&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-7319981115032705139?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/7319981115032705139/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/12/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/7319981115032705139'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/7319981115032705139'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/12/blog-post.html' title='रक्तचरित्र-दो'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' 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दर्शकों के गले से नीचे भी नहीं उतरती है। अनेक युवा दर्शक सिनेमा हाल में बैठे कह रहे थे-ऐसा नहीं होता बॉस। निर्देशक दानिश असलम की दुविधा पूरी फिल्म में पग-पग पर दिखाई पड़ती है। वह शायद खुद को ही यह नहीं समझा पाये कि फिल्म में वह कहना क्या चाहते हैं? इसलिए दर्शक भी नहीं समझ पाये कि वह कोई लव स्टोरी देख रहे हैं या संबंधों के विखंडन पर कुछ पढ़ रहे हैं? यह नयी पीढ़ी का प्यार को लेकर कोई असमंजस है या नया पाठ? यह रिश्तों से पलायन है या करियर को लेकर कन्फ्यूजन? ‘ब्रेक के बाद‘ में कुछ भी स्थापित और परिभाषित नहीं होता। फिल्म को केवल और केवल दीपिका पादुकोन के अभिनय और प्रसून जोशी के ताजगी भरे गीतों के लिए देखा जा सकता है। संगीत के दीवानों को प्रसून जोशी के रूप में नये समय का गुलजार मिला है। विशाल-शेखर का संगीत भी भावप्रवण है। इमरान खान अच्छे लगते हैं, लेकिन वह आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। उनकी संवाद अदायगी, हाव-भाव, बॉडी लैंग्वेज उनकी पहली फिल्म ’जाने तू या जाने ना‘ पर ही ठहरी हुई है। आगे जाना है तो उन्हें ग्रो करना होगा जैसे उनके कई समकालीन युवा सितारे कर रहे हैं। दीपिका पादुकोन जरूर अपनी प्रत्येक नयी फिल्म में कदम दर कदम आगे बढ़ रही हैं। जैसा चरित्र उन्हें दिया गया है उसके साथ उन्होंने न्याय किया है। वह दीपिका न रहकर आलिया खान ही हो जाती हैं। अभिनय के पाठ में इसे ही कायांतरण कहा जाता है। अपनी जिद और चाहत के सामने सब कुछ को तुच्छ और द्वितीय मानने वाली भ्रमित लड़की का रोल उन्होंने पूरी शिद्दत से अदा किया है। लेकिन रियल लाइफ में ऐसा नहीं होता कि ’ब्रेक के बाद‘ भी इतनी आसानी से रिश्ते विवाह में बदल जाएं। कहीं-कहीं पर फिल्म में ’लव आज कल‘ के चिराग भी टिमटिमाते हैं। उसमे भी दीपिका थी लेकिन वह ज्यादा विश्वसनीय और परिपक्व फिल्म थी। अगर ’ब्रेक के बाद‘ में फोकस सिर्फ करियर और प्यार के द्वंद पर केंद्रित रखा जाता तो कुछ अलग ही निकल कर आ सकता था- नये समय का सच। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशक:  दानिश असलम &lt;br /&gt;कलाकार:  इमरान खान, दीपिका पादुकोन, शर्मीला टैगोर, नवीन निश्चल, शहाना गोस्वामी, युधिष्ठर उर्स&lt;br /&gt;गीत:  प्रसून जोशी, विशाल डडलानी &lt;br /&gt;संगीत:   विशाल-शेखर&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-7106106687695911547?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/7106106687695911547/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/11/blog-post_27.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/7106106687695911547'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/7106106687695911547'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/11/blog-post_27.html' title='ब्रेक के बाद'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-2020212856670208930</id><published>2010-11-20T02:32:00.000-08:00</published><updated>2010-11-20T02:34:05.714-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कानपुर  20 नवंबर 2010'/><title type='text'>गुजारिश</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिंदगी से जंग की ’गुजारिश‘&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर कोई सिने प्रेमी किसी कारणवश यह फिल्म नहीं देखता है तो वह एक अविस्मरणीय सिनेमाई अनुभव से वंचित रह जाएगा। संजय लीला भंसाली के अब तक के सिनेमाई करियर का यह सबसे मजबूत और चमकदार मील का पत्थर है। हर कलाकृति बाजार का भी ताज बने यह जरूरी नहीं है, लेकिन कोई कृति जब अपने क्षेत्र की मिसाल बन जाए तो अद्वितीय कहलाती है। ’गुजारिश‘ एक अद्वितीय फिल्म है और ऋतिक रोशन ने फिल्म में अपने बहुआयामी तथा संवेदनशील अभिनय से एक जादुई लोक का निर्माण कर दिया है। इतनी कम उम्र में ऋतिक ने इतना अधिक विस्मयकारी अभिनय कर हतप्रभ कर दिया है। अगर अमिताभ बच्चन अभिनय की पाठशाला हैं तो इस फिल्म के बाद ऋतिक रोशन अभिनय का अनिवार्य पाठ बन गये हैं। जादू ऐश्वर्या राय बच्चन ने भी जगाया है। सिर्फ अपनी आंखों और भाव भंगिमा से ऐश ने पूरी फिल्म को ही परिभाषित कर दिया है। अगर अगले वर्ष तमाम बड़े पुरस्कार ’गुजारिश‘ के लिए घोषित हों तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। अभिनय, तकनीक, सिनेमेटोग्राफी, गीत, संगीत, कोरियोग्राफी, पटकथा, कथा, संवाद, संपादन प्रत्येक मोर्चे पर ‘गुजारिश‘ एक सशक्त तथा मुकम्मल फिल्म है जो जिंदगी से टूटकर मोहब्बत करने की अपील करती है। अगर जिंदगी का नाम एक ’चौतरफा अंधकार‘ है तो यह फिल्म जिंदगी से जंग करने की ’गुजारिश‘ करती है। इसके बावजूद कि अपनी नारकीय बीमारी से त्रस्त होकर ऋतिक कोर्ट से इच्छा मृत्यु की अपील करता है, फिल्म का अंतिम संदेश यही है कि जिंदगी बहुत ही खूबसूरत है। इस जिंदगी से सिर्फ और सिर्फ प्यार करो। यह एक ऐसे अद्भुत जादूगर की कहानी है जो अपनी शोहरत और वैभव के शिखर पर एक षड्यंत्रकारी दुर्घटना का शिकार हो अपाहिज हो जाता है। अपनी दुखद जिंदगी के इस बोझिल समय में उसके साथ सिर्फ तीन चार लोग रह जाते हैं। एक नर्स ऐश्वर्या राय बच्चन, एक वकील शेरनाज पटेल, एक डॉक्टर सुहेल सेठ और बाद में जादू सीखने का इच्छुक एक शागिर्द आदित्य राय कपूर। इन चार लोगों के साथ एक चार बाई छह के बिस्तर पर बारह साल गुजारने वाले शख्स की कारुणिक कहानी को इतना विराट कैनवास देकर संजय लीला भंसाली ने करिश्मा कर दिया है। एक साफ सुथरी, तार्किक, मार्मिक और सहज फिल्म है ’गुजारिश‘ जो जिंदगी के साज पर प्यार का नगमा छेड़ती है। अवश्य देखें। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशन:   संजय लीला भंसाली &lt;br /&gt;कलाकार:  ऋतिक रोशन, ऐश्वर्या राय, आदित्य राय कपूर, शेरनाज पटेल, सुहेल सेठ &lt;br /&gt;गीत:  एएम तुराज, विभु पुरी &lt;br /&gt;संगीत:  संजय लीला भंसाली&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-2020212856670208930?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/2020212856670208930/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/11/blog-post_20.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/2020212856670208930'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/2020212856670208930'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/11/blog-post_20.html' title='गुजारिश'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-1482868604660298854</id><published>2010-11-01T03:38:00.000-07:00</published><updated>2010-11-01T03:40:06.043-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा 31 अक्टूबर 2010'/><title type='text'>नक्षत्र</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस ‘नक्षत्र‘ के दर्शक चार&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मल्टीप्लेक्स में जाकर फिल्म देखना बहुत महंगा शौक हो गया है इसलिए दर्शक अब कोई भी फिल्म नहीं देखते। मोहन सावलकर की फिल्म के साथ भी दर्शकों ने यही रवैया अपनाया। उनकी ‘नक्षत्र‘ को देखने दर्शक सिनेमाघरों में नहीं पहुंचे। लेखक ने यह फिल्म केवल तीन अन्य दर्शकों के साथ देखी। आठ करोड़ में बनी ‘नक्षत्र‘ के दर्शक चार। सवाल कम बजट का नहीं है। कम बजट में ‘भेजा फ्राई‘ और ‘देव डी‘ जैसी सुपर हिट तथा अर्थपूर्ण फिल्में भी बनती हैं। दो नये युवा कलाकारों शुभ तथा सबीना को इंट्रोड्यूस करने वाली ‘नक्षत्र‘ की कहानी बेजान, निर्देशन थका हुआ और पटकथा धीमी तथा लड़खड़ाती हुई है। दोनों नये कलाकार अपने अभिनय से कोई उम्मीद नहीं जगाते। लेकिन बहुत दिनों बाद पर्दे पर मिलिंद सोमन का ‘एक्शन‘ देखना अच्छा लगा। इस फिल्म से हो सकता है कि मिलिंद का पुनर्जन्म हो जाए। वह क्राइम ब्रांच के इंस्पेक्टर बने हैं जिसमें उनका साथ दिया है नीरज कुमार ने। अनुपम खेर विलेन के रोल में हैं। फिल्म में उनकी मौजूदगी यह घोषणा करती है कि एक समय के बाद शायद पैसा पाने के लिए कोई भी रोल करना मजबूरी बन जाता है। फिल्म की एकमात्र विशेषता उसका कला निर्देशन है। आर्ट डायरेक्टर संतोष प्रजापति के बनाए कुछ सेट कलात्मक और दिलचस्प हैं। विशेष रूप से चाईना क्रीक में बनाया गया जानवरों की एक डॉक्टर का आवास और अस्पताल। फिल्म का नायक एक दृश्य में बुरी तरह घायल हो कर यहां पहुंचता है। फिल्म के पहले हिस्से में लगता है कि यह शायद बॉलीवुड में ‘स्ट्रगल‘ कर रहे एक लेखक की कहानी है। इस स्ट्रगल के दौरान दो चार अच्छे प्रसंग जुटाये गये हैं लेकिन बाद में कहानी ‘यू टर्न‘ ले लेती है। अब मामला ये है कि चार फिल्म निर्माताओं ने लेखक से एक पटकथा लिखवा कर, उसके जरिए एक नायाब हीरों का हार चुरा लिया है। इस हार की चोरी के आरोप में फिल्म का हीरो फंस गया है। कुछ अविश्वसनीय सूत्रों के जरिए वह एक एक कर चारों प्रोड्यूसर तक पहुंचता है लेकिन क्रमशः  चारों ही प्रोड्यूसर कत्ल कर दिए जाते हैं। चौथे प्रोड्यूसर के कत्ल होने से कुछ पहले यह राज खुल जाता है कि असली हीरो चोर तो खुद अनुपम खेर हैं जिनकी छवि एक दानवीर शहंशाह जैसी है। फिल्म मुंबई और बैंकॉक के बीच बेवजह आवाजाही करती रहती है। अनुपम खेर मुंबई में रहते हैं लेकिन उनका निवास बैंकॉक की लोकेशन पर है। इसी तरह फिल्म का हीरो दिल्ली से मुंबई आकर स्ट्रगल कर रहा है। लेकिन कई फिल्म कंपनियों की लोकेशन बैंकॉक में शूट हुई हैं। ‘नक्षत्र‘ सन् 2010 की फिल्म है लेकिन उसे फिल्माने का निर्देशकीय नजरिया 1950 के समय जैसा है। इस ‘नक्षत्र‘ से दूर रहने में ही समझदारी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशक:  मोहन सावलकर&lt;br /&gt;कलाकार:  शुभ, सबीना, मिलिंद सोमन, अनुपम खेर &lt;br /&gt;संगीत:   डीजे शेजवुड, समीर सेन, हैरी आनंद&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-1482868604660298854?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/1482868604660298854/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/11/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/1482868604660298854'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/1482868604660298854'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/11/blog-post.html' title='नक्षत्र'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-1692251003595150454</id><published>2010-10-23T03:35:00.000-07:00</published><updated>2010-10-23T03:36:28.155-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा 23 अक्टूबर 2010'/><title type='text'>रक्त चरित्र</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माफिया स्टाइल में क्रांति: रक्त चरित्र&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत दिनों के बाद राम गोपाल वर्मा ने ऐसी फिल्म बनायी है जो उनके सिनेमाई करियर को समृद्ध करती है। समझ नहीं आता कि जब राम गोपाल ‘सत्या‘, ‘सरकार‘ और ‘रक्त चरित्र‘ जैसी फिल्में बना सकते हैं तो वह बीच-बीच में कुछ निरर्थक और उबाऊ फिल्में क्यों बना देते हैं। अंडरवर्ल्ड रामू का चहेता विषय है। ’रक्त चरित्र‘ को भी उन्होंने हालांकि माफिया स्टाइल में ही बनाया है लेकिन इस बार विषय ’नक्सली हिंसा: कारण और निवारण‘ के इर्द-गिर्द घूमता है। यह संभवतः हिन्दी की पहली फिल्म है जो न सिर्फ दो भागों में एक साथ बनी है बल्कि दूसरे भाग के रिलीज होने की तारीख भी पहले भाग के अंत में करती है। घोषणा के अनुसार ’रक्त चरित्र-दो‘ लगभग एक महीने बाद यानी 19 नवंबर को रिलीज होगी। आंध्र प्रदेश के सुदूर इलाकों में राज सत्ता और धन शक्ति के नापाक, निरंकुश तथा खतरनाक गठजोड़ गरीब जनता पर कैसे जुल्म ढा रहे हैं, इसी की पृष्ठभूमि पर रामू हिंसा के विरुद्ध प्रतिहिंसा का पाठ रचते हैं। लेकिन इस प्रतिहिंसा को न तो तार्किक ठहराया जा सकता है न ही महिमा मंडित किया जा सकता है। इसलिए लोकतांत्रिक भाषा और रास्ते का इस्तेमाल करते हुए अपने क्रांतिकारी आख्यान में रामू सिस्टम बदलने के लिए सिस्टम का अंग बनने पर जोर देते हैं। रामू की विशेषता है कि जब वह अपनी शैली का सिनेमा बनाते हैं तो उनके कलाकार परिस्थितियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। वह कहानी की सतह से उठते हुए नजर आते हैं। ’रक्त चरित्र‘ में भी विवेक ओबेराय, सुशांत सिंह तथा अभिमन्यु सिंह हिंसा और प्रतिहिंसा के हरकारे बन कर ही उभरते हैं। इतनी ज्यादा और वैविध्यपूर्ण हिंसा भी लंबे समय बाद पर्दे पर उतरी है। शीषर्क गीत में फिल्म को नये समय की महाभारत कहा गया है। प्रकाश झा की ’राजनीति‘ को भी नये दौर की महाभारत से जोड़ा गया था। लेकिन मूलतः दोनों ही फिल्मों की व्याख्या देश के मौजूदा राजनैतिक परिदृश्य की तह में जाकर ही की जा सकती है। फिल्म का गीत संगीत फिल्म को गति देने के साथ-साथ उसकी कथा का बखान भी करता चलता है। सबसे बड़ी बात, पूरी फिल्म शुरू से अंत तक बांधे रखती है। फिल्म में शत्रुघ्न सिन्हा शिवाजी नामक दक्षिण के सुपर स्टार और राजनेता के किरदार में अच्छे लगे हैं। उनका संवाद ’वाक इज ओवर‘ लोकप्रिय हो सकता है। इस फिल्म से विवेक ओबेराय का सिनेभाई पुनर्जन्म हुआ है। यकीनन देखने लायक फिल्म है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशक:  राम गोपाल वर्मा&lt;br /&gt;कलाकार:  शत्रुघ्न सिन्हा, विवेक ओबेराय, सुशांत सिंह, अभिमन्यु सिंह, राजेंद्र गुप्ता, आशीष विद्यार्थी, प्रियामणि&lt;br /&gt;संगीत:   सुखविंदर सिंह/बापी टुटुल&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-1692251003595150454?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/1692251003595150454/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/10/blog-post_23.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/1692251003595150454'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/1692251003595150454'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/10/blog-post_23.html' title='रक्त चरित्र'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-4212610121203682786</id><published>2010-10-16T04:13:00.000-07:00</published><updated>2010-10-16T04:14:41.261-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा 16 अक्टूबर 2010'/><title type='text'>आक्रोश</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाहुबलियों का जंगलराज: आक्रोश&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब कभी प्रियदर्शन के भीतर का सरोकारों वाला निर्देशक जागता है तो दर्शकों को एक गंभीर और सामाजिक मंतव्यों से जुड़ी फिल्म देखने को मिलती है। वह सिर्फ कॉमेडी के ही सरताज नहीं विचारों के भी हरकारे हैं। उनकी नयी फिल्म ’आक्रोश‘ महानगरों के खुशगवार हालात से दूर उन बीहड़ इलाकों की टोह लेती है जहां आज भी बाहुबलियों का जंगलराज कायम है और जहां ताकत, वैभव तथा उच्चकुलीय अभियान के सामने सामान्य जन निहत्था और निरुपाय छोड़ दिया गया है। बैक ड्राप के रूप में प्रियदर्शन ने ’आक्रोश‘ में ऑनर किलिंग‘ का ताना-बाना खड़ा किया है, लेकिन असल में उनकी मूल चिंता उस साधारण, वंचित, दलित और सर्वहारा मनुष्य के साथ सलंग्न है जो जिंदगी के हर नये पल में नया सर्वनाश झेल रहा है। पंजाब या राजस्थान या उत्तर प्रदेश तो सिर्फ प्रतीक हैं। यह बनैला दमनचक्र व्यापक स्तर पर देश के प्रत्येक सुदूर इलाके में जारी है। वहां जहां सुरक्षा, सुविधा और सुखों की रोशनी आज भी नहीं पहुंची है। हिंसा के एक बेशर्म नंग नाच की पृष्ठभूमि पर प्रियदर्शन कर्तव्य पारायणता का बेबस पाठ भी तैयार करते है। तीन युवकों के गायब हो जाने के एक रहस्यमय केस की जांच करने के लिए सीबीआई अधिकारी अक्षय खन्ना पंजाब के एक गांव पहुंचते हैं। वहां उनकी मदद के लिए अजय देवगन हैं। दोनों मिलकर जब इस केस की गुत्थियां हल करते हैं, तब पता चलता है कि इलाके के चप्पे-चप्पे में बाहुबलियों की कितनी खतरनाक दहशत तारी है। आम आदमी की बेबसी का कितना दारुण दुखांत वहां कितनी आसानी से लिख दिया जाता है। यह चूंकि फिल्म है इसलिए ताकत का जंगली अंधेरा अंतिम सत्य के तौर पर स्थापित नहीं किया जा सकता था। इसीलिए अंत में तमाम बाहुबलियों के विरुद्ध न्याय की जीत होती दिखाई गयी है जबकि हकीकत दरअसल वहीं तक है जहां तक दमन का दावानल फैला हुआ है। एक अत्यंत यथार्थवादी फिल्म के जरिए आजाद हिंदुस्तान के भीतरी इलाकों में पसरा गुलाम जीवन दर्शाने के लिए प्रियदर्शन बधाई के पात्र हैं। फिल्म तीन प्रमुख पात्रों के इर्द-गिर्द घूमती है- अजय देवगन, अक्षय खन्ना, परेश रावल। तीनों का काम उम्दा है। राहत देने के लिए समीरा रेड्डी का आइटम सांग है जो पहले ही मशहूर हो चुका है। फिल्म में बिपाशा बसु के लिए कायदे का ’स्पेस‘ नहीं रखा गया है। वह नहीं भी होतीं तो चलता। हाशिए पर जीती औरत के रोल में रीमा सेन ने बेहतरीन काम किया है। एक सार्थक फिल्म। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशक:  प्रियदर्शन &lt;br /&gt;कलाकार:  अजय देवगन, अक्षय खन्ना, परेश रावल, बिपाशा बसु, रीमा सेन, समीरा रेड्डी&lt;br /&gt;संगीत: प्रीतम चक्रवर्ती&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-4212610121203682786?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/4212610121203682786/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/10/blog-post_16.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/4212610121203682786'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/4212610121203682786'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/10/blog-post_16.html' title='आक्रोश'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-6486544071690842822</id><published>2010-10-09T04:00:00.000-07:00</published><updated>2010-10-09T04:01:32.199-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा 9 अक्टूबर 2010'/><title type='text'>क्रुक</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नस्लवाद से लड़ती ‘क्रुक‘&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसी कि भट्ट कैंप की फिल्में होती हैं, ‘क्रुक‘ भी उसी तरह की फिल्म है। छोटा बजट, नयी हीरोईन और घर का एक्टर इमरान हाशमी। मनोरंजन के साथ साथ कोई संदेश देने का प्रयास। कभी इस कैंप की फिल्म हिट हो जाती है कभी नहीं होती। लेकिन प्रत्येक फिल्म अपनी लागत जरूर निकाल ले जाती है। छोटा ही सही लेकिन इमरान हाशमी का भी अपना एक दर्शक वर्ग बन गया है इसलिए उनकी सोलो फिल्म भी ठीक ठाक व्यवसाय कर लेती है। यह फिल्म भी थोड़ा बहुत व्यवसाय कर लेगी। पहले दिन ‘क्रुक‘ को देखने आये दर्शकों की संख्या संतोषजनक कही जा सकती है। अपने मंतव्य के कारण ‘क्रुक‘ थोड़ी गंभीर फिल्म है हालांकि निर्देशक मोहित सूरी ने रोमांस, एक्शन, कॉमेडी के तत्व डाल कर इसे मनोरंजक बनाने की कोशिश की है। फिल्म नस्लवाद से टकराने और उसका एक समाधान तलाशने का प्रयास करती है। इमरान हाशमी नकली नाम और पासपोर्ट के जरिए ऑस्ट्रेलिया जाता है ताकि वहां जा कर वह एक नयी और बेहतर जिंदगी जी सके। मुंबई में उसे कोई काम नहीं देता क्योंकि उसका पिता एक गैंगस्टर था जो जाली एनकाउंटर में मार दिया जाता है। मुंबई में अतीत इमरान के आगे आगे चलता है इसलिए वह एक पुलिस अधिकारी अंकल की मदद से ऑस्ट्रेलिया रवाना होता है। &lt;br /&gt;ऑस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों और व्यक्तियों के साथ जो नस्लभेदी वारदात घट रही हैं उन्हीं में से एक के साथ, न चाहते हुए भी, इमरान हाशमी उलझ जाता है। थोड़ी बहुत मारा मारी, प्रदर्शन, भाषण आदि के बाद फिल्म इस सकारात्मक नोट पर खत्म होती है कि भारत और ऑस्ट्रेलिया के लोग मिल कर ही नस्लवाद का खात्मा कर सकते हैं। एक दूसरे से नफरत करने और झगड़ने की नीति दोनों को हिंसा-प्रतिहंसा की एक अंधी गली में ले जाकर छोड़ देगी। देखा जाए तो इस फिल्म के माध्यम से भट्ट कैंप ने एक अंतरराष्ट्रीय समस्या को सिनेमाई पाठ में ढालने का प्रयत्न किया है लेकिन फिल्म को फिल्मी फार्मूलोें के बंधे बंधाये ढांचे में रख देने से उसका प्रभाव कमजोर हो जाता है। प्रीतम ने हूबहू वही संगीत दिया है जैसा इमरान की फिल्मों के गीतों में दिया जाता है। नेहा शर्मा का अभिनय कोई जादू नहीं जगाता जबकि उसके किरदार में एक तपिश एक तड़प मौजूद थी। इमरान हाशमी अपनी सीरियल किसर की छवि से मुक्त हो रहे हैं यह उनकी अभिनय यात्रा के लिए एक सुखद संकेत है। फिल्म देखी जा सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्माता:  मुकेश भट्ट&lt;br /&gt;निर्देशक:  मोहित सूरी&lt;br /&gt;कलाकार:  इमरान हाशमी, नेहा शर्मा, अर्जन बाजवा, गुलशन ग्रोवर&lt;br /&gt;संगीत:  प्रीतम&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-6486544071690842822?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/6486544071690842822/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/10/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/6486544071690842822'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/6486544071690842822'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='क्रुक'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-2238953070816614403</id><published>2010-09-13T03:41:00.000-07:00</published><updated>2010-09-13T03:42:19.877-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा  11 सितंबर 2010'/><title type='text'>दबंग</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘दबंग‘ आयी यूपी बिहार लूटने&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बॉलीवुड में धारा के विरुद्ध जाकर अच्छा सिनेमा बनाने के लिए प्रसिद्ध हैं युवा निर्देशक अनुराग कश्यप। उनके खाते में ‘नो स्मोकिंग‘, ‘गुलाल‘, ‘देव डी‘ जैसी बेहतरीन फिल्में हैं लेकिन ऐसी फिल्में पैसा नहीं देतीं। शायद यही वह पाठ है जो अनुराग के भाई अभिनव कश्यप ने उनसे सीखा है। इसलिए अपने करियर का आरंभ करने के लिए उन्होंने मुख्य धारा के सिनेमा यानी मसाला फिल्म का दामन थामा। और अपनी पहली ही फिल्म में वह सुपरहिट हैं। बहुत दिनों के बाद कोई फिल्म देखी जो ’हाउसफुल‘ मिली, जिसमें दर्शक सीटियां बजा रहे थे, कुर्सी से उठकर नाच रहे थे, यह गाते हुए, ’हुड़ दबंग दबंग...‘&lt;br /&gt;अभिनव ने अपनी पहली फिल्म में सलमान खान को तो  केंद्र में रखा ही, उनकी उस छवि को भी उभारा जिसके लिए सलमान मूलतः जाने जाते हैं यानी दबंगई। और यह फॉर्मूला काम कर गया है। उ.प्र. के लालगंज इलाके में घटने वाली ’दबंग‘ मुहावरे की भाषा में यूपी बिहार लूटने आ गयी है। पिछली ईद पर सलमान की एक्शन फिल्म ’वांटेड‘ हिट हुई थी। इस बार की ईद पर एक और एक्शन फिल्म ’दबंग‘ हिट हो गयी है। सलमान का तो अपना एक बड़ा दर्शक वर्ग है ही जो उनकी कोई भी फिल्म देखता है। ’दबंग‘ से उनकी लोकप्रियता और बढ़ेगी। लेकिन इस ’दबंग‘ का असली फायदा शत्रुघ्न सिन्हा की बेटी सोनाक्षी सिन्हा को जरूर मिलेगा जिनकी यही पहली फिल्म है। उप्र के एक गरीब बाप की निरीह बेटी के किरदार को उन्होंने बखूबी निभाया है। फिल्म की कहानी पर तो विशेष चर्चा संभव नहीं है लेकिन उसके कुछ प्रसंग बड़े मार्मिक और अनूठे हैं। जैसे किशोर सलमान द्वारा चारा काटने की मशीन से अपनी जन्म कुंडली काट देना। यह कुंडली पर नहीं पुरुषार्थ पर भरोसा करने का प्रतीक है। जैसे सोनाक्षी के पिता का किरदार निभाने वाले शराबी महेश मांजरेकर का आत्महत्या कर लेना ताकि सोनाक्षी अपने पिता की जिम्मेदारी से आजाद होकर सलमान से विवाह कर सके। फिल्म की एक और विशेषता उसका वह नंबर वन चल रहा गाना है जो मलाईका अरोड़ा खान पर बड़ी बेबाकी से फिल्माया गया- ’मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए।‘&lt;br /&gt;इस फिल्म में विनोद खन्ना, डिंपल कपाड़िया, ओमपुरी, महेश मांजरेकर, अनुपम खेर और टीनू आनंद जैसे दिग्गजों ने काम किया है तो सोनू सूद और अरबाज खान ने भी अपने अभिनय की छाप छोड़ी है। फिल्म का गीत-संगीत तो पहले ही हिट हो चुका है। फिल्म ’वांटेड‘ से ‘दबंग‘ की तुलना तो होगी लेकिन होनी नहीं चाहिए। दोनों फिल्मों में कॉमन सिर्फ एक ही चीज है-एक्शन। तो क्या एक्शन ही सफलता का सच है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशक  ः अभिनव कश्यप &lt;br /&gt;कलाकार:  सलमान खान, सोनाक्षी सिन्हा, अरबाज खान, सोनू सूद, मलाईका अरोड़ा (आइटम नंबर), अनुपम खेर, ओमपुरी, डिंपल आदि। &lt;br /&gt;संगीत:   साजिद-वाजिद-ललित पंडित&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-2238953070816614403?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/2238953070816614403/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/09/blog-post_13.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/2238953070816614403'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/2238953070816614403'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/09/blog-post_13.html' title='दबंग'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-7318738339138402881</id><published>2010-09-04T03:50:00.000-07:00</published><updated>2010-09-04T03:51:27.648-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा 4 सितंबर 2010'/><title type='text'>वी आर फैमिली</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वी आर फैमिली: रियलिटी पर भारी फैंटेसी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;करण जौहर के प्रोडक्शन की नयी फिल्म ’वी आर फैमिली‘ एक बेहतरीन फटकथा है, जिसमें एक असंभव इच्छा फैंटेसी की तरह रहती है। हॉलीवुड की हिट फिल्म ’स्टेपमॉम‘ पर आधारित ’वी आर फैमिली‘ का यथार्थ भारतीय समाज और सच्चाई को अभिव्यक्त नहीं करता, इसलिए इस फिल्म का देश के बड़े दर्शक वर्ग के साथ जुड़ाव संभव नहीं लगता। एक मां के जीवित रहते बच्चों के लिए दूसरी मां लेकर आने की अवधारणा फैंटेसी हो सकती है रियलिटी नहीं। लेकिन ’वी आर फैमिली‘ में यह अवधारणा ही रियलिटी है। हो सकता है कि आज के उत्तर आधुनिक समय का जो सिनेमा है उसके जादुई यथार्थवाद का यह समकालीन आईना हो। लेकिन थोड़ी देर के लिए अगर हम यह मान लें कि सिनेमा समाज और यथार्थ वगैरह से अलग एक स्वायत्त इकाई या कृति है तो ’वी आर फैमिली‘ की कुछ विशेषताओं पर चर्चा की जा सकती है। &lt;br /&gt;पहली विशेषता। यह काजोल की फिल्म है और काजोल के अविस्मरणीय अभिनय के लिए हमेशा याद की जाएगी। एक मरती हुई मां की इच्छा कि उसके तीन अबोध बच्चों को संभालने कोई दूसरी औरत आ जाए। लेकिन जब दूसरी औरत बच्चों के साथ दोस्ती तथा अपनत्व की पगडंडी पर आगे बढ़ने लगे तो मूल मां के भीतर ईर्ष्या का ज्वालामुखी धधकने लगे.. इस कठिन और जटिल मनोभाव को काजोल ने लाजवाब और सहज अभिव्यक्ति दी है। तलाकशुदा होने के बावजूद पति अर्जुन रामपाल को लेकर मन में मचलती मंद-मंद तड़प को वह सार्थक ढंग से सामने लाती है। दूसरी विशेषता। फिल्म की पटकथा बेहद कसी हुई और संवाद मर्मस्पर्शी तथा धारदार हैं। अपने आरंभ होने के साथ ही फिल्म में तनाव की रचना होने लगती है। यह तनाव पूरी फिल्म को बांधे और साधे रखता है। आमतौर पर चुलबुली और शोख युवती का किरदार निभाने वाली करीना कपूर ने इस फिल्म में जैसा रोल किया है वह अवसाद और दुख के अटूट अकेलेपन को पैदा करता है। दो स्त्रियों के विकट संघर्ष में फंसे निहत्थे और विकल्पहीन व्यक्ति की भूमिका को अर्जुन रामपाल ने गजब ढंग से निभाया है। सबसे बेमिसाल है फिल्म के तीन बच्चों का सहज और भावप्रवण अभिनय। कई स्थलों पर फिल्म रुलाती भी है इसलिए इसे मनोरंजन के लिए तो हर्गिज नहीं देखा जा सकता। लेकिन अगर आप एक सौतेली मां और दूसरी औरत के दर्द से दो-चार होना चाहते हैं तो ’वी आर फैमली‘ एक उम्दा अनुभव है। लेकिन बॉलीवुड में बीमारी लौट आयी है क्या? पिछले हफ्ते ही कैंसर से पीड़ित जॉन अब्राहम की ‘आशाएं‘ देखी थी। इस हफ्ते काजोल! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्माता:   करण जौहर&lt;br /&gt;निर्देशक:  सिद्धार्थ मल्होत्रा&lt;br /&gt;कलाकार:  अर्जुन रामपाल, काजोल, करीना कपूर, आंचल मुंजाल, दिया सोनेचा, नोमिनाथ गिन्सबर्ग &lt;br /&gt;संगीत:   शंकर-अहसान-लॉय&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-7318738339138402881?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/7318738339138402881/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/09/blog-post.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/7318738339138402881'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/7318738339138402881'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/09/blog-post.html' title='वी आर फैमिली'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-4242636339702672596</id><published>2010-08-28T03:44:00.000-07:00</published><updated>2010-08-28T03:45:39.175-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा 28 अगस्त 2010'/><title type='text'>आशाएं</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिंदगी को पुकारती ’आशाएं‘&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर आप बेहतर ढंग से बुनी गयी, एक संवेदनशील और अर्थपूर्ण कहानी पसंद करते हैं तो नागेश कुकनूर की ’आशाएं‘ आपको भरोसा देगी। भरोसा इस बात का कि बाजार की इस अंधी दौड़ में भी कुछ लोग ’अच्छे सिनेमा‘ को जुनून की तरह बचाए हुए हैं। भरोसा इस बात का कि जिंदगी हमेशा जिंदाबाद है और जिंदगी को पूरी शिद्दत के साथ जीना चाहिए। एक पंक्ति में कहें तो ’आशाएं‘ जिंदगी के समर्थन में उठी एक जीवंत पुकार है। और यह पुकार जॉन एब्राहम के मर्मस्पर्शी अभिनय से सजी हुई है। बॉलीवुड की चालू फिल्मों से अलग ’आशाएं‘ कम से कम जॉन एब्राहम की ’फिल्मोग्राफी‘ में एक सितारे की तरह जुड़ने वाली है। यह फिल्म लंबे समय से रोशनी का मुंह देखने को तरस रही थी। अगर यह रिलीज नहीं होती तो पर्दे पर रची हुई एक मार्मिक कविता की अकाल मौत हो जाती और दर्शक कभी नहीं जान पाते कि जॉन के भीतर कितना समर्थ अभिनेता छिपा हुआ है। अनीता नायर के रूप में नागेश ने बॉलीवुड को जो युवा अभिनेत्री दी है वह उचित मौके मिलने पर कमाल कर सकती है। मरती हुई लेकिन जीवंत लड़की का नायाब अनुभव बन गयी है अनीता नायर। वह न सिर्फ पूरी फिल्म को बांधे रखती है बल्कि कैंसर जैसी भयावह तकलीफ को चिढ़ाती भी रहती है। वैसे तो फिल्म की मुख्य हीरोइन सोनल सहगल है लेकिन ज्यादातर स्पेस अनीता नायर को ही मिला है, और इस स्पेस में अनीता ने अपने हिस्से का आकाश रच दिया है। ऐसा नहीं है कि आशाएं कोई अद्वितीय फिल्म है। कैंसरग्रस्त हीरो की कहानी पर राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन की अमर फिल्म ’आनंद‘ बन चुकी है। ’आशाएं‘ इस अर्थ में बेहतरीन फिल्म है कि यह जिंदगी की जिंदादिल दास्तान का कोलाज रचती नजर आती है। जिंदगी से मुंह मोड़ कर जॉन जिस मरते हुए लोगों के आश्रम में जीवन गुजारने जाता है वहां उसका साक्षात्कार इस यथार्थ से होता है कि जिंदगी भागने का नहीं, जीने का नाम है। कि अमर जिंदगी का झरना किसी कल्पना लोक में नहीं जिंदगी के सीने पर गड़ा हुआ है। इस सच से गुजरने के बाद जॉन अपने प्यार के साथ वापस जिंदगी में लौटता है। मारधाड़, कॉमेडी और सेक्स के इस ’मुख्य समय‘ में ’आशाएं‘ को ’बाजार‘ तो नहीं मिलेगा लेकिन अच्छे सिनेमा की गिनती में उसका भी नाम दर्ज होगा, इसमें शक नहीं। सलीम-सुलेमान और प्रीतम ने कहानी के अनुकूल संगीत दिया है जो मन को भाता भी है। धारा के विरुद्ध बने सिनेमा को प्रोत्साहन देने के लिए भी इस फिल्म को देखना चाहिए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशक:   नागेश कुकनूर &lt;br /&gt;कलाकार:  जॉन एब्राहम, सोनल सहगल, अनीता नायर, फरीदा जलाल, गिरीश करनाड। &lt;br /&gt;संगीत:  प्रीतम चक्रवर्ती, शिराज उप्पल, सलीम मर्चेन्ट, सुलेमान मर्चेन्ट। &lt;br /&gt;गीत:    समीर, कुमार, शकील, मीर अली।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-4242636339702672596?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/4242636339702672596/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/08/blog-post_28.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/4242636339702672596'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/4242636339702672596'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/08/blog-post_28.html' title='आशाएं'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-4707358730465985571</id><published>2010-08-21T04:00:00.000-07:00</published><updated>2010-08-21T04:01:06.135-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा 21 अगस्त 2010'/><title type='text'>लफंगे परिंदे</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इलीट क्लास के ‘लफंगे परिंदे‘&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने बॉलीवुड में कौन-कौन से खास लोग हैं जो झोपड़पट्टी या बैठी चाल या गरीब गुरबों की बस्ती में जीवन जीते किरदारों को विश्वसनीय, सहज और वास्तविक ढंग से पर्दे पर उतार सकते हैं? जो गली कूचों की टपोरी भाषा ही नहीं बोल सकते वैसा जीवन जीवंत भी कर सकते हैं? आम आदमी का जीवन जी सकने में सफल ये खास कलाकार हैं - आमिर खान, सलमान खान, संजय दत्त, अरशद वारसी, नसीरुद्दीन शाह, ओमपुरी, महेश मांजरेकर, करीना कपूर, विद्या बालन, तब्बू, मिथुन चक्रवर्ती, जैकी श्राफ, नाना पाटेकर, रणवीर शौरी, इरफान खान, अक्षय कुमार, सुनील शेट्टी, परेश रावल, उर्मिला मातोंडकर, प्रियंका चोपड़ा आदि। लेकिन अंग्रेज व्यक्तित्व वाले नील नितिन मुकेश और इलीट क्लास की दीपिका पादुकोन तो कहीं से भी ’लफंगे परिंदे‘ नजर नहीं आते। न हावभाव से, न चालढाल से, न संवाद अदायगी से, न बॉडी लैंग्वेज से। इसीलिए गली-कूचों की एक जीवंत, मर्मस्पर्शी और जिंदादिल दास्तान ’निर्जीव तमाशे‘ में बदलती नजर आती है। इलीट क्लास के ’लफंगे परिंदे‘ लोअर डेप्थ (तलछट) का यथार्थ साकार नहीं कर सके। हर निर्देशक का अपना ’जोनर‘ होता है जो उसे पहचानना चाहिए। इसी तरह हर कलाकार की भी अपनी सीमा होती है लेकिन जो उस सीमा का सफलतापूर्वक अतिक्रमण कर लेता है वह महान कलाकारों की श्रेणी में शुमार हो जाता है। जैसे सबसे बड़ा उदाहरण अमिताभ बच्चन। अगर दुर्भाग्य से इस फिल्म में पीयूष मिश्रा और केके मेनन जैसे अद्वितीय कलाकार नहीं होते तो ’लफंगें परिंदे‘ शायद उड़ भी नहीं पाते। फिल्म का सबसे ज्यादा प्रभावशाली पक्ष है इसका गीत-संगीत, उसके बाद ध्यान खींचते हैं संवाद। नील नितिन मुकेश के व्यक्तित्व पर किसी अमीरजादे का चरित्र ही सहज लग सकता है। दीपिका पादुकोन ने अंधी लड़की के किरदार में घुसने की जी-तोड़ कोशिश की है लेकिन फिल्म ’ब्लैक‘ में रानी मुखर्जी ने इस चरित्र के संदर्भ में जो लंबी लकीर खींच दी है उसे पार करना शायद संभव नहीं है। ’लफंगें परिंदे‘ की जो बुनियादी प्रेम कहानी है वह यकीनन बहुत संवेदनशील और ’ट्रेजिक‘ है। इस कहानी को मुंबई की किसी ’चाल‘ या ’वाड़ी‘ के बजाय पैडर रोड, नरीमन प्वाइंट अथवा बांद्रा के ’पॉश परिवेश‘ में घटता दिखाते तो शायद फिल्म का भविष्य कुछ और होता। उस परिवेश में दोनों प्रमुख पात्र ज्यादा ’रीयल‘ लगते। इस फिल्म की एकमात्र कमजोरी इसका अनरीयल होना ही है। इतना जरूर है कि फिल्म का कथानक लगातार बांधे रखता है।&lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;निर्माता:   आदित्य चोपड़ा &lt;br /&gt;निर्देशक:  प्रदीप सरकार &lt;br /&gt;कलाकार:  नील नितिन मुकेश, दीपिका पादुकोन, केके मेनन, पीयूष मिश्रा &lt;br /&gt;गीत:   स्वानंद किरकिरे &lt;br /&gt;संगीत:   आर.आनंद&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-4707358730465985571?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/4707358730465985571/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/08/blog-post_21.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/4707358730465985571'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/4707358730465985571'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/08/blog-post_21.html' title='लफंगे परिंदे'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-3031490730106975552</id><published>2010-08-14T02:37:00.000-07:00</published><updated>2010-08-14T02:38:46.479-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='13 अगस्त 2010'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा'/><title type='text'>पीपली लाइव</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तंत्र पर तमाचा ‘पीपली लाइव‘ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बॉलीवुड में बनने वाली एक अच्छी या बुरी फिल्म नहीं है ‘पीपली लाइव।‘ फिल्म की तरह इसकी समीक्षा की भी नहीं जा सकती। असल में ‘पीपली लाइव‘ बना कर इसके मूल निर्माता आमिर खान ने यह बताया है कि कोई भी सार्थक (और सफल भी) काम करने के लिए केवल और केवल एक बेहतरीन दिमाग की जरूरत पड़ती है। पैसा, ताम झाम, ग्लैमर बहुत बाद की बातें हैं। यही वजह है कि ‘पीपली लाइव‘ नामक तथाकथित फिल्म में कदम कदम पर आमिर खान का उर्वर दिमाग जैसे एक निर्णायक युद्ध सा लड़ता नजर आता है। पारंपरिक अर्थों में ‘पीपली लाइव‘ सिनेमा है भी नहीं। यह दरअसल सिनेमा के नाम पर एक खतरनाक तमाचा है जिसकी अनुगूंज आने वाले कई वर्षों तक वातावरण में बनी रहेगी। इस तमाचे के गहरे, रक्तिम निशान सत्ता के तंत्र पर बरसों बरस चमकते रहेंगे। और जो लोग इस सिनेमाई विमर्श के अनुभव से गुजरे हैं या गुजरेंगे वे इस बात के गवाह रहेंगे कि तंत्र चाहे स्थानीय हो, चाहे प्रादेशिक, चाहे भारतीय वह कितना अमानवीय, लोलुप, बेदर्द और जंगली होता है। तंत्र की बर्बरता का बखान करने के क्रम में आमिर खान ने मीडिया को भी नहीं बख्शा है। ‘पीपली लाइव‘ में मीडिया एक मजाक बन कर दौड़ता है - बदहवास, बेमतलब और बेलगाम। इस प्रकार एक गुमनाम गांव में एक किसान के आत्महत्या करने के ऐलान की पृष्ठभूमि पर आमिर खान का यह सिनेमाई पाठ सत्ता से जुड़ी हर संस्था को खेल-खेल में नंगा कर देता है। महान कवि गजानन माधव मुक्ति बोध की तरह यह बुदबुदाते हुए -‘हाय हाय, मैंने उन्हें देख लिया नंगा/अब मुझे इसकी सजा मिलेगी।‘&lt;br /&gt;अगर ‘पीपली लाइव‘ केवल मल्टीप्लेक्स की फिल्म बन कर रह गयी तो यह इसकी और इससे जुड़े तमाम लोगों की हार होगी। ‘पीपली लाइव‘ की विजय उसके व्यापक प्रदर्शन में निहित है। गांव-गांव-गली-गली-कस्बे-कस्बे में इसका प्रदर्शन ही इसे इसके मकसद तक पहुंचा सकता है। यह कैसे होगा यह भी आमिर खान को ही सोचना होगा। फिल्म के प्रोमोज लगभग पूरी फिल्म पहले ही बयान कर चुके हैं। हम केवल इतना बताना चाहते हैं कि आमिर खान को एक हजार गांवों से एक एक चिट्ठी आयी है। हर गांव का नाम पीपली है यानी कम से कम हिंदुस्तान में पीपली नाम के एक हजार गांव तो मौजूद हैं ही। एक रघुवीर यादव को छोड़ कर कोई भी फिल्मी कलाकार नहीं है लेकिन अभिनय के मामले में कोई कमतर नहीं है। ‘पीपली लाइव‘ के गाने प्रदर्शन से पूर्व ही लोकप्रिय हो चुके हैं। एक अनूठी, दिलचस्प और जरूरी फिल्म को तुरंत देखने जाएं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्माता:   आमिर खान /यूटीवी&lt;br /&gt;निर्देशक:  अनुषा रिजवी&lt;br /&gt;कलाकार:  रघुवीर यादव, ओमकारदास माणिकपुरी, मलाइका शिनॉय, नवाजुद्दीन सिद्धिकी, फारुख जफर&lt;br /&gt;संगीत:   इंडियन ऑसियान, बृज आदि&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-3031490730106975552?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/3031490730106975552/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/08/blog-post_14.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/3031490730106975552'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/3031490730106975552'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/08/blog-post_14.html' title='पीपली लाइव'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-1901449477444656356</id><published>2010-08-07T03:44:00.001-07:00</published><updated>2010-08-07T03:44:51.081-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='7 अगस्त 2010'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा'/><title type='text'>आयशा</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाथ से छूटती फिसलती सी ‘आयशा‘ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रेम कहानी होने के बावजूद थोड़ी गंभीर और जटिल किस्म की फिल्म है इसलिए आम दर्शक संभवतः ‘आयशा‘ को देखना पसंद नहीं करेंगे। लेकिन विशेष अथवा बौद्धिक दर्शकों को भी लीक से हट कर बनी ‘आयशा‘ ट्रीटमेंट के स्तर पर संतुष्ट नहीं करेगी। शुरू से अंत तक हाथ से फिसलती और छूटती सी नजर आती है फिल्म। कह सकते हैं कि एक बेहतरीन, अर्थपूर्ण, कुछ अलग किस्म की कहानी जब बुनावट यानी मेकिंग के स्तर पर लड़खड़ा जाती है तो ‘आयशा‘ जैसी फिल्म बनती है। वरना तो दिल्ली की जिस अमीरजादी, शोख, थोड़ी सी एरोगेंट, ज्यादातर आत्मकेंद्रित और पूरी तरह आत्म मुग्ध लड़की के किरदार में सोनम कपूर को उतारा गया है वह बॉक्स ऑफिस पर गदर मचा सकती थी। इस तरह के चरित्र को ‘नारसिसस‘ कहते हैं। यह चरित्र ग्रीक माइथोलॉजी में मौजूद है और पूरी दुनिया में इस चरित्र के प्रभाव ग्रीक माइथोलॉजी से ही ग्रहण किए गये हैं। यह केवल खुद पर मुग्ध, पूरी तरह पर्फेक्ट, अंतिम सत्य सा ‘तूफान‘ चरित्र होता है जो सोनम कपूर जैसी सॉफ्ट, कम उम्र और दिलकश लड़की पर फिट नहीं बैठता। इस ‘मिसमैच‘ के कारण ही ‘आई हेट लव स्टोरीज‘ की, दर्शकों के दिलों पर राज करने वाली सोनम ‘आयशा‘ में प्रभावित नहीं कर पाती। लेकिन एक लीक से हटकर उठायी गयी कहानी के जीवंत और जुदा अनुभव से गुजरने के लिए फिल्म को एक बार जरूर ही देखना चाहिए। सवा दो घंटे की फिल्म में कोई हीरोईन शायद इतनी तरह की ड्रेसेज नहीं पहन सकती जितनी सोनम ने पहनी हैं। लड़कियों को तो ड्रेसेज की इतनी अधिक वेरायटीज से गुजरने के लिए भी ‘आयशा‘ देख लेनी चाहिए। फिल्म का कथासार इतना सा है कि रियल लाइफ में दूसरों की जोड़ी मिलाने का शौक रखने वाली सोमन कपूर कैसे अपनी सनक और जिद के चलते क्रमशः अपने दोस्तों को खोती चली जाती है। हिंदी फिल्म है। सुखांत फिल्म बनाना मजबूरी है इसलिए अंत में सोनम को ‘रियलाइज‘ होता है कि वह कितनी गलत थी और इस आत्मस्वीकार के बाद वह अपने ‘प्यार‘ अभय देओल को पा लेती है। दिल्ली के बिंदास, बेफिक्रे, अल्हड़ किरदारों के रूप में अभय देओल, साइरस शौकर, इरा दुबे और अमृता पुरी दिल जीत लेते हैं। सोनम का अभिनय मंजता जा रहा है। वह सहज अभिनय करने की कठिन दिशा में आगे बढ़ रही है। अभय देओल के अभिनय में आत्मविश्वास है तो नयी लड़की अमृता पुरी ने बहादुरगढ़ की पंजाबी कुड़ी के रूप में खुद को ‘मनवा‘ लिया है। गीत-संगीत बेहतरीन है। लंबे समय बाद एम. के. रैना को बड़े पर्दे पर देखना सुखद है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्माता:   अनिल कपूर, रिया कपूर&lt;br /&gt;निर्देशक:  राजश्री ओझा&lt;br /&gt;कलाकार:  अभय देओल, सोनम कपूर, साइरस शौकर, इरा दुबे, अमृता पुरी, एम.के. रैना आदि।&lt;br /&gt;गीत:   जावेद अख्तर &lt;br /&gt;संगीत:   अमित त्रिवेदी&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-1901449477444656356?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/1901449477444656356/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/08/blog-post.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/1901449477444656356'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/1901449477444656356'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/08/blog-post.html' title='आयशा'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-6157241512845112674</id><published>2010-07-31T04:23:00.000-07:00</published><updated>2010-07-31T04:24:27.019-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा 31 जुलाई 2010'/><title type='text'>वन्स अपॉन ए टाइम इन मुंबई</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वन्स अपॉन ए टाइम इन मुंबई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सत्तर की मुंबई में माफिया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; मुंबई के माफिया राज या अंडरवल्र्ड पर आधारित जो तीन चार बेहतर फिल्में हिंदी सिनेमा के पास हैं उनमें एक और का इजाफा हो गया है। टीवी क्वीन एकता कपूर लगता है सिनेमा की साम्राज्ञी भी बन कर रहेंगी। पहले छोटे बजट की आॅफ बीट लेकिन सफल फिल्म ‘लव सेक्स और धोखा‘ बना कर खुद को प्रमाणित किया और अब बड़े बजट की सुपरहिट मसाला फिल्म बना कर बाजार में भी अपना सिक्का चलवा दिया। बहुत दिनों के बाद सिनेमाघरों में भारी भीड़ दिखाई पड़ी। सत्तर के समय की मंुबई को अनुभव करने के लिए युवा दर्शक उमड़ पड़े। मिलन लूथरिया का निर्देशकीय कौशल करिश्मा कर गया। उन्होंने सचमुच सातवें दशक की मुंबई के सामाजिक और आपराधिक ताने-बाने का बेहतरीन पाठ पेश किया है। निर्माण के समय खबरें आती थीं कि एकता कपूर बहुत दखलंदाजी कर रही हैं लेकिन फिल्म देखने के बाद महसूस हुआ कि यह दखलंदाजी कितनी रचनात्मक और सकारात्मक रही। फिल्म की पटकथा बेहद कसी हुई है। संवाद चुटीले और संगीत कर्णप्रिय है। केवल प्रमुख पात्रों पर ही नहीं फिल्म के प्रत्येक चरित्र के लुक, कपड़ों, हेयर स्टाइल और अंदाज पर बहुत मेहनत की गयी है। एक पंक्ति में कहना हो तो ‘वन्स अपाॅन ए टाइम इन मुंबई‘ सत्तर के समय में खड़ी दो हजार दस की चेतना है जिसके जरिए हम माफिया राज की नैतिक दीवारों पर मनुष्य विरोधी अनैतिक खिड़कियां खुलते देखते हैं। बीतते हुए और आते हुए डाॅन के इस द्वंद्व को बेहद स्पष्ट और तल्ख अंदाज में पेश करके मिलन लूथरिया ने इसे नये युग के माफिया विमर्श में बदल दिया है। और इस विमर्श को बेहद काबिल, विश्वसनीय, जीवंत तथा यादगार अनुभव में ढाला है इसके पांचों प्रमुख कलाकारों ने। अजय देवगन, इमरान हाशमी, कंगना रानावत, प्राची देसाई और रणदीप हुडा ने अपने किरदारों को अपने अभिनय से एक सिनेमाई पाठ में बदल दिया है। फिल्म में राजनीति और अपराध की दुरभिसंधियों की आहटों को भी जगह दी गयी है। तबाही, बम धमाकों, ट्रेन विस्फोटों, जहरीली शराब, ड्रग्स वगैरह के जिस खौफनाक ज्वालामुखी पर आज की मुंबई बैठी है उसकी रचना कौन से समय में और किन सपनों को पूरा करने की चाहत में हुई थी यह जानने-समझने के लिए नयी पीढ़ी को यह फिल्म अवश्य देखनी चाहिए। ऐसी फिल्मों में हीरोईनों के लिए खास ‘स्पेस‘ नहीं होता तो भी दोनों अभिनेत्रियों - कंगना तथा प्राची - ने अपना जलवा दिखाया है। कंगना के लिए तो यह शायद उसकी चुनी हुई फिल्मों में से एक बनेगी। गीत-संगीत भी सातवें दशक का जादू जगाते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्माता:  एकता कपूर, शोभा कपूर&lt;br /&gt;निर्देशक: मिलन लूथरिया&lt;br /&gt;कलाकार: अजय देवगन, इमरान हाशमी, कंगना रानावत, प्राची देसाई, रणदीप हुडा।&lt;br /&gt;गीत:  इरशाद कामिल&lt;br /&gt;संगीत:  प्रीतम चक्रवर्ती&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-6157241512845112674?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/6157241512845112674/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/07/blog-post_31.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/6157241512845112674'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/6157241512845112674'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/07/blog-post_31.html' title='वन्स अपॉन ए टाइम इन मुंबई'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-4207225045698734250</id><published>2010-07-24T03:50:00.000-07:00</published><updated>2010-07-24T03:51:17.879-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='24 जुलाई 2010'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा'/><title type='text'>खट्टा मीठा</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भ्रष्ट तंत्र के विरुद्ध ‘खट्टा मीठा‘&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बार प्रियदर्शन और अक्षय कुमार की जोड़ी ने काॅमेडी में इमोशन और मूल्यों का तड़का लगा कर एक ‘मीनिंगफुल‘ फिल्म बनाने की कोशिश की है। प्रियदर्शन ने फिल्म को भ्रष्टचार और भ्रष्ट तंत्र के विरुद्ध जंग का ऐलान बनाने का प्रयास किया है लेकिन यह प्रयास ‘कन्फ्यूजन‘ का शिकार हो गया है। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई एक गंभीर मुद्दा है जिसे काॅमेडी के औजारों से नहीं लड़ा जा सकता। इंटरवल तक फिल्म तो भी एक उम्मीद से जोड़े रखती है कि शायद यह भ्रष्ट तंत्र पर एक गहरा तंज साबित होगी लेकिन इंटरवल के बाद जब फिल्म बिखरना शुरू होती है तो बिखरती ही जाती है। फिल्म में कई उप कथाएं जोड़ दी गयी हैं जिनकी बिल्कुल भी जरूरत नहीं थी। ये उपकथाएं मूल फिल्म को भटकाव की सड़क पर फिसला देती हैं। असरानी वाला प्रसंग एकदम गैरजरूरी है और अक्षय के रोड रोलर वाला प्रसंग जरूरत से ज्यादा लंबा तथा उबाऊ हो गया है।&lt;br /&gt;मूल रूप से प्रियदर्शन कहना यह चाहते थे कि भ्रष्टाचार, अनाचार और अनैतिकता के दलदल में आकंठ डूबे एक तंत्र में ईमानदारी तथा मूल्यों की लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती। जो लड़ने का प्रयास करेगा वह एक दर्दनाक मौत मरेगा। (फिल्म में मकरंद देशपांडे की हत्या) इस तंत्र में जो सच्ची बात करेगा वह अकेला पड़ जाएगा और भूखा मरेगा (फिल्म में अक्षय कुमार का चरित्र)। यहां तक ही कहानी रहती तो बेहतर था। लेकिन एक सकारात्मक अंत दिखाने की चाहत में कुछ आतर्किक दृश्यों के दम पर फिल्म में सच्चाई की विजय और भ्रष्टाचार की पराजय के ‘नोट‘ पर फिल्म का अंत किया गया। इसे हम एक पवित्र मंशा भले ही कहें लेकिन यह मंशा ढंग से पर्दे पर नहीं उतर सकी। अक्षय कुमार के अपोजिट दक्षिण की जिस हीरोइन तृषा को उतारा गया उसमें जरा भी दम नहीं है। न तो वह ग्लैमरस है न ही समर्थ अभिनेत्री। पूरी फिल्म केवल और केवल अक्षय कुमार के कौशल और अंदाज की है जिसमें वह सौ प्रतिशत कामयाब हुए हैं। अगर आप अक्षय कुमार के प्रशंसक हैं तो फिल्म आपको कम से कम अक्षय के अभिनय के स्तर पर निराश नहीं करेगी। लंबी फिल्म है। कम से कम आधा घंटा छोटा करके एक कसी हुई फिल्म बनायी जा सकती थी। तो भी एक बार तो दर्शक फिल्म देखने जाएं ही क्योंकि फिल्म बोर नहीं करती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशक:  प्रियदर्शन &lt;br /&gt;कलाकार:  अक्षय कुमार, तृषा, मकरंद देशपांडे, राजपाल यादव, मिलिंद गुणाजी, अरुणा ईरानी, कुलभूषण खरबंदा, असरानी&lt;br /&gt;संगीत:   प्रीतम चक्रवर्ती&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-4207225045698734250?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/4207225045698734250/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/07/blog-post_24.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/4207225045698734250'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/4207225045698734250'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/07/blog-post_24.html' title='खट्टा मीठा'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-4174963606909425763</id><published>2010-07-17T03:42:00.000-07:00</published><updated>2010-07-17T03:43:04.562-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='17 जुलाई 2010'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा'/><title type='text'>लम्हा</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कश्मीर के वजूद पर विमर्श: लम्हा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यकीन तो था कि निर्देशन राहुल ढोलकिया का है इसलिए ‘लम्हा‘ अर्थपूर्ण फिल्म होगी, जो कि वह है। फिल्म ‘परजानिया‘ के निर्देशन से राहुल ढोलकिया को विश्व पर्दे की नागरिकता मिली थी। ‘लम्हा‘ में भी उन्होंने निराश नहीं किया। कश्मीर के वजूद पर एक सार्थक विमर्श पेश करने में वह सफल हुए हैं। कश्मीर को लेकर उन्होंने कुछ जलते सवाल हवा में उछाले हैं जिनका जवाब अमन और तरक्की पसंद अवाम को खोजना है। सियासत इन सवालों को उलझाती आयी है और उलझाती रहेगी क्योंकि कश्मीर सुलगता रहेगा तो सियासत का चूल्हा भी दहकता रहेगा। कश्मीर की आग ही सियासत का ईंधन है। कश्मीर एक अनसुलझा समीकरण है, कश्मीर एक कंपनी है, कश्मीर जन्नत और जहन्नुम के बीच ठिठका एक खौफनाक लम्हा है। कश्मीर की बरबादी में सब शामिल हैं, सब शामिल हैं, सब शामिल हैं - यह संदेश दिया है राहुल ढोलकिया ने। इस संदेश के संवाहक बने हैं संजय दत्त, कुणाल कपूर और बिपाशा बसु। संजय एक परिपक्व और समर्थ अभिनेता हैं। उनका काम वजनदार और सहज है। लेकिन बिपाशा बसु ने तो कमाल कर दिया है। एक ग्लैमरस गुड़िया इतना संजीदा और आॅफ बीट रोल इतने जीवंत ढंग से अदा करेगी, सोचा न था। एक बंगाली बाला होने के बावजूद कश्मीर की एक विद्रोही लड़की अजीजा का किरदार उन्होंने बेहद विश्वसनीय ढंग से निभाया है। जब वह संजय दत्त से कहती हैं -‘आंखों में जो गुस्सा है वह हर कश्मीरी लड़की को विरासत में मिलता है‘ तो पर्दे पर बिपाशा नहीं अजीजा ही दिखती है। हथियार फेंक कर चुनाव में उतरने वाले लोकप्रिय युवा नेता के रूप में कुणाल कपूर ने भी सशक्त अभिनय किया है। ‘लम्हा‘ में जो मौजूदा कश्मीर देखने को मिलता है उसे देख वह जन्नत बिल्कुल याद नहीं आती जो कश्मीर के नाम पर प्रचारित है। यह तो बहुत बदहाल, जर्जर और आतंक के साये में जीता शहर है जो सपने में डर की तरह उतरता है। इस डर पर एक नयी जगह खड़े होकर रोशनी डाली है राहुल ढोलकिया ने। संभवतः यह पहली हिंदी फिल्म है जिसमें कश्मीर की जामा मस्जिद में अदा की गयी नमाज का फिल्मांकन हुआ है। फिल्म का गीत-संगीत फिल्म की कहानी और पृष्ठभूमि के अनुकूल है। सबसे ताकतवर हैं फिल्म के संवाद। कुणाल कपूर का मात्र एक संवाद ‘कश्मीर में कोई सियासत नहीं छोड़ता‘ पूरी फिल्म का आख्यान बन जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्माता:  बंटी वालिया&lt;br /&gt;निर्देशक:  राहुल ढोलकिया&lt;br /&gt;कलाकार:  संजय दत्त, बिपाशा बसु, कुणाल कपूर, अनुपम खेर, यशपाल शर्मा, महेश मांजरेकर, राजेश खेरा, एहसान खान &lt;br /&gt;संगीत:   मिठुन&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-4174963606909425763?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/4174963606909425763/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/07/blog-post_17.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/4174963606909425763'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/4174963606909425763'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/07/blog-post_17.html' title='लम्हा'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-7233114104836094641</id><published>2010-07-10T03:25:00.000-07:00</published><updated>2010-07-10T03:26:22.827-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='10 जुलाई 2010'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा'/><title type='text'>मिलेंगे-मिलेंगे</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तकदीर की सड़क पर ‘मिलेंगे-मिलेंगे‘&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस फिल्म को देख कर सबसे पहला ख्याल यह आता है कि तकदीर ने करीना और शाहिद कपूर के बीच अलगाव क्यों पैदा किया होगा? इन दोनों की आॅन स्क्रीन जोड़ी भली लगती है और आॅन स्क्रीन केमिस्ट्री में कशिश है। सहारा वन मोशन पिक्चर्स द्वारा प्रस्तुत बोनी कपूर की फिल्म ‘मिलेंगे-मिलेंगे‘ पहले बननी शुरू हुई थी लेकिन इसी जोड़ी की ‘जब वी मेट‘ इससे लगभग तीन साल पहले रिलीज हो गयी  थी। ‘जब वी मेट‘ का जादू आज भी बरकार है। बोनी कपूर की फिल्म लंबे इंतजार के बाद अब जाकर रिलीज हुई है जब शाहिद-करीना के बीच जबर्दस्त अनबन और अबोला है। बोनी की फिल्म को एक पंक्ति में परिभाषित करना हो तो कह सकते हैं - रोचक, मनोरंजक, इमोशनल लव स्टोरी है जो तकदीर की सड़क पर अपनी यात्रा शुरू करती है और तकदीर में ही अपनी परिणति ढूंढती है। फिल्म किरण खेर की इस भविष्य वाणी से आरंभ होती है कि करीना कपूर को उसका लाइफ पार्टनर सात दिन बाद किसी विदेशी समुद्र के किनारे सात रंग के कपड़े पहने हुए मिलेगा। जबकि करीना दिल्ली में रहती है। यह लाइफ पार्टनर शाहिद कपूर है जो स्वयं भी दिल्ली में ही रहता है। यहां से शुरू होता है तकदीर का खेल। बैंकाक के समुद्र तट पर सुबह सात बजे सात तारीख को सात रंग के कपड़ों में करीना को शाहिद कपूर मिलता है। दोनों मिलते हैं लेकिन दो ही दिन में यह राज खुल जाता है कि जिसे करीना ‘डेस्टिनी‘ समझ रही है वह शाहिद की ‘प्लानिंग‘ है। करीना गुस्सा हो कर शाहिद को ठुकरा देती है। दोनों अपने अपने रास्ते चल पड़ते हैं। लेकिन तकदीर को यह अलगाव मंजूर नहीं है। तीन साल बाद इन दोनों को भाग्य फिर मिला देता है। कैसे, यही इस फिल्म की कथा भी है और उत्सुकता भी। सतीश कौशिक का निर्देशन कसा हुआ है। वह दर्शकों को बांध कर रखने में सफल हुए हैं। बीच-बीच में हास्य के जबर्दस्त क्षण आते रहते हैं जिनका दर्शक खुल कर मजा लेते हैं। यह करीना के जीरो साइज फिगर से पहले की फिल्म है जिसमें करीना ज्यादा आकर्षक लगी हैं। फिल्म का संगीत हिमेश रेशमिया ने दिया है जो बेहद दिलकश है। उनकी आवाज का एक गीत ‘कुछ तो बाकी है‘ दिल को स्पर्श करता है। एक सीधी सादी संवेदनशील प्रेम कहानी है जिसे प्रभावशाली संगीत और हल्के फुल्के हास्य से सजाया गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्माता:   बोनी कपूर&lt;br /&gt;निर्देशक:  सतीश कौशिक&lt;br /&gt;कलाकार: शाहिद कपूर, करीना कपूर, आरती छाबरिया, सतीश शाह, सतीश कौशिक, किरण खेर&lt;br /&gt;संगीत:   हिमेश रेशमिया&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-7233114104836094641?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/7233114104836094641/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/07/blog-post_10.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/7233114104836094641'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/7233114104836094641'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/07/blog-post_10.html' title='मिलेंगे-मिलेंगे'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-6536588235382233547</id><published>2010-07-03T03:56:00.000-07:00</published><updated>2010-07-03T03:57:25.522-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='3 जून 2010'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा'/><title type='text'>आई हेट लेव स्टोरीज</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्यारी सी ‘आई हेट लेव स्टोरीज‘&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;युवा दिलों के प्यार को केंद्र में रख कर फिल्में बहुत लंबे समय से बनती आ रही हैं। कुछ का नाम समय की शिला पर भी दर्ज है। करन जौहर की नयी फिल्म ‘आई हेट लव स्टोरीज‘ भी मूलतः दो युवा दिलों की प्रेम कहानी है जिसे थोड़ा अलग अंदाज में आधुनिक ढंग से कहने की कोशिश की गयी है। पुनीत मल्होत्रा द्वारा निर्देशित यह फिल्म हालांकि एक सामान्य सी ही फिल्म है लेकिन अपने कुल प्रभाव में यह प्यारी और दिलचस्प बन गयी है। इसमें पुनीत ने फिल्म के भीतर फिल्म बनाने की तकनीक को चुना है जो बीच बीच में ‘रिलीफ‘ देने का काम करती है। अपनी पिछली फिल्मों के मुकाबले इस फिल्म में सोनम कपूर ने अभिनय, अभिव्यक्ति और सुंदरता के स्तर पर लाजवाब काम किया है। आज के समय के केसानोवा  टाइप के कनफ्यूज्ड युवा के चरित्र को इमरान खान ने भी बेहद विश्वसनीय और जीवंत ढंग से अदा किया है। अच्छी बात यह है कि दोनों युवाओं के अभिनय में गहरी संवेदनशीलता भी है। कह सकते हैं कि बाॅलीवुड की यह युवा जोड़ी ‘भविष्य की उम्मीद‘ है। कम से कम दो से तीन रील काट कर फिल्म को ज्यादा चुस्त दुरूस्त किया जा सकता था। कुल मिला कर फिल्म की कहानी यह है कि इंटरवल से पहले सोनम कपूर इमरान को प्यार करती है लेकिन इमरान सोनम के प्यार को ठुकरा देता है। इंटरवल के बाद इमरान सोनम को प्यार करने लगता है और इस बार सोनम इस प्यार को ठुकरा देती है। मजेदार बात यह है कि फिल्म का यह कथासार खुद फिल्मकार ने भी फिल्म के भीतर बताया है। हिंदी फिल्म है इसलिए अंत में सोनम-इमरान का प्यार जीत जाता है। फिल्म एक सुखांत मोड़ पर खत्म होती है। सोनम और इमरान जिस करन जौहर जैसे बड़े फिल्म मेकर के प्रोडक्शन हाउस में सहायक की नौकरी करते हैं उस करन जौहर का किरदार समीर सोनी ने निभाया है। अपने अभिनय की सहजता के कारण समीर सोनी फिल्म में छा गये हैं। समीर दत्तानी सोनम के पहले प्रेमी के रोल में हैं लेकिन उनके चेहरे से हर समय वीरानी बरसती दिखती है। फिल्म का सबसे मजबूत और प्रभावशाली पक्ष इसका गीत-संगीत है। अन्विता, विशाल और कुमार के मर्मस्पर्शी गीतों को विशाल-शेखर ने मधुर संगीत दिया है। फिल्म को देखा जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्माता:   करन जौहर&lt;br /&gt;निर्देशक:   पुनीत मल्होत्रा&lt;br /&gt;कलाकार: इमरान खान, सोनम कपूर, समीर सोनी, समीर दत्तानी, केतकी दवे।&lt;br /&gt;संगीत:   विशाल-शेखर&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-6536588235382233547?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/6536588235382233547/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/07/blog-post.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/6536588235382233547'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/6536588235382233547'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/07/blog-post.html' title='आई हेट लेव स्टोरीज'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-4447066846184036438</id><published>2010-06-28T04:06:00.000-07:00</published><updated>2010-06-28T04:07:46.717-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा - 27 जून 2010'/><title type='text'>क्रांतिवीर</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नेक इरादों की कमजोर क्रांतिवीर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नाना पाटेकर को लेकर ‘क्रांतिवीर‘ और ‘तिरंगा‘ जैसी यादगार तथा अर्थपूर्ण फिल्में बनाने वाले मेहुल कुमार ने अपनी बेटी जहान ब्लोच को लाॅंन्च करने के लिए ‘क्रांतिवीर‘ का सीक्वेल बनाया है। फिल्म का चुनाव अच्छा है और उनका इरादा भी नेक है। लेकिन केवल नेक इरादों भर से बेहतर फिल्में नहीं बन सकतीं। एक कमजोर तथा गए जमाने की पटकथा के चलते यह सीक्वेल प्रभावित करने में कामयाब नहीं हो पाया है। जहान ब्लोच इस फिल्म में नाना पाटेकर और डिंपल कपाड़िया की तेजतर्रार बेटी के रोल में है। समाज में फैली विसंगतियों और असमानताओं को लेकर वह जहां तहां भिड़ जाती है। अंततः वह फिल्म के हीरो समीर आफताब के साथ मिलकर टीवी मीडिया के जरिए सामाजिक क्रांति करने का उद्देश्य अपने सामने रखती है। इस उद्देश्य में उसका साथ देते हैं उसके दो और युवा दोस्त आदित्य सिंह राजपूत तथा हर्ष राजपूत। इन दोनों में से एक राज्य के भ्रष्ट मंत्री तथा  दूसरा एक लालची बिल्डर का बेटा है। फिल्म के अंत में जहान ब्लोच अपने साथियों की मदद से इस उद्देश्य में उस समय सफल भी हो जाती है जब उसकी एक रिपोर्ट को देखकर आम जनता क्रोध में आ जाती है और भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ क्रांति का बिगुल बजा देती है। अपने आप में यह एक पवित्र लेकिन मासूम विचार है। क्योंकि इस तरह से क्रांतियां नहीं होती हैं। फिर, इस विचार को अमलीजामा पहनाने के वास्ते जिन चार युवा कलाकारों को चुना गया है उन्हें अभी अभिनय का  ककहरा सीखना है। जहान ब्लोच ने ‘राष्ट्रीय सहारा‘ को दिए एक इंटरव्यू में माना है कि इस फिल्म के लिए उसने अपना तीस किलो वजन कम किया। लेकिन यह काफी नहीं है। अभी उसे और पतला होना पड़ेगा। संवाद अदायगी तथा भावाभिव्यक्ति में भी असर लाना होगा। उसके साथी कलाकार समीर आफताब ने ठीक ठाक काम किया है लेकिन बाकी दो हर्ष तथा आदित्य तो कैमरे का सामना भी आत्म विश्वास के साथ नहीं कर पाए हैं अभिनय क्या करते! पूरी फिल्म गोविंद नामदेव और मुकेश तिवारी जैसे समर्थ कलाकारों के दम पर खींची गई है लेकिन दोनों के ही चरित्र नकारात्मक और बेहद ‘लाउड‘ हैं इसलिए प्रभावित नहीं कर पाते हैं। पटकथा, फिल्मांकन, संपादन तीनों पक्ष इस फिल्म की कमजोर कड़ियां हैं। पर खुशी की बात है कि इस फिल्म का गीत-संगीत बेहतर है। खास तौर से एक युवक के जन्म दिन पर फिल्माया हुआ गीत। केवल एक मिनट के बेहद छोटे से दृश्य में दर्शन जरीवाला एक अविस्मरणीय पल सौंप जाते हैं। फरीदा जलाल जहान ब्लोच की नानी के रोल में हैं और उन्होंने अपनी भूमिका सहज ढंग से निभायी है। जिस तरह के समय में हम रह रहे हैं और जैसी क्षणजीवी तथा भौतिकवादी युवा पीढ़ी हमारे इर्द गिर्द है उसे देखते हुए चार आदर्शवादी युवाओं को रोल माॅडल के रूप में पेश करके मेहुल कुमार ने जरूर एक सराहनीय काम किया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशक:   मेहुल कुमार&lt;br /&gt;कलाकार:  जहान ब्लोच, समीर आफताब, हर्ष राजपूत, आदित्य राजपूत, फरीदा जलाल, गोविंद नामदेव, मुकेश तिवारी, दर्शन जरीवाला।&lt;br /&gt;गीत:    समीर &lt;br /&gt;संगीत:   सचिन-जिगर&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-4447066846184036438?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/4447066846184036438/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/06/blog-post_28.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/4447066846184036438'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/4447066846184036438'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/06/blog-post_28.html' title='क्रांतिवीर'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-7539830543421791295</id><published>2010-06-19T04:03:00.000-07:00</published><updated>2010-06-19T04:05:05.116-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='19 जून 2010'/><title type='text'>रावण</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे भी तो संभव है ‘रावण‘&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मणि रत्नम नामवर निर्देशक हैं। अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्या राय को लेकर उन्होंने ‘गुरू‘ बनायी, जो बाॅलीवुड और अभिषेक बच्चन के करियर में मील के पत्थर की तरह दर्ज रहेगी। फिल्म बाॅक्स आॅफिस पर भी हिट हुई थी। अब मणि रत्नम ‘रावण‘ लेकर आये हैं। इसमें भी अभिषेक-ऐश्वर्या की जोड़ी है। मीडिया में इस फिल्म की आए दिन चर्चा होती रही है। कभी इसकी मेकिंग को लेकर, कभी इसमें फिल्माए जंगलों को लेकर कभी ऐश्वर्या तथा अभिषेक के हैरतअंगेज स्टंट दृश्यों को लेकर तो कभी शूटिंग के दौरान होने वाली मुसीबतों के चलते। इन सब पैमानों पर ‘रावण‘ खरी उतरती है। अभिषेक और ऐश्वर्या ने इस फिल्म में सचमुच अपने जीवन के अब तक के सबसे कठिन, खतरनाक लेकिन यादगार दृश्यों को अंजाम दिया है। फिल्म की मेकिंग, एडीटिंग, सिनेमेटोग्राफी, बैकग्राउंड म्यूजिक, निर्देशन, अभिनय, गीत सब कुछ आला दर्जे का और अनूठा है। लेकिन कहानी के स्तर पर फिल्म में एक जबर्दस्त चूक हो गयी है। न तो इस फिल्म का नाम ‘रावण‘ होना चाहिए था न ही इसके प्रमुख पात्रों को ‘रामायण‘ के पात्रों की छाया जैसा दिखाना चाहिए था। हर क्षेत्र के दिग्गज लोग इस फिल्म के साथ जुड़े हुए हैं। यह सलाह मणि रत्नम को किसी ने नहीं दी कि ‘रावण‘ जैसे बुराई के आपादमस्तक प्रतीक से भारत की जनता स्वयं को सकारात्मक स्तर पर कभी जोड़ना पसंद नहीं करेगी। रावण, रामायण और रामायण के पात्रों के आ जाने से फिल्म की भावनात्मक और संवेदनात्मक अपील पर प्रतिकूल असर पड़ा है। बौद्धिक स्तर पर भी इसकी कोई विशेष क्या, कतई जरूरत नहीं थी। सीधी सादी बीरा की कहानी है जो अपनी बहन पर हुए जुल्म का बदला लेने के लिए पुलिस अधिकारी की पत्नी का अपहरण करता है। दोनों में जंग होती है और अंततः प्रशासन जीत जाता है। विद्रोह कुचल दिया जाता है। कबीलाई नेता बीरा पुलिस अधिकारी की पत्नी रागिनी के प्रति आसक्त होता है। रागिनी भी उसकी अच्छाई, उसकी निष्ठा, उसके समर्पित प्रेम के कारण अंत में उसे लेकर कहीं भावनात्मक स्तर पर कमजोर पड़ती है। यह स्थिति एकदम स्वाभाविक भी है लेकिन एक यथार्थवादी कहानी के धरातल पर बने रह कर। लेकिन जैसे ही दर्शक को अहसास होता है कि यह नयी व्याख्या एक पौराणिक ग्रंथ के मशहूर चरित्रों के संदर्भ में हो गयी है, वह उससे अपना सामंजस्य नहीं बिठा पाता। इतनी प्रचारित, महंगी, बड़ी स्टार कास्ट वाली अद्भुत फिल्म इसीलिए दर्शकों के मोर्चे पर परास्त होती दिखती है। फिर भी एक जोखिम उठाने के लिए फिल्म की टीम से जुड़े सभी लोगों को सलाम। विशेष कर भोजपुरी स्टार रवि किशन को।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशक:  मणि रत्नम &lt;br /&gt;कलाकार: अभिषेक बच्चन, ऐश्वर्या राय बच्चन, विक्रम, गोविंदा, निखिल द्विवेदी, रवि किशन, प्रिया मणि &lt;br /&gt;गीत:   गुलजार&lt;br /&gt;संगीत:  ए.आर.रहमान&lt;br /&gt;सिनेमेटोग्राफी: संतोष सिवन&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-7539830543421791295?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/7539830543421791295/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/06/blog-post_19.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/7539830543421791295'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/7539830543421791295'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/06/blog-post_19.html' title='रावण'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-6775360489223362536</id><published>2010-06-05T03:18:00.000-07:00</published><updated>2010-06-05T03:20:04.212-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा 05-06-2010'/><title type='text'>राजनीति</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विराट और भव्य ‘राजनीति‘&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रकाश झा की नयी फिल्म ‘राजनीति‘ सब लोगों को देखनी चाहिए। उन्हें भी जो कहते हैं कि हमें राजनीति से कोई लेना देना नहीं। हम जो गेहूं का दाना घर में लाते हैं, वह भी राजनीति से अछूता नहीं है फिर कोई मनुष्य राजनीति से अलग कैसे रह सकता है। फिल्म ‘राजनीति‘ भी हमें यही संदेश देती है कि हम चाहें या न चाहें लेकिन राजनीति हमें पग-पग पर न सिर्फ संचालित करती है बल्कि भ्रष्ट भी करती है। राजनीति ने मनुष्य के कोमलतम रिश्तों में भी सेंध लगा दी है और मानवीयता तथा संवेदनशीलता जैसे पवित्र तथा अनिवार्य रूप से बेहतरीन गुणों को एक बड़े बाजार में धंधे पर बिठा दिया है। एक विराट और भव्य फिल्म बनाई है प्रकाश झा ने। यह उनके अब तक के जीवन का सबसे कामयाब, शानदार, जानदार काम है। अब तक की सबसे दिव्य, बौद्धिक उपलब्धि। यह फिल्म देख कर पता चलता है कि रणबीर कपूर, कैटरीना कैफ, मनोज बाजपेयी और अर्जुन रामपाल के भीतर जो प्रतिभा मौजूद है उसे अभी और और खोजा जाना बाकी है। अजय देवगन ने तो लीक से हट कर किए जीवंत अभिनय से अपने सामने ही चुनौती पेश कर दी है। नाना पाटेकटर और नसीरुद्दीन शाह मंजे हुए अभिनेता हैं। उनके होने ने फिल्म को गरिमा दी है। नाना पाटेकर का चरित्र पूरी फिल्म को अनवरत गति देने का काम भी करता है। इस बात को बहुत ज्यादा प्रचारित किया गया है कि ‘राजनीति‘ की प्रेरणा ‘महाभारत‘ से ली गयी है लेकिन ऐसा कुछ बहुत ठोस नहीं है। प्रकाश झा की फिल्म में महाभारत के कुछ चरित्रों की छायाएं जरूर दिखती हैं लेकिन उनका समय और संदर्भ वर्तमान यथार्थ से जुड़ा हुआ है। फिल्म के अंत में जब कैटरीना कैफ के व्यक्तित्व का राजनीतिकरण होता है तब हम उनके भीतर जरूर एक वर्तमान राजनैतिक व्यक्तित्व की छवियां तलाश सकते हैं लेकिन यह सब एक ‘सिनेमाई पाठ‘ की वजह से हुआ है। मनोज बाजपेयी ने करिश्माई काम किया है। कह सकते हैं कि ‘राजनीति‘ ने उन्हें नया जीवन दिया है। सत्ता की बनैली और दुर्दांत राजनीति में रिश्ते-नाते कैसे धू-धू कर के जल जाते हैं, इसका एक ठोस, अर्थपूर्ण और यथार्थवादी विमर्श पेश किया है प्रकाश झा ने। काॅमेडी के बाजार में एक सार्थक हस्तक्षेप। गीत-संगीत और संवाद भी रचनात्मक हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्देशक:   प्रकाश झा&lt;br /&gt;कलाकार:  नाना पाटेकर, नसीरुद्दीन शाह, अजय देवगन, रणबीर कपूर, कैटरीना कैफ, मनोज बाजपेयी, अर्जुन रामपाल आदि।&lt;br /&gt;संगीत:  प्रीतम चक्रवर्ती, आदेश श्रीवास्तव, शांतनु मोईत्रा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-6775360489223362536?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/6775360489223362536/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/06/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/6775360489223362536'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/6775360489223362536'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='राजनीति'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' 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उसमें ऋतिक ने करिश्मा और जादू सब कर दिया है। कंगना ने भी उसमें अपनी जान लगा दी है। लेकिन इतनी भव्य और खर्चीली फिल्म की कहानी बस इतनी सी है कि कंगना रानावत ऋतिक रोशन से प्यार प्यार करती है जबकि ऋतिक को बारबरा मूरी से प्यार है। बारबरा कंगना के भाई निक ब्राउन की मंगेतर है। निक और कंगना लाॅस वेगास के सबसे बड़े कैसीनो मालिक कबीर बेदी की संताने हैं। निक और कबीर गुंडों की लंबी चैड़ी फौज के साथ लगभग माफिया सरदारों जैसा जीवन जीते हैं। फिल्म के अंत में ऋतिक रोशन और बारबरा मूरी अलग-अलग ढंग से आत्महत्या कर लेते हैं। ऋतिक और बारबरा को एक दूसरे की भाषा समझ नहीं आती। दोनों कबीर बेदी की संतानों से केवल धन के लिए जुड़े थे। फिर पता नहीं क्यों वैभव तथा ताकत का दामन छोड़ कर दोनों एक दूसरे से मोहब्बत करने लगे और माफिया राज से टकरा बैठे। दोनों का प्रेम बेहद जटिल और अबूझ है। फिल्म में कंगना का ‘स्पेस‘ कम है तो भी उसने जानदार अभिनय किया है। भारी प्रचार के बावजूद बारबरा मूरी न तो अभिनय से और न ही सेक्स अपील से प्रभावित कर पायीं। पूरी फिल्म केवल और केवल ऋतिक रोशन के भरोसे खड़ी की गयी है और फिल्म देखी भी ऋतिक के कारण ही जाएगी। ऋतिक का डांस, भागने-लड़ने के दृश्य, बाॅडी लैंग्वेज, आंखों की भाषा सब कुछ बेहद अद्वितीय और विस्मयकारी है। उनके अपोजिट हिंदी और अंग्रेजी न जानने वाली मैक्सिकन हीरोईन रखने की आवश्यकता नहीं थी। अपने भारत की टाॅप टेन अभिनेत्रियों में से कोई भी होती तो फिल्म का मुकद्दर ही बदल जाता। प्यार भले ही भाषा की दीवार को नहीं मानता लेकिन फिल्म को अच्छी तरह समझने के लिए भाषा ही प्राथमिक है। फिल्म बनाने में निर्माता राकेश रोशन ने दिल खोल कर पैसा खर्च किया है। उनकी निर्देशकीय क्षमता को देखते हुए यह विचार आना स्वाभाविक है कि अगर इस फिल्म का निर्देशन उन्होंने किया होता तो शायद नतीजे ज्यादा बेहतर होते। फिर भी, एक बार तो फिल्म देखनी ही चाहिए - लोकेशंस, तकनीक और ऋतिक के लिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्माता:   राकेश रोशन&lt;br /&gt;निर्देशक:  अनुराग बसु&lt;br /&gt;कलाकार:  ऋतिक रोशन, बारबरा मूरी, कंगना रानावत, कबीर बेदी, निक ब्राउन, यूरी सूरी&lt;br /&gt;संगीत:   राजेश रोशन&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3758255263817014188-2317280335071910099?l=dhirendraasthana.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/feeds/2317280335071910099/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/05/blog-post_22.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/2317280335071910099'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3758255263817014188/posts/default/2317280335071910099'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dhirendraasthana.blogspot.com/2010/05/blog-post_22.html' title='काइट्स'/><author><name>dhirendra asthana</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02245418948506694932</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_PTgWpqAhAqQ/Sa6r2Ze2tYI/AAAAAAAAAAM/XUSeHfKOJYI/S220/dhirendra+asthana2.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3758255263817014188.post-3193533589431107455</id><published>2010-05-15T03:59:00.000-07:00</published><updated>2010-05-15T04:00:59.814-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय सहारा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='15 मई 2010'/><title type='text'>बम बम बोले</title><content type='html'>फिल्म समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गरीबी का ग्लोबल आख्यान ‘बम बम बोले‘&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब भारत के महान फिल्मकार सत्यजित रे विश्व के स्तर पर सराहे जाते थे तो बाॅलीवुड का एक वर्ग चिल्लाता था, ‘रे साहब भारत की गरीबी बेच रहे हैं।‘ लेकिन ये अपने प्रियदर्शन बाबू तो शुद्ध रूप से ‘मेनस्ट्रीम सिनेमा‘ के सरताजों में से हैं। ये तो मनोरंजक, कमर्शियल और मुख्य धारा का सिनेमा बनाते हैं। तो इनकी बनायी ‘बम बम बोले‘ को क्या कहें? एक तथाकथित अमीर देश के सचमुच के गरीब हिस्से का मार्मिक बाइस्कोप है यह। कह सकते हैं कि गरीबी का ग्लोबल आख्यान है क्योंकि ‘टैरर‘, ‘आतंकवादी‘ आदि शब्दों-गतिविधियों के जुड़ते ही मामला लोकल से सीधे अंतरराष्ट्रीय हो जाता है।&lt;br /&gt;दिल-दिमाग को (झकझोर देने वाली नहीं), अवसादग्रस्त कर देने वाली इस फिल्म को क्या परिभाषा दें? बच्चों के संदर्भ में फिल्में दो तरह की हो
